Thursday, February 24, 2011

देश के विदेश बिहार में कुछ कुछ होता है........



jugnu Shardey
जुगनू शारदेय लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. फिलहाल सलाहकार संपादक ( हिंदी ) - दानिश बुक्स
देश का विदेश बिहार बहुत बड़ा राज्य है । नौ करोड़ के आस पास आबादी है । यहां एक उप मुख्यमंत्री भी हैं । वह वित्त मंत्री भी हैं । हर साल एक आर्थिक सर्वेक्षण वह विधान सभा में पेश करते हैं । तो उप मुख्य मंत्री सुशील कुमार मोदी के आर्थिक सर्वेक्षण में क्या होता है । बिहार की तरक्की के आंकड़े होते हैं । अपने ही आंकड़ों को वह पता नहीं कभी पढ़ते हैं या नहीं – कौन जाने । कोई समझदार आदमी तो नहीं ही पढ़ेगा । इस बात को वह भी जानते हैं , हम भी जानते हैं । इसी लिए 500 से ज्यादा पृष्ठों का सर्वेक्षण की मोटी बातें यानी अखबार में छपने वाली बातें 15- 16 पृष्ठों में समाई होती हैं । इन्हें पढ़ने से लगता है कि देश के विदेश बिहार में कुछ कुछ होता है ।
मोदी के होने को होना नहीं मानते बिहार विधान सभा में विरोधी दल के नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी । बेचारे बड़ी मेहनत करते हैं । कुछ रट कर , कुछ पढ़
कर बोलते हैं । उन्हे देख कर मोदी जी को लगता है कि अच्छा होता कि राबड़ी देवी चुनाव न हारतीं । कम से कम नेता , विरोधी दल कुछ बोलता तो नहीं ।
पांच साल इसी में नीतीश कुमार – सुशील कुमार मोदी ने बिताए थे कि विरोधी दल होने के बावजूद होता नहीं था । अब जब बिहार विधान सभा में विरोधी दल
नहीं है तो यह सिद्दीकी क्यों लंबी चौड़ी बातें करता है । दिक्कत यहां यह भी है कि जो आंकड़े किसी ने नहीं पढ़े हैं , उसका हवाला सिद्दीकी देता है । तब लगता है कि बिहार विधान सभा में कुछ कुछ होता है । य़ूं तो देश के विदेश बिहार में ही कुछ न कुछ होता रहता है । होना भी चाहिए । अगर यह सब न हो तो कैसे पता चलेगा कि बिहार में हत्या वगैरह भी होता है । बिहार की पुलिस गोलियां वगैरह भी चलाती हैं । पुलिस गोली – वोली न चलाए तो लगता है कि पुलिस नहीं सर्वोदय के लोग हो गए हैं ।
सर्वोदय कहना भी गलत होगा बल्कि यह कहना चाहिए कि पुलिस नहीं शांति सेना हो गई है । बिहार की पुलिस है भी शांति सेना की तरह ही । काबिल और नाकबिल
विधायकों – नेताओं – मंत्रियों की सुरक्षा में लगे होते हैं । यहां तक कि विधान सभा में भी मुख्य मंत्री के कक्ष के बाहर उनके सुरक्षाकर्मी कुछ इस अंदाज से खड़े होते हैं कि जैसे मुख्य मंत्री पर हमला होने वाला हो । यह सब देख कर लगता है कि बिहार पुलिस में कागजों पर ही सही कुछ कुछ होता है ।
पूरे देश में मारने लायक व्यापारी ही होते हैं । देश के विदेश बिहार में भी वही सबसे ज्यादा मारे जा रहे हैं । व्यापारी हमेशा काला चोर होता है ।
लोकतंत्र में भी उसने नहीं सीखा कि चोरी कैसे होती है । जबकि लोकतंत्र में नेता से ले कर अफसर तक मिसाल बन कर मौजूद होते हैं कि चोरी कैसे की जाए । सिद्दीकी विधान सभा में कुछ उदाहरण बताते हैं । सरकार लालू का उदाहरण देती है । निर्वहन कुमार की आंखों के सामने भ्रष्टाचार होता है । पर कागज पर नहीं होता । व्यापारी की हत्या के खिलाफ जनता का जुलूस होता है । पुलिस के पास गोली होती है । गोली जब चलती है तो  मारने के लिए ही चलती है । सरकार कहती है कि पुलिस ने अपनी रक्षा के लिए गोली चलाई । कमाल है जो जनता की रक्षा के लिए हैं उन्हें अपनी रक्षा के लिए गोली चलानी पड़ती है । यही तो सरकार का कुछ कूछ होता है ।

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