Monday, February 21, 2011

दारूलउलूम देवबन्द-यही मेरा पहला और आखिरी मशवरा है!-अज़ीज़ बर्नी



इस समय हैदराबाद में हूं। कल मौलाना आज़ाद नैशनल उर्दू यूनिवर्सिटी में मीडिया के छात्रों से विशेष संबोधन करना था, जिसके लिए मैं हैदराबाद हाज़िर हुआ था। आज सुबह आयोजनो का सिलसिला प्रियदर्शनी काॅलेज, नामपल्लि हैदराबाद से हुआ। यह सभा अखिल भारतीय उर्दू तालीमी कमेटी द्वारा आयोजित की गई और इसके बाद हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के जन्म दिवस के सिलसिले में जलस-ए-सीरत-ए-रसूल सल्ल॰, प्रकाशन हाॅल, गांधी भवन और देर रात मुग़लपुरा में आयोजित किया गया। इन तीनों स्थानों पर मेरे भाषण का विषय क्या रहा और मैंने क्या गुफ़्तगू की इसकी चर्चा फिर कभी, इसलिए कि फ़िलहाल मैं दारुलउलूम देवबंद के विषय पर लिख रहा हूं और अभी इससे हटना नहीं चाहता। आंशिक रूप से यह चर्चा भी इसलिए कि प्रियदर्शनी काॅलेज की सभा में बुजुर्ग शायर नानक सिंह नशतर का एक शेर इस विषय के हिसाब से बहुत निकट लगा और दिल चाहा कि मैं इसे उद्धरण करते हुए अपने आज के लेख की शुरूआत करूं, इसलिए पहले मुलाहिज़ा फ़रमाएं यह शेर, फिर उसके बाद मेरा लेखः


पहले यह समझ लीजिए मसले का हल क्या है
सिर्फ़ मशवरों से तो रहबरी नहीं होती
मुझे यह शेर समय तथा विषय के अनुकूल इसलिए लगा कि जब से मैंने दारुलउलूम देवबंद के विषय पर लिखना आरंभ किया है पाठकों को मेरे मशवरे का इंतिज़ार है। और साफ़ शब्दों में मैं अभी कोई मशवरा देने का साहस नहीं कर सका हूं, केवल परिदृश्य पेश करने का प्रयास रहा है या उन आशंकाओं को सामने रखा है जिनका ख़ुदा-न-ख़्वास्ता सामना करना पड़ सकता है, लेकिन अब इस सिलसिले को और लम्बा नहीं किया जा सकता, अधिक समय भी नहीं है, इसलिए आज मैं अपनी गुफ़्तगू को वह रूप देना चाहता हूं, जिसे मशवरे की श्रेणी में रखा जा सकता है।
बहुत कठिन है किसी व्यक्तित्व का निर्माण करना और बहुत आसान है किसी के व्यक्तित्व को धूमिल कर देना। इसलिए मेरे क़लम के माध्यम से किसी के चरित्र हनन का तो प्रश्न ही क्या, उंगलियां कांप जाती हैं किसी नकारात्मक विषय पर लिखते हुए। फ़र्ज़ की मांग न होती तो शायद दरगुज़र कर देता और इस विषय पर क़लम उठाता ही नहीं। हर तरफ़ से यह आवाज़ें आ रही हैं कि दारुलउलूम देवबंद से जुड़े ज़िम्मेदार व्यक्ति ग्रुपों में विभाजित हो गए हैं। अमुक की मंशा यह है और अमुक की मंशा यह है, इसे इसलिए होना चाहिए और इसे इसलिए नहीं होना चाहिए, हमें ख़ानदानी जागीरदारी से छुटकारा पाना है, इत्याति इत्यादि। सबसे पहले तो यह ख़ानदानी जागीरदारी की कल्पना को मन से निकालना होगा और यह देखना होगा कि किसी भी परिवार से जुड़ा कोई व्यक्ति अगर योग्य है तो उसे केवल इस आधार पर आलोचना का निशाना बनाना उचित है? पंडित जवाहर लाल नेहरू से जो सिलसिला शुरू हुआ वह श्रीमति इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी से होते हुए राहुल गांधी तक पहुंच चुका है। क्या यह आपत्तिजनक है? अगर ऐसा होता तो राहुल गांधी को देश के भविष्य के रूप में किस तरह पेश किया जा सकता। श्रीमती विजय राजे सिंधिया, माधवराव सिंधिया, वसुंधरा राजे सिंधिया और ज्योतिरादित्य सिंधिया क्या एक ही परिवार के व्यक्ति नहीं हैं। मुलायम सिंह यादव, प्रोफ़ेसर राम गोपाल यादव, शिवपाल यादव, अखिलेश यादव, धर्मेंद्र यादव सबका संबंध एक ही परिवार से है। ऐसे अनेकों उदाहरण राजनीति के अलावा अन्य क्षेत्रों में भी दिए जा सकते हैं। इसलिए मौलाना हुसैन अहमद मदनी, मौलाना असद मदनी, मौलाना अरशद मदनी, मौलाना महमूद मदनी का संबंध अगर एक ही परिवार से है तो क्या केवल इसी आधार पर उन्हें आलोचना का निशाना बनाया जाना चाहिए। आज जबकि आवश्यकता इस बात की है कि यह सब जिन्हें हम अलग-अलग समूहों में सीमित करते हैं या क़रार देते हैं, उन सबको संगठित करने के प्रयास किए जाएं। हम इनमें क्यों फूट पैदा करने का प्रयास करते हैं। थोड़े समय के लिए वैचारिक मतभेद हो सकता है, मतभेद के कारण कुछ भी हो सकते हैं, हां वह भी हो सकते हैं जो आपके मन में हैं, परंतु क्या हमें इस नाज़्ाुक समय में एक काॅमन मिनिमम प्रोग्राम को ध्यान में रखते हुए सबको संगठित करने का प्रयास नहीं करना चाहिए। मैं मौलाना गुलाम मुहम्मद वस्तानवी को इस गठबंधन में शामिल देखना चाहता हूं। इस बात से हटकर कि दारुलउलूम देवबंद के मुहतमिम का फ़ैसला किसके पक्ष में हो, भले ही मौलाना ग़्ाुलाम मुहम्मद वस्तानवी के अपने पद पर बरक़रार रहने के रूप में हों या कोई दूसरा, परंतु फ़ैसला जो भी हो, इसमें सब शामिल हों। ख़ुशदिली के साथ शामिल हों और स्वच्छ भाव के साथ कोई ऐसा रास्ता निकालें जो सब के लिए स्वीकारीय हो। किसी का व्यक्तित्व धूमिल न हो। अगर हमने इस नाज़्ाुक घड़ी में किसी भी कारण से किसी एक भी ऐसे व्यक्तित्व को धूमिल कर दिया, जो हम सबके लिए क़ौमी पूंजी से कम नहीं है तो इतिहास हमें कभी क्षमा नहीं करेगा। उन व्यक्तियों को बनाने के लिए हमारी क्या भूमिका है, अगर नहीं है तो फिर यह अधिकार किसने दे दिया कि हम उन व्यक्तियों की प्रतिष्ठा को विवादित बनाने की दिशा में रात दिन एक कर दें। जहां तक मौलाना गुलाम मुहम्मद वस्तानवी साहब का संबंध है तो क्या उनसे शिकायत केवल इतनी ही कि उन्होंने गुजरात या नरेंद्र मोदी के संदर्भ में जो बातें अपनी जुबान से कहीं वह अनुचित थीं और एक समारोह के दौरान मुख्य अतिथि के रूप में भाग लेते हुए जो मोमेंटो पेश किए, तथ्यों की दृष्टि से उनका पेश किया जाना आवश्यक नहीं था। इस पर बेहतर राय मुफ़्यिान-ए-क्रिाम की होगी और देखना यह होगा कि हमारी मजलिस-ए-शूरा को कि जब उन्होंने मौलाना गुलाम मुहम्मद वस्तानवी का चयन दारुलउलूम देवबंद के मुहतमिम के रूप में किया तो क्या वह आयोजन हो चुका था। जहां तक गुजरात और नरेंद्र मोदी से संबंधित वाक्यों की बात है तो मौलाना गुलाम  मुहम्मद वस्तानवी के मदरसों या आधुनिक शिक्षा के केंद्र गुजरात में हैं। उनके विचार क्या पहले हमारी मजलिस-ए-शूरा के सामने नहीं थे। क्या यह पहला अवसर है जब उन्होंने अपने सिद्धांत को सामने रखा या मजलिस-ए-शूरा ने उनके चयन के समय ऐसी किसी भी बात को ध्यान देने योग्य नहीं माना। उनके बारे मे सभी विवरण जानने की आवयकता नहीं समझी या ऐसा बहुत कुछ सामने आने पर उन्होंने अनदेखी करना आवश्यक समझा। आज यह प्रश्न मजलिस-ए-शूरा को स्वयं अपने आपसे करना होगा। जहां तक मेरा अनुमान है सभी पाठकों को तो शायद इस बात की जानकारी ही नहीं है कि मजलिस-ए-शूरा में कौन-कौनसी शख़्सियतें शामिल हैं, उनका संबंध किस-किस शहर तथा किस-किस परिवार से है। कहीं ऐसा तो नहीं कि हम उन सबको देवबंद के किसी एक विशेष परिवार के व्यक्ति के रूप में देख रहे हों, लिहाज़ा प्रस्तुत है उनका संक्षिप्त परिचयः
1.  मौलाना मुफ़्ती मंजूर अहमद: कानपुर के शहर क़ाज़ीहैं, क्षेत्र के बड़े उलेमा में उनकी गणना होती है।
2.  मौलाना मुहम्मद याकूब: मदरसा काशिफ़ुल-हुदा (चिन्नई) के संरक्षक तथा तमिलनाडु राज्य के अमीर-ए-शरीअत एवं कई मदरसों के संरक्षक हैं।
3.  मौलाना अब्दुल अज़ीज़: मजलिस-ए-इल्मी हैदराबाद (आंध्र प्रदेश) के ज़िम्मेदार हैं।
4. हाफ़िज़ मुहम्मद सिद्दीक़: बीड़ी के व्यापारी हैं, कांग्रेस के टिकट पर सांसद तथा विधायक एवं राज्य मंत्री रह चुके हैं।
5. मौलाना अज़हर नोमानी: मदरसा हुसैनिया रांची (झारखंड) के संरक्षक हैं।
6. मौलाना अबुल क़ासिम नोमानी: जामिआ इस्लामिआ रेवड़ी तालाब बनारस के शेख़ुल हदीस और मुफ़्ती-ए-आज़म हैं। हज़रत मौलाना मुफ़्ती महमूदुल हसन गंगोही के ख़लीफ़ा हैं।
7. मौलाना बदरुद्दीन अजमल: इत्र के बड़े व्यापारी हैं, यूडीएफ़ असम के संस्थापक एवं संसद सदस्य हैं।
8. मौलाना निज़ामुद्दीन: अमीर-ए-शरीअत बिहार, उड़ीसा व झारखंड और आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड के महासचिव हैं।
9.  मौलाना गुलाम मुहम्मद वस्तानवी: मदरसा इशाअतुल उलूम, अक्कल कुआ (महाराष्ट्र) के संस्थापक, मुहतमिम और बहुत से शिक्षण संस्थानों के संरक्षक हैं। इस समय दारुलउलूम देवबंद के मुहतमिम हैं।
10. मौलाना अब्दुल अलीम फ़ारूक़ी: दारुल मुबल्लिग़ीन लखनऊ के ज़िम्मेदार और जमीअत-ए-उलेमा (अलिफ़) के नाज़िम-ए-उमूमी हैं।
11. मौलाना सैय्यद मुहम्मद राबे हसनी नदवी: आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड के अध्यक्ष और नदवतुल उलेमा लखनऊ के नाज़िम हैं।
12. मौलाना मुहम्मद तलहा: हज़रत मौलाना शेख़ मुहम्मद ज़करिय नव्वरल्लाह मरकदहू के सुपुत्र और प्रसिद्ध पीर-ए-तरीक़त हैं। मज़ाहिरुल उलूम सहारनपुर के संरक्षक भी हैं।
13. मौलाना सैय्यद मियां ख़लील हुसैन: मदरसा असग़रिया देवबंद के मुहतमिम और मशहूर बुजुर्ग  हैं।
14. मौलाना मुहम्मद इस्माईल: दारुलउलूम मुहम्मदिया मालेगांव के शेख़ुल हदीस होने के साथ साथ मालेगांव विधानसभा क्षेत्र के विधायक भी हैं।
15. मौलाना मुहम्मद इशतियाक़: मदरसा जामेउलउलूम मुजफ्फरपुर (बिहार) के नाज़िम और शेख़ुलहदीस हज़रत मौलाना मुहम्मद शेख़ ज़करिया रह॰ के ख़लीफ़ा हैं।
16. हाजी जमील अहमद: कलकत्ता के मशहूर और बड़े व्यापारी हैं।
17. मौलाना मलिक मुहम्मद इब्राहीम: मदरसा मिफ़्ताहुलउलूम वैलविशारम के संरक्षक और चमड़े के बड़े व्यापारी हैं।
18. मुफ़्ती सईद अहमद पालनपुरी दारुलउलूम देवबंद के प्रधानाध्यापक की हैसियत से मजलिस-ए-शूरा के सदस्य हैं।
यह है मजलिसे शूरा के सदस्यगण, जिन्होंने मुहतमिम की हैसियत से मौलाना गुलाम मुहम्मद वस्तानवी का चयन किया या जिन्हें 23 फरवरी 2011 को दूसरी बैठक में यह निर्णय लेने का अधिकार है कि उनकी नियुक्ति को बहाल रखा जाए या इसमें किसी प्रकार का परिवर्तन किया जाए। मैं फिर यह स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि यह विवाद जल्द से जल्द अपनी समाप्ति को पहुंचे और इस तरह पहुंचे कि मौलाना गुलाम मुहम्मद वस्तानवी, मौलाना अरशद मदनी, मौलाना महमूद मदनी, मौलाना बदरुद्दीन अजमल या उन जैसा कोई भी व्यक्ति, मजलिस-ए-शूरा के सदस्यों सहित किसी के व्यक्तित्व को क्षति न पहुंचे, इसलिए कि अगर ऐसा कुछ भी होता है तो यह दारुलउलूम देवबंद के विरोधियों की सबसे बड़ी कामयाबी होगी। दारुलउलूम देवबंद के ख़िलाफ़ षड़यंत्रकारी मानसिकता रखने वालों की बहुत बड़ी कामयाबी होगी। दारुलउलूम देवबंद की प्रतिष्ठा को धूमिल करने का प्रयास करने वालों की बहुत बड़ी कामयाबी होगी। मुसलमानों के धार्मिक तथा राजनीतिक नेतृत्व को असफल बनाने के प्रयास में एक बड़ी सफलता होगी। अगर हमें इन हालात से उबरने के लिए मस्लेहत से काम लेना पड़े तो भी लिया जाए। अगर कहीं थोड़ा बहुत समझौता करने की गुंजाइश दिखती हो तो वह भी की जाए। अगर वाक़ई ज़रा भी इनमें से किसी के आपसी संबंधों में रत्ती बराबर भी असमानता है तो उन्हें समतल करने का दिल व जान से प्रयास किया जाए। क्या हम इससे सीख हासिल नहीं कर सकते कि दो विभिन्न विचारधाराओं के लोग अपनी राजनीतिक या कारोबारी तरक़्क़ी के लिए एक साथ खड़े नज़र आते हैं। क्या हम नहीं देखते कि वैचारिक दृष्टि से नितीश कुमार और भारतीय जनता पार्टी अलग-अलग होते हुए भी एक साथ मिल कर सरकार चलाते हैं। क्या हम नहीं देखते कि यूपीए जिसकी आज केंद्र में सरकार है, उसके सहयोगी दल आपस में एक मत नहीं हैं, परंतु सत्ता के लिए संगठित हैं। हमारे सामने तो एक ऐतिहासिक संस्था के भविष्य का प्रश्न है, क्या हमें निजी अहं, निजी उद्देश्यों तथा निजीकारणों से ऊपर उठ कर संगठित होने के लिए तैयार नहीं करता। अगर नहीं तो फिर किस अधिकार से हम दारुलउलूम देवबंद के मामले में अपने विचार प्रकट कर रहे हैं। अगर यह हमारी क़ौमी सम्पत्ति है जिसे हम अपनी पूंजी मानते हैं तो उसे बचाने की ज़िम्मेदारी भी हमारी है और उसे बचाने का अर्थ केवल भवन को बचाना नहीं, उनसे जुड़े तमाम व्यक्तियों और उसमें शिक्षा प्राप्त करने वाले सभी छात्रों को बचाना भी है। क्यों यह आवश्यक समझते हैं कि हमें उनमें से अपनी राय अमुक के पक्ष में, अमुक के विरुद्ध देनी चाहिए। जब तक लकीर के इस पार या उस पार नहीं होंगे हमारी राय का कोई अर्थ नहीं होगा। मेरा विचार है कि इस मामले में राय देने वाला अगर मजलिस-ए-शूरा या संबद्ध ज़िम्मेदार व्यक्तियों जिनमें से कुछ का उल्लेख मैंने अपने लेख में किया है अधिक योग्य हैं, अधिक धार्मिक जानकारी रखते हैं, अधिक बेहतर फ़ैसला लेने की क्षमता रखते हैं तो निःसंदेह वह अपना मश्विरा दें, उस मशवरे को सामने रखे, वरना ख़ुदा के लिए अपने स्वाभिमान की शांति, किसी के साथ खड़े होने के शौक़ में उसे जटिल बनाने का प्रयास न करें, प्रयास करें, प्रयास करें, प्रयास कारगर होता न दिखे तो दुआ करें कि सब संगठित रहें। आपसी एकता और स्नेह के साथ इस मसले का हल निकले और बेहतर है कि 23 फ़रवरी से पहले निकले। इस सिलसिले में यही मेरा पहला और अंतिम सुझाव है और इसके साथ ही इस विषय पर मैं अपनी गुफ़्तगू समाप्त करता हूं।
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