Monday, March 07, 2011

जनाब भागवत, भारत की अवाम से माफी कब मांगेंगे !


अर्थात संघ किस तरह डरता है आतंक के धब्बे से
राम माधव, हिन्दू पुरूषों के संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्वप्रवक्ता, अपने हास्यबोध के लिए कभी चर्चित नहीं रहे हैं। यह जुदा बात है कि फरवरी के दूसरे सप्ताह में उनके द्वारा राजधानी में सम्बोधित प्रेस सम्मेलन में कुछ पत्रकार अपनी मुस्कान रोक नहीं सके जब संघ के प्रचारक एवं टेरर गुरू असीमानन्द तथा हिन्दुत्व आतंक की व्यापक परिघटना पर बात होने लगी।
असीमानन्द के किस्से को बिल्कुल अलग और अभूतपूर्व मोड़ देते हुए राम माधव ने पत्राकारों को बताया कि दरअसल असीमानन ने 2006 में ही संघ को छोड़ा था। साफ था, एक अच्छे प्रवक्ता के तौर पर उन्होंने पहले यह साफ कर दिया था कि 'संघ हिंसा में यकीन नहीं करता और वह एक सांस्कृतिक संगठन है आदि...। फिलवक्त यह नहीं बताया जा सकता कि स्कूल लीविंग सर्टिफिकेट की तर्ज पर, जिससे हम सभी वाकीफ होंगे, राम माधव ने असीमानन्द के 'संघ लीविंग सर्टिफिकेट' या ऐसे ही अन्य दस्तावेज की फोटोकापियां भी वहां वितरित की या नहीं।
बहरहाल, मीडियाकर्मियों के मुस्कान के राज का आकलन करना बहुत कठिन काम नहीं था। चन्द माह पहले राम माधव ने एक साक्षात्कार में कुछ अन्य संघ प्रचारकों के बारे में यही बात कही थी। वह वक्त था जब अजमेर बम धमाके, मक्का मस्जिद बम धमाके के असली कातिलों तक पहुंचा जा सका था और संघ प्रचारकों -देवेन्दर गुप्ता, लोकेश शर्मा, रामजी कलासांगरा, असीमानन्द और अन्यों से बने आतंकी मोडयूल का पर्दाफाश हुआ था और संघ के शीर्षस्थ नेता इन्द्रेशकुमार का नाम भी साजिशकर्ताओं में उछाला था।
वे जो संघ के क्रियाकलापों पर नज़र रखते हैं बता सकते हैं कि अपने कार्यकर्ताओं को 'पराया' घोषित करने या उनका 'परित्याग करने' की इस प्रणाली में नया कुछभी नहीं है। दरअसल, संघ ने इस रणनीति में एक तरह से महारत हासिल की है। अपने ही कार्यकर्ताओं का परित्याग करने का सबसे चर्चित उदाहरण महात्मा गांधी के हत्यारे नाथुराम गोडसे के रूप में दिखता है।( इस मसले का विवरण जानने के लिए उत्सुक लोग 1994 में अरविन्द राजगोपाल द्वारा 'फ्रण्टलाइन' पत्रिका के लिए गए गोपाल गोडसे के साक्षात्कार को देख सकते हैं जिसमें नाथुराम के इस अनुज ने बताया था कि उन दोनों भाइयों ने कभीभी संघ नहीं छोड़ा। और जब साक्षात्कारकर्ता ने स्पष्टत: पूछा कि आखिर नाथुराम ने अदालत को यह क्यों बताया कि उसने संघ को छोड़ा है, गोपाल गोडसे का जवाब था कि 'संगठन का बचाने का मकसद था।) चूंकि संघ किसी किस्म की सदस्यता सूचि नहीं रखता है, संगठन के लिए यह बहुत आसान हो जाता है कि वह किसी से भी तौबा करे। कल्पना करें कि कल यदि संघ अपने किसी अन्य वरिष्ठ नेता से पाला छुड़ाने के लिए यह ऐलान कर देता है कि उसे संघ से निकाल दिया गया, तब हमारे पास क्या प्रमाण बचता है ? और आनुषंगिक संगठनों की लम्बी चौड़ी फेहरिस्त के चलते संघ के लिए यह आसान भी होता है कि दोषारोपण से बचे। नि:स्सन्देह, असुविधाजनक लगनेवाले कार्यकर्ताओं से तौबा करने की इस नीति से संघ पर आंच आने से बच जाती है।
वैसे लोगों से आधिकारिक तौर पर पिंड छुड़ाने के बारे में एक बात स्पष्ट करना जरूरी है। यह रणनीति नीचले स्तर के कार्यकर्ताओं के लिए ही अपनायी जाती है। अगर आप संघ के वरिष्ठताअनुक्रम में ऊपर हैं, तब पूरा जोर लगाया जाता है कि आप को कैसे बचाया जाए।
2.
असीम आतंक इन्द्रेशजी 2005 में मुझे शबरी धाम पर मिले थे। कई सारे संघ के अग्रणी नेता उनके साथ थे। उन्होंने मुझे बताया बम विस्फोट करना मेरा काम नहीं है और इसके बजाय मुझे कहा गया कि मैं आदिवासी कल्याण के काम पर फोकस करूं जो संघ ने मुझे सौंपा है। उन्होंने मुझे बताया कि इस काम के लिए उन्होंने सुनील जोशी को जिम्मा सौंपा है। और जोशी को जिस चीज की आवश्यकता होगी वह पूरा करेंगे।''
-असीमानन्द की अपराधस्वीकृति से वैसे इस बात का अन्दाज़ा लगाना मुश्किल नहीं कि आखिर संघ को इस बात की जरूरत क्यों आन पड़ी कि वह बाहरी दुनिया को बताए कि असीमानन्द ने वर्ष 2006 में संघ छोड़ा था। और वह भी इस कथित फैसले के पांच साल बाद। कोईभी कह सकता है कि संघ इस काम को पहले भी अंजाम दे सकता था जब असीमानन्द के खिलाफ तमाम आतंकी मामलों में वारण्ट जारी था और वह फरार था। अब जब असीमानन्द पुलिस हिरासत में है तथा उसने मैजिस्र्टेट के सामने इस बात का कबूलनामा दिया है कि किस तरह संघ के शीर्षस्थ नेताओं के निर्देशों एवं सलाह से ही देश के अलग अलग हिस्सों में आतंकी हमले किए गए, तब यह कहना कोई मायने नहीं रखता है।
दरअसल संघ दोनों फायदे चाह रहा था। आतंकी हमलों से राजनीतिक तौर पर भी वह फायदे हासिल करना चाह रहा था और साथ ही साथ अपनी 'सामाजिक सांस्कृतिक' छवि पर भी खरोंच नहीं आने देना चाह रहा था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कर्णधारों को यही लगा होगा कि उसके जैसा तीस साल से अधिक पूरा वक्ती कार्यकर्ता पकड़ा गया तो वह सांगठनिक प्रतिबध्दताओं को अधिक तवज्जो देगा और अपने संगठन की कारगुजारियों को उजागर नहीं करेगा।
संघ-भाजपा के शीर्षस्थ नेतृत्व से असीमानन्द की नजदीकी किसी से छिपी नहीं है। अख़बारों में इस बात के फोटो भी छपे हैं कि किस तरह डांग जिले के शबरी धाम में असीमानन्द के सान्निध्य में नरेन्द्र मोदी, शिवराज सिंह चौहान, संघ सुप्रीमो मोहन भागवत या पूर्व सुप्रीमो सुदर्शन सभी बैठे हैं। निश्चित ही संघ परिवारजनों ने इस बात की कल्पना भी नहीं की होगी कि यह शख्स नब कुमार सरकार उम्र 59 वर्ष जो पश्चिम बंगाल के उसी गांव में जनमा है जहां कभी रामकृष्ण परमहंस पैदा हुए थे और जो तीस-पैंतीस साल से अनुशासित कार्यकर्ता के तौर पर संगठन के साथ सक्रिय है वह एक अल्लसुबह अपने अपराधों का कबूलनामा जज के सामने देगा और बताएगा कि चरित्रा निर्माण के लिए प्रतिबध्द कहे जानेवाला संघ किस तरह अतिवादियों का गिरोह है। संघ के नेतृत्व की बौखलाहट इस वजह से भी अधिक है कि असीमानन्द द्वारा मैजिस्र्टेट के सामने दिया गया कबूलनामा धारा 164 के अन्तर्गत है, जिसे अदालत में सबूत के तौर पर भी पेश किया जा सकता है। (समूचा कबूलनामा डब्लू डब्लू डब्लू डाट तहलका डाट काम पर पढ़ा जा सकता है।)
कबूलनामे में चन्द बातें स्पष्टता के साथ रखी गयी हैं :
संघ प्रचारकों की एक टीम मालेगांव 2006 और मालेगांव 2008, अजमेर शरीफ, मक्का मस्जिद एवम समझौता एक्स्प्रेस बम धमाके में शामिल रही है।
असीमानन्द द्वारा हस्ताक्षरित बयान इस बात की भी तस्दीक करता है कि किस तरह संघ के नेता इन्द्रेश कुमार ने आतंकी हमलों के लिए संघ प्रचारकों का चयन किया और पैसों का इन्तजाम किया।
इन्द्रेश कुमार ने ही सुनिल जोशी को आतंकी हमले के काम में लगाया था और सभी तरह की सहायता दी थी और इन्द्रेश कुमार द्वारा दिए दो मुस्लिम बच्चों ने ही अजमेर बम धमाके को अंजाम दिया।
असीमानन्द को डर था कि इन्द्रेश कुमार खुद सुनिल जोशी को मरवा देगा।
तय बात है कि प्रस्तुत कबूलनामा संघ परिवार के लिए तमाम असुविधाजनक सवाल खड़े करता है। अपने 85 साला इतिहास में संघ के लिए यह पहला मौका है कि उसकी गतिविधियों में लम्बे समय तक शामिल किसी शख्स ने संघ की आन्तरिक कार्यप्रणाली एवम श्रमविभाजन पर इस किस्म की निगाह डाली होगी। आम तौर पर होता यही आया है कि जहां जनसंहारों को 'सफल प्रयोगों' का प्रमाणपत्रा मिलता रहा है, जिसका सभी को अनुसरण करना है। गुजरात 2002 के बाद परिवारजनों के तमाम बयानों को हम पलट कर देख सकते हैं।
वैसे प्रस्तुत कबूलनामे से दूरी बनाने की एक कोशिश संघ परिवार ने यह की कि असीमानन्द के वकील के मार्फत यह कहलावाया कि यह बयान 'दबाव' के तहत दिया गया है। मगर दिल्ली के जिस मैजिस्र्टेट दीपक डबास के सामने जतिन चटर्जी उर्फ असीमानन्द ने अपने अपराधों की स्वीकृति दी थी, उसने इस बात का विशेष ध्यान रखा था और बयान को धारा 164 के अन्तर्गत दर्ज कराया था, जो सबूत के तौर पर भी बाद में इस्तेमाल हो सके।
राम माधव का बयान यही उजागर करता है कि असीमानन्द के बयान के चलते एवं आतंक की घटनाओं में अपने कार्यकर्ताओं की सहभागिता के रोज रोज हो रहे खुलासों से संघ परिवार बहुत बहुत चिन्तित है।
3.
प्यादों से तौबा करो, मास्टरमाइंडों के लिए कुछ भी करो
16 जुलाई 2010 को दिल्ली स्थित इलैक्ट्रानिक चैनल 'हेडलाइन्स टुडे' के कार्यालय पर हजारों संघ कार्यकर्ताओं ने हमला किया था और काफी तोडफोड की थी। (मेल टुडे, जुलाई 17, 2010) कहा गया कि उपरोक्त चैनल पर प्रसारित कुछ टेपों से संघीजन नाराज थे। इसमें यह भी दिखाया गया था कि दिल्ली के डा आर पी सिंह ने किस तरह उपराष्ट्रपति हामिद अन्सारी की हत्या की योजना बनायी थी। आखिर इन टेपों  में यही बात प्रदर्शित की गयी थी कि किस तरह संघ के वरिष्ठ नेता इन्द्रेश कुमार और अन्य अजमेर बम धमाके की योजना बना रहे हैं। इन टेपों में देश के पैमाने पर मुसलमानों की बैठकों पर आतंकी हमले कैसे किए जाएं यह भी चर्चा चली थी। गौरतलब था यह किसी स्टिंग आपरेशन के टेप नहीं थे बल्कि मालेगांव बम धमाके में बन्द आतंकी शंकराचार्य दयानन्द पाण्डे के लैपटाप में रिकार्ड किए गए अंशों को ही प्रसारित किया गया था।
हम देख सकते हैं कि हेडलाइन्स टुडे चैनल पर हमला एक तरह से हिन्दुत्व आतंक के मसले पर बचावात्मक पैंतरा अख्तियार करने के लिए मजबूर कार्यकर्ताओं को संकेत था, जिसकी शुरूआत इन्द्रेश कुमार को बचाने के लिए किसी भी हद तक जाने से हो रही थी। यह बातें अब इतिहास हो चुकी हैं कि किस तरह नवम्बर माह में संघ की तरफ से संप्रग सरकार की नीतियों के खिलाफ हल्ला बोलते हुए देश के पैमाने पर रैलियों का आयोजन किया गया, जिनकी खासियत यह थी कि इनमें संघ के अग्रणी नेता भी जगह जगह शामिल हुए। संघ के पूर्वसुप्रीमो सुदर्शन द्वारा सुश्री सोनिया गांधी को लेकर किए गए अनर्गल प्रलापों के चलते वैसे संघ की इस व्यापक मुहिम को फौरी झटका अवश्य लगा था।
यह कहना मुश्किल है कि संघ अपने कार्यकर्ताओं को समझाने के लिए क्या कवायद करता होगा, जहां कार्यकर्ताओं को स्पष्ट दिखता होगा कि साधारण कार्यकर्ताओं से तुरन्त तौबा करनेवाला नेतृत्व, अपने में से किसी की आतंकी मामलों में संलिप्तता को देखते हुए भी आंखें मूंदे हुए है। बताया जाता है कि संघ की मध्यप्रदेश इकाई के साधारण कार्यकर्ताओं में सुनिल जोशी की हत्या पर परदा डालने के लिए संघ प्रचारकों से भरी मध्यप्रदेश सरकार की कोशिशों को लेकर काफी नाराजगी थी। उन बेचारों को शायद यह पता नहीं रहा होगा कि 'परिवारजनों' ने ही सुनिल जोशी को मारा था।
वैसे प्यादों से तौबा करने और मास्टरमाइंडों के लिए किसी भी हद तक जाने की उठापटक में संघ परिवार की एक ऐसे संगठन की छवि उभरती है जो न केवल दिग्भ्रमित दिखता है बल्कि बेहद उलझा हुआ एवं दोहरे मापदण्ड अपनानेवाला दिखता है। आज एक बात कहना, दूसरे दिन उससे इन्कार करना, यह स्वीकारना कि उसके बीच कई आतंकी तत्व मौजूद थे जिन्हें उसने निकाल दिया है (मई 2010 की जोधपुर बैठक) और कुछ माह में ही अपना टोन बदलना और यह कहना कि यह सब हिन्दुओं को बदनाम करने की कोशिश है (अक्तूबर 2010 की जलगांव बैठक), इतनाही नहीं इसी को लेकर मुहिम चलाना (नवम्बर 2010)। आतंक के धब्बे से निकलने की इस छटपटाहट का चरमोत्कर्ष पिछले दिनों सुरेश जोशी, द्वारा प्रधानमंत्री के नाम लिखे पत्रा में उजागर होता है। संघ के सरकार्यवाह जोशी ने इस पत्रा में प्रधानमंत्री से कहा है कि वह एक स्वतंत्रा आयोग बना कर लेफ्टनन्ट कर्नल पुरोहित , दयानन्द पाण्डेय और अन्यों द्वारा मोहन भागवत एवं इन्द्रेश कुमार को मारने की रची कथित साजिश की जांच करवाए। पत्रा में लिखा गया है कि बुनियादी प्रश्न यह उठता है कि आखिर संघ को उन्हीं लोगों के साथ क्यों खड़ा किया जा रहा है जो संघ के प्रति दुश्मनाना रूख रखते हैं और उसके नेताओं को मारने की साजिश रचते हैं। पत्र में यह दिखाने की कोशिश की गयी है कि पुरोहित किनके इशारे पर काम कर रहा था और उसके लिए उसके छिपे राजनीतिक रिश्तों की पड़ताल आवश्यक है।
विश्लेषकों ने इस पत्र को संघ परिवार की रणनीति में आ रहे 'बदलाव' के तौर पर रेखांकित किया है, जो अब हिन्दुत्व आतंक के मसले पर हमलावर रूख अख्तियार करना चाह रहा है।
4.
सभी समझदार लोग ?
कोई भी व्यक्ति जिसने हिन्दुत्व आतंक की घटनाओं में संघीजनों की संलिप्तता की सीरियलनुमा जारी पटकथा पर गौर नहीं किया हो, उसे सुरेश जोशी उर्फ भैयाजी जोशी का पत्रा बेहद तार्किक मालूम पड़ सकता है, यही कि 'संघ को ऐसे लोगों के समकक्ष कैसे रखा जा सकता है जो उसके नेताओं को मारने की योजना बनाते हों?'
मगर इस किस्से में कई अन्य पहलू भी हैं जिनकी तरफ सुरेश जोशी का पत्र इशारा तक नहीं करता। इस कथित साजिश में पुणे के व्यापारी एवम संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता श्याम आपटे की भूमिका पर पूरी चुप्पी बरती गयी है। दयानन्द पाण्डेय के लैपटाप में रेकार्ड बातचीत स्पष्ट करती है पुरोहित, आपटे एवम दयानन्द पाण्डेय की आपसी बातचीत को। आखिर अपने ही एक वरिष्ठ कार्यकर्ता की इस साजिश में भूमिका पर भैयाजी जोशी का मौन क्या कहता है ? दूसरे तथ्य बताते हैं कि पुरोहित एवं विश्व हिन्दु परिषद के नेता प्रवीण तोगडिया की कई बैठकें हुई। आखिर इन बैठकों में क्या बात हो रही थी। याद रहे कि हेमन्त करकरे जब मालेगांव धमाके की जांच कर रहे थे तब यह बात भी सामने आयी थी कि तोगडिया दरअसल पुरोहित को अपने में जोड़ने की कोशिश कर रहे थे। यह अकारण नहीं है कि दयानन्द पाण्डेय के लैपटाप पर यह विवरण भी मौजूद है कि पुरोहित तोगडिया एवम विश्व हिन्दु परिषद के नेताओं की कितनी इज्जत करते थे, जबकि मोहन भागवत, इन्द्रेश कुमार आदि को आई एस आई का एजेण्ट समझते थे। पुरोहित के ईमेल अकाउंट में तोगडिया के चार ईमेल पते मिलने इसी नजदीकी का संकेत है।
क्या संघ को प्रधानमंत्री से यह नहीं कहना चाहिए था कि वह न केवल श्याम आपटे को गिरफ्तार करे बल्कि तोगडिया से भी इस मामले में सख्त पूछताछ करे।
हम देख सकते हैं कि इन्द्रेश कुमार एवम मोहन भागवत को मारने की यह साजिश संघ बनाम कुछ आतंकियों का मामला ही नहीं था बल्कि वह संघ परिवार के आपसी दरारों को ही उजागर करता है, जहां लोग साथ रहते हुए भी एक दूसरे से बेहद नफरत करते हैं और एक दूसरे के खिलाफ साजिश रचते है। असीमानन्द के कबूलनामे में यह बात दिखती है जब वह कहता है कि उसने सुनिल जोशी को आगाह किया था कि वह इन्द्रेश कुमार से बचे।
संघ परिवारजन एक दूसरे के खिलाफ कैसी कैसी कारगुजारियों में लिप्त होते हैं जिसे भाजपा के केन्द्रीय कार्यालय में पिछले कुछ समय में हो रहे विस्फोटक खुलासों से भी देख सकते हैं। दो साल पहले ख़बर आयी कि भाजपा के केन्द्रीय कार्यालय से लगभग डेढ करोड की राशि गायब है, जिसका खुलासा भी किसी 'अन्दरूनी' व्यक्ति ने ही किया था। मामला पुलिस को नहीं सौंपा गया, आन्तरिक जांच में ही निपटा दिया गया। इन दिनों भाजपा के कोषाध्यक्ष श्याम जाजू विवादों में है, जिनका पैन कार्ड लेकर कोई व्यक्ति पार्लियामेन्ट स्ट्रीट के बैंक में जाकर खाते की पड़ताल करने में मुब्तिला पकड़ा गया था, जो भी 'परिवार' की सदस्य बताया गया था। खैर !
प्रधानमंत्री के नाम पाती लिख कर संघ ने अपनी तमाम दरारों को ही नए सिरेसे लोगों के सामने उजागर किया है। उसकी तरफ से तुरूप का पत्ता समझी जानेवाली यह चाल ने उसे प्रश्नों के नए विवर्त में ला खड़ा किया है।
आज भले ही मालेगांव के आतंकी पुरोहित, दयानन्द पाण्डेय से दूरी बनाने में उसे अपनी चमड़ी बचने की जुगत दिखायी देती हो मगर क्या वह एक छोटेसे प्रश्न का उत्तार देने के लिए तैयार है। आखिर सव्वा दो साल पहले संघ एवं उसके तमाम आनुषंगिक संगठन क्यों इन आतंकियों को 'हीरो' बनाने में जुटे थे ? पिछले दिनों पाकिस्तान का आतंकी मलिक कादरी, जिसने ईशनिन्दा कानून को समाप्त करने की हिमायत करनेवाले पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर को मार डाला था, जब पिछले दिनों इस्लामाबाद अदालत में पेश किया जा रहा था, तब उसके हिमायतियों ने उस पर गुलाब की पंखुडियों की वर्षा की थी। सुरेश जोशी को वह तस्वीरें याद होंगी कि जब इन पुरोहित, दयानन्द पाण्डेय, प्रज्ञा एवं उनके तमाम सहयोगी आतंकियों को नाशिक एवम पुणे की अदालत में पेश किया गया था, तब उन पर भी गुलाब की फूलों की पंखुडियां बरसायी गयी थीं, जिसके लिए संघ के कार्यकर्ताओं ने शिवसेना के कार्यकर्ताओं के साथ कंधो से कंधा मिला कर काम किया था।
अब वक्त आ गया है कि सुरेश जोशी, मोहन भागवत एवम संघ के तमाम वरिष्ठ समझदार लोग हिन्दोस्तां की अवाम के नाम एक पत्रा लिखें एवम इस बात की सार्वजनिक माफी मांगें कि उन्होंने इन आतंकियों को समर्थन प्रदान किया था। इतिहास इस बात का गवाह है कि जब जांबाज अफसर हेमन्त करकरे इस काण्ड के सूत्रों को खंगाल रहे थे तब संघ, शिवसेना आदि संगठनों ने उनके खिलाफ मुहिम चलायी थी, यहां तक कि उन्हें देशद्रोही करार दिया जा रहा था। संसद के पटल पर जनाब आडवाणी ने भी महाराष्ट्र आतंकवाद विरोधी दस्ते के खिलाफ अनर्गल बातें कही थीं।
एक क्षेपक के तौर पर यह भी बताया जाना जरूरी है कि प्रधानमंत्री के नाम लिखी पाती में सुरेश जोशी कहीं भी हिन्दुत्व आतंकियों के हाथों मारे गए निरपराधों के बारे में शोकसम्वेदना तक प्रगट नहीं करते हैं और न जेलों में बन्द रहे उन मुस्लिम नौजवानों के लिए माफी के चन्द शब्द लिखते हैं जिन्हें संघ के कार्यकर्ताओं की आपराधिक कार्रवाइयों का खामियाजा भुगतना पड़ा था। याद रहे कि इन्हीं में से एक कलीम की आपबीती सुनकर असीमानन्द ने प्रायश्चित करना तय किया एवं इसलिए कबूलनामा दिया।
पुरोहित, पाण्डेय को लेकर संघ के समझदारों द्वारा लिखे पत्रा से मराठी की एक कहावत याद आती है जो बताती है कि 'बिल्ली आंख मूंद कर दूध पीती है और सोचती है कि दुनिया उसे देख नहीं रही है।' हिन्दुत्व आतंक की घटनाओं में अपने कार्यकर्ताओं की संलिप्तता से बदहवास संघ का व्यवहार कहावत में वर्णित 'बिल्ली' की तरह ही है। दुनिया ने उन्हें देखा है कि किस तरह उन्होंने मालेगांव बम धमाके के आतंकियों पुरोहित, प्रज्ञा, दयानन्द पाण्डेय, रमेश उपाध्याय आदि की हिमायत की थी, उनपर फूलों की पंखुडिया बरसायी थीं और आज जब जांच की आंच संघ के नेतृत्व तक पहुंचती दिख रही है तो वे चाहते हैं कि दुनिया वही समझे जो सुरेश जोशी की पाती कहती है।
 साभार:http://humsamvet.org.in/

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