Friday, December 31, 2010

नए साल की हार्दिक शुभकामनाएं

आईये देखिये आतंकियों का एक ज़लील चेहरा !!!???

शीर्षक काफ़ी संवेदनशील है... मगर क्या मेरा यह फ़र्ज़ नहीं कि जो सत्य है उसे लोगों का जानना ज़रूरी है... मेरे हिसाब से बहुत ज़रूरी है और अब तो ये बहुत ज़्यादा ज़रूरी है जब अदालत के न्यायाधीश लोग भी आस्था के आधार पर फ़ैसला लेने लगें ! जस्टिस शर्मा ने अपने भविष्य के लिए पर्याप्त ख़र्चा-पानी का बन्दोबस्त कर चुकें है, ठीक उसी तरह से जब फैज़ाबाद के तात्कालीन मजिस्ट्रेट ने भी कुछ इसी तरह का फ़ैसला सुनाया था जिसके तुरंत बाद उन्होंने फैजाबाद से चुनाव लड़ा लेकिन जनता ने उन्हें नकार दिया था. ख़ैर वो बाद की बात है आज "बाबरी मस्जिद का शहीद होना भारतीय-संविधान और विधिक-व्यवस्था के प्रति खुला विद्रोह है" आईये देखिये हिन्दू-आतंकियों का एक ज़लील चेहरा !!!

आईये देखते है वो चित्र जो राम के काले दिल वाले भक्तों की काली करतूत को उजागर करता है और जिसकी लाठी उसकी भैस वाली कहावत को चरितार्थ भी करता है:::

बाबरी मस्जिद का एक चित्र
कोई फ़र्क़ नहीं ???? सचमुच आप किसके साए में महफूज़ है???  
ये रहे असली भारत का मुहँ काला करने वाले
भगवा आतंक का एक भयानक चेहरा 
भारत सरकार लाचार थी, दुनियाँ की सबसे बड़ी आतंकी घटना को रोकने के लिए
इकट्ठा हुए आतंकी 
क्या यही है हिंदुत्व और हिन्दू धर्म ???
क्या यही है हिन्दू धर्म???
बाबरी मस्जीद शहीद करने के लिए जमा हुए हिन्दू आतंकी

हिन्दू आतंकवादियों के सरगना, जो भारत में खुलेआम घूम रहे हैं  
और मस्जिद शहीद कर दी गयी
बाबरी मस्जिद शहीद होने के बाद, वहीँ बना डाला मुफ्त की जगह पर मंदिर

बाबरी मस्जिद को शहीद करने वाले हत्यारों की काली सूची; कुल 67* हैं... गिनती जारी !!!

आज जानिए उन सभी लोगों की पूरी की पूरी  लिस्ट जो बाबरी मस्जिद के हत्यारे थे और आज भी खुलेआम घूम रहे हैं...सत्ता का सुख भोग रहे हैं...!!! लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक़ जिन लोगों ने भारत देश में सन '92 में खूनी खेल खेलने और दंगा भड़काने और बाबरी मस्जिद शहीद करने में शामिल थे, कि लिस्ट निम्नवत हैं:::


  1. आचार्य धर्मेन्द्र देव, धर्म संसद
  2. आचार्य  गिरिराज किशोर, विश्व हिन्दू परिषद् का वाइस-प्रेसिडेंट
  3. ए. के. सरन, आई. जी. सिक्युरिटी, उत्तर प्रदेश
  4. अखिलेश मेहरोत्रा, एडिशनल सुप्रिटेंडेंट ऑफ़ पुलिस, फैज़ाबाद
  5. अशोक सिंघल, विश्व हिन्दू परिषद् का प्रेसिडेंट
  6. अशोक सिन्हा, सचिव, उत्तर प्रदेश टूरिज़्म
  7. अटल बिहारी वाजपाई, भारत का पूर्व प्रधानमंत्री
  8. बद्री प्रसाद तोषनीवाल, विश्व हिन्दू परिषद् (मौत हो गयी 1994)
  9. बैकुंठ लाल शर्मा, विश्व हिन्दू परिषद् (पूर्व MP, पूर्वी दिल्ली)
  10. बाला साहेब ठाकरे, शिव सेना
  11. बी पी सिंघल, विश्व हिन्दू परिषद् (अशोक सिंघल का भाई)
  12. ब्रह्मा दत्त द्विवेदी, बी जे पी, (पूर्व मंत्री उत्तर प्रदेश, हत्या कर दी गयी 1998)
  13. चम्पत राय, लोकल कंस्ट्रक्शन मैनेजर
  14. दाऊ दयाल खन्ना, बी जे पी 
  15. डी. बी रॉय, सीनियर सुप्रिटेंडेंट ऑफ़ पुलिस, फैज़ाबाद (बीजेपी के टिकट से लोक सभा में दो बार एंट्री, बाद में हिन्दू महासभा को ज्वाइन किया)
  16. देवरहा बाबा, संत समाज
  17. गुर्जन सिंह, विश्व हिन्दू परिषद्/आर एस एस
  18. जी एम् लोढ़ा, बीजेपी
  19. एस. गोविन्दचार्या, आर एस एस, (बाद में आरएसएस वालों ने इसे लात मार दिया)
  20. एच वी शेषाद्री, आर एस एस (2005 में मर गया)
  21. जय भगवान् गोयल, शिव सेना (बाद में राष्ट्रवादी शिवसेना बनाई)
  22. जय भान सिंह पवारिया, बजरंग दल (बीजेपी के टिकेट से ग्वालियर से 1999 में एमपी)
  23. के एस सुदर्शन, आर एस एस
  24. कलराज मिश्रा, बीजेपी, (राज्य सभा सदस्य 1963-1968, सदस्य विधान परिषद 1986-2001)
  25. कल्याण सिंह, बीजेपी, उत्तर प्रदेश का पूर्व मुख्यमंत्री
  26. खुशाभाऊ ठाकरे, आर एस एस, (मौत 2003)
  27. लालजी टंडन, बीजेपी
  28. लल्लू सिंह चौहान, बीजेपी
  29. एल के आडवानी, बीजेपी
  30. महंत नृत्य गोपाल दास, प्रेसिडेंट राम जन्मभूमि न्यास, सदस्य विश्व हिन्दू परिषद्
  31. महंत  अवैध्य नाथ, हिन्दू महासभा (गोरखपुर से चार बार एम पी)
  32. महंत परमहँस राम चन्द्र दास, विश्व हिन्दू परिषद्
  33. मोरेश्वर दिनानंत सवे, शिवसेना
  34. मोरपंथ पिंगले, शिवसेना
  35. मुरली मनोहर जोशी, बीजेपी
  36. ओम पकाश सिंह (पूर्व मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश)
  37. ओंकार भवा, विश्व हिन्दू परिषद्/आर एस एस 
  38. प्रमोद महाजन, बीजेपी (अपने ही भाई के हांथो मारा गया 2006 में)
  39. प्रवीण तोगड़िया, विश्व हिन्दू परिषद्/आर एस एस
  40. प्रभात कुमार, मुख्य गृह सचिव, उत्तर प्रदेश शासन
  41. पुरुषोत्तम नारायण सिंह, विश्व हिन्दू परिषद्
  42. राजेन्द्र गुप्ता, मंत्री, उत्तर प्रदेश
  43. राजेन्द्र सिंह उर्फ़ रज्जू भैया, आर एस एस
  44. रामशंकर अग्निहोत्री, विश्व हिन्दू परिषद्
  45. राम विलास वेदांती, बीजेपी से दो बार एम पी
  46. आर  के गुप्ता, बीजेपी, वित्त मंत्री, उत्तर प्रदेश
  47. आर एन श्रीवास्तव, डीएम, फैज़ाबाद
  48. साध्वी ऋतंभरा, संत समाज/ विश्व हिन्दू परिषद्
  49. शंकर सिंह वाघेला, बीजेपी
  50. सतीश प्रधान, शिव सेना
  51. श्री चन्द्र दीक्षित, बीजेपी, (प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट, एस डी एम, पी सी एस- 1948-1950, आई पी एस सेवा, एस पी-बाराबंकी, फैज़ाबाद, एटा, अतिरिक्त एस पी-लखनऊ, इलाहाबाद, कानपुर कुम्भ मेला, एस एस पी, अलीगढ़, वाराणसी, डी आई जी ऑफ़ पुलिस बरेली मेरठ गोरखपुर- 1950-1970, बीजेपी से एम पी डिप्टी डाइरेक्टर इंटेलीजेन्स ब्यूरो- 1970-1975, आईजी, सीआईडी इंटेलीजेन्स, डाइरेक्टर जनरल ऑफ़ होमगार्ड व सिविल डिफेन्स, उत्तर प्रदेश, DGP-पुलिस, उत्तर प्रदेश 1982-1984)
  52. सीता राम अगरवाल, विश्व हिन्दू परिषद्
  53. एस पी गौर, कमिश्नर, IAS ऑफिसर
  54. सुन्दर सिंह भंडारी, बीजेपी, पुराना जनसंघी 
  55. सूर्य प्रताप साही, मंत्री, कल्याण सिंह कैबिनेट
  56. स्वामी चिन्मयानन्द, विश्व हिन्दू परिषद्. मंत्री वाजपई मंत्रालय  
  57. स्वामी सच्चिदानन्द उर्फ़ साक्षी महाराज, बीजेपी, बाद में सपा
  58. एस वी एम त्रिपाठी, DGP, उत्तर प्रदेश
  59. स्वामी सतमित राम जी, संत समाज
  60. स्वामी सत्या नन्द जी, संत समाज
  61. स्वामी वाम देव जी, संत समाज
  62. उमा भारती, विश्व हिन्दू परिषद्/ आर एस एस 
  63. यू पी बाजपाई, DIG, फैज़ाबाद
  64. विजयराजे सिंधिया, बीजेपी
  65. वी के सक्सेना, मुख्य सचिव, उत्तर प्रदेश
  66. विनय कटियार, आर एस एस/ बीजेपी
  67. युद्धनाथ पाण्डे, शिव सेना


*नीले रंग वालों को गौर से पढ़ें और जाने, ये वो लोग है जो उत्तर प्रदेश के शासन और प्रशासन में उच्च पदों पर कार्यरत थे और बाद में भी रहे... !!!

Thursday, December 30, 2010

अपराधी को निर्दोष तथा निर्दोष को अपराधी साबित किया जाता है

डॉक्टर बिनायक सेन को सजा के प्रश्न पर पक्ष और विपक्ष में बहस जारी है। मुख्य समस्या यह है कि पुलिस या अन्वेषण एजेंसी किसी भी मामले की विवेचना करती है। उसके पश्चात आरोप पत्र न्यायालय भेजा जाता है। संज्ञेय अपराधों में अभियुक्त को पुलिस गिरफ्तार कर मजिस्टरेट के समक्ष पेश करती है। वहीँ से शुरू होते हैं जमानत के मामले। देश के अन्दर जांच एजेंसियों की विवेचना का स्तर अत्यधिक घटिया है। जिस कारण अपराधी बेदाग छूट जाते हें और निर्दोष सजा पा जाते हें। स्तिथि बद से बदतर है, हत्या के अपराध में लोग आजीवन कारावास की सजा न्यायालयों से पा गए बाद में मृतक व्यक्ति जिन्दा होकर पुन: आ गया। अपहरण के मामलों में अक्सर होता है कि अपहरण हुआ भी नहीं लोग सालों जेलों में रहे और सजा भी पा गए। ब्रिटिश कालीन विधि में यह व्यवस्था थी कि जो भी शासन सत्ता के विरुद्ध जरा सा भी जाता था। उसको राजद्रोह जैसे अपराधों में गिरफ्तार कर न्यायालय से दण्डित करा दिया जाता था। ब्रिटिश कानून से ही भारतीय दंड संहिता पैदा हुई है। इसमें जगह-जगह बड़े आदमियों के अपराधों को लघु करने तथा लघु अपराध को गंभीर अपराध बनाने की व्यवस्था है। जो साफ़-साफ़ आये दिन दिखाई भी देती है। जब पुलिस चाहती है तो गंभीर अपराध को लघु अपराध घोषित कर देती है और जब चाहती है तो लघु अपराध को गंभीर अपराध घोषित कर देती है। जिससे निर्दोष को महीनो जेल में रहना पड़ता है और अपराधी को तुरंत जमानत मिल जाती है। न्यायालय में प्रक्रिया विधि चलती है और प्रक्रिया के तहत ही फैसले होते रहते हें। अपराधों की बढ़ोतरी को देखते हुए न्यायालय दरोगा की भूमिका में आ गए हैं और उनकी समझ यह है कि ज्यादा से ज्यादा सजा देकर हम अपराध का नियंत्रण कर रहे हैं। अभी तक न्याय व्यवस्था का मुख्य सिद्धांत है कि किसी निर्दोष को सजा नहीं होनी चाहिए चाहे अपराधी छूट जाए लेकिन अब इस सिद्धांत में मौखिक रूप से संशोधन हो चूका है निर्दोष व सदोष देखना उनका मकसद नहीं रह गया प्रक्रिया पूरी है तो सजा दे देनी है। देश में जब तमाम सारी अव्यस्थाएं है तो उनके खिलाफ बोलना, आन्दोलन करना, प्रदर्शन करना, भाषण करना आदि लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं हैं लेकिन जब राज्य चाहे तो अपने नागरिक का दमन करने के लिए उसको राज्य के विरुद्ध अपराधी मान कर दण्डित करती है। डॉक्टर बिनायक सेन जल, जंगल, जमीन के लिए लड़ रहे आदिवासी कमजोर तबकों की मदद कर रहे थे और राज्य इजारेदार कंपनियों के लिए किसी न किसी बहाने प्राकृतिक सम्पदा अधिग्रहित करना चाहता है। उसका विरोध करना इजारेदार कंपनियों का विरोध नहीं बल्कि राज्य का विरोध है। इजारेदार कम्पनियां आपका घर, आपकी हवा, आपका पानी, सब कुछ ले लें आप विरोध न करें। यह देश टाटा का है, बिरला का है, अम्बानी का है। इनके मुनाफे में जो भी बाधक होगा वह डॉक्टर बिनायक सेन हो जायेगा।

यही सन्देश भारतीय राज्य, न्याय व्यवस्था ने दिया है।


-लोकसंघर्ष !

Wednesday, December 29, 2010

कांग्रेस के बुरांड़ी अधिवेशन में बढ़ती महंगाई, रोता आम आदमी और भरोसा दिलाते प्रधानमंत्री

दो साल से ज्यादा हो गये जब वाम मोर्चा ने संप्रग-1 सरकार से समर्थन वापस लेते समय जो कारण गिनाये थे उनमें एक मुद्दा महंगाई का भी था। आजादी के बाद के इतिहास में महंगाई बढ़ने की अभूतपूर्व गति बरकरार है। कृषि मंत्री शरद पवार जब भी मुंह खोलते हैं, महंगाई और बढ़ जाती है। प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री और योजना आयोग के उपाध्यक्ष इत्मीनान से बंसी बजा रहे हैं कि आने वाले तीन महीनों में महंगाई पर काबू पा लिया जायेगा लेकिन महंगाई बढ़ती जा रही है, आम आदमी रो रहा है और प्रधानमंत्री मार्च 2011 तक महंगाई पर काबू पाने का भरोसा दिला रहे हैं परन्तु कर ऐसा कुछ रहे नहीं हैं जिससे महंगाई पर काबू पाया जा सके।

कांग्रेस के बुरांड़ी अधिवेशन में कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने एक आम आदमी की चर्चा की है। वे मानते हैं कि ”आम आदमी“ वह है जिसका उनकी व्यवस्था से कोई सम्पर्क नहीं है। शायद यही कारण है कि उसके दर्द को भूमंडलीकरण-उदारीकरण-निजीकरण की यह व्यवस्था समझने को तैयार नहीं है। इस आम आदमी का रेखाचित्र बनाते हुए एक काव्यात्मक अंदाज में कांग्रेस के युवराज ने कहा - ”वह गरीब हो या अमीर, शिक्षित हो या अशिक्षित, हिंदू हो या मुसलमान, सिख हो या ईसाई, अगर वह इस व्यवस्था से नहीं जुड़ा है तो वह ‘आम आदमी’ है। ..... यह आम आदमी नियमगिरि का वह आदिवासी बालक है, जिसे अपनी जमीन से बिना किसी कानून के बेदखल कर दिया जाता है। यह आम आदमी झांसी का वह दलित बालक है जिसे अपनी कक्षा में दलित होने के कारण सबसे पीछे बिठाया जाता है। वह बंगलुरू का वह युवा प्रोफेशनल है, जिसके बच्चे को ऊंची कैपिटेशन फीस न दे पाने के कारण अच्छे स्कूल में दाखिला नहीं मिल पाया। वह शिलांग के विश्वविद्यालय का टाॅपर है, जिसे इसलिए काम नहीं मिल सका, क्योंकि वह सही लोगों को नहीं जानता। वह अलीगढ़ का वह किसान है जिसे अपनी जमीन का उचित मुआवजा नहीं मिला है। वह हैदराबाद का बिजनेसमैन है जिसके अपने सम्पर्क नहीं हैं। यह ऐसा नौकरशाह है, जिसका भविष्य समझौता न करने की वजह से जोखिम में है। यह वह मेट्रो वर्कर है जिसने अपने खून-पसीने से उसे बनाया है, लेकिन जिसका उसे कोई श्रेय नहीं मिलता है। ...... वह जी-जान से इस देश को रोज बनाता है फिर भी हमारी व्यवस्था उसे हर कदम पर कुचलती है।“ आम आदमी को कुचलने का धमंड कांग्रेस में कूट-कूट कर भरा हुआ है।

इस रेखाचित्र में महंगाई और भ्रष्टाचार का मारा वह आम आदमी कहीं राहुल गांधी को नहीं दिखाई देता जिसके दुःख दर्दों के लिए उनकी तीन पीढ़ियां जिम्मेदार हैं। वे तीन पीढ़ियां जिन्होंने इस देश पर लम्बे समय तक शासन किया है। उनकी दादी इंदिरा गांधी के युग में इस आदमी के नाम का अखण्ड जाप कांग्रेस और सरकार रात-दिन करती रहती थी परन्तु उसके लिए करती कुछ नहीं थीं। उससे केवल वोट लेती थी। इस रेखाचित्र से कई सवाल उठते हैं, लेकिन एक सवाल को उठाना जरूरी है - आखिर कौन है जिम्मेदार जिसके कारण नियमगिरि का आदिवासी बालक अपनी जमीन से बेदखल होता है, दलित बालक को सबसे पीछे बैठना पड़ता है, पूरे देश के गरीबों और निम्न मध्यमवर्गीय लोगों की संतानें शिक्षा से वंचित रह जा रही हैं, टाॅपरों को रोजगार नहीं मिलता आदि आदि। क्या जिम्मेदार वे सरकारें नहीं जो केन्द्र में या राज्यों में कांग्रेस चला रही है? क्या जिम्मेदार वे नीतियां नहीं जिन्हें उनकी पार्टी ने इस देश में चलाना शुरू किया था? राहुल गांधी इस आम आदमी को एक बार फिर बेवकूफ बना कर वोट बटोरने की राजनीति खेल रहे हैं।

कांग्रेस के इसी अधिवेशन में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा है कि मार्च 2011 तक महंगाई दर गिर कर 5.5 प्रतिशत हो जायेगी। इसे पढ़ कर या सुनकर अजीब सी अनुभूति होती है। उनकी सरकार के अनुसार तो महंगाई दर गिर कर नवम्बर में 7.48 प्रतिशत आ गयी है लेकिन आज प्याज 70 रूपये किलो बिक रहा है। पेट्रोल के भाव पिछले पांच महीनों में पांच बार कीमतें बढ़ाकर 60 रूपये प्रति लीटर सरकार ने पहुंचा ही दिये हैं। डीजल, किरोसिन और रसोई गैस की कीमतें बढ़ाने की तैयारी है। खाद्यान्न व्यापार में विदेशी पूंजी को अनुमति दी जा रही है, सट्टेबाजी कराई जा रही है और आयात-निर्यात का खेल चल रहा है। आम आदमी भूखों मरता है तो मरे। 87 करोड़ जनता 20 रूपये प्रतिदिन से कम आमदनी पर जीवित है, महंगाई के बावजूद गरीबी की इस रेखा में कोई परिवर्तन नहीं आया है। मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी में कोई अन्तर नहीं आया है। उस आम आदमी की कोई पीड़ा उनके चेहरे पर नहीं झलकती।

कांग्रेस के इसी अधिवेशन में प्रस्तुत एक आर्थिक प्रस्ताव कहता है कि विकासशील देश में कुछ कीमतें इसलिए बढ़ती हैं कि उनकी आपूर्ति और मांग के मध्य असंतुलन होता है। कुछ कीमतें इसलिए बढ़ती हैं कि कई सेवाओं और वस्तुओं के निर्माताओं को ज्यादा कीमत दिये जाने की जरूरत होती है। कुछ कीमतें इसलिए बढ़ती हैं कि अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में उनकी कीमतें ऊपर चली जाती हैं। इस प्रस्ताव में भी कहीं दर्द नहीं झलकता उस आम आदमी का। यानी सब कुछ किसी न किसी कारक का सहज परिणाम है क्योंकि मुक्त अर्थव्यवस्था में सब कुछ सरमाया करता है, सरकारें कुछ नहीं। सरकारें तो केवल घोटाले, घपले और भ्रष्टाचार के लिए बनाई जाती हैं जिनसे आम आदमी का कोई सम्पर्क नहीं है। शायद वह समय आ गया है जब यह सवाल भी खड़ा किया जाये कि सरकारों की फिर जरूरत क्या है?

कांग्रेस के बुरांड़ी अधिवेशन ने आम आदमी को एक बार फिर ललकारा है कि तेरा कोई वजूद नहीं, तेरा कोई महत्व नहीं, तेरी कोई जरूरत नहीं, तेरी कोई अस्मिता नहीं।

आम आदमी का खून अगर अब भी इस ललकार से नहीं खौलता तो शायद वह पानी ही है खून नहीं!



प्रदीप तिवारी
(लेखक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, उत्तर प्रदेश का कोषाध्यक्ष है)

सपा और कांग्रेस की शांति में 'पीस पार्टी ' का दखल

मुसलमानों के पक्ष में उलेमा काउंसिल बनी, नेशनल लोकतांत्रिक पार्टी(नेलोपा) ने लड़ाई लड़ी और अब भविष्य की उम्मीदें लेकर पीस पार्टी उभरी है। मुसलमानों को लगता है कि इन तीनों पार्टियों के नेतृत्वकर्ता मुस्लिम है,इसलिए वह समुदाय को संदिग्ध बनाने की कोशिश के खिलाफ मैदान में उतरेंगे।


बाटला हाउस कांड के बाद उत्तर प्रदेश के मुसलमानों में राजनीतिक नेतृत्व की चाहत पहले के मुकाबले ज्यादा ताकतवर ढंग से उभर कर आयी है। यह चाहत उत्तर प्रदेश में उन दलों के लिये चुनौती साबित होने जा रही है जो अपने को धर्मनिरपेक्ष राजनीति के अलंबरदार कहते रहे हैं। धर्मनिरपेक्ष पार्टियों से मुसलमानों का भरोसा उठने के तर्कसंगत कारण हैं और अब उनके बीच यह साफ हो चुका है कि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का जवाब एक नया मुस्लिम ध्रुवीकरण ही है।

मुस्लिम समुदाय ने प्रदेश के दो विधानसभा सीटों के लिए हाल ही में हुए उपचुनावों में पीस पार्टी को मुकाबले में खड़ाकर और कांग्रेस को लड़ाई से बाहर कर अपनी मंशा जाहिर कर दी है। वहीं दोनों सीटों डुमरियागंज और लखीमपुरपर जीत हासिल करने वाली समाजवादी पार्टी भी इस नये राजनीतिक उभार से सकते में है और आरोप लगा रही है कि पीस पार्टी को गोरखपुर के मठाधीश और सांसद आदित्यनाथ से शह मिल रही है।

मुस्लिम समुदाय की इस तरह की चाहत के कारण पहले भी उत्तर प्रदेश और दूसरे राज्यों में ऐसी कई पार्टियों या संगठनों का उदय होता रहा है जो मुसलमानों का हिमायती होने की कोशिश में लगे रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक देश भर में पंजीकृत कुल एक हजार पार्टियों में मुसलमानों की हिमायती करीब 35हैं। केवल उत्तर प्रदेश में पीपुल्स डेमोके्रटिक फ्रंट,   पीस पार्टी ऑफ  इंडिया, मजलिस ए मशवरत, नेशनल लोकतांत्रिक पार्टी, भारतीय परचम पार्टी,इंसान दोस्त पार्टी सक्रिय हैं।

मगर दोबारा से इस अहसास को मुकम्मिल जमीन बाटला हाउस कांड ने दी। कारण कि अयोध्या में हुए बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद पहला मौका था जब उत्तर प्रदेश (खासकर पूर्वी)के मुसलमानों को लगा कि उन्हें नागरिक नहीं मुसलमान समझा जाता है।

आजमगढ़ के युवाओं को जब दिल्ली पुलिस ने आतंकवादी होने के आरोप में जामिया इलाके के बाटला हाउस में मार गिराया और गिरफ्तार किया था तो मुस्लिमों की नुमांईदगी का दावा करने वाली सपा और कांग्रेस ने खुफिया एजेंसियों के दावों के करीब खड़ा होना मुनासिब समझा। यहां तक कि पार्टियों के स्थानीय और छोटे नेताओं ने आजमगढ़ और आसपास के जिलों से पार्टी समर्थक मुसलमानों से बातचीत बंद कर दी और दिल्ली में बैठे बड़े नेता किंतु-परंतु में बयान देते रहे और फायदा आखिरकार खुफिया एजेंसियों और पुलिस को ही होता रहा।

दिल्ली में 13 सितंबर को हुए श्रृंखलाबद्ध बम धमाकों में शामिल रहने के संदेह में 19 सितंबर 2008 को बाटला हाउस में मारे गये साजिद और आतिफ,और उसके बाद एक टीवी चैनल के बाहर से गिरफ्तार आरोपी सैफ की वजह से पूरे आजमगढ़ की तस्वीर तकरीबन आतंकवादियों के गढ़ के तौर पर उभरने लगी।

राजधानी दिल्ली में इस घटना के बाद मुसलमानों को खासकर आजमगढ़ से ताल्लुक रखने वालों को हर स्तर पर सामाजिक बहिष्कार और लानत-मलानत झेलनी पड़ी। दिल्ली में रहकर पढ़ाई और नौकरी कर रहे ज्यादातर युवा अपने घर भाग गये,या गुमनाम होने को मजबूर हुए। प्राइमरी स्कूल के शिक्षक परवेज अहमद बताते हैं कि ‘इस पूरे घटनाक्रम ने धर्मनिरपेक्ष और न्याय की आस रखनेवालों को संदेह भर दिया और मुस्लिमों ने मजबूरी में ही सही मुस्लिम नेतृत्व को फिर गले लगाया।’

आजमगढ़ के सामाजिक कार्यकर्ता मसीउद्दीन के मुताबिक,‘भारत के जिन नागरिकों के परिजन देश की उन्नती और विकास में सदियों से लगे रहे उन्हें इन आरोपों ने जब संदिग्ध बना दिया तो उनकी अंतिम उम्मीद उन जनप्रतिनिधियों पर टिकी जो उनसे वोट लेते हैं। मगर वह भी ताल ठोककर खुफिया एजेंसियों के गलत तौर-तरीकों के खिलाफ मैदान में नहीं उतरे। यहां तक कि सैफ की गिरफ्तारी के बाद जब यह उजागर हुआ कि उसके पिता समाजवादी पार्टी के नेता हैं तो तत्काल प्रभाव से सपा ने इससे इनकार कर दिया था।’
'जनप्रतिनिधियों का नार्को टेस्ट हो' 
राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ अयूब  




पीस पार्टी की कई वैकल्पिक मांगों में से एक ‘नार्को टेस्ट’भी है। पीस पार्टी का मानना है-धार्मिक ग्रंथों  पर हाथ रख नेता झूठी कसमें-वादे करते हैं। इसलिए सभी पार्टियों के अध्यक्षों का नार्को जांच हो कि उनके पार्टी चलाने का मकसद देशहित है या माफियाहित।



ऐसे समय में मुसलमानों के पक्ष में उलेमा काउंसिल बनी,नेशनल लोकतांत्रिक पार्टी(नेलोपा)ने लड़ाई लड़ी और भविष्य की उम्मीदें लेकर पीस पार्टी उभरी। आजमगढ़ के संजरपुर गांव के तारिक कहते हैं,‘मुसलमानों को लगता है कि इन तीनों पार्टियों के नेतृत्वकर्ता मुस्लिम है,इसलिए वह समुदाय को संदिग्ध बनाने की कोशिश के खिलाफ मैदान में उतरेंगे।’

आज यही वजह है कि उत्तर प्रदेश में मुस्लिम प्रतिनिधित्व वाली इन तीनों पार्टियों को राजनीतिक विश्लेषक इसे एक नयी बयार के रूप में देख रहे हैं। हालांकि इन पार्टियों की एक दूसरी ऐतिहासिक सच्चाई कुछ ही दिन मैदान में बने रहने की भी है, जिसका फायदा अंततः दूसरी बड़ी चुनावी पार्टियों को ही होता रहा है।

बाटला हाउस के बाद एक मात्र भरोसेमंद बनी उलेमा काउंसिल के निर्माण के दो साल भी नहीं बीते कि वह खंडित हो गयी और काउंसिल के प्रमुख सदस्य डॉक्टर जावेद अलग हो चुके हैं। आजमगढ़ से  पत्रकार अंबरीश राय कहते हैं,-काउंसिल मुसलमानों का कितना भला कर सकेगी इसका अंदाजा संसदीय चुनाव में आजमगढ़ से भाजपा की जीत से लगाया जा सकता है। जो भाजपा यहां से कभी नहीं जीती थी वह मुस्लिम विरोधी होते हुए भी यहां से पहली बार जीती और सपा हार गयी।’उलेमा काउंसिल के महासचिव असद हयात कहते हैं,‘सपा की हार का कारण काउंसिल नहीं बल्कि सपा का जातिवादी और मुसलमानों को ठगने का इतिहास रहा है।’

उलेमा काउंसिल ने पूर्वी उत्तर प्रदेश की पांच सीटों पर अपने प्रत्याशी खड़े किये थे जिनमें लालगंज और आजमगढ़ सीट पर सपा को हारने का कारण बनी। वहीं पीस पार्टी ने पिछले लोकसभा में कुल इक्कीस प्रत्याशी खड़े किये थे और उसे इन क्षेत्रों में चार फीसदी मतदाताओं ने वोट दिये। जाहिर तौर पर ये दोनों पार्टियां सर्वाधिक नुकसान सपा का करने वाली हैं।

 इसलिए इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि इसका सीधा फायदा भाजपा को होगा। पर इस नजरिये से नेलोपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अरसद खान ऐतराज रखते हैं। उनकी राय में ‘मुस्लिमों और समाज के कमजोर तबके को सभी पार्टियाँ  ठगती रहीं हैं,इसलिए मुस्लिम नेतृत्व का खालिस मतलब यह न निकाला जाये कि हम सिर्फ मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करेंगे।’

आगामी चुनावों में मुस्लिम नेतृत्व की मांग करने वाली इन पार्टियों का प्रदर्शन कैसा होगा,यह तो अभी परखा जाना है। मगर इतना तो साफ है कि पीस पार्टी की बढ़ती ताकत के मद्देनजर बसपा,कांग्रेस और इनसे भी बढ़कर सपा पेरशान है कि प्रदेश में वह अपने को मुसलमानों की हितैषी मानती है।

(पाक्षिक पत्रिका द पब्लिक  एजेंडा से साभार व संपादित)

जज साहब के पौव्वे से चूता है न्याय

हमारे देश में कोई व्यक्ति किसी जज के फैसले या आचरण के खिलाफ यदि अपनी जुबान खोलता है तो है तो उसको न्यायालय की अवमानना के जुर्म में सज़ा हो सकती है. किसी भी समाज में तभी तक शांति रह सकती है, जब तक सब यह महसूस करते हैं कि उनके साथ अन्याय नहीं हो रहा है.यदि अन्याय होगा तो न्याय के लिए आवाज़ उठाने पर उसकी सुनवाई होगी, लेकिन जब समाज में ये व्यवस्था टूटने लगती है तो समाज भी टूटने लगता है, क्योंकि उसके बाद न्याय के लिए लोग फिर अपने तरीकों से लड़ने लगते हैं. 

आज़ादी के बाद हमारा विश्वास राजनेताओं पर से समाप्त हो गया.नौकरशाही विकास के काम करने में न सिर्फ नकारा साबित हुयी, बल्कि विकास में बाधक भी साबित हो गयी. धर्म का खोखलापन पहले ही उजागर हो गया था. ऐसे में इस देश के सामने आज़ादी के बाद आम आदमी के लिए तय किये गए रोटी,बराबरी और इज्ज़त के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कोई भी सहारा नहीं बचा.
हमारे देश में अभी तक किसी भी तकलीफ के निवारण के लिए अदालतों पर आखिरी भरोसा बचा है, गाँव के गरीब आदमी से लेकर बड़े सामाजिक कार्यकर्ता तक किसी समस्या के समाधान के लिए नेता या अधिकारी के पास न जाकर अदालत में गुहार लगाते हैं. लेकिन चिंता का विषय यह है कि अब अदालतें भी बाकी लोकतान्त्रिक संस्थाओं की तरह अपनी विश्वसनीयता खो रही हैं. अदालतों की इस हालत से चिंतित होकर जब कोई व्यक्ति या संस्था समाज का ध्यान इस ओर खींचना चाहता है तो उसे इन अदालतों में बैठे हुए समस्त मानवीय कमजोरियों से भरे हुए लोग न्यायालय की अवमानना की सज़ा का खौफ दिखाकर खामोश कर देते हैं.
मेरा कई वर्षों तक अदालतों से नज़दीकी सम्बन्ध रहा है,पाँच वर्ष तक उपभोक्ता फोरम का सदस्य रहा,तीन वर्ष लोक अदालत की सीनियर बेंच का मेम्बर रहा और चार वर्ष विधिक सेवा प्राधिकरण का सदस्य रहा.इस दौरान जजों के मानसिक स्तर, सोच और चारित्रिक स्तर के बारे में अच्छे से जानने का मौक़ा मिला.
सारी बातें तो खोलकर नहीं बताऊंगा, क्योंकि अश्लील लेखन से बचना चाहता हूँ. लेकिन मैं देखता था कि जज लोग छोटी छोटी बातों जैसे घर जाते समय बस में बिना किराया दिए मुफ्त में सफ़र करने के लिए थानेदार को फोन करते थे.थानेदार जज साहब को सपरिवार बस में मुफ्त ले जाने के लिए बस के कंडेक्टर को धमकाने के लिए सिपाही भेजता था. ऐसे में उसी थानेदार के खिलाफ उसी जज की अदालत में कोई कैसे न्याय पाने की उम्मीद कर सकता है.
जब हमारी संस्था की मदद से 'सलवा जुडूम' से उजाड़े गए लिंगागिरी और बासागुडा गाँव को दुबारा बसाया जा रहा था, और आदिवासी आंध्र प्रदेश और जंगलों में अपने छिपे हुए स्थानों से बाहर आकर अपने उजड़े हुए गावों में जला दिए गये घरों को दुबारा बना रहे थे तो उनके पास खाने के लिए कुछ भी नहीं था.हमारा आदिवासी साथी कोपा और उसकी टीम संस्था की बस में दाल, चावल, तेल, मसाले, आलू, प्याज आदि भरकर उन भूखे ग्रामीणों के लिए दंतेवाडा से बासागुडा जा रहे थे (हालाँकि उन गाँव वालों को राहत पहुंचाना सरकार का काम था जिसके लिए सुप्रीम कोर्ट का आदेश मिला हुआ था) तो 'सलवा जुडूम' और उनकी माई-बाप पुलिस ने इस दाल-चावल से भरी गाडी को रोक लिया और कहा कि इस राशन का बिल दिखाओ तब गाडी को आगे जाने देंगे.
कोपा ने कहा कि 'हम ये सामग्री मुफ्त में बांटने के लिए ले जा रहे हैं,हम गाँववालों को इसका बिल थोड़े ही देंगे. बिल हमारी संस्था के आफिस में है, आप ठहरिये मैं बिल भी लाकर दिखा देता हूँ.' लेकिन पुलिस तो गाँव के दुबारा बसने को ही रोकना चाहती थी, इसलिए फटाफट पूरे राशन को गाडी समेत ज़ब्त कर थाने में ले गए.उधर गाँव में बच्चे, औरतें, बूढ़े भूखे थे. मैं बिल लेकर थाने पहुँचा. थानेदार ने कहा अब राशन और गाडी अदालत से छूटेगी.
हम अदालत गए. जज साहब शराब पीकर अपने न्याय के आसन पर विराजमान थे. थानेदार साहब हमारे ही सामने बिना हिचक के डायस पर पहुँच गए और जज के कान में फुसफुसाने लगे तो जज ने चिल्लाकर थानेदार से कहा, 'हाँ, हाँ में इन लोगों को अच्छी तरह जानता हूँ. ये सब नक्सलवादी हैं. तुम चिंता मत करो.'
इसके बाद हम अपना वकील तलाश करने बार रूम में आ गए. हमारे साथ पूना से आयी हुयी एक महिला पत्रकार भी थी. जज साहब हमारे पीछे-पीछे अपने आसन से उठकर बार रूम में आ गए. सारे वकील जज साहब को देखकर खड़े हो गए. जज साहब एक कुर्सी पर बैठ गए और उस महिला पत्रकार को अपने साथ बैठने के लिए कहा. महिला पत्रकार पास में एक कुर्सी पर बैठ गयी.
जज साहब ने अपनी जींस (जी हाँ जींस) में से पव्वा निकाला, दो घूँट मारे और इजहारे मुहब्बत करने लगे कि 'मेरी बीबी एकदम गंवार है. मैं यहाँ अकेला रहता हूँ. तुम मेरे घर चलो.' महिला पत्रकार भी बहुत होशियार थी उसने कहा, 'सर, मैंने आप जैसा इंसान नहीं देखा. ये राशन की गाडी छोड़ दीजिये.' जज साहब ने तुरंत गाडी छोड़ने के कागजों पर हस्ताक्षर कर दिए और वो महिला पत्रकार फिर मिलने का वादा करके राशन लेकर कोपा के साथ तुरंत गाँववालों के पास पहुँच गयी.
कुछ और वाकये छत्तीसगढ़ में आजकल की न्यायिक व्यवस्था की स्थिति पर हैं.हालाँकि हम सब ये जानते हैं कि जजों के माईनिंग कम्पनियों में शेयर के किस्से बहुत आम हैं. माईनिंग कंपनियों के मालिक जजों को अनेक तरीकों से प्रभावित या दुष्प्रभावित कर सकते हैं. दंतेवाड़ा में आदिवासियों का कत्लेआम माईनिंग कंपनियों के लिए ही किया जा रहा है इसलिए जजों का रवैया आदिवासियों के खिलाफ ही रहा है.
कुछ और उदाहरण देना चाहूंगा. दंतेवाड़ा जिले में एक गाँव नेन्द्रा है, इस गाँव को पुलिस और सलवा जुडूम ने तीन बार जलाया था.इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर जब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की टीम आदिवासियों की शिकायतें सुनने दंतेवाडा गयी तो नेन्द्रा गाँव के लोग भी अपनी आपबीती सुनाने आये. उन्हें आज तक न्याय तो नहीं मिला, अलबत्ता 10 जून 2008 को ग्रामीणों ने अपना बयान दर्ज कराया और 16 जून 2008 यानी छः दिन बाद ही उनका गाँव पुलिस ने चौथी बार फिर जला दिया.
इसके बाद हमारी संस्था इस गाँव में डट गयी. एक मानव कवच का निर्माण किया गया, जिसमें 22 आदिवासी युवक-युवतियां शामिल थे. डेढ़ साल तक सब लोग वहां रहे. उस इलाके के गाँववालों को बाज़ार नहीं जाने दिया जाता था. लोग भूख से मर रहे थे. औरतों के पास कपडे नहीं बचे थी और वो चीथड़ों से अपना तन ढकने के लिए मजबूर थीं. इसलिए ये मानव कवच के सदस्य गाँववालों को लेकर बाज़ार जाते थे.
तीन साल से ग्रामीण खेती नहीं कर पा रहे थे,क्योंकि पुलिस आकर फसल जला देती थी.संस्था के मानव कवच वालों ने गाँववालों के साथ-साथ खेती फिर से शुरू की. उस गाँव से पिछले आठ महीने से चार लड़कियां गायब थीं, जिसमें से 'सलवा जुडूम'कैंप के नेताओं के घर पर बंधक बनाकर रखी गयी दो लड़कियों को तो हमारे कार्यकर्ता छुपकर मुक्त करा लाये और उनके परिजनों को सौंप दिया (मेरे पास दोनों के फोटो मौजूद हैं.मैं किस्से नहीं सुना रहा हूँ ), लेकिन जिन दो लडकियों को पुलिसवाले ले गए थे उनका कुछ पता नहीं चल रहा था. उनमें से एक लडकी के पिता को भी उसके साथ ले जाकर पुलिस ने पिता की ह्त्या कर दी थी.
गायब लड़कियों के परिजन उनकी तलाश करने की प्रार्थना कर रहे थे.हमने उनके भाइयों की प्रार्थना पत्र एसपी को भेजे, मगर एसपी ने नौ माह तक कोई कार्यवाही नहीं की.अंत में हाईकोर्ट में हेबियस कार्पस दायर की गयी. नियमतः हेबियस कार्पस पर उसी दिन सुनवाई करके पुलिस को नोटिस दिया जाना चाहिए था, लेकिन छह महीने बाद जज ने लडकी के भाई के वकील को फटकारा कि इसने अपनी बहन के गुम होने की शिकायत इतनी देर से क्यों की? वकील ने जज को बताया कि 'इसकी बहन का पुलिस ने ही अपहरण किया है और ये तो अपनी जान बचाकर जंगल में छुपा हुआ था.अपहरणकर्ता लोग तो थाने के मालिक बनकर बैठे हुए है,ये डरा हुआ लड़का थाने कैसे जाता? अगर इस संस्था ने इसकी मदद न की होती तो ये मामला तो कभी भी कोर्ट तक भी नहीं पहुँचता. असली क़ानून तो एसपी ने तोडा है, जिसने शिकायत मिलने के बाद भी नौ महीने तक कोई कार्यवाही नहीं की.'
इतना सब सुनने के बाद जज साहब ने उस एसपी के खिलाफ कोई टिप्पणी तक नहीं की.जज ने कहा ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई आदमी थाने में जाने से डरे.लडकी के भाई के वकील ने बताया 'साहब दंतेवाड़ा में तो वकीलों को थाने में जाने पर थानेदार पीट देते हैं.उदाहरण के लिए ये देखिये अलबन टोप्पो वकील साहब आपके सामने खड़े हैं.इनको कोपा कुंजाम के साथ थाने जाने के अपने कानूनी अधिकार का इस्तेमाल करने पर एसपी के निर्देश पर रात भर थानेदार ने थाने में बंद करके पीटा है. आप करेंगे कार्यवाही?
इस पर जज साहब चुप रहे.एक सप्ताह बाद पुलिस लडकी के भाई को उठाकर लाई.जान से मारने की धमकी के बाद उसे उसी जज के सामने पेश किया. गायब लड़की के भाई के वकील ने जज को बताया कि इसे पुलिस उठाकर लाई है.आप इसे कम से कम 48घंटे के लिए पुलिस से अलग कर दें .और फिर बयान दर्ज करें.लेकिन जज ने तुरंत बयान दर्ज करने का आदेश दिया.लड़की के भाई ने पुलिस के दबाव में बयान दिया कि 'मेरी बहन का अपहरण हुआ ये सच है. मेरे बाप की ह्त्या हुई ये भी सच है, लेकिन वो पुलिस ने नहीं की. किसने की मैं नहीं जानता. ' और जज ने तुरंत मामला खारिज कर दिया.
उसके भाई का फोन मेरे पास आया तो मैंने उससे पूछा कि ऐसा बयान क्यों दिया? उसने बताया, 'एक बहन बची है, बूढ़ी मां है. मुझे भी मार देते तो उन्हें कौन पालता? इसलिए उन्होंने जो सिखाया मैंने बोल दिया.'



दंतेवाडा स्थित वनवासी चेतना आश्रम के प्रमुख और सामाजिक कार्यकर्त्ता हिमांशु कुमार का संघर्ष, बदलाव और सुधार की गुंजाईश चाहने वालों के लिए एक मिसाल है. उनसे vcadantewada@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है. 
सभार: http://www.janjwar.com/

Tuesday, December 28, 2010

आस्था की जीत या संविधान की?

जिस न्यायिक निर्णय का पूरा देश साँस रोककर इन्तिज़ार कर रहा था, आखिरकार वह आ ही गया। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच ने अयोध्या मामले में विवादित भूमि के मालिकाना हक संबंधी सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा व अन्यों द्वारा दायर दावों का निराकरण कर दिया है। इस निर्णय की प्रशंसा भी हुई है और निंदा भी। निंदकों में मुख्यतः मुकदमे के पक्षकार हैं। जो लोग इस विवाद का स्थाई समाधान चाहते हैं वे कहते हैं कि इस निर्णय ने तीनों पक्षकारों (रामलला विराजमान को भी अदालत ने एक पक्षकार माना है) के बीच विवाद के सुलझाव का रास्ता प्रशस्त कर दिया है। अब हिन्दू वहाँ मंदिर बना सकते हैं और मुसलमान- अगर चाहें तो-वहाँ एक मस्जिद का निर्माण कर सकते हैं और देश इस विवाद को पीछे छोड़ कर आगे बढ़ सकता है।

आखिर इस विवाद का कभी तो अंत होना चाहिए ताकि देश आगे बढ़ सके। अगर इस निर्णय से यह लक्ष्य प्राप्त हो गया होता तो इससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता था। परंतु तथ्य यह है कि दोनों पक्षकार इस निर्णय से असंतुष्ट हैं और उच्चतम न्यायालय में अपील करने की तैयारी कर रहे हैं। यह निर्णय किसी भी प्रकार का समझौता या मेल-मिलाप कराने में तो सफल हुआ ही नहीं है बल्कि इससे एक अत्यंत ख़तरनाक नज़ीर की स्थापना हो गई है। ‘शांति और समझौता बेशक बहुत महत्वपूर्ण हैं परंतु अगर इन्हें संवैधानिक, प्रजातंत्र और कानून के राज की कीमत पर हासिल किया जाता है तो इनसे फायदे से अधिक नुकसान होने की आशंका होती है।

अयोध्या मामले का निर्णय कानून पर नहीं वरन् आस्था पर आधारित है। तीन में से दो जजों ने ऐतिहासिक प्रमाणों और देश के कानून को दरकिनार कर केवल हिन्दुओं की आस्था के आधार पर यह मान लिया कि राम एक स्थान विशेष पर जन्मे थे और यह भी कि वहाँ बारहवीं सदी में बनाया गया एक मंदिर अस्तित्व में था। मजे की बात यह है कि दोनों जजों ने यह भी स्वीकार किया कि वे इतिहास व पुरातत्व विज्ञान के बारे में कुछ नहीं जानते। तीसरे जज खान का यह कहना है कि यद्यपि उक्त स्थान पर राम मंदिर के होने का कोई प्रमाण नहीं है तथापि शांति व समझौते की खातिर विवादित भूमि को तीनों पक्षकारों के बीच बाँटना उचित होगा। इस तरह, एक ओर रामलला और दूसरी ओर निर्मोही अखाड़े को भूमि दे दी गई। लगे हाथ, सुन्नी वक्फ बोर्ड को भी जमीन में हिस्सा दे दिया गया।

पक्षकारों के अलावा कई विधिवेत्ताओं ने भी उच्च न्यायालय के निर्णय की कड़ी निंदा की है और यह आशा व्यक्त की है कि उच्चतम न्यायालय केवल और केवल संवैधानिक व कानूनी दृष्टिकोण से इस मामले में अंतिम फैसला करेगा। इस प्रक्रिया में काफी समय लगने की संभावना है।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले में तीनों जजों ने शांति और समझौते को अधिक महत्व दिया है और प्रजातांत्रिक भारत के संवैधानिक मूल्यों को कम। कानून का न तो पक्षकारों और न ही जजों की आस्था से कोई लेना-देना है और न ही होना चाहिए। भारत जैसे देश में, जहाँ पिछले साठ सालों से न्यायापालिका की स्वतंत्रता और संवैधानिक मूल्यों को संरक्षित रखा गया है, कोई भी न्यायिक निर्णय केवल कानून पर आधारित होना चाहिए।

यह शायद पहली बार है कि देश के किसी उच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक तथ्यों और कानूनी प्रावधानों को दरकिनार कर, केवल आस्था को प्रधानता दी है। अदालत को इस बात से कोई मतलब नहीं होना चाहिए कि उसके निर्णय से समझौता या मेलमिलाप होता है या नहीं। अदालत को तो कानून के अनुसार काम करना चाहिए। बेशक, अदालत सभी पक्षकारों से यह अपील कर सकती है कि वे अदालती लड़ाई में अपना समय व धन बर्बाद करने के बजाय आपसी बातचीत से विवाद का हल खोज लें। परंतु यह पक्षकारों पर निर्भर है कि वे अदालत की अपील को स्वीकार करें या न करें। अगर वे ऐसा नहीं करते तो जजों का यह कर्तव्य है कि वे कानून के अनुरूप अपना निर्णय सुनाएँ।

जो लोग इस निर्णय को शांति की जीत और एक पुराने विवाद का सुखद अंत निरूपित कर रहे हैं वे या तो इसके दूरगामी परिणामों से वाक़िफ़ नहीं हैं या हमारे संवैधानिक प्रजातंत्र के लिए उनके मन में आदर व सम्मान का भाव नहीं है। खुशी मनाने वालों की सोच चाहे जो हो परंतु यह साफ है कि इस निर्णय से अदालतों की कार्यप्रणाली में एक ख़तरनाक प्रवृत्ति की शुरुआत हुई है। आगे चलकर, जज अपनी-अपनी आस्था के अनुरूप निर्णय देने लगेंगे। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उच्च न्यायालयों व उच्चतम न्यायालय का कोई भी निर्णय, भविष्य के निर्णयों का आधार बन सकता है।

यदि इसी तर्क को हम आगे बढ़ाएँ तो क्या इससे यह ध्वनित नहीं होता कि चूँकि प्रजातंत्र में संख्या बल सबसे महत्वपूर्ण है इसलिए बहुसंख्यक समुदाय की आस्था का अधिक महत्व है और अल्पसंख्यकों के धार्मिक विश्वासों का कम। क्या इससे हमारा न्यायतंत्र बहुसंख्यकवादी नहीं हो जाएगा? क्या इससे कानून और संविधान में अल्पसंख्यकों व कमजोर वर्गों की सुरक्षा के लिए किए गए प्रावधान अर्थहीन नहीं हो जाएँगे? क्या इससे अल्पसंख्यकों की देश के न्यायतंत्र और संविधान पर आस्था कम नहीं होगी? अगर हम संविधान और कानून की सर्वोच्चता में आस्था रखते हैं तो हमें इस निर्णय पर प्रश्नचिह्न लगाने ही होंगे। निःसंदेह, धार्मिक आस्था और विश्वास, व्यक्तियों व धार्मिक समुदायों के लिए बहुत महत्व रखते हैं परन्तु जहाँ तक राष्ट्र का प्रश्न है, उसके लिए संविधान सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। भारत एक विविधवर्णी राष्ट्र है जहाँ विभिन्न आस्थाओं वाले लोग रहते हैं। हमारा संविधान प्रत्येक नागरिक को अंतःकरण और आस्था की आजादी देता है परंतु राष्ट्र के लिए कानून उतना ही महत्वपूर्ण है जितनी किसी व्यक्ति के लिए उसकी आस्था। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय को इस परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए।

वैसे भी, हिन्दू धर्म अपने आप में एकसार नहीं है। हिन्दुओं में दक्षिण भारत के द्रविड़ भी शामिल हैं पंरतु उनकी धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराएँ, उत्तर भारत की आर्य परंपराओं से सर्वथा भिन्न हैं। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री करुणानिधि ने हाल में यह आरोप लगाया है कि आर्य देवी-देवता, द्रविड़ों पर थोपे जा रहे हैं।

स्पष्टतः इलाहाबाद उच्च न्यायालय जिस “हिन्दू आस्था“ की बात कर रहा है वह भी विभाजित है। उन धर्मनिरपेक्ष हिन्दुओं के अतिरिक्त जो संवैधानिक मूल्यों में आस्था रखते हैं, अन्य सांस्कृतिक पृष्ठभूमियों वाले व अन्य भाषा-भाषी हिन्दू भी वह “आस्था“ नहीं रखते जिसकी न्यायालय ने चर्चा की है। कुल मिलाकर, आस्था के आधार पर न्यायिक फैसले होने से सभी अल्पसंख्यक समूहों व विशेषकर प्रभावित होने वाले अल्पसंख्यकों पर, यह दबाव बनता है कि वे बहुसंख्यकों की मान्यताओं के समक्ष अपने घुटने टेक दें।

जो कुछ मैंने ऊपर कहा, उसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि अयोध्या जैसे विवादों को बातचीत और आपसी समझौते से नहीं सुलझाया जाना चाहिए। अगर अयोध्या विवाद, संवाद और न्यायपूर्ण लेन-देन के आधार पर सुलझ जाता है तो मुझसे ज्यादा खुशी किसी को नहीं होगी। इस मामले के सबसे पुराने पक्षकारों में से एक-श्री हाशिम अंसारी, जो सन् 1960 के दशक से इस मुकदमे को लड़ रहे हैं-ने निर्णय के बाद हनुमानगढी़ मंदिर के मुख्य पुजारी से मुलाकात की। यह एक प्रशंसनीय पहल है। उन्होंने मुख्य पुजारी श्री ज्ञान दास से अनुरोध किया कि वे निर्माेही अखाड़े को इस बात के लिए राजी करें कि आपसी संवाद और सहमति के जरिए इस विवाद का कोई हल निकाला जाए।

भारत एक महान प्रजातंत्र है और हमें इतिहास के गड़े मुर्दे उखाड़ने के बजाय भविष्य की ओर देखना चाहिए। भूत से भविष्य कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है। अगर ऐसा कोई मुद्दा उठ खड़ा होता भी है तो उसे आपसी समझ और सहयोग से इस ढंग से निपटाया जाना चाहिए कि किसी पक्ष को यह महसूस न हो कि उसकी हार हुई है। राजनैतिक दलों द्वारा इतिहास के गड़े मुर्दे उखाड़कर उनका इस्तेमाल अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए करना देश के लिए अहितकर है। भाजपा ने ठीक यही किया है।

यह अत्यंत खेद का विषय है कि बाबरी मस्जिद को ढहाने के गैर-कानूनी, असंवैधानिक व गैर-प्रजातांत्रिक षड्यन्त्र को अंजाम देने वाले तत्व, इस निर्णय को अपनी जीत मानकर जश्न मना रहे हैं। वे आस्था की न्याय पर विजय को अपनी विजय बता रहे हैं। यह अत्यंत ख़तरनाक व निंदनीय प्रवृत्ति है। मस्जिद ढहाने वालों को आज तक कोई सजा न मिलना भी भारतीय संविधान का अपमान है। उन्हें उनके इस कृत्य का-जो हिन्दू धर्म की शिक्षाओं के विरुद्ध था-कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए।

ऐसे मामलों में समाज की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। हमारे बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों, शांति कार्यकर्ताओं और उन सबको, जो संवैधानिक व प्रजातांत्रिक मूल्यों में आस्था रखते हैं, आगे बढ़कर दोनों पक्षों पर सार्थक आपसी संवाद करने का दबाव बनाना चाहिए ताकि इस विवाद को अदालत की चहारदीवारी के बाहर सुलझाया जा सके।

सन् 2000 के शुरू में, कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य ने मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड की मदद से इस विवाद के शांतिपूर्ण निपटारे की पहल की थी परंतु विहिप ने उनका घेराव किया और उन्हें अपने कदम पीछे खींचने पड़े। इस बार, द्वारिका पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने ऐसी ही पहल की है। इस पहल का स्वागत किया जाना चाहिए और मुस्लिम पर्सनल ला-बोर्ड को इस कार्य में शंकराचार्य को पूरा सहयोग देना चाहिए।

इसके साथ ही, हमें भारत के आमजनों की भी दिल खोलकर प्रशंसा करनी होगी जिन्होंने शांति व सौहार्द बनाए रखा और अयोध्या निर्णय के बाद कहीं से भी किसी अप्रिय घटना की सूचना नहीं आई। आमजनों ने हमारे राजनेताओं से अधिक परिपक्वता व समझदारी प्रदर्शित की है।

हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि देश में शांति और व्यवस्था बनाए रखने में मुसलमानों का महत्वपूर्ण योगदान रहा। निर्णय के पहले की जुमे की नमाजों में देश की लगभग सभी मस्जिदों के इमामों ने मुसलमानों से शांति बनाए रखने और निर्णय को-चाहे वह उनके पक्ष में हो या विरुद्ध-स्वीकार करने की अपीलें कीं। इसके विपरीत, सन् 1980 के दशक के मध्य से लेकर अंत तक मुसलमान, बाबरी मस्जिद के मुद्दे पर अत्यंत संवेदनशील और उत्तेजित थे।

मुसलमानों को अब यह अहसास हो गया है कि प्रजातंत्र व धर्मनिरपेक्ष मूल्यों में ही उनका सुखद व सुरक्षित भविष्य छुपा हुआ है। उन्हें इस बात का अहसास है कि टकराव से केवल हिंसा और बर्बादी होगी और सभी भारतीयों की भलाई में ही उनकी भलाई निहित है। इस बार हिन्दुओं और मुसलमानों ने जबरदस्त एकजुटता का परिचय दिया और अतिवादियों को-जो उत्तेजक वक्तव्यांे के जरिए माहौल को बिगाड़ते थे- दरकिनार कर दिया। अब तो अतिवादी भी अत्यंत समझदारी की बातें कर रहे हैं। उन्हें भारत की जनता ने इसके लिए मजबूर किया है। कोई भी जागृत समाज अपने राजनेताओं पर किस तरह नियंत्रण रख सकता है, यह उसका उदाहरण है। बेहतर होगा कि देश की सबसे बड़ी अदालत के दरवाजे खटखटाने के पहले, अयोध्या मामले का बातचीत से हल खोजने की गंभीर कोशिश की जाए और हमारे देश जैसे प्रजातंत्र में यह काम केवल समाज कर सकता है।



-डॉ. असगर अली इंजीनियर
मोबाइल: 0986944999
(लेखक मुंबई स्थित सेंटर फार स्टडी ऑफ़ सोसायटी एंड सेक्युलरिज्म के संयोजक हैं, जाने-माने इस्लामिक विद्वान हैं और कई दशकों से साम्प्रदायिकता व संकीर्णता के खिलाफ संघर्ष करते रहे हैं।)

सोशल नेटवर्किंग और दिमाग

एक नए शोध के अनुसार जिन लोगों का सामाजिक जीवन व्यस्त होता है उनके दिमाग के एक हिस्से में अधिक जगह होती है.
दिमाग
सामाजिक व्यवहार के अनुसार दिमाग में स्वतः विकास होता रहता है
नेचर न्यूरोसाइंस में छपे एक शोध के अनुसार कई लोगों के दिमाग के स्कैन से पता चला कि दिमाग का एक हिस्सा एमिगडाला सामाजिक व्यस्तताओं के साथ सामंजस्य के लिए थोड़ा बढ़ जाता है.
यह शोध 58 लोगों पर किया गया जिसमें उनकी उम्र और दिमाग की साइज़ के आँकड़े लिए गए. अमरीकी टीम ने पाया कि जिन लोगों की सोशल नेटवर्किंग अधिक है उनके दिमाग का एमिगडाला वाला हिस्सा बाकी लोगों की तुलना में अधिक बड़ा है.
दिमाग का एमिगडाला वाला हिस्सा भावनाओं और मानसिक स्थिति से जुड़ा हुआ माना जाता है.
यह शोध मैसाचुसेट्स जनरल हॉस्पिटल और हार्वर्ड मेडिकल स्कूल बॉस्टन की टीमों ने डॉ लीसा फेल्डमैन बारेट के नेतृत्व में किया है.
वैज्ञानिकों ने शोध के दौरान लोगों से कहा कि वो अपने संपर्कों और सामाजिक गतिविधियों के बारे में पूरी जानकारी दें जिसके बाद उन्होंने वैज्ञानिक तकनीकों का इस्तेमाल करते हुए उन लोगों के दिमाग का एक खाका तैयार किया.
नेचर न्यूरोसाइंस पत्रिका में छपे शोध में यह टीम लिखती है, ‘‘हमने पाया कि वयस्कों में एमिगडाला का आकार और संरचना का संबंध सोशल नेटवर्किंग से रहता ज़रुर है.’’
शोधकर्ताओं का कहना है कि एमिगडाला सामाजिक व्यवहार में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है.
इस शोध के अनुसार मानव का दिमाग बदलते सामाजिक जीवन के साथ अपने आपमें सुधार भी करता रहता है.

विश्व घटनाचक्र 2010


बनते-बिगड़ते सामरिक समीकरण, यूरोप में आर्थिक उथल पुथल, भारत- चीन जैसी उभरती महाशक्तियाँ, कोरिया में युद्ध के मंडारते बादल,अमरीकी दामन से निकलकर नई दिशा में बढ़ते इराक़ के हिचकिचाते क़दम, दुनिया को आँख दिखाता ईरान, चरमपंथ से जूझता अफ़ग़ानिस्तान...कुछ ऐसा रहा 2010 में विश्व का घटनाचक्र. और एक बात जो इस पूरे घटनाचक्र में समान रही वो है विश्व में उलट पुलट होता सत्ता सुंतलन. इसकी झलक आपको इस साल की हर बड़ी घटना में मिलेगी.

विकीलीक्स की दुनिया

  • ग्वांतानामो बे बंदी शिविर के क़ैदियों को दूसरे देशों के यहाँ रखवाने के लिए अमरीका का मोलभाव
  • रूस सरकार और माफ़िया में साँठगाँठ
  • मुशर्रफ़-मनमोहन थे समझौते के करीब
  • हिलेरी ने भारत की खिल्ली उड़ाई, कहा भारत ने सुरक्षा परिषद सदस्या की दौड़ में अपने आप को आगे कऱार दिया
  • सऊदी अरब अमरीका को उकसाता रहा है कि वो ईरान पर हमला करे
विकीलीक्स के घटनाक्रम तो ने साल का अंत-अंत होते पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया...ये वार न किसी हथियार का था, न परमाणु बम का न किसी मिसाइल का. ये घात लगाया इंटरनेट और तकनीक ने और इसका सबसे ज़्यादा ख़ामियाज़ा उठाना पड़ा अमरीका जैसे उस देश को जहाँ इंटरनेट को उसकी ताक़त समझा जाता है.
विकीलीक्स ने लाखों संवेदनशील कूटनयिक संदेश दस्तावेज़ों के रूप में प्रकाशित किए जिसमें अमरीका से लेकर पाकिस्तान और सऊदी अरब समेत कई देशों को लपेटे में लिया है.
विकीलीक्स ने विभिन्न देशों की कूटनीतिक नीतियों पर सवाल खड़े कर दिए हैं.पाकिस्तान और सऊदी अरब जैसे देशों के लिए अमरीका की सार्वजनिक वाहवाही और निजी स्तर पर इन देशों को लेकर अमरीका की गंभीर चिंताएँ और आशंकाएँ... विकीलीक्स के दस्तावेज़ों में ये विरोधाभास झलकता है.
पाकिस्तान और अमरीका ने दस्तावेज़ प्रकाशित करने के लिए विकीलीक्स की कड़ी निंदा की है.इन दस्तावेज़ों को लेकर कई देशों की झुंझलाहट कनाडा के प्रधानमंत्री के सलाहकार के बयान से साफ़ झलकती है. उन्होंने टीवी पर ये तक कह डाला कि विकीलीक्स के संस्थापक जूलियन असांज की हत्या कर देनी चाहिए.
दस्तावेज़ लीक करने का विकीलीक्स का क़दम कितना सही और कितना ग़लत है इस पर बहस जारी है. लेकिन एक बात तो तय है कि इस पूरे किस्से से अमरीका काफ़ी विचलित हुआ है. बलात्कार के आरोप में जूलियन असांज को ब्रिटेन में गिरफ़्तार किया गया है जिसे कुछ लोग बदले की कार्रवाई के तौर पर देख रहे हैं. पर क्या ये गिरफ़्तारी अमरीका पर मंडारते इस समस्या को टाल पाएगी?
(अमरीका में अंदरूनी तौर पर भी हलचल रही. मध्यावधि चुनाव मेंसत्ताधारी डेमोक्रेटिक पार्टी को करारी हार मिली तो रिपब्लिकन पार्टी नेप्रतिनिधि सभा में बहुमत हासिल कर लिया. ओबामा ने माना कि अर्थव्यवस्था पर लोग नाराज़ हैं. ऐसे में अब ओबामा प्रशासन को कई विधेयकों पर रिपब्लिकन पार्टी के साथ मिलकर चलना होगा.)

इराक़-अफ़ग़ानिस्तान

अमरीका के लिए सिरदर्द बने विकीलीक्स में इराक़ से जुड़े दस्तावेज़ों का भी ज़िक्र है. इराक़ के संदर्भ में 2010 को बयां करना हो तो नूरी अल मलिकी का बयान याद आता है जहाँ उन्होंने कहा है कि 2010 में इराक़ ‘आज़ाद’ हो गया. वो इसलिए क्योंकि अगस्त 2010 में अमरीका ने इराक़ में अपना सैन्य मिशन अंतत ख़त्म कर दिया.
बड़ा सवाल ये है कि मार्च 2003 को शुरु हुए अमरीकी अभियान के बाद अब अमरीका कैसा इराक़ छोड़ कर जा रहा है? अंदरूनी हिंसा और राजनीतिक अस्थितरता से पार पा पाएगा इराक़?

इराक़

  • जुलाई 2010 तक 97461 से एक लाख से ज़्यादा की संख्या के बीच नागरिकों की मौत (स्रोत इराक़ बॉडी काउंट)
  • 2011 के अंत तक अमरीका इराक़ युद्ध के ख़र्च पर करीब 802 अरब डॉलर ख़र्च कर चुका होगा. (स्रोत कांग्रेशनल रिसर्च सर्विस) जबकि कुछ विशेषज्ञ ये की़मत तीन ट्रिलियन डॉलर बताते हैं.
विभिन्न संस्थाएँ दावा करती हैं कि साढ़े सात सालों में एक लाख से ज़्यादा लोगों की जान गई. कई बार इराक़ी क़ैदियों के साथ प्रताड़ना तो कभी भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं.
राजनीतिक तौर पर भी इराक़ को लोग किसी परिपक्व देश के तौर पर नहीं देख रहे. नौ अप्रैल 2003 को बग़दाद में सद्दाम हुसैन की मूर्ति तोड़ते अमरीकी सैनिकों की तस्वीर आज भी लोगों के ज़हन में ताज़ा है लेकिन यही तस्वीर ये सवाल भी पूछती है कि अमरीकी अभियान ने आख़िर क्या हासिल किया...क्या इराक़ में अमन शांति है, बेहतर सुविधाएँ हैं, राजनीतिक स्थिरता है?
अफ़ग़ानिस्तान
इराक़ के बाद अगर अमरीका ने किसी देश में अपना काफ़ी कुछ दाँव पर लगाया है तो वे है अफ़ग़ानिस्तान. 2010 अफ़ग़ानिस्तान के लिए काफ़ी अहम साल रहा. पेंटागन ने साफ़ तौर पर माना है कि अफ़ग़ानिस्तान में चरमपंथियों की ताकत बढ़ रही है और हिंसा नए स्तर पर पहुँच गई है.
वहीं बराक ओबामा ने कहा दिया है कि अमरीका जुलाई 2011 में सैनिक हटाना शुरु कर देगा. जबकि नैटो ने वर्ष 2014 के अंत तक सुरक्षा की कमान अफ़ग़ान सैनिकों के हाथों में सौंपे जाने की योजना को स्वीकृति दे दी है.
पर क्या अफ़ग़ान सुरक्षाबल अफ़ग़ानिस्तान की सुरक्षा का ज़िम्मा लेने के लिए सक्षम हैं? तालिबान का ख़तरा, मादक पदार्थों की तस्करी और भ्रष्टाचार को लेकर समय-समय पर चिंता जताई जा चुकी है. सैन्य अभियान की बात करें तो विकीलीक्स के अनुसार अफ़ग़ानिस्तान युद्ध पर अमरीका अपनी करीबी सहयोगी ब्रिटेन से काफ़ी नाख़ुश है.
इस सबको देखते हुए अमरीका और नैटो के सामने चुनौती ये है कि वो 2014 के बाद एक बेहतर अफ़ग़ानिस्तान छोड़कर जाएँ.
कोरिया और ईरान का हाल
अफ़ग़ानिस्तान का पड़ोसी ईरान पिछले कई सालों की तरह 2010 में भी अमरीका और पूरी दुनिया को आँख दिखाता रहा और अपने परमाणु कार्यक्रम पर डटा हुआ है.

परमाणु मसला

  • संयुक्त राष्ट्र चाहता है कि ईरान 18 साल से चालू यूरेनियम संवर्धन का काम रोके
  • संयुक्त राष्ट्र ने ईरान पर चार चरणों प्रतिबंध लगाए-2006,2007,2008,2010
  • ईरान ने अपने पहले परमाणु संयंत्र में रूसी परमाणु ईंधन से बिजली बनाना शुरु किया
ईरान पर कड़ा रुख अपनाने वाले अमरीका ने तो 2010 में ये तक कहा दिया कि ईरान भविष्य में असैन्य ज़रूरतों के लिए यूरेनियम संवर्धन कर सकता है बशर्ते ईरान ये दर्शाए कि ये काम ज़िम्मेदारी से कर सकता है. इससे पहले ऐसा सॉफ़्ट बयान अमरीका ने नहीं दिया,
परमाणु मसले पर ईरान ने एक साल बाद जाकर दिसंबर में अंततराष्ट्रीय जगत से बात की है पर कोई नतीजा नहीं निकला.
ईरान ने दो टूक शब्दों ने कहा दिया है कि अगर ईरान पर लगे प्रतिबंध हटाए जाते हैं तो बातचीत का कुछ फ़ायदा हो सकता है. अगली बातचीत जनवरी में होगी. ईरान और अंतरराष्ट्रीय जगत में आँख मिचौली का खेल जारी है.
कोरिया
ईरान की तरह कोरिया ने भी दुनिया को असमंजस में डाला हुआ है.दूसरा विश्व युद्ध ख़त्म होने के बाद पैदा हुई परिस्थितियों ने कोरिया को दो खेमों में बाँट दिया था. 1953 के कोरिया युद्ध के बाद दोनों देशों के बीच 2010 में सबसे ज़्यादा तनाव देखा गया जब नवंबर में उत्तर कोरिया ने दक्षिण कोरिया पर तोपों से गोले दाग दिए जिसमें कुछ सैनिक भी मारे गए. इसके बाद कोरियाई प्रायद्वीप में माहौल तनावपूर्ण हो गया.उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमरीका समेत अन्य देशों में चिंता है जबकि ईरान के मसले की ही तरह चीन अब भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से उ.कोरिया के साथ खड़ा हुआ नज़र आता है.
चीन का बढ़ता प्रभुत्व
बात चाहे ईरान मसले की हो, उत्तर कोरिया की या वैश्विक अर्थव्यवस्था की.. 2010 का पूरा घटनाक्रम कहीं न कहीं विश्व में चीन के बढ़ते प्रभुत्व को दर्शाता है.
कोरियाई प्रायद्वीप में संकट के बादल छाए तो सबकी नज़रें चीन पर थीं. अमरीकी सेना प्रमुख माइक मलेन ने भी माना है कि उत्तर कोरिया पर चीन का ‘अलग’ प्रभाव है जिसका इस्तेमाल चीन को उ. कोरिया पर अंकुश लगाने के लिए करना चाहिए.
चीन के बढ़ते असर का एक नमूना विकीलीक्स के दस्तावेज़ों में भी नज़र आता है. जिनमें कहा गया है कि मुंबई में 26/11 हमलों से पहले पाकिस्तान के कहने पर चीन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में जमात-उद-दावा पर प्रतिबंध को रोक लिया था. ये तब जब अमरीका प्रतिबंध के पक्ष में था.
विकीलीक्स से निकले दस्तावेज़ों में चीन को अमरीका की आशंका साफ़ झलकती है जहाँ राजनयिकों ने साफ़ तौर पर कहा है कि 'चीन बहुत ही आक्रमक और ख़तरनाक आर्थिक प्रतियोगी' है.
कूटनीतिक और सामरिक मामलों में ही नहीं, आर्थिक मामलों में भी दुनिया में चीन का दबदबा है. एक ओर जहाँ विकसित देशों की अर्थव्यवस्थाएँ चरमरा रही हैं, वहीं आर्थिक मंदी के बावजूद चीनी अर्थव्यवस्था मज़बूत बनी हुई है.2010 में तो चीन जर्मनी को पछाड़ विश्व का सबसे बड़ा निर्यातक बन गया.
चीनी कार्यकर्ता लियू शियाबो को नोबेल पुरस्कार दिए जाने को लेकर भी चीन दुनिया पर दवाब बनाता रहा कि कई देश इस कार्यक्रम का बहिष्कार करें और कई देशों ने ऐसा किया भी. वहीं युआन मुद्रा को लेकर भी दुनिया के बड़े देश और चीन आमने सामने हैं.
टीकाकारों की राय में तमाम मुद्दों पर चीन से मतभेदों के बावजूद अमरीका समेत किसी भी देश के लिए चीन से सीधे टकराव लेना अब उतना आसान नहीं रहा.
यूरोज़ोन संकट में
चीन जहाँ आर्थिक प्रगति की राह पर अग्रसर है वहीं आर्थिक मंदी से उबरने की कोशिश में लगे विश्व को 2010 में यूरोप ने झटका दिया. मज़बूत माने जाने वाले कई यूरोपीय देश धराशायी हो गए जिसका राजनीतिक असर भी देखने को मिला.
ग्रीस में मई 2010 की एक घटना यूरोप में छाए आर्थिक संकट की गंभीरता को दर्शाती है. ग्रीस में सरकार की आर्थिक कटौतियों के ख़िलाफ़ हुए विरोध प्रदर्शनों में नाराज़ नागरिकों ने एक बैंक की इमारत को आग लगा थी और अंदर तीन कर्मचारियों की मौत हो गई जिसमें एक गर्भवती महिला भी थीं.
संकट से घिरे सब यूरोपीय देशों की स्क्रिप्ट एक जैसी ही रही- देश पर कर्ज़ का बोझ, आर्थिक कटौतियाँ, लोगों का विरोध प्रदर्शन और फिर संकट से जूझने के लिए बाहरी मदद का सहारा.
  • रिपब्लिक ऑफ़ आयरलैंड को यूरोपीय संघ और आईएमएफ़ से लेनी पड़ी मदद
  • कर्ज़ चुकाने के लिए ग्रीस को यूरोपीय यूनियन की मदद
  • ब्रिटेन में बड़े स्तर पर बजट में कटौती, लोगों का विरोध प्रदर्शन
  • यूरोप के कई बड़े देश कर्ज़ के बोझ तले दबे
  • इटली का कुल कर्ज़ उसकी जीडीपी का 115.8 फ़ीसदी, ग्रीस का कुल कर्ज़ 115.1 फ़ीसदी ( आँकड़े 2009 के)
शुरु करते हैं ब्रिटेन से जहाँ 2010 में चुनाव हुआ. नई सरकार ने अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की राह में बड़े पैमाने पर कटौतियाँ घोषित की.
लंदन की सड़कों पर दशकों बाद विरोध के ऐसे दृश्य देखने को मिले जब हज़ारों छात्र और शिक्षक सड़कों पर उतर आए.
वहीं कर्ज़ तले दबे रिपब्लिक ऑफ़ आयरलैंड की सरकार को अपना आर्थिक संकट सुलझाने के लिए अंतत यूरोपीय संघ की शरण में जाना पड़ा. अब अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और यूरोपीय संघ आयरलैंड को तीन साल के भीतर करीब 100 अरब डॉलर देंगे.
लेकिन आयरलैंड को इसके बदले में कई कटौतियों की घोषणा करनी पड़ीं. कटौतियों के ख़िलाफ़ ब्रिटेन की तरह यहाँ भी विरोध प्रदर्शन हुए. सरकार को इसका राजनीतिक ख़ामियाज़ा भी भुगतना पड़ा और प्रधानमंत्री ब्रायन कावेन को घोषणा करनी पड़ी कि यूरोपीय संघ से मिलने वाली आर्थिक मदद की रूपरेखा तय होने के बाद वे नए साल में चुनाव करवाएँगे.
ग्रीस भी 2010 में आर्थिक संकट से जूझता रहा. अप्रैल में हालात ये थे कि ग्रीस पर लगभग 300 अरब यूरो का कर्ज़ था. नतीजतन बड़े स्तर पर कटौतियाँ. आख़िरकर यूरोपीय यूनियन ने 145 अरब डॉलर के कर्ज़ को मंज़ूरी दे दी थी
ग्रीस के संकट के कारण यूरोप ही नहीं दुनिया भर के बाज़ारों में गिरावट का दौर रहा. यूरोपीय संघ में इसे लेकर अफ़रा-तफ़री का माहौल था कि कहीं ग्रीस का संकट बाकी देशों को अपनी चपेट में न ले ले.
स्पेन समेत यूरोज़ोन के कई देशों के आर्थिक हालात बहुत अच्छे नहीं है और यूरो के अस्तित्व पर ही सवाल उठाए जा रहे हैं. वहीं दुनिया के मज़बूत आर्थिक स्तंभ माने जाने वाले- अमरीका, यूरोप और जापान की भी स्थिति अच्छी नहीं है. जबकि भारत-चीन की विकास दर अच्छी चल रही है.
आशंका यही है कि वैश्विकरण के दौर में जब एक देश की आर्थिक डोर दूसरे से बंधी हुई है, ऐसे में एक देश में मचा आर्थिक कोहराम आसानी से अन्य देशों को अपनी चपेट में ले सकता है.
इसके अलावा 2010 में दुनिया में बर्मा में 20 साल बाद चुनाव देखे, सू ची की रिहाई देखी और फ़लस्तीनी-इसराइल शांति वार्ता फिर विफल होते देखी. गेंद अब वर्ष 2011 के पाले में है
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