Saturday, March 12, 2011

मजबूर नीतीश कुमार


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अपने ऊपर हो रहे चौतरफा हमलों के बाद मजबूर होकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पिछले दिनों समाचार चैनलों के संपादकों से मुखातिब हुए थे. उनकी और उनके सलाहकारों की समझदारी रही होगी कि इस नई तरह की प्रेस-वार्ता में चंद सवालों, जिसमें बहुत सारे सवाल प्रायोजित लग रहे थे, का जवाब देने के बाद शायद कम-से-कम प्रधानमंत्री की ओर अंगुलियां कुछ कम उठे. लेकिन हुआ इसका उल्टा. प्रेस-वार्ता में प्रधानमंत्री ने जिस तरह सारा दोष गठबंधन सरकार की मजबूरियों पर डालने की कोशिश की, इस तर्क ने प्रधानमंत्री को एक नये आलोचना के केंद्र में ला दिया है.


प्रधानमंत्री की 'बेचारगी' सुनने के बाद उसी दिन बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उन्हें मजबूरी बताने के बजाए जनता के बीच जाने की सलाह दी थी. पिछले दिनों नीतीश कुमार ने एक बार फिर गठबंधन की राजनीति पर अपने विचार रखे. 

बिहार विधानसभा में राज्यपाल के अभिभाषण पर हुई चर्चा का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि जिस दिन गठबंधन की सरकार चलाना हमारे लिए मजबूरी बन जायेगी, उसी क्षण मैं इस्तीफा दे दूंगा. ऐसा कह कर नीतीश कुमार ने एक बार फिर एक तीर से कई शिकार करने की कोशिश की. 

नीतीश कुमार ने अपने जवाब से न सिर्फ विपक्ष के हमलों से अपनी सरकार का बचाव किया बल्कि उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को फिर यह याद दिलाया कि भविष्य के प्रधानमंत्री के रुप में देखा जा रहा एक व्यक्ति वर्तमान प्रधानमंत्री की तरह मजबूर नहीं है. साथ ही उन्होंने अपने गठबंधन के जूनियर पार्टनर भाजपा को भी संकेत दिया कि वो उन्हें किसी भी तरह से मजबूर न करे. नीतीश कुमार ने अपने जवाब में गठबंधन से संबंधित टिप्पणी करने के साथ ही जात-पात की राजनीति और भ्रष्टाचार पर भी अपने 75 मिनट के भाषण का कुछ हिस्सा खर्च किया.

लेकिन अगर हम विधानसभा में दिये गये मुख्यमंत्री के जवाब को तथ्य और तर्क की कसौटी पर कसें, उसकी समीक्षा करें तो कुछ दूसरी ही तस्वीर सामने आती है. बिहार में सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन के उद्भव, उसके पिछले पांच से अधिक वर्षों के कार्यकाल और इस दौरान खुद नीतीश कुमार के बदलते एजेंडों, बयानों और कार्यशैली का मूल्यांकन कई तरह की मजबूरियों को सामने लाता है.

नीतीश कुमार की राजनीतिक मजबूरी का सबसे ताजा उदाहरण है सवर्ण आयोग का गठन. साथ ही नीतीश कुमार सामाजिक रूप से जिस तरह दो छोरों को साधते हुए दुबारा मुख्यमंत्री बने हैं, यह कलाबाजी सवर्ण आयोग के गठन के रूप में राजनीतिक-सामाजिक कीमत भी वसूल रही है. 

गौरतलब है कि महादलित आयोग का कार्यकाल 25 दिसम्बर, 2010 को ही समाप्त हो गया लेकिन नए का अभी तक पुनर्गठन नही हुआ है. लेकिन चुनावी वादों को पूरा करने की मजबूरी में सरकार ने संविधान की मूल प्रस्थापनाओं के विरूद्ध आर्थिक आधार पर आरक्षण की संभावनाओं की तलाश करने के लिए सवर्ण आयोग का गठन कर दिया है.

दूसरी ओर नीतीश कुमार ने विधानसभा में अपने जवाब में यह सवाल भी खड़ा किया था कि प्रधानमंत्री आज गठबंधन की मजबूरी में भ्रष्टाचार से समझौता कर रहे हैं, क्या गठबंधन चलाने के लिए देश को तोड़ दिया जायेगा? यह कहते हुए प्रकारांतर से नीतीश यह स्थापित करने का प्रयास कर रहे थे कि भ्रष्टाचार से समक्षौता देश को विखंडन की राह पर धकेलने सरीखा है. 

नीतीश कुमार की इस चिंता से एक स्तर तक सहमत होते हुए क्या उनसे यह नहीं पूछा जाना चाहिए कि भाजपा जैसी राजनीतिक ताकत के साथ उनका गठबंधन क्या एक नये प्रगतिशील व धर्मनिरपेक्ष समाज और राष्ट्र के निर्माण के लिए है? अफसोस की बात यह है कि ऐसा नहीं है. गणतंत्र दिवस के दिन कश्मीर के लाल चौक पर झंडा फहराने के लिए भाजयुमो द्वारा जनवरी में आयोजित एकता यात्रा इसका सबसे ताजा उदाहरण है. हालांकि एनडीए, जिसकी सबसे बड़ी घटक दल भाजपा है, ने इससे किनारा कर लिया था. लेकिन लालू प्रसाद यादव ने जहां लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा को रोकने का साहस दिखाया था, वहीं नीतीश कुमार ने इस यात्रा की रस्मी आलोचना भर की. परिणाम यह हुआ कि भाजपा का युवा मोर्चा पटना, गया सहित राज्य के कई शहरों में माहौल को एक बार फिर सांप्रदायिक रंग में रंगकर आगे बढ़ गया. जाहिर है ऐसा हुआ क्योंकि नीतीश कुमार मजबूर थे.

एकता यात्रा का बिहार से सफलतापूर्वक गुजरना इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है कि किस तरह नीतीश कुमार का सहारा पाकर बिहार में सांप्रदायिक ताकतें लगातार मजबूत हो रही हैं. 15वें बिहार विधानसभा चुनाव के परिणाम भी उनकी बढ़ती राजनीतिक ताकत को ही दिखाता है. इन चुनाव परिणामों से जो सबसे चिंताजनक पहलू सामने आया है वो है 2005 के चुनावों के मुकाबले भाजपा के सीटों में जबरदस्त उछाल. विधानसभा में भाजपा का आंकड़ा 55 से 91 पर पहुंच गया. भाजपा के बागी और समर्थक विजेताओं को भी अगर साथ जोड़ लिया जाए तो यह संख्या 95 हो जाती है. 

नीतीश कुमार के नाम पर भाजपा को इस बार अप्रत्याशित रूप से मुसलमानों का समर्थन भी बड़े पैमाने पर मिला है, जबकि उसने अल्पसंख्यकों संबंधी अपनी राजनीति में फिलहाल कोई व्यापक सकारात्मक बदलाव नहीं लाया है. हां इतना भर जरूर है कि वह कम-से-कम बिहार में रणनीतिक रूप से लगभग चुप है. लेकिन विधानसभा चुनाव परिणाम के आईने में नीतीश कुमार को यह देखना चाहिए कि भाजपा का बिहार में मजबूत होना परोक्ष रूप से नरेंद्र मोदी को भी मजबूत करता है.

जहां तक गठबंधन की बात है तो कोई भी गठबंधन अलग-अलग मजबूरी के कारण ही आकार लेता है. बिहार में एनडीए गठबंधन का उद्भव भी इससे अलग नहीं है. यह दिलचस्प है कि लालू यादव से अलग होने के बाद नीतीश कुमार ने 1995 के विधानसभा चुनावों में भाकपा (माले) के साथ चुनावी तालमेल किया था. उस समय नीतीश कुमार समता पार्टी के नेता थे. लेकिन इस गठबंधन को अपनी राजनीतिक आकांक्षाओं को पूरा करने में असमर्थ पाते हुए वो वामपंथ से अलग होकर दक्षिणपंथ से गठबंधन बनाने के लिए 'मजबूर' हुए.

दिल्ली में मंत्री या बिहार में मुख्यमंत्री बनने के लिए बाबरी मस्जिद ढहाने वाली भाजपा का हाथ थामने में उन्हें कोई दिक्कत महसूस नहीं हुई. तब भी जब गुजरात दंगों का काला अध्याय उसके साथ जुड़ गया. लेकिन यह भी कम दिलचस्प नहीं है कि बिहार के वोट समीकरण को ध्यान में रखते हुए वो प्रधानमंत्री पद के एक दूसरे 'योग्य' उम्मीदवार नरेंद्र मोदी का हर दिखावटी विरोध करने पर मजबूर हुए.

साथ ही नीतीश कुमार विपक्ष पर आज भी जिस जात-पात की राजनीति में फंसे होने का कटाक्ष करते हैं, थोड़ा करीब से देखने पर वर्तमान जदयू-भाजपा गठबंधन भी शुद्ध रूप से एक जातीय गठबंधन ही दिखाई देता है, जिसने बेमेल लेकिन नई जातीय सरणियां गढ़कर लालू को पटना और दिल्ली की कुर्सी से बेदखल किया है.

दूसरी ओर भाजपा लालू को अपदस्थ करने में लाख कोशिशें करने के बाद भी असफल रहने और अपनी वर्तमान राजनीतिक सीमाओं व ताकत का अंदाजा लगाने के बाद ही नीतीश का नेतृत्व स्वीकारने को मजबूर हुई थी. बात ज्यादा पुरानी नहीं है, फरवरी-2005 के चुनाव के तीन चरण बीतने के बाद ही भाजपा-जदयू गठबंधन ने नीतीश को बतौर मुखयमंत्री पेश किया था. इसके बाद इस गठबंधन ने जो सफलता का स्वाद चखा है, उसकी मिठास 15वें विधानसभा चुनाव परिणामों ने और बढ़ाई ही है.
राजनीति की अपनी मजबूरियां होती हैं और ये कीमत भी वसूल करती हैं.
लेकिन एनडीए वैचारिक स्तर पर एक असहज गठबंधन है, इस मजबूरी को नीतीश कुमार चुनाव के दौरान दिये एक टीवी साक्षात्कार में स्वीकार भी कर चुके हैं. लेकिन इस मजबूरी के बावजूद बिहार के सामाजिक बुनावट को ध्यान में रखते हुए नीतीश कुमार ने 'विकास के अपने नये मॉडल' के साथ जिस चौकन्नेपन से अतिपिछड़ों व महिलाओं को राजनीतिक रूप से सबल किया है और महादलित व अल्पसंख्यकों के लिए कल्याणकारी योजनाएं शुरू की हैं, उसके लिए नीतीश तारीफ के हकदार है. उनका यह सयास प्रयास सामाजिक न्याय के एजेंडे को आगे ही बढ़ाता है.

सत्ता की राजनीति की मजबूरी के चलते नीतीश कुमार विरोधाभाषी भाजपा-जदयू गठबंधन को ढोने को तो मजबूर हैं ही, साथ ही बिहार के बहुपुरस्कृत मुख्यमंत्री के रूप में उनका पिछले पांच से अधिक वर्षों का कार्यकाल उनके बदलते एजेंडों, बयानों और कार्यशैली के कारण भी कई मजबूरियों का गवाह है. 

सत्ता में आते ही जातीय जनसंहारों की जांच कर रहे अमीरदास आयोग को भंग करना विरोधीभाषी गठबंधन के कारण उपजी मजबूरी का पहला उदाहरण था. इसके बाद समान शिक्षा प्रणाली आयोग की बारी आई. जून, 2006 में इस आयोग की रिपोर्ट को जारी करते हुए उन्होंने सार्वजनिक तौर पर स्वीकार किया था कि वो मजबूर हैं, नहीं तो उनका बस चले तो वो एक झटके से निजी स्कूलों को बंद कर दें. समय गवाह है कि नीतीश कुमार ऐसा कहने के पांच सालों बाद भी अपनी मजबूरी दूर नहीं कर पाये हैं. बंद होना तो दूर शिक्षा का व्यवसाय करने वाले निजी स्कूल बिहार में शिक्षा अधिकार कानून का पालन करने तक से इंकार कर रहे हैं और मजबूर मुख्यमंत्री कड़ी कार्रवाई करने की जगह बस चेतावनी भर दे रहे हैं. 

आयोगों के गठन में माहिर लेकिन उससे भी ज्यादा इन आयोगों की सिफारिशों को लागू करने से मुकरने की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए नीतीश कुमार ने विधानसभा चुनावों के पहले भूमि सुधार आयोग की अनुशंसाओं को जमीन पर उतारने से इंकार कर दिया था. जबकि समान शिक्षा प्रणाली व भूमि सुधार आयोगों के मुद्दे किसी खास सामाजिक समूह से सम्बद्व नहीं होकर बहुत व्यापक थे. लेकिन नीतीश कुमार आज वास्तव में जिस मुखर व शक्तिशाली प्रभुवर्ग के चहेते हैं, उस वर्ग के हित ही उनको मुकरने के लिए मजबूर कर रहे थे और आगे भी करेंगे. ऐसा होना कोई अचरज की बात भी नहीं है.

नीतीश कुमार अपने प्रगतिशील राजनीतिक पहलकदमी से भी समक्षौता करने को कम मजबूर नहीं हुए हैं. 2009 के आम चुनावों के बाद हुए उपचुनाव में उन्होंने परिवारवाद के खिलाफ 'लड़ाई' शुरू की थी. इस चुनाव में वो विकास के नाम पर वोट नहीं जुगाड़ सके और बुरी तरह मात खा गए. हालांकि परिवारवाद के नाम पर टिकट से वंचित किये गये नेताओं के विद्रोह और भीतरघात के अलावा भी ढेर सारे दूसरे कारण इस हार के पीछे थे. लेकिन इस हार से सबक लेते हुए 15वें बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश परिवारवाद के खिलाफ 'लड़ाई' से भी समझौता करने पर मजबूर हुए. उन्होंने यह तर्क देते हुए अपनी झेंप मिटाई कि राजनीतिक बिरादरी अभी इसके लिए तैयार नहीं.

राजनीति की अपनी मजबूरियां होती हैं और ये कीमत भी वसूल करती हैं. दिल्ली में मनमोहन सिंह की मजबूरी की कीमत पर अगर भ्रष्टाचार का विष-बेल देश के आम लोगों की कमाई चूस रहा है तो बिहार में नीतीश कुमार की मजबूरियां सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता और समावेशी विकास के एजेंडे को पीछे धकेल रही हैं.


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