Tuesday, March 01, 2011

डीएनए जाँच का कान्सेप्ट किसने दिया?


डीएनए प्रोफाईलिंग यानि डीएनए जाँच एक ऐसी तकनीक है जो फोरेंसिक साइंस में इस्तेमाल होती है। इस जाँच के ज़रिये किसी जगह पर मिले खून या वीर्य के अन्दर मौजूद डीएनए को देखकर उस व्यक्ति विशेष की पहचान की जाती है। जिस्म से निकलने वाले वीर्य में उस व्यक्ति के जिस्म की इन्फार्मेशन होती है। और अगर उस वीर्य की जाँच की जाये तो उस व्यक्ति के जिस्म के बारे में सब कुछ मालूम हो जाता है। डीएनए जाँच इसी तथ्य पर आधारित है।


डीएनए प्रोफाईलिंग तकनीक पहली बार 1984 में सर एलिक जेफरी द्वारा लीसेस्टर यूनिवर्सिटी, इंग्लैण्ड में इस्तेमाल की गयी। इस तकनीक को बाद में आई.सी.आई कंपनी ने बड़े पैमाने पर लांच किया।

डीएनए जाँच में सबसे पहले इंसानी जिस्म का कोई ऐसा नमूना लिया जाता है जिसमें उस व्यक्ति का डीएनए मौजूद हो सकता है। ऐसे नमूने में शामिल है खून, वीर्य या फिर लार। खून के सफेद ज़र्रात में डीएनए मौजूद होता है लेकिन लाल जर्रात में डीएनए नहीं पाया जाता। हम जानते हैं कि डीएनए बहुत ही बारीक सीढ़ीदार संरचना होती है जो जिस्म की हर कोशिका में मौजूद होती है। डीएनए में कुछ तत्वों के परमाणु एक खास क्रम में जुड़े रहते हैं। यही क्रम उस व्यक्ति के बारे में और उसकी नस्ल के गुणों के बारे में सूचनाएं रखता है। अगर यह क्रम बदल जाये तो गुण भी बदल जाते हैं। डीएनए में मौजूद इसी क्रम को देखकर व्यक्ति विशेष या उसके माँ बाप के बारे में पता लगाया जा सकता है।

डीएनए प्रोफाइल बनाने में जिन तकनीकों का इस्तेमाल होता है उनमें शामिल हैं, आर.एफ.एल.पी. (RFLP), पी.सी.आर. (PCR), एस.टी.आर (STR) और ए.एफ.एल.पी. (AFLP) इत्यादि। वर्तमान में इनमें से पी.सी.आर. विधि सबसे ज्यादा इस्तेमाल हो रही है। पी.सी.आर. का पूरा नाम है पालीमरेज़ चेन रियेक्शन (Polymerase Chain Reaction) जिसमें एक प्रक्रिया द्वारा डीएनए की लाखों कापियां बनायी जाती हैं। और फिर उसका फोटोग्राफ तैयार हो जाता है।

ये तो बात हुई आधुनिक साइंस की। अब सवाल उठता है कि क्या इस्लाम भी डीएनए तकनीक की तरफ कोई इशारा करता है? ये बात तो ज़ाहिर हो चुकी है कि हमारे इमाम (अ.) और रसूल (स.) को उन सभी बातों का इल्म था जो हम तक आज की साइंस के ज़रिये पहुंच रही हैं। लेकिन चूंकि उस ज़माने में आम आदमी को उन बातों का कुछ पता नहीं था और अगर इमाम इस बारे में कुछ बताते भी तो उनकी बात कोई नहीं समझ सकता। लिहाज़ा हमारे इमामों ने और रसूल ने इस बारे में सिर्फ इशारे ही दिये और ऐसे बहुत से इशारे हमारी किताबों में मौजूद हैं। इन्ही में शामिल है डीएनए जाँच का भी इशारा।    

यह हदीस हमने हासिल की है इस्लामी दानिश्वर शेख सुद्दूक (अ.र.) की किताब एललुश-शराये से।

रसूल अल्लाह (स.) से सवाल किया गया कि जनाबत की वजह से गुस्ल का हुक्म क्यों दिया गया है और पाखाना या पेशाब की वजह से नहीं हालांकि पाखाना तो जनाबत से भी नजिस और गंदा है। तो रसूल (स.) ने जवाब दिया कि जनाबत इंसान की ज़ात से निकलती है और वह इंसान के पूरे जिस्म से निकल कर आती है और पाखाना इंसान की ज़ात से नहीं निकलता। वह तो वही गिज़ा है जो एक दरवाजे से दाखिल होती है और दूसरे से निकल जाती है।

यहाँ पर रसूल अल्लाह साफ साफ फरमा रहे हैं कि जनाबत इंसान की ज़ात से निकलती है और वह इंसान के पूरे जिस्म से निकल कर आती है यानि इंसान का वीर्य उसके पूरे जिस्म का प्रतिनिधित्व करता है यानि उसके वीर्य में उस व्यक्ति के जिस्म से सम्बंधित सूचनाएं मौजूद होती हैं और उसकी जाँच करके उस इंसान को पहचाना जा सकता है। जबकि पेशाब या पाखाना में ऐसा नहीं होता। पेशाब इत्यादि की जाँच करके उस इंसान के बारे में कुछ पता नहीं लग सकता , जब तक की उसमें अलग से जिस्म के सेल्स न मिले हों । ये हकीकत है कि सेहतमन्द इंसान के पेशाब या पाखाना में डीएनए जैसी कोई चीज़ नहीं होती। 

लिहाज़ा साफ साफ ज़ाहिर हुआ कि रसूल अल्लाह (स.) आम अलफाज़ में डीएनए की थ्योरी समझा रहे हैं जो उस ज़माने में लोगों ने उनकी एक हदीस समझकर लिख तो लिया था लेकिन ज्यादा तवज्जो नहीं दी थी। लेकिन आज जब साइंस तरक्की कर चुकी है तो हम इस हदीस की गहराई को समझ सकते हैं। अगर रसूल अल्लाह (स.) अपने ज़माने में डीएनए वगैरा की बात करते तो लोग उनकी बातों को ज़रा भी समझ नहीं पाते। अत: रसूल ने साइंस के इन उसूलों को इस तरह आम ज़बान में बताया कि लोग आसानी से सब कुछ समझ गये।

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