Wednesday, March 09, 2011

गोधरा फैसले में छलनी से भी ज्यादा छेद


गोधरा फैसले में छलनी से भी ज्यादा छेद
गत 22 फरवरी 2011 को सत्र न्यायालय ने गोधरा रेल आगजनी मामले में फैसला सुनाया। अदालत ने गुजरात राज्य के इस आरोप को सही ठहराया कि स्थानीय मुसलमानों ने साबरमती एक्सप्रेस के एस-6 कोच में आग लगाने का षड़यंत्र रचा था। जिन 94 आरोपियों पर मुकदमा चल रहा था उनमें से 63 को बरी कर दिया गया और 31 को साजिश के तहत कारसेवको को जिंदा जलाने का दोषी ठहराया गया।
गोधरा कांड को साजिश बताने वाले पहले व्यक्ति थे गुजरात के तत्कालीन व वर्तमान मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी। वे घटना के आधे घंटे के भीतर इस निष्कर्ष पर पहुँच गए थे। उन्होंने कहा था कि गोधरा कांड के पीछे अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी संगठन थे, जिन्होंने स्थानीय मुसलमानों की मिलीभगत से इसे अंजाम दिया था। इन मुसलमानों को पाकिस्तानी आई.एस.आई. का सहयोग भी हासिल था। गोधरा की तत्कालीन कलेक्टर जयंती रवि ने घटना के पीछे किसी साजिश के होने की संभावना से इंकार किया था।
गोधरा जैसी बड़ी रेल दुर्घटनाओं की रेल्वे आवश्यक रूप से आंतिरक जांच करवाती है परंतु तत्कालीन रेल मंत्री नीतीश कुमार ने इस घटना की जांच किए जाने के आदेश नहीं दिए। वे उन दिनों भाजपा के नेतृत्व वाली एन.डी.ए. गठबंधन सरकार में शामिल थे।
गोधरा कांड के पीछे मुस्लिम आतंकी षड़यंत्रहोने के आरोप का जमकर प्रचार किया गया और इसका इस्तेमाल, गोधरा के बाद गुजरात में हुए मुसलमानों के कत्लेआम को औचित्यपूर्ण ठहराने के लिए किया गया। एन.डी.ए. प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई ने फरमाया कि गुजरात इसलिए हुआ क्योंकि गोधरा हुआ था। उत्तर प्रदेश की तत्कालीन (व वर्तमान) मुख्यमंत्री सुश्री मायावती ने गुजरात में मोदी के समर्थन में चुनाव प्रचार किया। बहनजी उन दिनों भाजपा के खेमे में थीं। गुजरात कत्लेआम के बारे में एक प्रश्न का जवाब देते हुए सुश्री मायावती ने कहा, गोधरा भी तो हुआ था!
बाद में, केन्द्र में यूपीए की सरकार बनी और रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव ने गोधरा कांड की जांच के आदेष दिए। रेल्वे के लिए यह कानूनन जरूरी है कि वह हर बड़ी रेल दुर्घटना की यथासंभव जल्दी से जल्दी जांच करवाए। गोधरा के मामले में यह कानूनी जिम्मेदारी कई वर्षों बाद पूरी की गई। जांच के लिए बैनर्जी आयोग की नियुक्ति की गई। यह आयोग इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि गोधरा कांड, किसी षड़यंत्र का नतीजा नहीं था।
गोधरा कांड को षड़यंत्र साबित करने के लिए, गुजरात पुलिस ने कई गवाह ढूंढ़ निकाले। इन गवाहों को यह स्वीकार करने के लिए मजबूर किया गया कि उन्होंने 140 लीटर पेट्रोल खरीदा, पेट्रोल रेल्वे लाईन तक पहुंचाया, एस-6 व एस-7 के बीच के वेस्टीब्यूल को काटा, एस-6 में पेट्रोल फैलाया और फिर बाहर से आग के जलते हुए गोले फेंककर कोच में आग लगा दी।
हालिया गोधरा निर्णय में यह तो स्वीकार किया गया है कि गोधरा के पीछे षड़यंत्र था परंतु गुजरात सरकार द्वारा मुख्य षड़यंत्रकारी घोषित किए गए हाजी उमरजी को बेकसूर बताया गया है। अन्य प्रमुख आरोपियों के खिलाफ भी कोई सुबूत नहीं पाए गए। केवल ये तथ्य ही इस निर्णय का खोखलापन सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं।
गोधरा को षड़यंत्र बताने का मुख्य आधार यह है कि पेट्रोल बेचा-खरीदा गया और एस-6 में आग के गोले फेंके गए। इन दोनों घटनाओं का कोई चष्मदीद नहीं है। जिन लोगों ने पहले यह स्वीकार किया था कि उन्होंन पेट्रोल बेचा, वे भी अदालत में अपने बयानों से मुकर गए और उनमें से एक ने तो यह भी कह दिया कि गवाही देने के लिए उसे 50,000 रूपये दिए गए थे। गवाह ने कहा कि उसे यह राशी गुजरात पुलिस के मुख्य जांचकर्ता नोएल परमार ने दी थी। स्पष्टतः, षड़यंत्र की कहानी में छलनी से भी ज्यादा छेद हैं।
यह आरोप कि मुसलमानों ने बाबरी कांड का बदला लेने के लिए कारसेवकों को जिंदा जलाया, कई कारणों से तार्किक नहीं लगता। पहली बात तो यह है कि मुसलमानों को ही नहीं बल्कि शासकीय तंत्र को भी यह पता नहीं था कि साबरमती एक्सप्रेस में कारसेवक यात्रा कर रहे थे। केवल विहिप के नेताओं को यह जानकारी थी। दूसरे, उस दिन साबरमती एक्सप्रेस पाँच घंटे से अधिक देरी से चल रही थी। ट्रेन का गोधरा पहुँचने का सही समय आधी रात के आसपास है। किसी भी षड़यंत्रकारी के लिए अचानक सामने आई इस परिस्थिति से सामंजस्य बैठाना कठिन होता।
तीसरे, जिस समय वेस्टीब्यूल काटा जा रहा था, उस समय आर.पी.एफ. और जी.आर.पी. के जवान क्या कर रहे थे? वेस्टीब्यूल को काटना और फिर उसमें घुसना कोई आसान काम नहीं होता। चौथे, ठंड के मौसम में (घटना फरवरी 2002 की है) पौ फटने के पहले के समय में, कोच के खिड़की-दरवाजे बंद रहे होंगे। ऐसे में, बाहर से आग के गोले अंदर कैसे फेंके गए? पहले यह प्रचार किया गया था कि ट्रेन को मुसलमानों ने रोका था। बाद में हुई जांचों में यह सामने आया कि ट्रेन दो बार रूकी-पहली बार कारसेवकों द्वारा चेन खींची जाने से और दूसरी बार किसी तकनीकी खराबी से। यह भी कहा गया कि कारसेवक जलते हुए कोच से भाग न सकें इसलिए कोच के दरवाजे बाहर से लॉक कर दिए गए थे। यह दावा करने वाले शायद यह भूल गए कि रेलों के यात्री डिब्बों में बाहर से दरवाजे लॉक करने की कोई व्यवस्था ही नहीं होती।
इस तरह, इस आरोप पर संदेह करने के पर्याप्त आधार हैं कि गोधरा कांड के पीछे मुसलमानों का षडयंत्र था। इस सिलसिले में तहलकाके ताजे अंक (5 मार्च 2011) में प्रकाशित आशीष खेतान की खोजपूर्ण रपट उल्लेखनीय है।
इस रपट से यह साफ हो जाता है कि गोधरा को मुसलमानों का षड़यंत्र बताए जाने के दावे में कोई दम नहीं है। रपट (डब्ल्यू.डब्ल्यू.डब्ल्यू.तहलका.कॉम) में घटना का अत्यंत सूक्ष्मता से तथ्यपरक व तार्किक विष्लेषण किया गया है। मुस्लिम षड़यंत्रका दावा न केवल झूठा है बल्कि असली षड़यंत्र पर परदा डालने की सुनियोजित साजिश है। रपट के अनुसार, गोधरा कांड साजिश का नतीजा था परंतु यह साजिश मुसलमानों ने नहीं रची थी।

यह याद करना प्रासंगिक होगा कि तहलकाद्वारा स्न 2007 में किए गए स्टिंग आपरेशन (द ट्रुथ अबाउट गुजरात 2002) से यह सामने आया था कि नौ भाजपा कार्यकर्ता-जिन्हें गोधरा कांड मामले में चष्मदीद गवाह के रूप में प्रस्तुत किया गया था-घटनास्थल पर मौजूद ही नहीं थे। उन्होंने पुलिस के कहने पर हिन्दुत्व की खातिरझूठी गवाहियाँ दी थीं।
पुलिस के अनुसार, गोधरा प्लेटफार्म पर खानपान सामग्री बेचने वाले हिन्दू वेन्डर अजय बारिया को भी षडयंत्र में शामिल कर लिया गया था। जज पटेल ने अजय बारिया के बयान को बहुत महत्व दिया है। सवाल यह है कि मुस्लिम षड़यंत्रकारी, अंतिम समय में, एक हिन्दू को षड़यंत्र में शामिल क्यों करेंगे? वे पेट्रोल ढ़ोने और कोच को जलाने में उसकी मदद क्यों लेंगें? “तहलकाने अजय बारिया को ढ़ूढ़ने की बहुत कोशिश की परंतु वह नहीं मिला। उसकी माँ ने तहलकाको बताया कि पुलिस ने जबरदस्ती उसे गवाह बनने पर मजबूर किया था और यह भी कि पुलिस उस पर लगातार नजर रखती है।
एक पेट्रोल पंप के दो कर्मचारियों, रंजीतसिंह व प्रतापसिंह पटेल ने यह दावा किया था कि 26 फरवरी को उन्होंने कुछ मुसलमानों को 140 लीटर पेट्रोल बेचा था। इन दोनों ने पहले पुलिस को यह बताया था कि उन्होंने उस रात किसी को पेट्रोल नहीं बेचा। छःह महीने बाद वे अपनी बात से पलट गए। तहलकाके छिपे हुए कैमरे के सामने, प्रताप ने स्वीकार किया कि पुलिस अधिकारी नोएल परमार ने उन दोनों को उनका बयान बदलने के लिए 50,000 रूपये दिए थे। परमार ने उन्हें यह भी बताया था कि अदालत में उन्हें किन मुसलमानों को पेट्रोल के खरीददार के तौर पर पहचानना है। जबीर बहेरा नाम के एक छोटे-मोटे अपराधी ने पहले कहा कि मौलवी उमरजी षड़यंत्र के मास्टरमाइंड थे और मौलवी ने ही एस-6 को निशाना बनाने का निर्णय लिया था परंतु उसने यह भी कहा कि उमरजी ने षड़यंत्रकारियों की किसी बैठक में हिस्सा नहीं लिया। बाद में वह इन सभी दावों से पीछे हट गया। एक अन्य मामूली अपराधी सिकंदर सिद्दीक ने कहा है कि मौलवी पंजाबी ने भीड़ को उकसाया था परंतु पंजाबी तो उस दिन देश में ही नहीं थे।
तहलकाकी रपट से स्पष्ट है कि असली षड़यंत्रकारी मुसलमान नहीं थे। हकीकत, कई बार, अफ़सानों से भी ज्यादा हैरान करने वाली होती है। पिछले कई सालों से हम यह बताया जा रहा था कि मालेगांव, समझौता एक्सप्रेस और अजमेर जैसे आतंकी हमलों के लिए मुसलमान जिम्मेदार थे। इस लेखक और अन्य कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने पुलिस और हिन्दुत्ववादियों द्वारा फैलाई गई इस मान्यता को चुनौती दी परंतु उनके तर्क नक्कारखाने मे तूती की आवाज साबित हुए। ऐसे लोगों की निंदा की गई, उन्हें हिन्दू विरोधी और यहां तक कि राष्ट्रविरोधी तक कहा गया। परंतु अब हेमंत करकरे द्वारा की गई जांच और स्वामी असीमानंद के इकबालिया बयान से यह स्पष्ट हो गया है कि न केवल इन धमाकों बल्कि कई अन्य आतंकी हमलों के लिए भी हिन्दुत्व संगठन और उनके कार्यकर्ता जिम्मेदार थे।
राम पुनियानी(लेखक आई.आई.टी. मुंबई में पढ़ाते थे, और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं।)
घटना के तुरंत बाद गोधरा की कलेक्टर जयंति रवि की टिप्पणी से लेकर सन् 2007 के तहलकास्टिंग आपरेशन तक से उद्घाटित हुए तथ्यों को एक सूत्र में पिरोने से जो चित्र उभरता है, उसे  आशीष खेतान इन शब्दों में प्रकट करते हैं, वह एक षड़यंत्र था, इसमें कोई संदेह नहीं। परंतु वह एक अलग ढंग का षड़यंत्र था। वह इस देश के सामाजिक ताने-बाने को तहस-नहस करने का षड़यंत्र था। इस षड़यंत्र का रचयिता था राज्यतंत्र और इसका उद्धेष्य था, एक समुदाय विशेष के मुंह पर कालिख पोतना और उसे दुश्मन करार देना।
गोधरा मामले में गुजरात पुलिस की जांच में अगणित खामियां तो हैं हीं, उसके असली इरादे भी संदेहास्पद हैं। इस मामले की निष्पक्ष जांच आवश्यक है। शायद सीबीआई इस काम के लिए उपयुक्त एजेन्सी होगी।
(लेखक आई.आई.टी. मुंबई में पढ़ाते थे, और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं।)

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