Friday, March 04, 2011

सेहत के सरगनाओं पर अंकुश नहीं


राजस्थान के जोधपुर में तेरह लोगों की एक साथ मौत और वह भी अस्पताल के डाक्टरों - कर्मचारियों की लापरवाही के परिणामस्वरूप होना, निश्चित रूप से जानबूझ कर सामूहिक हत्याकांड  किए जाने जैसा घिनौना अपराध है...
निर्मल रानी

अस्पताल कर्मियों,डाक्टरों और स्वास्थ्य विभाग से जुड़े लोगों की लापरवाही व अनदेखी के कारण   मरीज़ों के मरने की खबरें कोई नई बात नहीं है। देश के किसी न किसी कोने से ऐसी खबरें सुनने को मिलती रहती हैं कि किसी डॉक्टर की लापरवाही से या समय पर इलाज न मिल पाने से किसी मरीज़ की मौत हो गई हो।

मरीज़ों के परिजनों द्वारा ऐसी दु:खद घटनाओं की प्रतिक्रिया स्वरूप रोष व्यक्त किए जाने यहां तक कि निजी नर्सिंग होम या सरकारी अस्पताल में तोडफ़ोड़ किए जाने की खबरें भी आती ही रहती हैं। नक़ली व प्रयोग करने की तिथि पूरी कर चुकी दवाईयों के प्रयोग से मरीज़ों की मृत्यु हो जाने या उनकी तबीयत और अधिक बिगड़ जाने की भी खबरें आती रहती हैं।

ऐसा कहा जाता है कि जिस राष्ट्र के लोग शारीरिक रूप से स्वस्थ होते हैं वही राष्ट्र वैचारिक रूप से भी जागरुक,स्वस्थ तथा चेतन होता है। बेशक एक स्वस्थ राष्ट्र ही तेज़ी से विकास की मंजि़लें तय कर सकता है। परंतु लगता है कि हमारे देश में अन्य सरकारी विभागों की ही तरह स्वास्थय विभाग से जुड़े नेटवर्क को शायद इस बात का ज्ञान ही नहीं है या फिर भ्रष्टाचार,लापरवाही,स्वार्थ व रिश्वत खोरी जैसी बुराईयों ने इन लोगों को इस कद्र जकड़ रखा है कि इन्हें न तो किसी दूसरे व्यक्ति के सेहत    की चिंता होती है न ही उसके अर्थिक हालात या पारिवारिक परिस्थितयों के बारे में कुछ सोचने का समय।

विभाग के कर्मचारियों व अधिकारियों की ऐसी ही एक ज़बरदस्त लापरवाही का प्रमाण गत दिनों राजस्थान के जोधपुर जि़ले के सरकारी अस्पताल में देखने को मिला। यहां 13प्रसूताओं की एक ही समय में तब मौत हो गई जब उन्हें संक्रमित ग्लूकोज़ चढ़ा दिए गए। अस्पताल  अधिकारियों  की लापरवाही से इतनी अधिक प्रसूताओं की एक साथ मौत होने की यह अब तक की सबसे बड़ी घटना मानी जा रही है।

यह भी खबर है कि अभी और भी कई मरीज़ ऐसे हैं जिन्हें इसी बैच का संक्रमित ग्लूकोज़ चढ़ाया गया था उनमें से कई मरीज़ों की हालत गंभीर बनी हुई है। राजस्थान सरकार ने मृतकों के परिजनों को 5-5लाख रूपये का मुआवज़ा देने की घोषणा कर अपने फर्ज  की इतिश्री कर ली है। जनाक्रोश को नियंत्रित रखने के मद्देनज़र स्वास्थ्य विभाग के दो अधिकारी जिनमें एक ड्रग इंस्पेक्टर तथा एक स्टोर कीपर शामिल है, को निलंबित कर दिया गया है।

परंतु परिवार के एक जिम्मेदार सदस्य वह भी एक प्रसूता मां का मरना एक परिवार के लिए कितनी बड़ी कमी छोड़ जाएगा,उस नुकसान की भरपाई न ही दौलत से की जा सकेगी न ही किसी के निलंबन या बहाली से। राजस्थान सरकार ने इस संबंध में एक और सकारात्मक कदम यह भी उठाया है कि राज्य सरकार के स्वास्थय विभाग को ग्लूकोज़ की आपूर्ति करने वाली उस कंपनी को काली सूची में डाल दिया गया है तथा संक्रमण का संदेह होने वाले बैच के इस्तेमाल पर पाबंदी लगाई गई है।

इन सभी उपायों के बावजूद उन तेरह परिवारों में एक ही समय में पसरे मातम व शोकाकुल वातावरण को  खुशियों के माहौल में कतई नहीं बदला जा सकता। यहां एक बात यह भी काबिले ग़ौर है कि सभी मृतक प्रसूता या तो गरीब परिवार की थीं या मध्यम गरीब परिवार की। सेहत संबंधी मामलों को लेकर जहां तक भारत की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बनने वाली साख का प्रश्र है तो इसमें भी भारत का रिकॉर्ड अत्यंत अफसोसनाक है। आंकड़ों के अनुसार दुनिया में सबसे अधिक नवजात शिशुओं की मौत भारतवर्ष में ही होती है।

विज्ञान जगत की प्रतिष्ठित पत्रिका द् लॉनसेट के अनुसार 2005 में भारत में बीस लाख पैंतीस हज़ार बच्चे मौत के मुंह में समा गए। इनमें जहां मां की $खराब सेहत, गरीबी, समय पर इलाज न मिल पाना,कुपोषण जैसी विसंगतियां शामिल थीं वहीं स्वास्थय विभाग की लापरवाही,$गलत दवाओं का प्रयोग तथा संक्रमित दवाईयों का इस्तेमाल भी इनकी मौत के कारणों में एक प्रमुख कारण था। स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही के परिणामस्वरूप गत् वर्ष उत्तर प्रदेश में 475बच्चों की मौत हो गई जबकि इससे कहीं अधिक सं या में बच्चे मानसिक व शारीरिक रूप से विकलांग हो गए।

परंतु सरकार है कि इन ज़मीनी हकीकतों से शायद बेखबर रहकर अपनी तथाकथित हवाई उपलब्धियों के पोस्टर,बैनर तथा होर्डिंग्स आदि लगवाकर आम जनता,आला अधिकारियों,नेताओं तथा विश्व स्वास्थय संगठन को यह दिखलाना चाहती है कि पूरे देश में सब कुछ ठीकठाक है। और जब इस प्रकार की दुर्भाग्यपूर्ण सामूहिक मौतों की खबर सुनाई देती है तब जहां मुआवज़े व निलंबन की राजनीति शुरु होती है वहीं अधिकारियों द्वारा एक दूसरे पर दोषारोपण करने का अभियान भी छिड़ जाता है।

स्वास्थय विभाग की लापरवाही व इसमें व्याप्त भ्रष्टाचार का नेटवर्क इतना अधिक फैल चुका है तथा इसकी जड़ें इतनी गहरी हो गई हैं कि आज देश में जगह-जगह मेडिकल स्टोर्स पर नकली दवाईयां,प्रयोग तिथि पूरी कर चुकी अर्थात् एक्सपायर तिथि की दवाईयां आदि धड़ल्ले से बेची जाती हैं। तमाम प्रतिबंधित ड्रग्स भी यहां उपलब्ध हो जाते हैं।

याद कीजिए 2वर्ष पूर्व दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान की वह घटना जबकि एक समारोह के दौरान मंच पर विराजमान वरिष्ठ डॉक्टरों ने संक्रमित जल ग्रहण कर लिया था। देश की नामी कंपनी का प्लास्टिक के गिलास में सील मिनरल वॉटर डॉक्टर्स के समक्ष रखा गया था। यह जल न केवल संक्रमित था बल्कि   इसकी तह में फफूंद  भी लगा हुआ साफ नज़र आ रहा था। इस पानी को पीने वाले कई डॉक्टरों की जान पर बन आई। इनमें से कई डॉक्टर केवल अस्वस्थ ही नहीं बल्कि गंभीर अवस्था में भी पहुंच गए थे। संयोग से वे सभी एम्स  के डॉक्टर थे इसलिए उन्हें बचा लिया गया अन्यथा यदि यही 'आम आदमी' होते तो संभवत:अपनी जान से भी हाथ धो बैठते।

अभी कुछ समय पूर्व देश में एक ऐसे भ्रष्टाचारी नेटवर्क का उस समय भंडाफोड़ हुआ था जबकि वह कैंसर की बीमारी में प्रयुक्त होने वाले बेशकीमती इंजेक्शन को निकाल कर उसकी जगह पानी भरकर मरीज़ों को दे दिया करता था। नतीजा आप खुद समझ सकते हैं। सवाल यह है कि अन्य विभागों व क्षेत्र में फैले भ्रष्टाचार की ही तरह क्या स्वास्थय विभाग के अधिकारियों व कर्मचारियों को भी इस बात की छूट दी जा सकती है कि वे अपनी सरकारी सेवा के दौरान केवल अपने आर्थिक लाभ के चलते दूसरों की जान से खिलवाड़ करें?

 यदि नहीं तो इनके अपराध को जानबूझ कर किया जाने वाला योजनाबद्ध अपराध समझा जाना चाहिए और न्याय की दृष्टि से इन्हें वही सज़ा दी जानी चाहिए जोकि एक सुनियोजित षड्यंत्र के साथ किए गए अपराध के लिए किसी अपराधी को दी जाती है। राजस्थान के जोधपुर में तेरह लोगों की एक साथ मौत और वह भी स्वास्थय विभाग के कर्मचारियों की लापरवाही के परिणामस्वरूप होना,निश्चित रूप से यह जानबूझ कर सामूहिक हत्याकांड  किए जाने का घिनौना अपराध है। इसमें कोई शक नहीं कि इसमें दोषी पाए जाने वाले सभी लोग कड़ी  सज़ा पाने के हकदार हैं।

लेखिका  सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर लिखती हैं,उनसे nirmalrani@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.
http://www.janjwar.com/

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