Monday, March 07, 2011

गुजरात में मुसलमान अब भी आतंक के साये में


''हम एक पुलिस राज्य में रह रहे हैं। मुझे यहां डर लगता है। मेरे भी बच्चे हैं'', इन शब्दों के साथ सुप्रसिध्द नृत्यांगना और सामाजिक कार्यकर्ता मल्लिका साराभाई ने गुजरात की राजधानी अहमदाबाद में आयोजित एक सभा में अपनी मानसिक पीड़ा को व्यक्त किया। मल्लिका जी गत 18 फरवरी, 2011 को ऑल इंडिया सेक्युलर फोरम के दसवें वार्षिक अधिवेशन के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रही थीं।
उद्घाटन सत्र को गुजरात के अनेक महत्वपूर्ण नागरिकों और फोरम के पदाधिकारियों ने संबोधित किया। मल्लिका साराभाई ने आगे कहा कि ''गुजरात पर जो बीती है उसका बयान करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं। कहा जा रहा है कि परिस्थितियां बदल गई हैं और अब तो मुसलमान भी नरेन्द्र मोदी को वोट दे रहे हैं। मैं नहीं जानती, इसमें कितना सच है, परंतु यदि ऐसा है भी तो इसके पीछे के रहस्य को उजागर करना जरूरी है। कभी-कभी मुझे ऐसा लगता है कि गुजरात में मेरे सिवाए सब खुश हैं। परंतु मैं इतना जानती हूं कि इस स्थिति को एक होकर ही बदला जा सकता है।''
पूर्व अतिरिक्त महाधिवक्ता एवं महाराष्ट्र सरकार के पूर्व मंत्री श्री बी. ए. देसाई ने कहा कि एक गुजराती होने के कारण उन्हें यह सोचकर शर्म आती है कि गुजरात की सत्ता नरेन्द्र मोदी जैसे व्यक्ति के हाथ में है। गुजरात एक फासिस्ट राज्य बन गया है। यहां भयावह अल्पसंख्यक-विरोधी वातावरण है। देसाई ने कहा कि हमारे देश के लिए शर्म की बात है कि यहां के एक मुख्यमंत्री (मोदी) को अमेरिका ने वीजा देने से इंकार कर दिया। ब्रिटेन ने अवश्य नरेन्द्र मोदी को वीजा दिया था परंतु मोदी स्वयं वहां नहीं गए क्योंकि उन्हें आशंका थी कि ब्रिटिश सरकार उन्हें गिरतार कर लेगी। गिरतारी की संभावना इसलिए थी क्योंकि गुजरात में हुए सन् 2002 के दंगों में कुछ ब्रिटिश नागरिक भी मारे गए थे।
गुजरात के प्रसिध्द अधिवक्ता मुकुल सिन्हा, जो कई मामलों में दंगा पीड़ितों की पैरवी कर रहे हैं, ने कहा कि यह एकदम साफ है कि पूंजीवादी व्यवस्था के चलते साम्प्रदायिकता से संघर्ष करना बहुत मुश्किल है। अनहद की संयोजक शबनम हाशमी, प्रोफेसर राम पुनियानी, एल. एस. हरदेनिया एवं डॉ. असगर अली इंजीनियर ने इस बात पर जोर दिया कि गुजरात को साम्प्रदायिकता के चंगुल से छुड़ाने के लिए सघन प्रयासों की आवश्यकता है। हरदेनिया ने फोरम की गतिविधियों पर प्रकाश डाला।
उद्घाटन सत्र के पश्चात 19 और 20 फरवरी को पूरे देश की साम्प्रदायिक स्थिति पर विचार हुआ। सम्मेलन में उपस्थित अनेक मुस्लिम पुरूषों और महिलाओं ने उन कठिन परिस्थितियों का विवरण दिया जिनमें उन्हें जीवनयापन करना पड़ रहा है। उन्होंने बताया कि प्राय: सभी मुस्लिम  बस्तियों में  रहवासियों को बुनियादी सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हैं। प्राय: सभी मुसलमान दूसरे दर्जे के नागरिकों के समान रह रहे हैं। इन बस्तियों में पीने का पानी तक ठीक से नहीं मिलता। मलमूत्र की निकासी का भी संतोषजनक प्रबंध नहीं है। अनेक तरीकों से मुसलमानों को सताया जा रहा है। जैसे, एक मुस्लिम बस्ती में लगभग पूरे अहमदाबाद का कचरा डाला जाता है, जिससे चारों तरफ बदबू आती रहती है और अनेक प्रकार की बीमारियां उत्पन्न होती हैं। जो हाल अहमदाबाद का है  वैसा ही प्राय: पूरे गुजरात का है। सम्मेलन में गुजरात में मुसलमानों के साथ किए जा रहे दुर्व्यहार की एक स्वर से निंदा की गई और मांग की गई कि उनके साथ सम्मानजनक व्यवहार किया जाए।
गुजरात के साथ साथ असम में भी मुसलमानों और बांग्लाभाषी हिन्दुओं के साथ की जा रही ज्यादतियों पर चिंता प्रकट की गई। असम से आए प्रतिनिधियों ने बताया कि बड़े पैमाने पर मुसलमानों और बांग्लाभाषियों को डाउटफुल (संदेहास्पद) मतदाता घोषित किया जा रहा है।
यह सब कुछ एक योजनाबध्द परंतु भौंडे तरीके से हो रहा है। जैसे किसी परिवार के मुखिया को संदेहास्पद मतदाता घोषित कर दिया गया है परंतु मुखिया की पत्नी को मतदाता रहने दिया गया है। इसी तरह, किसी परिवार की पुत्री को संदेहास्पद मतदाता बता दिया गया है परंतु उसके भाई को मतदाता रहने दिया गया है। इसी तरह का व्यवहार बांग्ला भाषियों के साथ हो रहा है। फिर वे भले ही हिन्दू हों। असम की स्थिति की जांच के लिए फोरम ने एक टीम गठित की थी। इस टीम में एल.एस.हरदेनिया, दीपक भट्ट, हाफिज अहमद, डा. दिलीप बोरा, हनीफ मुश्ताक और डा. शाउज़ ज़मां अहमद शामिल थे। इस जांच टीम ने असम के विभिन्न स्थानों का मुआयना कर वास्तविकता जानने का  प्रयास किया था। टीम की रिपोर्ट सम्मेलन में वितरित की गई । जांच दल की राय थी कि असम की स्थिति कभी भी विस्फोटक हो सकती है। यह अफसोस की बात है कि भारत सरकार असम की स्थिति की पूरी तरह उपेक्षा कर रही है।
ओडिसा की स्थिति पर भी विचार किया गया, जहां पिछले कुछ सालों से ईसाईयों पर अनेक प्रकार की ज्यादतियां होती आइं हैं। सम्मेलन में इस बात पर प्रसन्नता व्यक्त की गई कि पॉस्टर स्टेन्स और उनके दो बच्चों के हत्यारे दारासिंह को आजन्य कारावास की सजा दी गई परंतु इस संबंध में सर्वोच्च न्यायालय ने जो टिप्पणी की थी वह दुर्भाग्यपूर्ण थी। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि दारासिंह  स्टेन्स को सबक सिखाना चाहता था। इस संबंध में देश भर के बुध्दिजीवियों द्वारा की गई आपत्ति के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी वह टिप्पणी  वापिस ले ली।
भाजपा-शासित राज्यों से आए प्रतिनिधियों ने बताया कि वहां की सरकारे हर प्रकार का हथकंड़े अपनाकर हिन्दुत्व की विचारधारा की जडें मजबूत कर रही हैं। भाजपा-शासित राज्यों में अल्पसंख्यकों पर ज्यादतियां होती रहती हैं और पुलिस किसी भी प्रकार की कार्यवाही नहीं करती। हरदेनिया और दीपक भट्ट ने मध्यप्रदेश में व्याप्त स्थिति पर प्रकाश डाला।
सम्मेलन में डॉ. विनायक सेन को दी गई सजा की निन्दा की गई और यह मांग की गई कि उस कानून को रद्द कर दिया जाना चाहिए जिसका सहारा लेकर मानवाधिकारों की रक्षा के लिए काम करने वाले लोगों को सताया जाता है।
आल इंडिया सेक्युलर फोरम की स्थापना दस वर्ष पूर्व हुई थी। इन दस वर्षों में फोरम की गतिविधियों का क्षेत्र काफी बढ़ा है। अनेक राज्यों में फोरम अनेक मामलों में हस्तक्षेप करने की स्थिति में आ गया है।
मध्यप्रदेश में फोरम की गतिविधियां लगभग पूरे वर्ष चलती रहती हैं। इन गतिविधियों में सेमीनार, कार्यशालायें, जनसभायें शामिल हैं। साथ ही, जहां भी सांप्रदायिक तनाव या हिंसक घटनायें होती हैं फोरम वहां अपनी जांच टीम भेजता है और दंगा पीड़ितों की हर संभव सहायता करता है। सम्मेलन में मालेगाँव, हैदराबाद, अजमेर और समझौता एक्सप्रेस की आतंकी हमलों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हाथ होने का उल्लेख किया गया। इस संदर्भ में यह मांग की गई कि इन घटनाओं के संबंध में जिन मुसलमानों को गिरतार किया गया है उन्हें शीघ्र रिहा किया जाय। इसके लिए एक अभियान चलाने का भी फैसला किया गया।
साभार:http://humsamvet.org.in/

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