Thursday, April 21, 2011

बनारस विस्फोट 2010 और मीडिया ट्रायल, भाग 2

लगभग सभी समाचार पत्रों में यह खबर भी छपी थी कि गाँव में प्रवेश करने वाले वाहनों को देख कर ग्रामवासी सहम जाते हैं। शायद पत्रकार बन्धुओं ने इसका अर्थ यह निकाला कि ए0टी0एस0 या किसी सुरक्षा एजेंसी के लोगों के आने की आशंका को लेकर सन्देह और भय के कारण ऐसा होता है। परन्तु इस असहजता का एक बड़ा कारण आरोपी युवकों और गाँव के प्रति स्वयं मीडिया का रवैया भी रहा है। ग्रामवासियों में यह आम धारणा है कि पत्रकार बन्धु कितनी ही लुभावनी और सहानुभूतिपूर्ण बातें करें पर छपने वाले समाचार एक पक्षीय और समुदाय विशेष के लोगों की छवि को धूमिल करने वाले ही होते हैं।
बनारस धमाके के बाद जब कुछ पत्रकारांे ने ए0टी0एस0 वालों से गाँव में आने के बाबत सवाल किया तो कई लोगों ने उन्हें बताया कि मंगलवार 7 दिसम्बर को दिन में 10-11 बजे के बीच चार से पाँच अज्ञात लोग जो किसी एजेन्सी से सम्बन्धित लगते थे संजरपुर बाजार में घूमते हुए देखे गए थे। उनके पास कुछ फोटो भी थे। परन्तु किसी समाचार पत्र ने बनारस धमाके से पहले इन अज्ञात लोगों की गतिविधियों का समाचार नहीं प्रकाशित किया। बटाला हाउस काण्ड के बाद से कई अवसरों पर ऐसे समाचार प्रकाशित हुए जो मनगढ़ंत, घोर आपत्तिजनक और वास्तविकता से कोसों दूर थे। गाँव के लोग उस समाचार को अब भी नहीं भुला पा रहें हैं जिसमें कहा गया था कि आतिफ और सैफ के बैंक खातों से बहुत ही अल्प अवधि में तीन करोड़ रूपयों का लेन देन हुआ है। हालाँकि यह समाचार बिल्कुल ही निराधार और झूठा था और इस आशय का प्रमाण भी पत्रकारों को दिया गया परन्तु किसी ने अब तक इसका खण्डन नहीं किया। शायद इन्हीं कारणों से पत्रकार ग्रामवासियों का विश्वास नहीं जीत पा रहें हैं और ग्रामवासी जब उन्हें देखकर असहज होते हैं तो पत्रकार उसका अलग अर्थ निकालते हैं......................।
ये वे समाचार थे जिन्हें देखा और परखा जा सकता है तथा इनकी सत्यता को प्रमाणित भी किया जा सकता है इसी वजह से हमने इन्हें तथ्यात्मक समाचारों की श्रेणी में रखा है। परन्तु आश्चर्य की बात है कि इनमें स्पष्ट भिन्नता मौजूद है जिसे बहुत आसानी के साथ महसूस किया जा सकता है। दूसरी ओर वे समाचार हैं जिनका सम्बन्ध घटना के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों और उनके संगठन से है। यह जाँच का विषय है और जब तक कोई स्पष्ट संकेत न मिल जाय कोई भी समाचार सम्भावना और अनुमान की परिधि से बाहर नहीं जाना चाहिए। परन्तु समाचार माध्यमों ने इस लक्ष्मण रेखा को बार-बार पार किया है। वाराणसी धमाके के बाद भी आई0एम0 संजरपुर और आजमगढ़ को लेकर जिस तरह भावनात्मक समाचारों का प्रकाशन देखने को मिला वह बटाला हाउस काण्ड के पश्चात शुरू हुए मीडिया ट्रायल के विस्तार जैसा लगता है। 7 दिसम्बर को लगभग साढ़े 6 बजे
दशाश्वमेध घाट पर विस्फोट होता है। कथित रूप से आधे घंटे के बाद 7 बजे शाम को घटना की जिम्मेदारी लेने वाले आई0एम0 का ईमेल आता है। इसी ईमेल के आधार पर मुम्बई पुलिस आयुक्त संजीव दयाल की पत्रकार वार्ता के अंश सभी समाचार पत्रों में घटना के तीसरे दिन 9 दिसम्बर को प्रकाशित हुए जिसमें उनका कहना था............. बनारस धमाके की जिम्मेदारी लेने वाले आई0एम0 के आका इकबाल भटकल और रियाज भटकल पाक में हैं (हिन्दुस्तान 9 दिसम्बर पृष्ठ नं0 1)।........... लेकिन निश्चित तौर पर इण्डियन मुजाहिदीन के मुख्य खिलाड़ी पाकिस्तान में बैठे हैं और वहीं से आतंक का खेल चला रहे हैं। यह पूछने पर कि मुख्य खिलाड़ी से उनके क्या मायने हैं? दयाल ने कहा निश्चित तौर पर भटकल बन्धुओं से (अमर उजाला 9 दिसम्बर पृष्ठ नं0 6)। मुम्बई पुलिस आयुक्त का इण्डियन मुजाहिदीन और भटकल बन्धुओं पर इस आरोप का आधार आई0एम0 द्वारा भेजा गया ई-मेल था। हालाँकि ई-मेल जाँच की दिशा को भटकाने के लिए भी भेजा जा सकता है। इस पर हम बाद में चर्चा करेंगे, पहले घटना से सम्बन्धित अन्य समाचारों पर, जिनका सिलसिला विस्फोट के अगले दिन से ही शुरू हो गया, इण्डियन मुजाहिदीन का ई-मेल उसका स्रोत नहीं हो सकता।
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दिसम्बर को लगभग साढ़े 6 बजे शाम को विस्फोट के बाद समाचार पत्रों के प्रकाशन में मुश्किल से चार घण्टे का समय रह जाता है। चारांे ओर अफरा-तफरी और अफवाहांे का माहौल है। इण्डियन मुजाहिदीन के ई-मेल के अलावा कोई दूसरा सुराग नहीं है और उस ई-मेल की प्रमाणिकता की जाँच अभी होना बाकी है। घटना स्थल पर कोई अवशेष न पाए जाने के कारण जाँच का रुख भी तय नहीं हो पा रहा है ऐसी स्थिति में जब कि समाचारों के प्रकाशन में चार घण्टे से भी कम समय है, फिर भी अगले दिन के समाचार पत्रों में घटना को अंजाम देने वाले सम्भावित कई संगठनों का नाम आया, उस में इण्डियन मुजाहिदीन के साथ आजमगढ़ की ओर भी उँगली उठाई गई। खास बात यह है कि उन्हीं संगठनों को शक के दायरे में रखा गया जिनसे मुस्लिम समुदाय पर ही आरोप आता हो। ................... वैसे तो हाल फिलहाल अधिकारी हूजी और सिमी पर शक कर रहे हैं परन्तु इसमें लश्कर के हाथ होने का भी सन्देह है (हिन्दुस्तान 8 दिसम्बर पृष्ठ नं0 15)। उसी दिन के दैनिक जागरण में आजमगढ़! पूर्वांचल (पृष्ठ 7) पर दो बड़ी खबरें छपीं। एक का शीर्षक है, ‘‘आतंकियों का ठिकाना रहा है आजमगढ़’’ और दूसरे का (शक की सुईं जनपद के फरार आतंकियों पर) पत्र आगे लिखता है..................... रात 9 बजे जिन संदिग्ध लोगों को पुलिस ने वाराणसी मंे हिरासत में लिया हैं और जो कागजात उनके पास से मिले हैं, उससे यह आशंका और मजबूत हो गई है कि विस्फोट के तार आजमगढ़ से जुड़े हैं। सूचनाओं के बाद ए0टी0एस0 की एक टीम आजमगढ़ के लिए रवाना हो चुकी है। अमर उजाला की उसी दिन पृष्ठ नं0 14 पर हेड लाइन है-छः आतंकी अब भी फरार, कचहरी ब्लास्ट के आरोपी हैं दो आतंकी, इसी के साथ पिछले कुछ धमाकों और आजमगढ़ के गिरफ्तार और लापता युवकों की खबरें भी हैं। परन्तु उन धमाकांे का उल्लेख कहीं नहीं किया गया है जिनमें पहले सिमी. या हूजी जैसे संगठनों पर आरोप लगा था और अन्धाधुन्ध तरीके से मुस्लिम युवकों को गिरफ्तार भी किया गया था लेकिन बाद में अभिनव भारत, सनातन संस्थान तथा संघ व उससे जुड़े अन्य संगठनों के सदस्यों के नाम प्रकाश में आए। उनमें से कई अब जेल में हैं और कई लापता। एक समाचार और, जो प्रमुखता से सभी समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ वह था भाजपा के बनारस बन्द का। भाजपा की यह प्रतिक्रिया जिस तीव्रता के साथ आई उससे ऐसा प्रतीत होता है जैसे वह इसके लिए पहले से तैयार थी। इतने कम समय में घटना की पूरी जानकारी जुटा पाना आसान नहीं वह भी आतंकी विस्फोट जैसे गम्भीर मुद्दे पर।

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मसीहुद्दीन संजरी
क्रमश:

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