Monday, March 07, 2011

‘कांग्रेस’ तमिलनाडु विधानसभा चुनावों के परिपेक्ष में..... अज़ीज़ बर्नी


8 मार्च अर्थात महिला दिवस, इसलिए मेरा कल का लेख इसी विषय पर होगा। चूंकि मैं इस समय उर्दू ज़बान के संदर्भ में गुफ़्तगू कर रहा हूं और देश के विभिन्न भागों में जन-गणना का कार्य जारी है। हम अपनी मातृभाषा के ख़ाने में उर्दू दर्ज कर रहे हैं, परंतु इतना ही काफ़ी नहीं है अब इस ख़ानापुरी से आगे बढ़कर कुछ सोचना और करना होगा और यह ऐतिहासिक कारनामा अंजाम देना महिलाओं के द्वारा ही संभव है। ऐसा नहीं है कि पुरुषों की सेवाओं को कम करके देखा जा रहा है। हां, बस यह इस वास्तविकता की स्वीकारोक्ति है कि मां की गोद से मिलने वाली भाषा ही बच्चे की पहली भाषा होती है, इसीलिए हम उसे मातृभाषा कहते हैं। मैं अपने कल के लेख के लिए महिलाओं का विशेष ध्यान चाहता हूं, इसलिए कि मैं इस उर्दू तहरीक को सफल बनाने में उनकी अभूतपूर्व भूमिका देख रहा हूं, लेकिन मैं एक पत्रकार हूं और मुझे ताज़ा राजनीतिक स्थिति पर भी नज़र रखनी है। तमिलनाडु का प्रादेशिक चुनाव कांग्रेस तथा डीएमके के बदलते संबंध इस समय मेरे सामने हैं, इसलिए मेरा आजका लेख इसी विषय पर और कल का लेख महिला दिवस को समर्पित:
कांग्रेस शायद डीएमके को नाराज़ करना नहीं चाहती थी, वरना जो स्थिति आज उत्पन्न हुई है, यह उसी समय पैदा हो सकती थी जब 2-जी स्पेक्ट्रम मामले में डीएमके के ए-राजा को लेकर हंगामा आरंभ हुआ था। लगातार संसद की कार्यवाही ठप होती चली जा रही थी। जेपीसी (संयुक्त सस्दीय समिति) गठित करने का दबाव बढ़ता चला जा रहा था, यहां तक कि प्रधानमंत्री डा॰ मनमोहन सिंह जी के व्यक्तित्व को प्रभावित करने का भी निरंतर प्रयास किया जा रहा था, परंतु कांगेे्रस ने ऐसा कोई संकेत देने का प्रयास नहीं किया कि वह डीएमके का दामन झटक देना चाहती है। हालांकि अन्ना डीएमके प्रमुख जय ललिता ने उसी समय स्पष्ट रूप से यह संकेत दे दिया था कि डीएमके सेे अलग हो जाने की स्थिति में सरकार को किसी प्रकार की कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ेगा। उनकी पार्टी का बिना शर्त समर्थन यूपीए सरकार को प्राप्त होगा। फिर भी कांगे्रस डीएमके के साथ दोस्ती निभाती रही, लेकिन सीटों के बटवारे के प्रश्न पर यह तनाव सामने आ गया। अगर उस समय कांग्रेस ने यह फ़ैसला कर लिया होता कि वह डीएमके से थोड़ी दूरी पर रहना चाहती है, इसलिए कि डीएमके के कारण यूपीए सरकार को लगातार भ्रष्टाचार के आरोपों को सहन करना पड़ रहा है और सफ़ाई देना कठिन होता चला जा रहा है, तब शायद कांगे्रस राजनीतिक दृष्टि से अधिक बेहतर स्थिति में होती। यह तो उस समय भी साफ़ दिखाई दे रहा था कि तमिलनाडु में जय ललिता का ग्राफ़ बढ़ रहा है और करुणानिधि का घट रहा है। बेशक कांगे्रस अपने दम पर राज्य में कोई बड़ी पोज़िशन प्राप्त करने की संभावना नहीं देख रही थी, परंतु इसका दोतरफ़ा लाभ उसे ज़रूर होता। एक तो जय ललिता के साथ संबंध आज से अधिक बेहतर होते दूसरे डीएमके से जनता की नाराज़गी का ज़िम्मेदार कांग्रेस को नहीं ठहराया जा सकता। राजनीतिक पेचीदगियां कुछ ऐसी हैं कि प्रादेशिक चुनावों के बाद कांग्रेस के पास यह अवसर तब भी रहता कि जिसके साथ मिलकर सरकार बनाने का अवसर मिले या प्राप्त कर लिया जाए, हालांकि यह अवसर आज भी उसके पास है अगर एआईडीएमके को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता है और डीएमके किसी हालत में भी सरकार बनाने की स्थिति में नहीं आती है तो कांग्रेस राज्य में जय ललिता को समर्थन देने का फ़ैसला कर सकती है और डीएमके से अलग होने की स्थिति में कंेद्रीय सरकार को जय ललिता का समर्थन प्राप्त हो सकता है।
जिस तरह देश के विभिन्न राज्यों में प्रादेेशिक पार्टियां मज़बूत होती जा रही हैं और कांग्रेस या भारतीय जनता पार्टी की निर्भरता उन पर बढ़ती चली जा रही है, उसके दूरगामी परिणाम सामने आ सकते हैं। भारतीय जनता पार्टी तो कांग्रेस के मुक़ाबले बहुत नई पार्टी है और उसे आगे बढ़ने का अवसर कांग्रेस के बिखराव तथा प्रादेशिक पार्टियों द्वारा ही मिला है, लेकिन कांग्रेस के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता। न जाने क्यों वह अलग-अलग राज्यों में अपना मज़बूत नेतृत्व पैदा नहीं कर पा रही है या अगर है तो उसे उन राज्यों की दृष्टि से बढ़ावा नहीं दे पा रही है। कांगे्रस के पास अलग-अलग राज्यों से बड़े क़द के नेताओं की कमी नहीं है, परंतु वह अपने राज्य की राजनीति में अधिक रुचि लेते नज़र नहीं आते, वह केंद्रीय सरकार का हिस्सा बने रहना चाहते हैं। ऐसा कांग्रेस पार्टी के इशारे पर होता है या उनकी रुचि अपने राज्य की अपेक्षा केंद्र में अधिक होती है, अब यह तो अधिक बेहतर वह स्वयं या उनकी पार्टी ही जानती होगी। लेकिन आज कांग्रेस को यह सोचने की आवश्यकता होनी चाहिए कि जय ललिता और करुणानिधि के क़द का कोई प्रादेशिक नेता उनके पास क्यों नहीं है, प्रादेशिक चुनाव के लिए किसका चेहरा देख कर क्षेत्रीय जनता कांग्रेस को वोट देने का फ़ैसला करे। जब उसे साफ़ नज़र आ रहा है कि कांग्रेस के पास ऐसा कोई चेहरा ही नहीं है जो राज्य का मुख्यमंत्री बन सके अगर उसे जय ललिता और करुणानिधि के बीच ही यह फ़ैसला करना है कि उनमें से किसके हाथों में राज्य की लगाम दी जाए, तो फिर कांग्रेस की तो किसी न किसी के पीछे चलना मजबूरी ही होगी। जबकि जनता की इच्छा होती है कि उसका वोट सत्ता प्राप्त करने वाले को मिले।
कांग्रेस के पास केंद्रीय गृह मंत्री पी॰चिदम्बरम, तमिलनाडु के एक दिग्गज नेता के रूप में कल भी थे और आज भी हैं। अगर 2006 के राज्य चुनाव से पूर्व कांग्रेस ने पी॰चिदम्बरम का चेहरा और नाम प्रादेशिक चुनावों के लिए प्रयोग किया होता तो अतिसंभव है कि उसे उस समय प्रादेशिक चुनाव में और बाद के संसदीय चुनावों में अधिक सफलता प्राप्त होती। आज डीएमके से नाराज़ और परिवर्तन की इच्छा रखने वाला वोटर जो जय ललिता की ओर जाने का इरादा रखता है वह कांगे्रस की ओर भी आ सकता था। क़द की दृष्टि से पी॰चिदम्बरम, जय ललिता तथा करुणानिधि के मुक़ाबले कमज़ोर नज़र नहीं आते। निरंतर केंद्रीय सरकार का हिस्सा रहने वाले इस कांग्रेसी नेता को अपना मुख्यमंत्री देखने में प्रादेशिक जनता अधिक प्रसन्न तथा संतुष्ट हो सकती थी। इस स्थिति में उन्हें अपने राज्य के विकास की अधिक संभावनाएं नज़र आतीं। इसलिए कि केंद्रीय वित्त मंत्री के पद पर सफल रहने वाला व्यक्ति अपने राज्य के लिए केंद्र से अच्छा पैकेज ले सकता है। उस समय यह आशाएं और बढ़ जाती हैं, जब सरकार उसी पार्टी की हो। ऐसा कांग्रेस ने नहीं चाहा। चिदम्बरम उसे पसंद नहीं करते थे, यह तो वही बेहतर जानते होंगे, परंतु कांगे्रस अपने फ़ैसले लेने में इतनी कमज़ोर नहीं होती कि अपने दल के किसी भी दिग्गज नेता के साथ उसे समझौता करना पड़ता। नारायण दत्त तिवारी उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री थे, जब उत्तराखन्ड भी उत्तर प्रदेश में शामिल था, परंतु बाद में वह केवल उत्तराखन्ड के मुख्यमंत्री बने। अर्जुन सिंह की तरह उनकी इच्छा भी केंद्र में किसी बड़ी ज़िम्मेदारी के लिए हो सकती थी। लेकिन कांग्रेस ने वही किया जो पार्टी के दृष्टि से ठीक लगा।
केरल में एके एन्टनी बड़े क़द के नेता हैं परंतु वह केंद्रीय सरकार में रक्षा मंत्री हैं जबकि राज्य में कम्युनिस्टों का जादू टूट रहा है। भारतीय जनता पार्टी वहां है नहीं, कांगे्रस उम्मीद करे तो किससे, किसका चेहरा सामने रख कर चुनाव लड़े। यही बात पश्चिम बंगाल में है, यहां 34 वर्षों बाद कम्युनिस्ट अगर जनता में परिवर्तन की चाह के चलते घाटे में नज़र आ रहे हैं तो ममता बैनर्जी के अलावा कोई और विकल्प उनके पास है ही नहीं। जबकि यह साफ़ नज़र आ रहा है कि वहां कम्युनिस्टों के लम्बे शासन में बदलाव की चाहत पश्चिम बंगाल की जनता की पहली इच्छा है। प्रणव मुखीर्जी जो पश्चिम बंगाल में सबसे लोकप्रिय और साफ़ छवि के योग्य नेता हैं, अगर कांगे्रस ने उन्हें सामने रखा होता तो अतिसंभव है कि ममता बैनर्जी से भी कहीं अधिक जनता उनके पीछे नज़र आती। बहरहाल अब तो बहुत देर हो चुकी है। उत्तर प्रदेश में भी कांगेे्रस के सामने यह प्रश्न खड़ा हो सकता है। मुलायम सिंह यादव और अब मायावती के बड़े क़द के सामने राज्य का कोई चेहरा ऐसा तो हो, जिसे कांगे्रस सामने रख कर विकल्प की बात मज़बूती से कह सके। जहां तक हमारी नज़र है, क्षेत्रीय स्तर पर, क्षेत्रीय नेताओं का बढ़ता हुआ क़द आने वाले समय में ऐसे परिणाम दे सकता है, जिस पर आज ही बहुत अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। निःसंदेह यह सभी बड़े नेतागण जिन्होंने अपने अपने राज्यों में अपनी-अपनी पहचान अपने बल-बूते पर प्राप्त की है, उनकी शक्ति को कम करके नहीं देखा जा सकता, परंतु उन्हें राज्य के साथ-साथ अपनी केंद्रीय भूमिका के बारे में भी सोचना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि आने वाले समय में केंद्रीय सरकार के लिए राष्ट्रीय स्तर की पार्टियां हों और प्रादेशिक सरकारें क्षेत्रीय नेताओं के पास। ऐसे में गठबंधन के साथ चलने वाली केंद्रीय सरकार कितनी आज़ाद होगी, समझा जा सकता है। यह एक अलग विषय है, जिस पर काफ़ी गंभीरता से विचार करने और लिखने की आवश्यकता है।
बहरहाल हम इस समय बात कर रहे थे तमिलनाडु के प्रादेशिक चुनावों की, कांगे्रस और डीएमके के बीच उत्पन्न हुई दूरी की, तो कांग्रेस के लिए जहां यह चिंता की बात है कि उसका एक साथी उससे अलग हो सकता है, जिसका आने वाले समय में केंद्रीय सरकार की मज़बूती पर प्रभाव पड़ सकता है तो संतोष की बात यह भी होनी चाहिए कि समाजवादी पार्टी इस संभावित घाटे को पूरा करने के लिए आगे आ सकती है। हां, परंतु मुलायम सिंह का साथ प्राप्त करने के लिए उसे एक बार फिर उत्तर-प्रदेश के विधानसभा चुनावों पर विचार करना होगा। ज़ाहिर है कि कांगे्रस जहां अपने लिए एक बार फिर ज़मीन तलाशने में लगी है, क्या कांग्रेस मुलायम सिंह से उनकी शर्तों पर समझौता कर सकेगी? और अगर समझौता करना उसकी मजबूरी ही है तो यह समझौता तमिलनाडु में करुणानिधि के साथ ही क्यों नहीं? बहरहाल यह तमाम उलझनें कांगे्रस के साथ हैं, फिर भी उसे यह भी देखना होगा कि अगर केवल इच्छाओं और इरादों से काम चल जाता तो बिहार के प्रादेशिक चुनाव में इतने घाटे का सामना नहीं करना पड़ता। कुछ ज़मीनी सच्चाई को समझना भी आवश्यक है। जहां ज़मीन तलाश की जाती है, वहां उस ज़मीन पर रहने वालों के दिलों में झांक कर भी देखना होता है। दिल्ली की दूरबीन से हर राज्य का गांव नज़र नहीं आता। परिणाम उस गांव के निकट रहने वाले के पक्ष में चला जाता है और कांगे्रस देखती रह जाती है।
आजका लेख चूंकि तमिलनाडु की राजनीतिक स्थिति तथा कांग्रेस एवं डीएमके के बदलते संबंधों पर है, इसीलिए हम किसी अन्य राज्य के संदर्भ में गुफ़्तगू नहीं करना चाहते। कांग्रेस ने अपने सिपह-सालारों में थोड़ा परिवर्तन किया है। तमिलनाडु की ज़िम्मेदारी ग़्ाुलाम नबी आज़ाद के सुपुर्द की गई है। तमिलनाडु एक ऐसा राज्य है जहां मुसलमानों की आबादी केवल 5.6 प्रतिशत है। जबकि उसके बग़ल के राज्य केरल में मुसलमान लगभग 25 प्रतिशत हैं। ज़ाहिर है राजनीतिक दृष्टि उन्हीं की गहरी हो सकती है, जो राजनीति में हैं, परंतु राजनीति से ज़रा दूर रहने वाले भी यह समझते हैं कि चुनाव में धर्म तथा जाति का आज भी बड़ा दख़ल है। भाषा की दृष्टि से तो तमिलनाडु और केरल बाहर वालों के लिए एक जैसा ही है। धर्म जनता को जोड़ने या प्रभावित करने का अगर कोई कारण बन सकता था या बन सकता है तो ग़्ाुलाम नबी आज़ाद का प्रभाव तमिलनाडु से अधिक केरल में होना चाहिए।
तमिलनाडु की कुल 234 विधानसभा सीटों में से कांग्रेस ने पिछली बार 34 सीटें प्राप्त कीं, जबकि केवल 48 सीटों पर चुनाव लड़ा, इसी प्रकार 2001 में 14 सीटों पर चुनाव लड़ कर 7 सीटें प्राप्त की, यह पहले की सीटों के मुक़ाबले काफ़ी अच्छी स्थिति थी इस बार और बेहतरी की उम्मीद की जा सकती है।
इन आंकड़ों की रौशनी में हमें लगता है कि कांग्रेस को यह कठिन फ़ैसला कर ही लेना चाहिए कि वह तमिलनाडु विधानसभा का इलैक्शन अकेले लड़े और पूरी ताक़त के साथ लड़े। कम से कम जनता के सामने तीन ऐसी पार्टियां तो हों, जहां उसके लिए उनमें से किसी एक के चुनाव का मौक़ा हो। हो सकता है कि कांगे्रस में यह बहस चल पड़े कि ऐसी स्थिति में अधिक सीटों पर लड़ा तो जा सकता है परंतु निर्वाचित होने वाले सदस्यों की संख्या कुछ कम हो सकती है, अगर यह चुनाव वह बिना किसी सहारे के लड़े तो, ज़रूरी नहीं कि एसा ही हो अगर हो जाय तो भी यह कोई नुक़्सान की बात नहीं है, इसलिए कि कांग्रेस बैलेंसिंग पावर होगी। अगर सत्ता की चैखट पर पहुंचने के लिए दोनों में से कोई भी पार्टी कुछ क़दम पीछे रह जाती है तो मंज़िल पर क़दम रखने के लिए कांग्रेस की सहायता दरकार होगी। राजनीति में संबंधों की खटास या मिठास स्थाई नहीं होती। उम्मीद कम है, फिर भी अगर डीएमके (करुणानिधि) सत्ता से कुछ दूर रह जाती है तो कांग्रेस का साथ पाने में न उसे कोई परहेज़ होगा और न कांग्र्रेस को इसमें कोई कठिनाई होगी। जय ललिता को अगर ज़रूरत पड़ी तो यह संबंध उनके साथ भी स्थापित हो सकता है। ऐसा कुछ भी नहीं हुआ तो भी तमिलनाडु में पार्टी को खड़ा करने का एक अवसर तो मिलेगा। वरना 234 में से केवल 60-62 सीटों पर तो उम्मीदवार खड़े कर दिए जाएंगे। शेष सीटों पर जहां कांग्र्रेस के उम्मीदवार नहीं होंगे वहां पार्टी का अस्तित्व क्या रह जाएगा। ज़ाहिर है कि वह डीएमके और एआईडीएमके के बीच विभाजित हो जाएंगे। कांग्र्रेस को चाहिए कि वह राज्यों में अपनी ताक़त में वृद्धि करे पार्टी को मज़बूत करे, अपना कैडर खड़ा करे, यह तभी संभव है, जब वह पूरे साहस और शक्ति के साथ अकेली इलैक्शन में उतरने का फ़ैसला करे। यूं भी तमिलनाडु के प्रादेशिक चुनावों के परिणाम का केंद्रीय सरकार पर बहुत अधिक प्रभाव नहीं पड़ने वाला, बस संबंधों में सामंजस्य रखने की आवश्यकता है।
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