Thursday, March 03, 2011

भाई मुज़म्मिल (सोहन वीर) से मुलाकात interview March 2011


अहमद अव्वाहः अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि वबरकातुह
मुज़म्मिलः वालैकुमुस्सलाम व रहमतुल्लाहि वबरकातुह

अहमदः मुज़म्मिल भाई आपका नम्बर भी आ ही गया?
मुज़म्मिलः जी अहमद भाई, मैंने आपसे कितनी बार कहा कि मेरा इन्टरव्यू भी ले लो।

अहमदः तुम्हारा हाल तुम्हें खुद मालूम है कैसा था, क्या वह इस लायक़ था कि उसे छपवाया जाये, वह तो ऐसा हाल था कि उसे छुपाया जाये बस, फिर यह बात भी थी कि अबी (मौलाना मुहम्मद कलीम सिद्दीकी) जिसके बारे में फरमाते हैं मैं उनसे ही बात करता हूं, मैंने अबी से तुम्हारी बात कही थी, तो अबी कहते थे ज़रा इन्तज़ार कर लो इसका हाल ज़रा इस लायक होने दो।
मुज़म्मिलः मशहूर है कि बारा बरस में कोडी के दिन भी बहाल हो जाते हैं, अहमद भाई मुझे बारा बरस इस्लाम कुबूल किये हुए हो गये, बल्कि अगर मैं कहूं कि इस्लाम कुबूल करने का ढोंग भरे हुए, तो यह भी सही है।
 
अहमदः वाकई हम पर तुम्हारा अहसान है कि तुम्हारी वजह से हमने अबी को पहचाना और हमें मालूम हुआ कि किसी को बरदाश्त करना और सबर करना किसको कहते हैं, वरना अच्छे-अच्छे हिम्मत हार जाते हैं।
मुज़म्मिलः अहमद भाई आप हज़रत के घर में सबसे नर्म, बरदाश्त करने वाले और रहमदिल हैं, आपने भी मुझे दो बार फुलत से भगाया, लेकिन हज़रत दोनों बार मुझे अपनी गाड़ी में बैठाकर साथ ले आये।
 
अहमदः अच्छा अब डेढ साल से तुमने कोई ड्रामा नहीं किया, कहते हैं चोर चोरी से जाये, हेरा-फेरी से नहीं जाता, तो क्या अब तुम्हारे दिल में पुरानी हरकतें करने की बात नहीं आती?
मुज़म्मिलः अल्हमदू लिल्लाह मेरे अल्लाह का करम है(रोते हुए) अब कुछ भी नहीं आती।
 
अहमदः तुम्हें कलमा पढे हुए कितने दिन हुए?
मुज़म्मिलः कौन-सा वाला कलमा पढे हुए, मैंने तो बिसियों बार कलमा पढा है।
 
अहमदः तुमने इस्लाम कुबूल करने के लिए कलमा कब पढा?
मुज़म्मिलः मौलवी अहमद! मैं ने हर बार इस्लाम कुबूल करने के लिए कह कर कलमा पढा, सबसे पहला ड्रामा मैंने 9 जून 1998 में कलमा पढने का किया, जब थाना भवन के एक बडे आदमी चैधरी साहब मुझे हजरत की खिदमत में लेकर आये थे, इसके बाद मैं ज़रूरत के लिहाज़ से बार-बार कलमा पढकर मुसलमान होने का ड्रामा करता रहा, लेकिन 3 मार्च 2009 को मुझे हज़रत ने जामा मस्जिद फुलत में दस बजकर बाईस मिन्ट पर कलमा पढवाया था उसके बाद से काशिश करता हूं कि इस पर जमा रहूं, हमारे हज़रत कहते हैं कि मुझे हर वक्त डर रहता है कि ईमान रहा कि नहीं, इस खौफ से मग़रिब के बाद और फ़जर के बाद एक बार रोज़ाना ईमान कुबूल करने के लिए कलमा पढता हूं, आपने तो सुना होगा, नव-मुस्लिम आकर कहता है कि मैं नव-मुुस्लिम हूं, हज़रत मालूम करते हैं कब मुसलमान हुए? तो वह बताता है कि दो महीने हो गये, दो साल हो गये। हजरत कहते हैं कि आप तो मुझसे पुराने मुसलमान हो, मैं ने अभी फजर के बाद इस्लाम कुबूल किया है या मग़रिब के बाद, हज़रत तो यह भी फरमाते हैंं कि हर बच्चा सच्चे नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की सच्ची खबर के मुताबिक मुसलमान पैदा होता है, तो अब आप नव-मुस्लिम कहां हुए, आपतो पैदाईशी मुसलमान हैं, अल्हम्दू लिल्लाह 9 जून से रोज़ाना सुबह-शाम ईमान की तजदीद करता हूं, दिन रात मैं कभी-कभी बीच में भी कलमा पढ लेता हूं कि शायद अभी मौत का वक्त करीब हो।
 
अहमदः आजकल तुम कहां रह रहे हो?
मुज़म्मिलः मैं आजकल हजरत के हुक्म से सहारनपुर के एक मदरसे में पढ रहा हूं, यह तो आपके इल्म में है कि मैं अगस्त 2009 में चार महीने जमात में लगाकर आया, और कुरआन शरीफ नाज़रा और हिफज़ (कुरआन कंण्ठस्थ) सात महीने में मुकम्मल किया, 5 अप्रैल 2010 को मेरे हज़रत हमारे मदरसे में तशरीफ लाये, मेरे खत्म कुरआन की दुआ हुई, हज़रत पर इस कद्र रक्कत(रूदन, करूणा) तारी थी कि तकरीर करना मुश्किल हो गया और चालीस मिन्ट की दुआ करायी, सारा मजमा रोता रहा, हजरत ने प्रोग्राम के बाद खाना खाते हुए यह बात कही कि आज मुझे मुज़म्मिल के हिफज(कंण्ठस्थ) की जितनी खुशी हुयी, अगर अल्लाह ने बख्श दिया और जन्नत में जाना हुआ तो शायद इतनी खुशी बस उस रोज़ होगी, उसके बाद मैं ने दौर किया और अल्हम्दू लिल्लाह मैंने जमात में आदिलाबाद में वक्त लगाया, और साथियों को कुरआन शरीफ सुनाया, इस साल अल्हमदुलिल्लाह अरबी पढनी शुरू कर दी है, मैंने हज़रत से वादा किया है इन्शा अल्लाह जल्द हज़रत को आलमियत की सनद दिखानी है, सुमा इन्शाअल्लाह।

अहमदः कुरआन मजीद तो आपका अल्हम्दू लिल्लाह अब बिल्कुल पक्का हो गया है, मगर आपने बडी उम्र में हिफज किया है इस लिये याद करते रहना चाहिए।
मुज़म्मिलः हज़रत से मैंने मालूम किया था कि हमारे नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का कितना कुरआन पढने का मामूल था तो हज़रत ने बताया कि एक मन्ज़िल रोज़ाना, और बहुत से सहाबा कराम का भी आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम कि इत्तबा(अनुसरण) में इस मामूल का जिक्र आता है, मैंने ईद के बाद से तहज्जुद में एक मन्ज़िल पढना शुरू किया है, चन्द दिनों के अलावा जब मुझे डेंगू हो गया था अल्हम्दू लिल्लाह अभी तक नागा नहीं हुआ, हमारे मदरसे में सिफर घण्टे में तर्जुुमा(अनुवाद) कुरआन पढाया जाता है, अल्हम्दू लिल्लाह मुझे खासा कुरआन समझ में आने लगा है, कभी-कभी बहुत ही मज़ा आता है।
अहमदः शुरू में जब 1998 में तुम ने कलमा पढा थ तो उस वक्त तुम्हारा इरादा मुसलमान होने का था कि नहीं?
मुज़म्मिलः असल में आपको मालूम है, मैं थाना भवन के करीब एक भंगी खानदान में पैदा हुआ, हमारे खान्दान वाले गांव के चैधरियों के यहां सफायी वगैरा करते थे, मेरे पिता जी दस्वी क्लास तक पढे हुये थे, और सोसाईटी में मुलाजिम हो गये थे, मेरी मां भी पढी लिखी हैं, वह एक प्रायमरी स्कूल में टीचर हैं, उन्होंने ही मुझे पढाया, मैं बहुत जहीन था, हाई स्कूल में फ्रस्ट डवीजन पास हुआ, ग्यारहवीं में पहले मुझे शराब की लत लगी फिर और दूसरे खतरनाक नशों का आदी हो गया, और इस तरह के लडकों के साथ बुरी संगती हो गयी, उनमें एक दो मुसलमान भी थे, इण्टर पास करके मेरी मां मुझे डाक्टर बनाना चाहती थीं, मगर मैं आवारा लडकों के साथ लग गया, कुछ रफ्तार मेरी ऐसी तेज़ थी कि जिधर जाता आगे निकल जाता था। थाना भवन में एक गूजर ज़मीनदार के बेटे के साथ मेरे ताल्लुकात बढे जो नशे की वजह से बने थे, उनके यहां हज़रत एक बार नाश्ते के लिए आये थे, मैं वहां मौजूद था, हज़रत से चैधरी साहब के बडे बेटे ने मेरी मुलाक़ात करायी, तो हज़रत ने उनके बेटे जो मेरे साथी थे अल्ताफ से कहा कि अपने दोस्त की खबर लो वरना यह तुम्हें दोज़ख़ में पकड कर ले जायेगा, अल्ताफ के बडे भाई ने मझ से कहा सोहन वीर कब तक तू अछूत रहेगा, मुसलमान होजामैं ने कहा अगर मैं मुसलमान हो जाऊँगा तो मुसलमानों में मेरी शादी होजायेगी?’ उसने कहा हो जायेगी। मैं ने सोचा चलो देखते हैं, एक बार मुसलमान होकर देखते हैं अगर जमेगा तो अच्छा है वरना फिर अपने घर आजाऊँगा। मेरे पिताजी का तो शराब की लत में 45 साल की उम्र में इन्तकाल हो गया था, मेरी मां मेरी वजह से बहुत परैशान रहती थी, अल्ताफ के बडे भाई मसरूर मुझे लेकर फुलत पहुंचे, हज़रत ने मुझे कलमा पढवाया, मेरठ भेज कर मेरे कागज बनवाये और मुझे जमात के लिए दिल्ली मर्कज भेज दिया गया, हमारी जमात भोपाल गयी, हज़रत ने यह कह कर पैसे अब्बा इलयास से दिलवाये कि यह कर्ज़ है, जमात से वापस आकर तुम काम पर लगोगे तो वापस करने हैं, जब यह जैब खर्च खत्म हो गया तो मैंने अमीर साहब से कहा कि मैंने घर फोन किया था, मेरी मां बहुत बीमार है मुझे बुलाया है, अमीर साहब से सत्राह सौ रूपये लेकर मैं जमात से वापस आगया, सत्राह-सौ रूपये शराब और गोलियों वगैरा में खर्च किए और थाना भवन पहुंचा, वहां लोगों से कहा कि जमात से मुझे अमीर साहब ने भगा दिया कि तुम नव-मुस्लिम हो हमें मरवाओगे क्या? तुम्हारे घर वाले हमारे सर हो जायेंगे, यह कहा और मुझे भगा दिया, मुझे किराये के पैसे भी नहीं दिये, अल्ताफ ने हज़रत को फोन किया। हज़रत ने कहा कि हम मालूम करेंगे, ऐसा नहीं हो सकता, फिर भी अगर कोई जमात इलाके में काम कर रही हो, उसमें जोड दें, उन्होंने थाना भवन मर्कज जाकर मालूम किया तो मालूम हुआ कि कैराना के इलाके में एक अच्छी जमात काम कर रही है, मुझे जमात के एक साथी लेकर कर कैराना जाकर दूसरी जमात में जोडकर चले आये। जमात में अमीर साहब ने खर्च की रक़म अमानत के तौर पर एक मास्टर साहब के पास रख दी थी, तीन रोज़ तो मैं हिम्मत करके जमात में रहा, मगर मेरे लिए मुश्किल था कि मैं इतनी महनत करूं मैं ने रात मास्टर साहब के जवाहरकट से पैसे निकाले और फरार होगया, जब तक पैसे रहे तफरीह करता रहा और फिर फुलत पहुंचा, हजरत से बडी मुश्किल से वक्त लेकर तन्हाई में मुलाकात की, हज़रत से माफी मांगी और कहा कि पहले मेरी शादी करादें, हज़रत ने मुझे समझाया कि जब तक तुम अपने पैरों पर खडे नहीं होगे कौन अपनी लडकी देगा, तुम खुद सोचो। अगर तुम्हारी कोई बेटी हो तो तुम बेरोज़गार लडके से शादी कैसे करोगे? कुछ सबर करो, अपने हाल को बनाओ, देखो तुम्हारी जिन्दगी का यह अहम मोड है, हमें तुम से सिर्फ तुम्हारे मुस्तकबिल के लिए ताल्लुक है, तुम अच्छी जिन्दगी गुजारोगे तो खुशी होगी, मुझे बहुत समझाया मगर मेरी समझ में बात न आयी, वापस आया और दैनिक जागरण के दफतर में खतोली जाकर एक खबर बनवायीः शादी का वादा पूरा न होने पर हिन्दू जवान ने इस्लाम लौटायाऔर इस्लाम कुबूल करने का सर्टिफिकेट एक लडके के हाथ हजरत के पास भिजवा दिया और हजरत से कहलवा दिया कि इस्लाम मुझे नहीं चाहिए। घर वापस चला गया, मां मुझे देख कर बहुत नाराज हुयी, लेकिन जब मैं ने दैनिक जागरण दिखाया कि इस्लाम छोड कर आया हूं तो बहुत खुश हुयी। घर रह कर फिर वही काम मां को लूटना, शुरू में मां झेलती रही मगर एक रोज़ जब मैं ने ज्यादा नशा करके गांव के एक लडके से लडाई की तो वह बहुत परैशान होगयी और बोली बस सोहन मुझे ऐसे बेटे से अच्छा है कि मैं बगैर बेटे के रहूं, और मेरे घर से मुंह काला करके मुझे निकाल दिया, एक दो रोज़ में घर से इधर-उधर रहा, मुझे कहीं ठिकाना नहीं मिला तो मैंने हिम्मत करके हजरत को फोन किया, इत्तफाक से फोन मिल गया, हज़रत से मैं ने कहा कि में मुज़म्मिल आपका भगौडा बोल रहा हूं, हज़रत ने कहा भगौडा कौन होता, मेरा बेटा मुज़म्मिल बोल रहा है, हज़रत ने पूछाः कहां हो? मैं ने कहा मुज़फ्फरनगर, हजरत ने कहा फुलत आजाओ, मुलाकात पर बात होगी, मैं ने कहा फुलत में मुझे कौन आने देगा, हज़रत ने कहा आजाओ मैं आज फुलत में हूं, फुलत पहुंचा, हज़रत ने गले लगाया, रात को देर तक समझाते रहे, और बोले बेटा जो कुछ तुम अच्छा-बुरा कर रहे हो अपने साथ कर रहे हो, तुम हमें सत्तर बार धोका दोगे हम फखर के साथ धोका खायेंगे, और हज़रत उमर रजि. का वाकिआ सुनाया, हज़रत उमर फरमाते थे दीन के नाम पर कोई हमें धोका देगा तो हम सत्तर बार फखर से धोका खायेंगे, मुझे ज़ोर देते रहे कि तुम जमात में एक पूरा चिल्ला(चालीस दिन) लगा लो, मैं ने आमादगी ज़ाहिर की, मेरे कागजात तलाश कराये तो नहीं मिल सके, दोबारा मेरठ भेज कर कागजात बनवाये और मुझे मर्कज निज़ामुद्दीन भेज दिया गया, इस बार एक जानने वाले साथी को समझा कर मेरे साथ किया, जमात में मेरा वक्त मथुरा में लगा, नशे की आदत मेरे लिए बहुत बडा मसला था, मैं बहुत हिम्मत करता था मगर रूका नहीं जाता था, दो बार मैं ने बाहर जाकर शराब पी ली, अमीर साहब ने हजरत को फोन किया, हज़रत ने एक साहब को मुज़फ्फरनगर से नशा छुडाने की दवा ले कर भेजा, उसको खाने से नशा का मसला हल हो गया, मगर अपनी आज़ाद तबियत की वजह से मैं पूरे चिल्ले मैंने साथियों की नाक में दम रखा, मगर अमीर साहब हज़रत के एक मुरीद थे, उनसे हज़रत ने कह दिया था, अगर आपने मुज़म्मिल का चिल्ला पूरा लगवा दिया तो आपको दाई(अल्लाह की ओर निमन्त्राण देने वाला) समझेंगे वरना आप फेल होजायेंगे, उन्होंने लोहे के चने चबाये मगर जमात से वापस नहीं किया, चूंकि मेरा जे़हन बहुत अच्छा था, बिल्कुल न करने के बाद भी मैंने नमाज मुकम्मल और नमाज़े जनाजा याद कर ली, और खाने के, सोने के आदाब, मुखतलिफ दुआऐं याद कर लीं। चिल्ला लगाकर आया तो हजरत बहुत खुश हुए, अमीर साहब को बहुत मुबारकबाद दी और मुझे दिल्ली में एक जानने वाले के यहां नोकरी पर लगवा दिया, चार हजार रूपये माहाना और खाना रहना तै हुआ, रिशेप्शन पर डियूटी थी, वहां पर एक लडकी से मेरे ताल्लुकात हो गये, और मैं उसे लेकर फरार होगया, लडकी के घर वालों ने कम्पनी के मालिक और मेरे खिलाफ एफ.आई.आर. कर दी, सबको परैशान होना था, हज़रत ने किसी तरह अफसरों से सिफारिश करके केस को डील किया, लडकी एक ब्रहम्ण की थी, मैंने उसे कलमा पढवाया और इलाहाबाद लेजाकर कानूनी कार्यवाही करवाई, कम्पनी में तीन और नव-मुस्लिम काम करते थे, कम्पनी वालों ने हजरत से कहा कि इन सभी को कहीं और काम पर लगा दो, हज़रत ने कहा इनको रिज़क देने वाले अल्लाह हैं, आप जैसे कितने लोगों को अल्लाह ने इनकी खिदमत के लिए मालदार बनाया है, हज़रत उन तीनों को लेकर आगये और उसी दिन कोशिश करके उन तीनों को काम पर लगवा दिया, मेरी यह शादी ज्यादा दिन नहीं चल सकी और मैं ने उस लडकी को छ महीने बाद तलाक दे दी।
अहमदः उन दिनों आप कहां रहे?
मुज़म्मिलः मैं ने हज़रत का नाम लेकर कानपुर में एक साहब को अपना बाप बना लिया था और उनके यहां हम दोनों रहे।
 
अहमदः उन्होंने ऐसे में तुम्हें रख लिया?
मुज़म्मिलः मैं हजरत के ताल्लुक के लोगों को निगाह में रखता था, हज़रत से कोई मिलने आया फोरन फोन नम्बर ले लिया, एक दो फोन खेरियत और दुआ के लिए करता था। हज़रत भी बेटा-बेटा उनके सामने करते थे, लोग समझते कि यह हज़रत का बहुत खास है, बस मेरा काम निकलता रहता था।
 
अहमदः इस तरह अन्दाज़न तुमने कितने लोगों से पैसे ऐंठे होंगे?
मुज़म्मिलः लाखों रूपये मैं ने हज़रत के ताल्लुक से लोगों से वसूल किए और सैंकडों ऐसे लोग होंगे जिन से मैं ने फायदा बल्कि हकीकत में नुक्सान उठाया, दसियों मामले तो आपके सामने भी आये, दो बार आपने, एक बार शुऐब भाई ने मुझे फुलत से भगा दिया, आपने तो वार्निंग दी थी कि आज के बाद तुम्हें फुलत में देखा तो अपनी मोजूदगी में मुंह काला करके निकाल दूंगा।
 
अहमदः उस लडकी का क्या हुआ?
मुज़म्मिलः उसका इस्लामी नाम मैंने आमना रखा था, घर वाले उसे मारना चाहते थे, तलाक के बाद उसके लिए फुलत के अलावा कोई जगह नहीं थी, हजरत के पास वह पहुंची, हज़रत ने उसको मेरठ के किसी मदरसे में भेजा, कुछ रोज पढाया, इद्दत का वक्त गुज़रने के बाद गाजियाबाद के एक जानने वाले के बेटे से उसकी शादी कर दी।
 
अहमदः उसके बाद क्या हुआ?
मुज़म्मिलः मुझ पर एक बहुत शातिर शैतान सवार था, रोज-रोज नये खेल सुझाता था, मैं ने हज़रत से कुछ बडी रकम ऐंठने की सोची। मैंने मुज़फ्फरनगर इन्टेलीजेंस के दफतर में सम्पर्क किया और वहां एक राजपूत इन्सपेक्टर से दोस्ती कर ली, और कहा फुलत में धर्म बदलवाने का काम होता है, और बडी रकम उनके पास बाहर से आती है
 
अहमदः क्या तुम समझते हो कि एकसा है?
मुज़म्मिलः मुझे खूब मालूम है कि हज़रत का मिजाज़ तो यहां के लोगों से भी चन्दा करने का नहीं है, बस वैसे ही शैतानी में मैंने ऐसा कहा, मैं ने कहा कि मैं वहां से आपको बडी रक़म दिलवा सकता हूं, मगर उसमें से 25 पतिशत मुझे देना होगा, वह तैयार हो गये। उन्होंने एक आई.बी. कारकुन को जिस का पांव एक हादसे में कट गया था, मेरे साथ भेजा, और एक और साथी को साथ लिया, मैं तो रास्ते में रूक गया और उनको वहां भेज दिया, अब्बा इलयास साहब और मास्टर अकरम का पता बता दिया, वह दोनों फुलत पहुंचे कि हम मुसलमान होना चाहत हैं, हज़रत तो नहीं मिले, मास्टर अकरम के पास गये, उनसे बातें हुयीं, उन्होंने मौलाना उमर साहब से उनको मिलवाया, महमूद भाई भी आ गये, उन्होंने उनको इस्लाम का तार्रुफ(परिचय) करवाया और बताया कि हम लोग तो पैसे लेकर मुसलमान करते हैं, हम तो कलमा पढवाकर इस्लाम देते हैं, इसके लिए कोई रक़म देने या शादी वगैरा का किया तुक है, हमारे यहां तो अगर आप सर्टीफिकेट लेंगे तो पांच सौ रूपये फीस है, वह देनी पडेगी, हम आपको मदरसे की रसीद देंगे, यह लोग और बहसें करते रहे, वहां पर कुछ मिला नहीं तो मायूस होकर वापस आये, मुझ पर बहुत बरसे, वहां से किताब आपकी अमानत-आपकी सेवा मेंलेकर आये, उसको पढकर बहुत मुतास्सिर थे, मैंने कहा इतनी आसानी से बात बनने वाली नहीं, वह मेरे इसरार पर दो-तीन बार गये, कुछ हाथ नहीं आया, उन्होंने मुझे धमकाया कि तुम्हारे खिलाफ मुकदमा बना देंगे, मैं मायूस वापस आया, फिर मैंने बजरंग दल और शिव सेना वालों को भडकाने की कोशिश की, शिव सेना वालों ने फुलत कहलवाया भी कि फुलत वाले यह धर्म बदलवाने का काम या तो बंद कर दें वरना हम इन्तज़ाम करेंगे, हज़रत ने उनके पास साथियों को भेजा, और उनसे काम का तार्रुफ कराया और दफतर वालों से फुलत आने को कहा, बारी-बारी वह लोग आते रहे और फिर मामला ठण्डा हो गया।
अहमदः इसके बाद एक बार पुरकाज़ी में भी तो आपने शादी की थी?
मुज़म्मिलः हज़रत के ताल्लुक के एक काज़ी जी से मैं ने बहुत रो-रो कर अपना हाल सुनाया और उनसे कहा कि मैंने हज़रत को बार-बार न चाहते हुए भी धोका दिया, अब मैं उस वक्त तक हज़रत को मुंह नहीं दिखाना चाहता जब तक एक अच्छा मुसलमान न बन जाऊँ, काज़ी जी ने मुझ पर तरस खाकर मुझे अपने घर रख लिया, उनके यहां कोई औलाद नहीं थी, मैं उनकी दुकान पर बैठने लगा, उन्होंने बिजनौर जिला के एक गांव में अपने रिश्तेदारों में मेरी शादी करा दी बेचारों ने खुद ही शादी वगैरा के इन्तज़ामात किए।
 
अहमदः उन्होंने आपके बारे में तहकीक नहीं की?
मुज़म्मिलः उन्होंने हज़रत से मालूम किया था, हज़रत ने कहा हम दाई(अल्लाह की ओर निमन्त्राण देने वाला) हैं, और दाई तबीब(हकीम) होता है, आखरी सांस तक मायूस होना उसूले तिब(चिकित्सा) के खिलाफ है, कोशिश किजिए, क्या खबर अल्लाह ने उसकी हिदायत आपके हिस्से मेें लिखी हो।
 
अहमदः उसके बाद क्या हुआ? उस लडकी को भी आपने तलाक़ दे दी है?
मुज़म्मिलः बस आठ महीने में उसके घर वालों का और काज़ी जी के सारे खान्दान का नाक में दम करके, मार-पीट कर तीन तलाक़ देकर भाग आया।
अहमदः उसके बाद क्या हुआ?
मुज़म्मिलः में दर-बदर भटकता रहा, उस दौरान एक बार हिम्मत करके फुलत पहुंचा, मास्टर इस्लाम मुझे मिल गये, हज़रत तो नहीं थे, उन्होंने मुझे डराया, बहुत बुरा-भला कहा कि तूने सब लोगों का एतिमाद खत्म कर दिया, हर नव-मुस्लिम मुहाजिर से यहां के लोग बद ज़न(कुधारणा, बुरे खयाल वाले) हो गये हैंं। मैं उनसे बहुत लडा और चला आया। कई बार गलत लोगों के साथ लगा, दो बार दो-दो महीने के जेल में भी रहा। हजरत के किसी जानने वो ने ज़मानत करायी, अल्लाह का शुक्र है कि जिन लोगों ने मुकदमा कराया था हजरत की सिफारिश से उन्होंने वापस ले लिया। जेल में अल्बत्ता मैंने दो लोगों का कलमा पढवाया, हजरत सब लोगों से कहते थे कि देखो उसकी वजह से पांच लोग जेल में और एक ब्राहम्ण की लडकी आमना मुसलमान हुयी, अब उनकी नस्लों में क्यामत तक कितने लोग मुसलमान होंगे, अब अगर यह हमारी जिन्दगी को जेलखाना भी बना दे तो हमने महनत वसूल कर ली।
मुज़म्मिलः सब घर वाले और ताल्लुक वाले तुम्हारी वजह से अबी (मौलाना मुहम्मद कलीम सिद्दीकी) से बहस भी करते थे, अबी अक्सर, बिगडे हुए लोगों और नव-मुस्लिमों के लिए कहते हैं कि जैसे रूह वैसे फरिश्ते, नेक लोगों के पास नेक लोग आते हैं, बदों के पास बद आते हैं, हम फासिक़ और फाजिर धोकेबाज़ ढोंगियों के पास पाकबाज़ और नेक लोग कहां रहने लगे, देखो शराबियों के पास शराबी, जुआरियों के पास जुआरी जमा होत हैं, हम जैसे बदकारों के पास कहां नेक लोग जमा होने वाले हैं, अम्मी जान का इन्तकाल हुआ तो फरमाने लगे कि अम्मीजान नहीं रहीं तो हमें कैसी कमी महसूस हो रही है, हालांकि अपने घर के सारे अज़ीज़ भाई-बहन बीवी-बच्चे मौजूद हैं, यह बेचारे नव-मुस्लिम इनका कोई भी नहीं, अपना सगा बेटा कितना ऐबों में फंस जाता है, कभी किसी से जिक्र भी नहीं करता, न घर से निकालता है, यह बेचारे दर-बदर फिरते हैं, ज़रा-सी बात इनसे हो जाये तो लोग इन्हें निकाल देते हैं, पुराना मुसलमान सारे ऐब करे तो कोई खयाल नहीं, यह कल का मुसलमान सोचते हैं कि फरिश्ता बन जाये और सब धुतकारते हैं, यह कह कर अबी बार-बार रोने लगते हैं।
मुज़म्मिलः एक रोज़ जब में पिछली बार आया था, तो हज़रत से मिला तो मैं ने यह भी कहा कि आपने मुझे इतनी बार बुरी हरकत करने के बावजूद बार-बार मौका दिया, हज़रत ने फरमाया कि मुझ से बुरी हरकत कौन करने वाला होगा, मेरे बेटे तुम मुझ से तो हज़ार दर्जे बहतर हो, बस अल्लाह ने मेरे ऐब छुपा रखे हैं।
 
अहमदः इस दौरान तुम कितनी बार जमात में गये?
मुज़म्मिलः इन बारा सालों में मुझे सत्राह बार जमात में भेजा गया, एक बार चिल्ला(चालीस दिन) और आखिर में तीन चिल्ले तो पूरे किए, वरना धोका देकर भागता रहा, उसी जमाने में मुझे 21 बार काम से लगाया, या कारोबार कराया, मगर मैं कोई काम करने के बजाये धोका देता रहा।
 
अहमदः अब तुम्हारे दिल में वह बातें नहीं आतीं?
मुज़म्मिलः अल्हम्दू लिल्लाह नहीं आतीं, मुझे ऐसा लगता है वह शैतान जो मुझ पर सवार था वह मेरे हजरत की बरकत से मुझे छोडकर चला गया है, 2 मार्च 2009 को फुलत के एक साहब ने मेरी एक हरकत पर मुझे बहुत मारा, हजरत सफर से रात को देर से तशरीफ लाये, सुबह दस बजे मुझे देखा, मेरा पूरा जिस्म जख्मी था, हज़रत मुझे पकड कर जामा मस्जिद ले गये, मस्जिद जाकर दो रकात नमाज़ पढी, और मुझे देखते रहे और बार-बार चूमते रहे, मेरे बेटे कब तक तुम ऐसी जिल्लत बर्दाशत करते रहोगे, और अगर इसी तरह रहे तो फिर दोज़ख की मार किस तरह सहोगे, चलो आओ अल्लाह से दुआ करें, बहुत देर तक दुआ की, मैं आमीन कहता रहा, फिर बोले मुज़म्मिल आओ दोनों सच्चे दिल से तौबा करें बस, ऐसी तौबा जिसके बाद लौटना न हो, मुझे तौबा करायी, ईमान की तजदीद करायी, और मुझसे वादा लिया कि बस अब मुसलमान दाई बनकर मेरी इज़्ज़त की लाज रखोगे, और सबको दिखा दोगे कि इन्सान कभी भी अच्छा बन सकता है, मैंने वादा किया अगले रोज चार महीने की जमात में चला गया, और अल्हम्दू लिल्लाह जमात में दाढी रखी और खूब दुआ का अहतमाम किया, हज़रत ने जमात से वापस आकर काम पर लगने को कहा, मैं ने हाफिज आलिम बनने की खाहिश का इजहार किया, दाखिला होगया, अल्हम्दू लिल्लाह हिफज मुकमल होगया, इन्शा अल्लाह बहुत जल्द आलमियत का निसाब मुकमल कर लूंगा, मेरा इरादा है कि आलमीनी दाई बनूं, इसके लिए एक घण्टे मैं ने अंग्रेजी अच्छी करने के लिए पढनी शुरू कर दी है, अल्हम्दु लिल्लह इस वक्फे में मेरे मदरसे में सब लोग खसूसन असातजा और जिम्मेदार मुझे बहुत चाहते हैं बल्कि मुझ से दुआ कराते हैं।
 
अहमदः माशा अल्लाह, अरमुगान के पाठकों के लिए कोई सन्देश दें?
मुज़म्मिलः बस हजरत की बात ही कहूंगा कि हर मुसलमान एक दाई है और हर दाई एक तबीब है, किसी मरीज से आखरी सांस तक मायूस होना या मर्ज के बुरा होने की वजस से मरीज को अपने दर से धुतकारना उसूले तिब के खिलाफ है, हर इन्सान अल्लाह की बनायी हुयी शाहकार मखलूक है इसको अहसन तक्वीम पर अल्लाह ने अपने हाथों से बनाया है, उस से मायूस नहीं होना चाहिए, बस उसके लिए दिल में दर्द रख कर उसके इस्लाह और उसे दावत देने की फिकर रखनी चाहिए, शायद मुझसे ज्यादा बुरा इन्सान तो अल्लाह की ज़मीन में कोई और हो? जब मैं अपने लिए इन्सान बनने का इरादा करके यहां तक आ सकता हूं तो किसी से भी मायूस होने की क्या वजह है, दूसरी दरखास्त पाठकों से दुआ की है, कि अल्लाह ताला मौत तक मुझे इस्तकामत अता फरमाये और मेरे हज़रत ने जो मुझ से अरमान बनाये हैं और हज़रत फरमाते भी हैं कि मेरी हसरत है कि मुज़म्मिल अल्लाह ताला तुम्हें प्यारे नबी के आंखों की ठण्डक बनाये, मेरी तमन्ना है कि अल्लाह ताल मुझे प्यारे नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की आंखों की ठण्डक बनायें।
 
अहमदः शुक्रिया भाई मुज़म्मिल! वाकई एक ज़माना था कि तुम्हारा नाम सुनकर हम सभी को गुस्सा आ जाता था, मगर अल्हमदू लिल्लाह अब तुम से मिलने की बेचैनी रहती है।
मुज़म्मिलः जी अहमद भाई! मैं इसी लायक़ था और हूं, बस मेरे अल्लाह का करम है कि उसने दिल का रूख मोड दिया है।
 
अहमदः शादी के बारे में तुम्हारा क्या इरादा है?
मुज़म्मिलः अब शादी मेरे लिए कोई बात नहीं रही, अल्हम्दू लिल्लाह मेरे अल्लाह ने मेरे दिल अपनी तरफ फेर दिया है, अब मुझे खिलवत में अपने रब के हुजूर राज़ और नियाज़ का मज़ा मेरे रब ने मुझ गन्दे को लगा दिया है, कुरआन यह कहता है ‘‘इन कुरआन अल्फजर कान मशहूदा’’ सुबह का कुरआन मजीद तो आमने सामने का है, बस ऐसे जमील महबूब से सामना होने लगे तो सारी हसीनायें अन्धेरा लगती हैं, अल्हम्दू लिल्लह मेरे अल्लाह के करम से नाला नीम शबी की बादशाहत मेरे अल्लाह ने मुझे अता फरमादी है, इसकी वजह से हर एक के सामने हाथ फैलाने से मेरे अल्लाह ने मुझे बचा लिया है।
 
अहमदः आजकल अखराजात वगैरा किस तरह चल रहे हैं?
मुज़म्मिलः अल्लाह के करम से नाला नीम शबी की बादशाहत ने दिल को मालादार कर दिया है, इसकी बरकत से हाथ फैलाने से अल्लाह ने बचा लिया है, अल्हम्दू लिल्लाह अब मुझे खर्च की ज़रूरत नहीं, मैं छुटटी में मज़दूरी कर लेता हूं, मैंने इम्तिहान की छुटटी में मज़दूरी की, और एक हज़ार रूपये हज़रत की खिदमत में हदिया किए, कब से हज़रत आपको लूटता रहा यह हकीर हदिया कबुल कर लिजिए, हजरत ने बहुत गले लगाया और बडी कद्र से कुबूल कर लिया, अब हाथ ऊपर कर लिया है और अल्लाह से सवाल किया है कि अल्लाह अब किसी के आगे हाथ न फैलवायें, मुझे उम्मीद है कि अल्लाह ताला अब किसी का मोहताज न करेंगे।
अहमदः अच्छा बहुत शुक्रिया। अस्सलामु अलैकुम
मुज़म्मिलः वालैकुमुस्सलाम व रहमतुल्लाही वबरकातुह
with thanks

मार्च 2011, उर्दू मासिक 'अरमुगान' 

www.armughan.in

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