Wednesday, February 23, 2011

मध्य प्रदेश में हर रोज 6 महिलाओं से बलात्कार



मध्य प्रदेश में हर रोज छह महिलाओं की अस्मत लूट ली जाती है, वहीं हर तीन दिन में दो महिलाएं सामूहिक बलात्कार का शिकार बनती हैं। इतना ही नहीं हर दस दिन में बलात्कार के बाद एक पीड़ित की हत्या कर दी जाती है। मंगलवार को सरकार की ओर से प्रस्तुत किए गए आंकड़ों से यह खुलासा हुआ है।
प्रदेश के गृह मंत्री उमाशंकर गुप्ता द्वारा मंगलवार को विधानसभा में दी गई जानकारी के मुताबिक 16 फरवरी 2010 से 31 जनवरी 2011 की अवधि में प्रदेश में 2,191 महिलाओं को बलात्कार का दंश झेलना पड़ा है। बलात्कार की सबसे ज्यादा 110 घटनाएं बैतूल जिले में हुईं वहीं राजधानी भोपाल इस मामले में दूसरे स्थान पर है जहां 99 महिलाओं की आबरू लूटी गई।
आंकड़ों के मुताबिक पीड़ितों में 828 अनुसूचित जाति जनजाति और 901 पिछड़ा वर्ग से हैं। वहीं 462 पीड़िता सामान्य वर्ग की हैं। कुल पीड़ितों में 1,163 वयस्क और 1,028 अवयस्क हैं।
कांग्रेस विधायक रामनिवास रावत व पांची लाल मेड़ा के सवालों के जवाब में बताया गया है कि 350 दिन की अवधि में 209 सामूहिक बलात्कार हुए हैं। वहीं 31 पीड़ितों की बलात्कार के बाद हत्या कर दी गई। बलात्कार के बाद हत्या के सबसे ज्यादा 11 मामले इंदौर में दर्ज किए गए। 
गुप्ता ने बताया कि इन मामलों में अब तक 2,431 आरोपियों की गिरफ्तारी हो चुकी है और 132 आरोपी फरार हैं। कांग्रेस विधायक रामनिवास रावत ने कहा है कि प्रदेश की कानून व्यवस्था पूरी तरह चरमरा चुकी है और महिलाएं अपने आपको असुरक्षित महसूस कर रही हैं।
पिछले बर्षों के कुछ संक्षिप्त विवरण:
ध्य प्रदेश में भी महिलाओं के खिलाफ हिंसा में तेजी से वृध्दि हुई है। सरकारी आंकडों पर गौर करें तो मध्य प्रदेश में पिछले एक वर्ष के दौरान प्रतिदिन औसतन बलात्कार की सात वारदातें दर्ज की गईं। अगर राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं पर यौन हिंसा सहित विभिन्न प्रकार की हिंसाओं पर नजर डालें तो 46 प्रतिशत के साथ मध्य प्रदेश दूसरे स्थान पर है। प्रदेश सरकार ने अपराधों में वृध्दि की बात स्वीकारते हुए कहा कि जनसंख्या में वृध्दि और शहरीकरण के कारण ऐसा हुआ है। महिला और पुरुष के खिलाफ एक जुलाई 2008 से 15 जून 2009 के बीच राज्य में एक लाख 51 हजार पांच सौ 98 अपराध दर्ज हुए। इनमें से से सबसे अधिक 11954 इंदौर जिले में और 10458 भोपाल जिले में दर्ज किए गए। इसके अलावा जबलपुर जिले में 8140 और ग्वालियर जिले में 5786 अपराध घटित हुए। हत्या की सबसे अधिक वारदातें इंदौर में 130 हुईं। इसके बाद ग्वालियर जिले में 94 लोगों की हत्या की गई। इंदौर जिला हत्या के अलावा हत्या के प्रयास और लूट के अपराधों में भी आगे रहा।
गौर करने वाली बात है कि भारत को आजाद हुए 60 साल से ज्यादा हो गए हैं। स्वतंत्रता के बाद भारत ने न जाने प्रगति की कितनी सीढ़ियां चढ़ ली हैं। अगर हम देखें तो विकास का पैमाना माने जाने वाला ऐसा कोई भी क्षेत्र नहीं बचा है, जहां भारत की पहुंच नहीं हो पाई है। इसमें सिर्फ देश और प्रदेशों के पुरुष ही नहीं बल्कि महिलाओं ने भी अग्रणी भूमिका निभाई हैं। आज कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं होगा जिसमें महिलाओं की भागीदारी न हो। परंतु तेजी से बदलते सामाजिक परिवेश में भारतीय महिलाओं की दशा पूर्ववत बनी हुई है। केंद्र सरकार तथा राज्य सरकारें भी औरतों के जीवनस्तर में सुधार का प्रयास कर रही हैं, लेकिन इनका प्रयास सार्थक साबित नहीं हो पा रहा है। ये वे तथ्य हैं जो उजागर हुए तथा जनता के सामने प्रस्तुत किए गए। उन घटनाओं की संख्या भी कम नहीं है, जिन्हें दबा दिया गया या लोकलज्जा के चलते उजागर नहीं किया गया। इन आंकड़ों से आप सहज अनुमान लगा सकते हैं कि प्रदेश की महिलाएं कितनी सुरक्षित हैं। इन घटनाओं से साफ जाहिर हो रहा है कि राज्य सरकार महिलाओं के उत्थान के लिए जो कदम उठा रही हैं, क्या उन्हें उसमें सफलता मिल पाई है। दूसरी ओर घर और दफ्तर दोनों जगह महिलाएं भेदभाव की शिकार हैं। करीब तीन चौथाई महिलाओं का मानना है कि उनके पति उनके काम में हाथ नहीं बंटाते हैं। केवल एक चौथाई पति ही खाना बनाने, घर की सफाई करने और बच्चों की देखभाल करने में पत्नियों का हाथ बंटाते हैं। समाज में महिलाएं पुरुषवादी मानसिकता और लैंगिक भेदभाव की शिकार हैं। यही कारण है कि उन्हें नौकरी में पदोन्नति नहीं मिलती। काम के बढ़िया अवसर नहीं मिलते और वे कार्यालयों में शीर्ष स्थान तक नहीं पहुंच पातीं।
अगर देश की बात करें तो मात्र 3.3 प्रतिशत महिलाएं ही महत्वपूर्ण पदों पर पहुंच पाती हैं। 17.7 प्रतिशत महिलाएं तो बीच की श्रेणी के पदों तक पहुंच पाती हैं। जबकि 78.9 प्रतिशत महिलाएं जूनियर स्तर तक ही रह जाती हैं। शहर में रहने वाली 66.33 प्रतिशत महिलाएं नौकरी करना चाहती हैं। जबकि 52.84 ग्रामीण महिलाएं घरेलू पत्नियां ही बने रहना चाहती हैं। शहरों में 29.95 प्रतिशत तथा महानगरों में 18.24 प्रतिशत महिलाएं नौकरी करना चाहती हैं। महानगरों में 16.91 प्रतिशत महिलाएं अपना व्यापार करना चाहती हैं जबकि शहरी इलाकों में यह प्रतिशत 3.72 प्रतिशत और ग्रामीण इलाकों में यह प्रतिशत 2.34 प्रतिशत है। नौकरी की संभावना बढने के बावजूद महानगरों की 17 प्रतिशत महिलाएं स्वरोजगार करना चाहती हैं। 42 प्रतिशत महिलाओं का मानना है कि वे पुरुषों की तरह दफ्तर में ज्यादा देर तक नहीं रह सकतीं। लोगों से सम्पर्क नहीं बना सकती। इसलिए उन्हें पदोन्नति नहीं मिल पाती और 34.66 प्रतिशत महिलाओं का मानना है कि वे पारिवारिक कारणों से पुरुष की तरह दौड-धूप नहीं कर सकतीं इसलिए वे नौकरी में पिछड जाती हैं। 22 प्रतिशत ग्रामीण महिलाएं पारिवारिक जिम्मेवारियों में फंस जाती हैं जबकि शहरों में 19 प्रतिशत तथा महानगरों में केवल 9 प्रतिशत महिलाएं पारिवारिक जिम्मेदारियों से बंधी हैं। इससे स्पष्ट है कि आधुनिक पुरुषप्रधान समाज में नारी को द्वितीय पंक्ति में रखा गया है। जब हम पुरुष और नारी में भेद नहीं करते हैं तो क्यों नहीं औरतों को प्रथम पंक्ति में रखते हैं।
महिलाओं को भी वे सभी अधिकार मिलने चाहिए जो पुरुषों को मिल रहे हैं। जहां तक क्षमता का सवाल है यह स्पष्ट हो चुका है कि महिलाएं प्रत्येक क्षेत्र में पुरुषों से आगे जा रही हैं, लेकिन हमारे समाज में नारी को वह स्थान नहीं दिया गया है, जो उसे मिलना चाहिए। समाज में नारी को पुरुष के साथ नीचे ओहदे पर रखा गया है, धारती पर आते ही लड़के और लड़की के मध्य अधिकांश परिवारों में भेद किया जाता है। लड़कियों की शिक्षा तथा विकास पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता है। यह सच है कि विगत कुछ दशकों की तुलना में वर्तमान समय में महिलाएं अधिकार संपन्न हुई हैं। पंचायत राज की विभिन्न स्तरीय संस्थाओं में आरक्षण मिल गया है। कुछ समय बाद लोकसभा और विधानसभाओं के चुनावों में भी आरक्षण मिल जाएगा, ऐसी आशा की जा रही है, लेकिन विगत कुछ वर्षों में महिलाओं पर हुए अत्याचार के आंकड़ों को देखा जाए तो सहज पता चल जाएगा कि महिलाओं की सुरक्षा कितना कठिन कार्य है। हमारा समाज नारी को वह स्थान नहीं दे पाया है, जो उसे मिलना चाहिए। आज महिलाओं के सामने असमानता सबसे बड़ी चुनौती है। नारी को इसके लिए अपनी चेतना को जगाना होगा। महिला उत्थान के लिए दो चीजें बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। महिलाओं के प्रति हमारे रुख में क्रांतिकारी परिवर्तन तथा पुरुष और नारी दोनों के लिए सार्वभौमिक शिक्षा। तभी हम नारी की स्थिति में परिवर्तन की आशा कर सकते हैं। औरतों पर हो रहे घटनाओं के कारणों की खोजकर अत्याचारियों को कडी से कड़ी सजा नहीं दी गई तो महिलाओं का वर्तमान और भविष्य अंधकारमय होता चला जाएगा।

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