Sunday, March 20, 2011

खूंटी पर टंगी खड़ाऊं सरकार

अंग्रेजी के प्रतिष्ठित और संतुलित अखबार ‘द हिंदू’ ने विकीलीक्स के ‘गोपनीय केबल’ छापने शुरू कर दिए हैं। अभी सिर्फ दो ही दिन हुए हैं, भारत की संसद और सरकार हिलने लगी है। इन ‘केबलों’ में से पता नहीं कैसे-कैसे गड़े मुर्दें उखड़ेंगे। भारत स्थित अमेरिकी दूतावास ने अपने विदेश मंत्रलय को जो गोपनीय संदेश, रपट, पत्र् और सुझाव आदि भेजे हैं, वे इतने विकट हैं कि हमारी सरकार न तो उन्हें गलत बता सकती है और न सही ! पिछले दो दिनों में जो दस्तावेज़ छापे हैं, उनके तथ्य ही इतने खतरनाक हैं कि इस सरकार की जगह अगर जवाहरलाल नेहरू या मोरारजी देसाई की सरकार होती तो वह बिना मांगे ही इस्तीफा दे देती।
यहां हम सिर्फ दो मामलों को लेते हैं। पहला, जुलाई 2008 में विश्वास-मत प्राप्त करने के लिए सरकार ने क्या-क्या हथकंडे अपनाए और दूसरा, अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी में भारत भारत से ईरान के खिलाफ वोट क्यों दिया ? ये दोनों मामले काफी अलग-अलग मालूम पड़ते हैं लेकिन आगे जाकर हम देखेंगे कि वे आपस में गहरे जुड़े हुए हैं।

आप याद करें कि 2008 में क्या हुआ था ? मनमोहन-सरकार पर संकट छा गया था। भारत-अमेरिकी परमाणु-सौदे का विरोध करते-करते कम्युनिस्ट पार्टियों ने सरकार का समर्थन बंद कर दिया था। सरकार अल्पमत में आ गई थी। लोकसभा में 272 वोट का सवाल था। संसद में जिस दिन मतदान हुआ, उसके पांच दिन पहले अमेरिका दूतावास का एक कूटनीतिज्ञ श्री सतीश शर्मा से मिलने आया। सतीश शर्मा के किसी सहयोगी ने उसे दो तिजोरियाँ दिखाईं और कहा कि इनमें 50-60 करोड़ रू. रखा है, जो कि एक बड़े फंड का हिस्सा है। यह पैसा गैर-कांग्रेसी सांसदों को बांटा जाएगा ताकि वे सरकार के पक्ष में वोट करें। अजित सिंह के राष्ट्रीय लोक दल के चार सांसदों को दस-दस करोड़ रू. तो पहले ही दिए जा चुके हैं। उसे बस डर यही था कि कहीं अजित सिंह के सांसद पैसा भी खा जाए और वोट भी न दे। ये बातें अमेरिकी राजदूतावास के शार्ज डि एफेयर्स स्टीव व्हाइट ने 17 जुलाई 2008 के अपने ‘केबल’ में लिखकर अपने विदेश मंत्रलय को भेजीं। इस ‘केबल’ में सतीश शर्मा का परिचय देते हुए व्हाइट ने लिखा कि वे सोनिया गांधी के ‘अत्यंत घनिष्ट’ पारिवारिक मित्र हैं और राज्यसभा के सदस्य हैं।
सतीश शर्मा ने उस अमेरिकी कूटनीतिज्ञ से जो कुछ कहा, वह और भी खतरनाक था। शर्मा ने कहा कि खुद प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह ने अकाली दल के आठ सांसदों को अमेरिका के धन्ना सेठ संतसिंह छटवाल के जरिए पटाने की कोशिश की (लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली)। अब समझ में आया कि छटवाल जैसे विवादस्पद आदमी को पद्रमभूषण से सम्मानित क्यों किया गया था। शर्मा ने यह विश्वास भी दिलाया कि सोनिया और राहुल गांधी पूरी तरह भारत-अमेरिकी परमाणु-सौदे का समर्थन कर रहे हैं। सरकार के समर्थन में शिव-सेना और भाजपा के सांसदों को भी तोड़ने की कोशिश की जा रही है। अब हम ज़रा दुबारा याद करें कि 22 जुलाई 2008 को लोकसभा में क्या नाटक हुआ था। किसे याद नहीं कि संसद के पटल पर नोटों की गडि्रडयाँ उछाली जा रही थीं और बताया जा रहा था कि सत्ताधारी दल और उसके समर्थक दलों के सांसद में पैसा नक़द बॉंटने के लिए संसद-भवन में ले आए थे। हंगामा हुआ और वह शर्मनाक घटना आई-गई हो गई लेकिन इस ‘गोपनीय केबल’ ने भारतीय लोकतंत्र् के उस गहरे घाव को दुबारा हरा कर दिया है। उस समय यह माना जा रहा था कि सरकार गिराने के लिए हो सकता है कि विरोधी दलों ने यह नाटक रचा है लेकिन अब तो बात बिल्कुल साफ हो गई है। किसी अन्य कांग्रेसी नेता ने उसी कूटनीतिज्ञ को यह भी कहा कि पहले कमलनाथ रिश्वत में सिर्फ छोटे जहाज देता था, अब वह ‘जेट विमान’ भी दे सकता है।”

एक कांग्रेसी नेता किसी दूसरे कांग्रेसी नेता के बारे में ऐसी बातें ईर्ष्या-द्वेष से प्रेरित होकर कर दे तो कोई आश्चर्य नहीं लेकिन सतीश शर्मा और उनके सचिव ने अमेरिकी कूटनीतिज्ञ को जो बात सीधे-सीधे कही है और दिखाई है, उसे झूठ मानने का कोई कारण नहीं है। अपनी सरकार को भेजी गई गुप्त रपट में कोई अफसर मनगढ़त बात क्यों लिखेगा ? उसके द्वारा प्रेषित विवरण को हमें प्रामाणिक ही मानना होगा, जब तक कि यह सिद्घ न हो जाए कि वह सर्वथा निराधार है। यह विवरण प्रामाणिक है, इसका आधार कुछ आंकड़े भी हैं। 17 जुलाई को जो गुप्त रपट वाशिंगटन भेजी गई, उसमें लिखा था कि सरकार को 273 वोट मिलेंगे, 251 विरोध में पड़ेंगे और 19 तटस्थ रहेंगे। 22 जुलाई को लगभग यही हुआ। 275 पक्ष में और 256 विरोध में पड़े। दस तटस्थ में रहे। अमेरिकी दूतावास का यह अगि्रम मूल्यांकन क्या अखबार पढ़कर संभव हुआ हो सकता है ? जाहिर है कि कांग्रेस के एकदम अंतरंग सूत्रें द्वारा दी गई जानकारियों के आधार पर ही ऐसी भविष्यवाणी की जा सकती थीं।
इस रहस्योद्रघाटन से क्या सिद्घ होता है ? सबसे पहले तो यह सिद्घ होता है कि जिस लोकतंत्र् पर हम गर्व करते हैं, वह कितना खोखला है। हमारे सांसद, जो भारत की संप्रभुता और जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं, वे आलू-बैंगन की तरह खरीदे जा सकते हैं। उन्हें न अपनी अस्मिता की चिंता है न अपनी विचारधारा की और न ही अपनी पार्टी की ! उन्होंने अपने दुराचरण से लोकतंत्र् के माथे पर कलंक लगा दिया है। दूसरा, उस घटना के इस रहस्योद्रघाटन से प्रधानमंत्र्ी की साफ-सुथरी छवि तहस-नहस हो रही है। अब तक यह माना जा रहा था कि सारे घोटाले कीचड़ की तरह हैं और डॉ. मनमोहन सिंह उन पर कमल की तरह खिले हुए है। वे बिल्कुल बेदाग हैं। वे मजबूर हैं। वे क्या करें ? वे गठबंधन-धर्म निभा रहे हैं। वे खड़ाऊ-राज चला रहे हैं। वे अमानत में खयानत कैसे कर सकते हैं ? लेकिन अमेरिकी दूतावास के इस ‘केबल’ से पता चलता है कि वे कम खुदा नहीं हैं। कोशिश तो उन्होंने भी पूरी की लेकिन वे फेल हो गए। छटवाल का पैसा अकालियों को पटा नहीं पाया। यदि चार-छह सांसद और नहीं पट पाते तो यह सरकार तभी गिर जाती। अब सरकार तो दुबारा भी बन गई लेकिन उसकी इज्जत गिर गई है। जिस सरकार की इज्जत गिर जाए, उसकी कौन सुनता है ? न जनता सुनती है, न नौकरशाही और न ही उसकी अपनी पार्टी ! अराज़कता का नया दौर अपने आप शुरू हो जाता है।
तीसरा, इस रहस्योद्घाटन से यह भी पता चलता है कि हमारे नेतागण विदेशी कूटनीतिज्ञों से कितने ज्यादा खुले हुए हैं। पार्टी और सरकार के गहनतम रहस्यों को पहले से ही उजागर करने में भी वे नहीं चूकते। कोई आश्चर्य नहीं कि हमारी सुरक्षा के बहुत-से रहस्य इसी तरह हमारे नेता विदेशियों को थमाते रहते हैं। छोटे-मोटे विदेशी कूटनीतिज्ञ भी हमारी भारी-भरकम नेताओं पर भारी पड़ जाते हैं। इस रहस्योद्रघाटन का चौथा सबक यह भी है कि तकनीक की इस नई दुनिया में अब कुछ गुप्त रहनेवाला नहीं है। यदि जूलियन असांज ने आज अमेरिकी दस्तावेजों को उजागर किया है तो कल अन्य देशों के गुप्त दस्तावेज भी सामने आ सकते हैं। इसीलिए सबसे अच्छा तो यह है कि सब सरकारें, नेता और अफसर अपना आचरण शुद्घ और पारदर्शी रखें या फिर जो गोपनीय हो, उसे सिर्फ अपने तक सीमित रखें।
‘द हिंदू’ में अभी तक छपे अन्य विवरणों में दूसरी सबसे अधिक ध्यातव्य घटना ईरान की है। भारत ईरान-विरोधी नहीं था, खास तौर से नरसिंहराव और वाजपेयी-सरकारों के जमाने से लेकिन मनमोहन सिंह सरकार ने कुछ अजूबा ही कर दिया। उसने ईरान के मामले में अमेरिकी नीति का अंधानुकरण शुरू कर दिया। अमेरिकी सरकार ने ईरान के विरूद्घ उसी तरह अभियान शुरू कर दिया, जैसे उसने सद्रदाम हुसैन के विरूद्घ किया था। ईरान पर उसने परमाणु शस्त्रस्त्र बनाने के आरोप लगाए और दुनिया के देशों से उसके विरूद्घ प्रतिबंध लगाने का आग्रह किया। भारत प्रतिबंधों के विरूद्घ रहा। उसने पश्चिमी देशों का समर्थन नहीं किया लेकिन मनमोहनसिंह-सरकार ने अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी में ईरान के विरूद्घ मतदान कर दिया और एक बार नहीं, दो-दो बार किया। सितंबर 2005 में और फरवरी 2006 में। भारत के विदेशी मामलों के सारे विशेषज्ञ हैरत में पड़ गए। एकाएक किसी को समझ में नहीं आया कि हमारी सरकार ने यह शीर्षासन क्यों किया? कम्युनिस्टों ने यह आरोप जरूर लगाया कि यह अमेरिका की खुशामद में उठाया हुआ कदम है।
कम्युनिस्टों के इस आरोप पर अब मुहर लग गई है। विकीलीक्स के दस्तावेजों से पता चलता है कि अमेरिकी कूटनीतिज्ञों ने यहां हमारी सरकार का टेंटुआ कस दिया था। उन्होंने हमारे विदेश मंत्रलय को साफ़-साफ़ बता दिया था कि यदि आप ईरान का विरोध नहीं करेंगे तो परमाणु-सौदा खटाई में पड़ जाएगा। नतीजा यह हुआ कि हमाने ईरान के साथ अपने घनिष्ट संबंधों को खटाई में डाल दिया। ईरान से हम तेल आयात करते हैं, उसके साथ हम तेल की पाइपलाइन डालने की कोशिश कर रहे थे, उसने अफगानिस्तान के गृहयुद्घ में पाकिस्तान के बजाय हमारा साथ दिया, वह गुट-निरपेक्षता का आदर्श उदाहरण पेश कर रहा था, वह अमेरिका से अपने विवाद में भारत की मध्यस्थता भी स्वीकार कर सकता था और इन सब बातों के अलावा उसकी परमाणु-तैयारी से भारत को दूर-दूर तक कोई खतरा नहीं था। इसके बावजूद डॉ मनमोहन सिंह ने अमेरिकी पटरी पर चलना स्वीकार किया। अमेरिकी दादागीरी का मुखर विरोध करनेवाले प्रसार मंत्री मणिशंकर अय्यर से मंत्रिपद छीन लिया। ‘गुप्त केबलों’ से पता चलता है कि अय्रयर को हटाने के पीछे तगड़ा अमेरिकी दबाव था। ऐसा करके क्या मनमोहन सिंह ने यह सिद्घ नहीं किया कि उन्हें भारत के राष्ट्रहितों की बजाय अमेरिका के राष्ट्रहितों की चिंता ज्यादा थी ? अमेरिका के साथ किए जा रहे परमाणु-सौदे से अमेरिका को अरबों डॉलर का लाभ मिलनेवाला है लेकिन भारत को क्या फायदा होगा, यह हमारी सरकार हमें आज तक नहीं बता सकी है। आज जापान जिस विभीषिका से गुजर रहा है, उस देखते हुए उक्त सौदे के औचित्य पर नए प्रश्न-चिन्ह लग रहे हैं।
क्या यह परमाणु-सौदा भारत के लिए इतना लाभदायक है कि इसके लिए मनमोहनसिंह सरकार ने अपनी सत्ता दांव पर लगा दी और लोकतंत्र् के मुंह पर कालिख पोत दी ? इतना ही नहीं, अपने एक सुयोग्य मंत्री को निकाल दिया और ईरान के मामले में शीर्षासन कर दिया। इन दोनों मामलों को जोड़कर देखे तो मन में प्रश्न उठता है कि नई दिल्ली से चल रहा राज खड़ाऊ-राज तो है लेकिन ये खड़ाऊ किसकी है?

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