Wednesday, April 13, 2011

हठयोग के चमत्‍कार: लिंग के द्वारा 80 किलो का पत्‍थर उठाना ।



करतब दिखाता हुआ एक नागा बाबा
अभी कल एक ब्‍लॉग पर एक विद्वान का कमेंट पढ़ने को मिला, जिसमें उन्‍होंने हठयोग के द्वारा लिंग से पत्‍थर उठाने का जिक्र किया है। यह बात ऐसे व्‍यक्ति द्वारा कही गयी है जो स्‍वयं को विज्ञान संचारक कहलाना पसंद करते हैं। धन्‍य है हमारे देश के विज्ञान संचारक, जो अब विज्ञान की तो कम बातें करते हैं, पर धर्म से जुड़ी हुई प्रवृत्तियों को विज्ञान सम्‍मत सिद्ध करने में ज्‍यादा रूचि रखते हैं। 

जैसा कि हम जानते हैं कि हमारे देश में हठयोग के नाम पर आदिकाल से लोगों को मूर्ख बनाया जाता रहा है। लेकिन जैसे-जैसे ज्ञान का विकास होता गया, वैसे-वैसे मनुष्‍य तथाकथित चमत्‍कारों और दिव्‍य शक्तियों का भंडा फोड़ता चला गया। इस दिशा में बी0 प्रेमानन्‍द का नाम विशेष रूप से उल्‍लेखनीय है। 

बी0 प्रेमानन्‍द 26 पुस्‍तकों के लेखक हैं, वे प्रादेशिक संस्‍थाओं द्वारा आयोजित विज्ञान यात्राओं के अध्‍यक्ष हैं, जिनके कारण वे भारत के सात हजार शहरों और गांवों में जा चुके हैं, जहां उन्‍होंने लगभग दो करोड़ व्‍यक्तियों को व्‍याख्‍यान दिया है। वे वर्कशाप का भी आयोजन करते हैं, जिसमें वे 150 चमत्‍कारों को दिखा कर उनका विश्‍लेषण करते हैं और देवताओं, धर्म के चमत्‍कारों के इतिहास पर प्रकाश डालते हैं।  

बी0 प्रेमानन्‍द
उन्‍होंने 'विज्ञान बनाम चमत्‍कार' पुस्‍तक में ऐसे सैकड़ों चमत्‍कारों की असलियत बताई है, जिन्‍हें देखकर व्‍यक्ति अभिभूत हो जाता है। इसी पुस्‍तक के पृष्‍ठ 53 पर एक नागा बाबा द्वारा श्श्नि के सामने की खाल द्वारा 35 किलो का पत्‍थर उठाने और उसके रहस्‍य पर प्रकाश डाला गया है। उन्‍होंने लिखा है:

हाल ही के एक कुंभ मेले में एक नंगे नागा बाबा अपने श्श्नि कीत्‍वचा पर खूंटे से 35 किलो का पत्‍थर लटकाकर जुलूस में चल रहे थे। यह दृश्‍य दूरदर्शन और अधिकतर समाचारपत्रों और पत्रिकाओं में चित्रित किया गया। साक्षात्‍कार के दौरान उन्‍होंने इसआश्‍चर्यजनक कार्य का श्रेय अपनी योगशक्ति और ब्रह्मचर्य को दिया। वास्‍तव में इस योग का ब्रह्मचर्य से कोई सरोकार नहीं है। शिश्‍न कीऊपरी खाल80किग्रा तककावजन उठाने की क्षमता रखती है। पर बाबा ने तो डर के मारे 35 किलो का ही भर उठाया था। 

दक्षिण भारत के मंदिरों में भिक्षुकों द्वारा खाल छेद कर पूरे शरीर पर नींबूं फल और सब्जियां सिल लेना, आम दृश्‍य हैं। केरल के एक मंदिर में प्रचारक अपनी पीठ पर दो खूंटे बांध कर अपने को डंडे से लटका लेता है। इसी प्रकार कुछ लोग पीठ पर खूंटे सिल करदेवताओं के रथ खींचते हैं। अन्‍य लोग त्रिशूल द्वारा जीभ और गाल छेद डालते हैं। 

मुसलमान फकीर अपनी गर्दन, पेट छाती को तलवारों से जख्‍मी करते हैं। इन विकट और भयंकर चमत्‍कारों को देखकर लोग भयग्रस्‍त हो कर श्रद्धा से भर उठते हैं। पर क्‍या ये वास्‍तव में चमत्‍कार हैं ये किसी भी साहसी व्‍यक्ति द्वारा बहुत कम पीड़ा सह कर दिखाए जा सकते हैं। 

आगे प्रेमानन्‍द इन क्रियाओं के रहस्‍य को स्‍पष्‍ट करते हुए लिखते हैं कि दर्द की संवेदना तभी मालूम होती है जब दर्द के लक्षण का संकेत मस्तिष्‍क तक पहुंचता है। इसी प्रकार एनस्‍थीसिया द्वारा दर्द रहित शल्‍यक्रिया की जाती है। त्‍वचा को नोचने से वहां की शिराएं सुन्‍न पड़ जाती हैं और दर्द की संवेदना मस्तिष्‍क तक नहीं पहुंचती है और बाहरी त्‍वचा, बिना फटे आसानी से वजन उठा लेती है। यही इस तरह के चमत्‍कारों का एक मात्र राज है।

1 comment:

  1. premanand ji shalya kriya se dard to nahi hoga ye bat thik he par ling me itni takat kaha se aa jayegi ki vah 35 kilo ka bhar dho sake usme khichav nahi hoga kya . ye sab chije yog kriya se sampann hoti he jo aap kar pane me asafal ho gay the

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