Thursday, April 21, 2011

बनारस विस्फोट 2010 और मीडिया ट्रायल, भाग 5


यदि मक्का मस्जिद में ठीक जुमा की नमाज के समय हुए धमाकों का आरोप मुस्लिम युवकों पर आ सकता है और उनकी गिरफ्तारी भी हो सकती है। अजमेर शरीफ दरगाह में रमजान के महीने में अफ़्तार के समय हुए धमाके के आरोप में मुस्लिम नौजवानों को हिरासत में लिया जा सकता है। मालेगाँव जैसे मुस्लिम बाहुल्य नगर मंे आतंकी विस्फोट के बाद उसी समुदाय के लोगों को मुल्जिम बनाया जा सकता है तो दशाश्वमेध घाट पर हुए आतंकी विस्फोट मंे पहले की आतंकी वारदातों में शामिल हिन्दू संगठनों को शक के दायरे से बाहर रखने का औचित्य क्या है? वाराणसी घटना के बाद एक बार भी किसी ऐसे संगठन के सम्बन्ध में कोई भी खबर प्रकाशित नहीं हुई जिसमें उन पर शक की बात कही गई हो। अब इस बात को स्वीकार किया ही जाना चाहिए कि आतंकवाद की कोई आस्था नहीं होती। आतंकवादी न ही हिन्दू होता है न मुसलमान। वह सिर्फ आतंकवादी होता है। नफरत फैलाना और मासूमों का खून करना ही उसका मकसद होता है वह यह काम मस्जिद-मन्दिर, मधुशाला या बाजार कहीं भी कर सकता है।
किसी आतंकवादी घटना के पश्चात् मीडिया के, एक ही समुदाय से जुड़े संगठनों के प्रति आक्रामक रवैये के पीछे सबसे महत्वपूर्ण भूमिका सुरक्षा एजेंसियों, खुफिया विभाग, स्वयं मीडिया से जुड़े साम्प्रदायिक मानसिकता के लोग और मीडिया के बाजारवादी सिद्धान्त के साथ-साथ धु्रवीकरण की राजनीति भी है। मक्का मस्जिद हैदराबाद, अजमेर शरीफ दरगाह और मालेगाँव धमाकों के तुरन्त बाद भी इस प्रकार का माहौल बनाया गया था। समझौता एक्स0 धमाकों के रहस्यों पर से पर्दा उठने के बाद तो अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत को शर्मिन्दगी का सामना करना पड़ रहा है। इन सभी धमाकों में मुस्लिम युवकांे को आरोपी बनाकर षड्यंत्रों का खुलासा कर लेने का दावा किया गया था। गवाह और सुबूत होने की बात भी कही गई थी। निश्चित रूप से सुरक्षा एवं खुफिया एजेंसियों में बैठे साम्प्रदायिक मानसिकता के लोगों का उन्हें भरपूर सहयोग प्राप्त था। महाराष्ट्र ए0टी0एस0 प्रमुख के0पी0 रघुबंशी पर कर्नल पुरोहित और प्रज्ञा सिंह ठाकुर को बचाने का आरोप लगता रहा है। आतंकी विस्फोट के आरोप में गिरफ्तार कर्नल पुरोहित से उनकी घनिष्टता भी कोई ढकी छुपी बात नहीं रह गई है। गुजरात में पुलिस कमिश्नर बंजारा समेत कई अधिकारी फर्जी मुठभेड़ में आतंकवादी बताकर मुस्लिम युवकों और युवतियों की हत्या करने के आरोप में गिरफ्तार हो चुके हैं। यदि सघन जाँच की जाए तो यह सूची काफी लम्बी हो सकती है। निःसन्देह उच्चतम स्तर पर इस तिकड़ी को राजनैतिक समर्थन भी प्राप्त था। कर्नल पुरोहित और प्रज्ञा ठाकुर एण्ड कम्पनी की गिरफ्तारी के बाद संघ और भाजपा ने बहुत तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी। स्वर्गीय हेमन्त कर्करे की खुलेआम आलोचना ही नहीं की गई बल्कि प्रत्यक्ष रूप से जाँच को प्रभावित करने की गरज से उन पर दबाव भी डाला गया। हिन्दूवादी संगठनों की तरफ से उन्हें मुसलसल धमकियाँ भी मिलती रहीं। सभी मुसलमान आतंकवादी नहीं पर सभी आतंकवादी मुसलमान जरूर हैं जैसे बयान देने वाले भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी जी के गुस्से को शान्त करने के लिए प्रधानमंत्री के सलाहकार ने उनसे मुलाकात भी की थी। यह सारी कवायद इसलिए थी कि असली आतंकवादी को कानून के शिकंजे से बाहर निकालकर आरोप मुस्लिम युवकों पर ही बना रहे और पूरे मुस्लिम समुदाय को दानव के रूप में प्रस्तुत कर हिन्दुओं में असुरक्षा की भावना को जागृत किया जाए। इस प्रकार राजनैतिक धु्रवीकरण के लिए वातावरण तैयार किया जा सके। वाराणसी विस्फोट के बाद जिस तरह से इण्डियन मुजाहिदीन, डा0 शाहनवाज व असदुल्ला के साथ अन्य संगठनों का नाम बार-बार लिया गया, चाहे वे
अधिकारियों व खुफिया सूत्रों के हवाले से हांे या मीडिया में मौजूद साम्प्रदायिक मानसिकता के लोगों की अपने दिमाग की उपज। वाराणसी विस्फोट के बाद उसी प्रकार का वातावरण निर्मित करने की कोशिश की गई, इससे यह सन्देह अवश्य पैदा होता है कि कहीं फिर वही कहानी दुहराने का षड्यन्त्र तो नहीं रचा जा रहा है जो इससे पूर्व हैदराबाद, अजमेर, मालेगाँव और समझौता एक्स0 धमाकों के बाद किया गया था और इन्हीं धमाकों में संघ के प्रचारक इन्दे्रश कुमार जैसे लोगों के शामिल होने के समाचारों से जनता का ध्यान हटाने की साजिश हो रही है।

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मसीहुद्दीन संजरी
समाप्त

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