Tuesday, March 15, 2011

वोटासन का जादू


जादू, जिसका नाम सुनते ही लगता है कि कोई चमत्कार होने वाला है, हो गया है, फिर कोई मदारी आ गया खेल तमाशा करने। वैसे भी देश में रोजाना कम खेल-तमाशे नहीं हो रहे हैं, अख्खी जनता यानि भले मानुष रोजाना नए नए घपले घोटालों के खेल, तमाशे और खुलासे से चमत्कृत हो रहे हैं, यह क्या किसी जादू से कम है ?
सुबह-सुबह जब दफ्तर के लिए निकला तो रास्ते में बहुत से लोग एक घेरा बनाकर खड़े हुए दिखे। मैंने सोचा कि दफ्तर के बाकी बंधु लोग जब क्रिकेटेरिया के बुखार में तपे हुए रोजाना टाईमपास कर रहे हैं, तो मैं क्यों पीछे रहूं, वैसे भी हम लोगों को एक दूसरे की नकल करने की आदत जो ठहरी। लिहाजा मैं भी वहां पहुंच गया। गोल घेरे के अंदर एक मदारी हाथ में डमरू लिए खड़खड़ाता हुआ बंदर को नचा रहा था और कह रहा था, बच्चा लोग, भाई लोग, माई लोग और ताई लोग, सब अपना हाथ खुला रखने का, काहे कि देश में अख्खा भ्रष्टाचार मतलब चमत्कार बढ़ गिया है, सबकुछ खुल्लमखुल्ला होने का। लोग गईया माता का, भैंस भाभी का पूरा का पूरा चारा निगल जाता हे, देश का गरीब-गुरबा जनता मानुष लोगों का करोड़ो रूपया निगल जाता हे, उसका बावजूद खुल्लमखुल्ला छाती ठोंक के घूमता हे, ये कोई चमत्कार से कम हे क्या। अबी बाबा लोग नया-नया आसन सिखाता हे, 120 किलो फूल टू फटाक वजन, भारी भरकम तोंद लेके जाता हे, उसके बाद फूं फा करता हे, सिर के बल उलटा पुलटा करता हे, बंदर के माफिक उछलता हे, फिर कुछ महीना में फिटफाट हो जाता हे। ऐसा चमत्कार दिखाने वाला बाबा अबी एक नया आसन खोजा है भाई लोग, उसका नाम है, उसका नाम है, उसका……….
भीड़ में खड़ा एक युवक झल्लाया, अरे, कुछ आगे भी तो बोल।
मदारी ने कहा उसका नाम हे वोटासन, जिसके सामने पूरा जनता लोटासन करता हे, बच्चा लोग ताली बजाओ, बुजुर्ग बाबा लोग अपनी जेब में रखा रूमाल निकालो, माथे का पसीना पोंछ डालो ओर गबरू जवान इसको ठीक से समझ लो, नौकरी नईं मिले तो आड़ा बखत में वोटासन का मंतर काम आएगा।
मदारी ने आगे कहा अख्खा भाई लोग को ये तो मालूम होगा कि वोटासन का मंतर जानने वाला मंतरी, संतरी, नेता लोग पांच साल में एकीच बार अख्खा जनता के सामने लोटासन करता हे। बाद में पांच साल तक सबको हमरा ये चिंपू बंदर के जइसा नचाता हे, चल रे चिंपू जरा नाच के बता।
मदारी फिर बोला ऐसा ही वोटासन सिखाने के वास्ते बाबाजी अख्खा इंडिया घूम घाम रहा हे। जहां भी जाता हे, उछलकूद करता हे, फूं फां करके पेट को फुलाता पिचकाता हे, फिर अख्खा मानुष जन को वोटासन का पट्टी पढ़ाता हे। वोटासन का बहूत बड़ा फायदा ये है कि इसको सीखने के बाद किसी से डरने का जरूरत नईं। एक बार नेता, मंतरी, संतरी बन गिया, तो समझ ले पूरा जिनगी भर ऐश करेगा। आने वाला चुनाव में ऐसा ईच बाबाजी का चेला चपाटी लोग वोटासन के लिए लोटासन करने अख्खा लोग के पास जाएगा। चलो अब जल्दी से अपना जेब में हाथ डालो, नोट पानी निकालो और तमाशा खतम करो। रोज रोज का तमाशा देखके इधर अपुन का बंदर भी थक गिया हे, इसको थोड़ा सा आराम करने को मांगता।
रतन जैसवानी, लेखक दैनिक छत्‍तीसगढ में ब्‍यूरो चीफ जिला जांजगीर-चांपा, हैं
रतन जैसवानी, लेखक दैनिक छत्‍तीसगढ में ब्‍यूरो चीफ जिला जांजगीर-चांपा, हैं
एक घंटे टाईमपास के बाद वहां से दफ्तर जाते वक्त मैं यही सोच रहा था कि देश के हालात और मदारी के खेल तमाशे में कोई खास अंतर नहीं रहा। मदारी की तरह नेता
, मंत्री अपने अधिकारों और सुविधाओं का डमरू खड़खड़ाते हुए आम जनता को बंदर समझकर नचाते हैं, उसके नाम पर बटोरे हुए पैसे से तमाम ऐशो आराम हासिल करते हैं, राज करते हैं। वोटासन के जादू का मतलब अब समझ आने लगा था। आखिर वोटासन किसी भारी भरकम चमत्कार से कम है क्या ? जनता पांच साल तक जिन्हें पानी पी पीकर कोसती है, चुनाव आते ही सब कुछ भूलकर फिर से वोटासन के फेरे में पड़ जाती है और जनता, मदारी के बंदर की तरह आजीवन, सिर पर दोनों हाथ रखकर नाचती रहती है। जय हो वोटासन बाबा, तेरी महिमा अपरम्पार है।

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