Wednesday, February 23, 2011

नशा क्रिकेट के 'खेल' का

Photo: http://www.aajkhabar.com
नशा क्रिकेट के खेल का सट्टाबाजार की मानें तो क्रिक्रेट का विश्वकप जीतने के सबसे ज्यादा आसार भारत के हैं। लेकिन विश्वकप जीत की खुमारी में कोई भी तस्वीर भारत के माथे पर चस्पा है तो वह 1983 की कपिलदेव की टीम इंडिया है, जो सिर्फ एक लाख रुपये के खर्चे पर इंग्लैंड रवाना हुई थी। उसके पास उस वक्त जीतने के लिये वाकई दुनिया थी और गंवाने के लिये सिर्फ टीम इंडिया का कैप। जिसके एवज में दस हजार से ज्यादा की कमाई किसी खिलाड़ी की नहीं थी। लेकिन 2011 में जब टीम इंडिया रवाना हुई तो हर खिलाडी के पैरो तले दुनिया है और जीत-हार का मतलब उसके लिये सिर्फ खेल है।
 1983
में समूचा विश्वकप महज चालीस लाख में निपटा दिया गया था और दुनिया कपिलदेव के वह आतिशी 175 रन भी नहीं देख पायी थी क्योकि उस दिन बीबीसी की हड़ताल थी। लेकिन 2011 में क्रिक्रेट दिखाने वाले टीवी चैनल में एक दिन की हडताल का मतलब है 500 करोड़ का चूना लगना। और इस बार विश्वकप का खर्चा है पचास करोड़ रुपये। 1983 में हर भारतीय खिलाड़ी के पीछे देश का बीस हजार रुपये लगा था। और खिलाडियो के जरीये प्रचार करने वाली कंपनियो से खिलाड़ियों को कुल कमाई महज पचास हजार थी। लेकिन आज की तारीख में खिलाड़ियों के जरीये प्रचार करने वाली कंपनियों से खिलाड़ियों की कमाई सिर्फ पैंतीस हजार करोड़ की है।
जी, यह आंकडा सिर्फ भारतीय खिलाडियों का है। जिसका असर यही है कि विश्वकप की टीम में नौ खिलाड़ी अरबपति हैं और बाकी करोड़पति। लेकिन सवाल यह नहीं है कि देश में क्रिक्रेट की खुमारी सिर्फ पैसों पर रेंगती है। सवाल यह है कि जिस दौर में क्रिकेट बाजार में बदला उसी दौर में बाजार के जरीये देश को चूना लगाने वाले कॉरपोरेट के लिये खिलाड़ी ही बाजार बन गया। जिस दौर में 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की आंच में प्रधानमंत्री भी आये हैं और सीबीआई कारपोरेट घरानों की परेड करा रही है, उसी दौर में टीवी पर उन्हीं दागदार कारपोरेट के प्रोडक्ट का प्रचार करते वही क्रिक्रेटर भी नजर आ रहे हैं, जिनके माथे पर टीम इंडिया का कैप है और जर्सी पर दागदार कंपनियों का स्टीकर।
असल में दागदार टेलीकॉम कंपनियां ही नहीं, रीयल इस्टेट से लेकर देश के खनिज संपदा को लूटने में लगी कंपनियों के भी प्रचार में यही क्रिक्रेटर सर्वोपरी हैं। अगले मुकाबलों में जब टीम इंडिया मैदान पर होगी तो हर खिलाडी की जर्सी को गौर से देखियेगा। हर जर्सी पर दो कंपनियों के स्टीकर का मतलब महज बाजार को ढोना भर नहीं है बल्कि इसकी एवज में मिलने वाली रकम भी विश्वकप जीतने के बाद मिलने वाली रकम से भी कई गुना ज्यादा है। तो पहली बात तो यह तय हो गयी कि क्रिक्रेट विश्वकप में जीत का उस रकम से कुछ भी लेना देना नहीं है जो विश्वकप के साथ मिलेगी। तब जीत किसलिये।
जाहिर है क्रिक्रेट एक खेल है तो खिलाडी को मान्यता जीत से ही मिलती है। लेकिन देश के भीतर 20-20 के आईपीएल के धंधे ने तो इस मान्यता की भी बोली लगा दी, जहां खिलाडी की जिन्दगी में चकाचौंघ और पांच सितारा समाज में घूमने-फिरने की ऐंठ खेल से ज्यादा उस पावर पर आ टिकी जहां खिलाड़ी मशीन में बदल गया। और तीन से चार ओवर में चौके-छक्के मार कर झटके में लाखो के वारे-न्यारे कर ले जाये। उसके बाद मनमोहनोमिक्स के चुनिंदा कारपोरेट के साथ गलबहिया डालकर खिलाड़ियों का खिलाड़ी बन जाये। तो विश्वकप में जीत की भूख टीम इंडिया में जगेगी कैसे। जाहिर है यहां सवाल देश के उन करोड़ों लोगों के जोश-उत्साह और उमंग का होगा, जिनकी रगों में क्रिक्रेट देश भक्ति के आसरे दौड़ता है और जीत का मलतब दुनिया को अपने पैरो तले देखने की चाहत होती है। यानी जिस 80 करोड़ आम जनता के हक को अपनी हथेली पर समेटकर चकाचौंध की व्यवस्था में राजनेता-कारपोरेट और नौकरशाह का कॉकटेल देश के राजस्व को ही लूट रहे हैं, उनके लिये वही क्रिक्रेट खिलाड़ी जीतना चाहेंगे, जो लूट की पूंजी में खुद बाजार बनकर खिलाड़ी बने हुये हैं।
असल में देश के सामने सबसे बड़ा संकट यही है कि जो व्यवस्था देश को आगे बढाने के नाम पर अपनायी जा रही है, वह चंद हाथों में सिमटी हुई है और पहली बार देश की ही कीमत अलग अलग तरीके से हर वह लगा रहा है जिससे उसे विश्वबाजार में मुनाफा मिल सके। मामला सिर्फ टेलिकाम के 2जी स्पेक्ट्रम या इसरो के एस बैंड का नहीं है। सवाल आदिवासी बहुल इलाको की खनिज-संपदा के खनन का भी है और खेती की जमीन पर कुकुरमुत्ते की तरह उगते उघोगो का भी है। सवाल गांव के गांव खत्म कर शहरीकरण के नाम पर सड़क से लेकर पांच सितारा हवाईअड्डो के विस्तार का भी है और पर्यावरण ताक पर रखकर रईसी के लिये लवासा सरीखे शहर को बसाने का भी है। और इस उभरते भारत की गांरटी लिये अगर क्रिक्रेटर ही आमजन की भवनाओं को अपनी कमाई तले जगाने लगे तो सवाल वाकई देश की असल धड़कन का होगा। क्या वाकई देश के हालात इस सच को स्वीकारने के लिये तैयार है कि कल तक जो विदेशी निवेश देश की मजबूत होती अर्थव्यवस्था का प्रतीक था, आज उसमें हवाला और मनी-लॉड्रिंग का खेल क्यों नजर आ रहा है। कल तक जो कारपोरेट सरकारी लाइसेंस के जरीये देश का विकास करता हुआ दिखता था आज वह देश के राजस्व को लूटने वाला क्यों लग रहा है। कल तक जो नौकरशाह जिस किसी भी मंत्रालय में कारपोरेट की योजनाओ की फाइल पर मंत्रीजी के संकेत मात्र से "ओके" लिखकर विकास की दौड में अपनी रिपोर्टकार्ड में " ए " ग्रेड पा लेता था। अब वहीं नौकरशाह नियम-कायदो का सवाल उठाकर उसी कारपोरेट के नीचे से रेड कारपेट खिंचने को तैयार है क्योकि भ्रष्टाचार पर सीबीआई से लेकर सुप्रीमकोर्ट तक की नजर है। तो क्या खुली बाजार अर्थव्यव्स्था की हवा के दौर में देश की सत्ता भी अब विकास की परिभाषा बदलने के लिये तैयार है। अगर हां तो फिर नयी परिभाषा तले विश्वकप खेलने के लिये तैयार टीम इंडिया को परखना होगा। जिसके पास न तो 1983 के खिलाड़ियों की तरह क्रिक्रेट जीने का जरीया नहीं कमाने का जरीया है। उस वक्त नंगे पांव हर मैच-दर-मैच क्रिकेटर खुद को चैपियन बनाने में लगे थे यानी टीम इंडिया विकसित होने की दिशा में थी। लेकिन 2011 में टीम इंडिया खेल शुरु होने से पहले ही ना सिर्फ खुद को चैंपियन माने हुये हैं बल्कि जिन्दगी से आगे हर चकाचौंघ को अपनी हथेली पर चमकते हुये देखने का नशा है। हालांकि टीम इंडिया की जीत को लेकर करोड़ों आमजन के नशे में अब भी तिरंगे के लहराने और देश का माथा उंचा रखना ही है । लेकिन पहली बार देश के हालात में सियासत का खेल ज्यादा रोंमाच भरा है और सरकार-विपक्ष के साथ साथ जनता भी अब महंगाई और भ्रष्टाचार को लेकर 20-20 खेलने के मूड में आक्रामक है। ऐसे में 50-50 ओवर का वन-डे विश्वकप कितना रोमांच पैदा कर पायेगा यह देखना भी देश को पहली बार समझने जैसा ही होगा। इसलिये सट्टेबाजों पर ना जाइये जो 5 हजार करोड से ज्यादा की रकम जीत हार पर लगाकर भारत को चैंपियन बता रहा है। बल्कि दुआ मनाईये कि वाकई इस बार खेल से खिलाड़ी निकले । न कि भ्रष्ट व्यवस्था में पैसो की जमीन पर खिलाड़ियों के खिलाडी !

साभार: पुण्य प्रसून बाजपेयी

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