Wednesday, March 09, 2011

रामदेव पर कामदेवों के तीर

राम माधव, हिन्दू पुरूषों के संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्वप्रवक्ता, अपने हास्यबोध के लिए कभी चर्चित नहीं रहे हैं। यह जुदा बात है कि फरवरी के दूसरे सप्ताह में उनके द्वारा राजधनी में सम्बोधित प्रेस सम्मेलन में कुछ पत्रकार अपनी मुस्कान रोक नहीं सके जब संघ के प्रचारक एवं टेरर गुरू असीमानन्द तथा हिन्दुत्व आतंक की व्यापक परिघटना पर बात होने लगी।
बाबा रामदेव ने काले धन के खिलाफ मुहिम क्या छेड़ी, मानों बर्र के छत्ते में हांथ डाल दिया। असल में पहले राजनेताओं ने बाबा रामदेव को ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया था क्योंकि इस देश में बहुत से बाबा हैं जिनके लाखों समर्थक हैं किंतु वे राजनेताओं के विरुध्द कभी नहीं बोलते बल्कि उन्हें लाभ ही पहुंचाते हैं, बदले में राजनेता भी उन्हें प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष लाभ पहुंचाते हैं। 
यह, ताली एक हांथ से नहीं बज सकती, के सर्वमान्य सिध्दांत के अनुसार रेसीप्रोकल अरेंजमेंट है। कई बाबा राजनेताओं तथा देशी विदेशी उद्योगपतियों, अफसरशाहों, फिल्मी हस्तियों के बीच संपर्क सूत्र का भी कार्य करते हैं। भ्रष्टाचार आपसी सहमति से होता है इसलिये इसमें कोई वादी या प्रतिवादी नहीं होता और जब तक किसी केस में पिटीशनर न हो, केस दायर ही नहीं हो सकता। भ्रष्टाचार में पीडित पक्ष आम जनता होती है जो संगठित न होने के कारण अंदर ही अंदर कुढ़ती रहती है और भ्रष्टाचार को अपने भाग्य का लेख मान कर आदर्श भारतीय पत्नी की तरह चुपचाप सब कुछ सहन करती रहती है। बाबा रामदेव के ट्रस्ट के पास 1152 करोड़ की संपत्ति बताई जाती है, बाबा इसे थोड़ा कम यानि 1115 करोड़ बताते हैं। बाबा के ट्रस्ट के पास अकूत संपत्ति, महंगी कारें, आलीशान भवन सब कुछ है। किसी भी व्यक्ति को केवल 4 चीजों की आवश्यकता होती है जिसके लिये वह आजीवन संघर्षरत रहता है, मान-सम्मान, धन-संपत्ति, ख्याति-प्रसिध्दि तथा स्वस्थ शरीर। बाबा रामदेव के पास यह सारी चीजें हैं इसलिये उन्हें कामदेवों (राजनेताओं) की परवाह नहीं है। नेताओं की यही समस्या है कि कामदेव के जिन बाणों से अच्छे अच्छे ऋषि मुनियों के दिल दिमाग तथा शरीर छलनी हो जाते हैं, वे बाण रामदेव बाबा पर असर नहीं दिखा सकेंगे क्योंकि बाबा की आत्मा पहल ही तृप्त है। वह जहां भी जाते हैं लाखों की भीड़ आकर्षित कर लेते हैं। पैसों की भी कमी नहीं है। गाड़ी घोड़ा भी पर्याप्त हैं। फिर बाबा पर कौन सा तीर चलाया जाय कि तपस्या भंग हो जाय। उधर बाबा रामदेव है कि नगर निगम के बुलडोजर की तरह सबको रौंदते हुये बढ़ने को तैयार है। अब जिनको अपने मकान टूटने का डर है, वे तो बौखलायेंगे ही। बाबा ने पूरे देश में काले धन के खिलाफ हस्ताक्षर अभियान चला रखा है जिसे भरपूर सफलता भी मिल रही है। नेताओं की चिंता यह है कि जितने लोग बाबा के कार्यक्रमों तथा हस्ताक्षर अभियान में हिस्सा ले रहे हैं, यदि मतदान के समय भी वे नेताओं से विमुख हो गये तो सत्ता प्राप्ति असंभव हो जायग। इसलिये बाबा के बुलडोजर को ब्रेक लगाना ही पड़ेगा। बाबा पर सबसे पहले ब्रेक लगाया दिग्गी राजा ने। दिग्गी राजा परिपक्व राजनीतिज्ञ हैं इसलिये उन्होंने केवल यह कहा कि बाबा को यह बताना चाहिये कि उनके आश्रम में किसी प्रकार का काला धन नहीं लगा है। हालांकि काले धन की जांच कराना सरकार का काम है, चाहे किसी भी एजेंसी (सीबीआई, इनकम टैक्स, प्रवर्तन निदेशालय, पुलिस इत्यादि) से जांच करा ले, कोई व्यक्ति काले धन की स्वेच्छा से घोषणा क्यों करेगा, फिर भी बाबा ने कह दिया कि मेरे पास 1 रुपये का भी काला धन नहीं है। दिग्गी राजा के प्रश्न का उत्तर बाबा रामदेव ने दे दिया तो विवाद यहीं समाप्त हो जाना चाहिये था किंतु दिग्गी राजा जैसे वरिष्ठ नेता ने शुरुआत की थी तो कनिष्ठों का एक्टिव होना जरूरी था। उत्तराखंड के विधायक किशोर उपाध्याय ने आरोप लगाया कि बाबा के पास हरिद्वार में करोड़ों की संपत्ति है तथा उनके रिश्तेदार ट्रस्ट में महत्वपूर्ण पदों पर हैं  
बाबा रामदेव ने ट्रस्ट में किसी डायरेक्ट रिलेशन के होने का खंडन कर दिया। कभी बाल ठाकरे के सेनापति रहे संजय निरुपम ने तो बाबा को धमकी भी दे डाली। उन्होंने सलाह दी कि बाबा केवल आध्यात्म की बातें करें, राजनीति में न पड़ें। उन्होंने कहा कि इस देश में बहुत से बाबा हैं जिनके बड़े बड़े आश्रम हैं, हम उन्हें कभी नहीं छेड़ते किंतु यदि कोई बाबा अपने आवरण से बाहर जाता है तो उसे जांच के लिये तैयार रहना चाहिये। उन्होंने यह भी कहा कि मैं प्रार्थना करूंगा कि बाबा रामदेव बेगुनाह साबित हो जायं। यह सलाह भी दे दी कि बाबा राजनीति में न आयें नहीं तो बर्बाद हो जायेंगे। निरुपम का संदेश स्पष्ट है कि रामदेव बाबा राजनीति से दूर रहें वर्ना उन्हें गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे। सरकार के पास पुलिस, प्रशासन, आईबी, सीबीआई, सभी कुछ हैं, बाबा को ऐसे चक्करों में फंसा देंगे कि बाबा के लिये त्राहिमाम की स्थिति निर्मित हो जायगी।
उधर बाबा रामदेव की राबिन हुड बनने की महत्वाकांक्षा उन्हें सरेंडर नहीं करने दे रही है। बाबा ने भी घोषणा कर दी कि वे जून में अपनी राजनीतिक पार्टी लांच कर देंगे। बाबा रामदेव के पास संपत्ति की कमी नहीं है। उनके विरोधी कहते हैं कि उनकी 1152 करोड़ की संपत्ति है। बाबा भी स्वीकार करते हैं कि उनके ट्रस्ट के पास 1115 करोड़ की संपत्ति है। स्काटलैंड तथा ह्यूस्टन में सैकड़ों एकड़ जमीन है। बाबा के ट्रस्ट की भारत के 22 राज्यों में 152 दुकानें तथा 50 अस्पताल हैं, 236 उत्पादों की बिक्री होती है। योग की 166 आडियो तथा वीडियो कैसेट्स हैं तथा 32 पैकेज हैं। योग शिविरों में प्रति व्यक्ति 5000 रुपये फीस ली जाती है। इन सबसे करोड़ों रुपये प्रतिमाह की आय होती है। अब बाबा रामदेव की मकान, दुकान, गाड़ी, बंगले की चाहत तो पूरी हो चुकी है, उनकी ख्याति भी भारत के अलावा विदेशों में भी है। ऐसी स्थिति में बाबा की केवल एक इच्छा शेष रह जाती है, भारत का बेताज बादशाह या किंग मेकर बनने की जिसके लिये पहले अपने आपको देश का मसीहा या राबिन हुड सिध्द करना होगा। बाबा इसी दिशा में प्रयत्नशील हैं।
इसमें कोई बुराई नहीं हैयदि इसी बहाने देश का विदेशों में काले धन के रूप में जमा पैसा वापस देश में आ जाता है तथा भ्रष्टाचार पर थोड़ी नकेल कस जाती है तो यह भी देश के वृहद हित में होगा। देश में राजनीति में प्रवेश के लिये कोई शैक्षणिक योग्यता या मेडिकल फिटनेस निर्धारित नहीं है, न ही आयु का बंधन है। कोई भी व्यक्ति राजनीति में प्रवेश कर सकता है, चुनाव लड़ कर विधायक, सांसद, मंत्री बन सकता है फिर भी नेतागण बाबा रामदेव के राजनीति में प्रवेश का विरोध कर रहे हैं क्योंकि उनकी समस्या यह है कि राजनीति के हमाम में सब नंगे हैं, यदि इस हमाम में कोई व्यक्ति कपड़े पहन कर घुस आता है तो सभी को कपड़े पहनने को विवश होना पड़ेगा या फिर हमाम छोड़ कर बाहर जाना होगा। भ्रष्टाचार में लिप्त राजनीति में फिलहाल यह संभव नहीं है।

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