Tuesday, April 12, 2011

अन्ना हजारे का सांप्रदायिक लोकपाल बिल


क्या हम ऐसे किसी सांप्रदायिक सोच के बदलाव का समर्थन कर सकते हैं? खासकर तब जबकि रामदेव 'स्वाभिमान मंच' के बैनर तले अगले लोकसभा में चुनाव लड़ने जा रहे हों...

दिल्ली में एक जगह है जंतर-मंतर। वहां तीन दिन से अन्ना हजारे धरना दे रहे हैं। उनके धरने को देखने बहुत लोग लगातार जा रहे हैं। वहां से लौट रहे लोग बता रहे हैं कि अन्ना हजारे के जज्बात देखने लायक हैं। 78 वर्ष की उम्र में उन्होंने महाराष्ट्र से दिल्ली आकर जो काम कर दिखाया है, वह कोई नहीं कर सका है। लोग यह भी कह रहे हैं कि उन्होंने एक ऐसा अनशन किया है जो देश में भ्रष्टाचार खत्म करने के बाद ही खत्म होगा। जोशीले  लोग इसी बात को ‘दूसरे गांधी का दूसरा स्वतंत्रता आंदोलन’ के रूप में समझाने की कोशिश कर रहे हैं।

यह सब सुनकर मुझसे रहा नहीं गया, इसलिए कल मैं भी अन्ना के धरने से हो आया। वहां सबसे पहले कारों की कतार दिखी, फिर पुलिस वाले मिले और अंत में एक पुराने समाजवादी नेता मिले जो किशन पटनायक के साथ गुजारे पलों के भरोसे आज भी जीये जा रहे हैं।

हमने पूछा 'अन्ना से क्या उम्मीद है?' इतने पर वो चालू हो गये, ‘उम्मीद क्या पूछते हैं? यह सब नवटंकी है। वर्ल्ड कप के बाद मीडिया वालों को कोई काम नहीं है, इसलिए लगे हुए हैं। देश में कानूनों की क्या कमी है, जरूरत तो लागू कराने की है। एनजीओ का पैसा आ रहा है और धरना चल रहा है। इसी बहाने मीडिया भी अपने दलाली के धंधे में जनता की आवाज का छौंक लगा रही है। परसों से आइपीएल शुरू हो रहा है, उससे पहले किसी तरह सरकार इस मामले को निपटा देना चाहती है।’

उनकी इतनी सुनने के बाद एक मित्र ने इशारा किया आगे बढ़ते हैं। आगे बढ़ने के साथ मित्र ने कहा,‘ बड़ा निराश आदमी है! कहीं कुछ अच्छा हो रहा है, मानने को तैयार ही नहीं है।’ हां-हूं करते हुए मैं और मित्र वहां पहुंचे, जहां अन्ना बैठे थे।

अन्ना स्टेज पर एक तरफ अकेले बैठे थे और दूसरी ओर एक नौजवान लड़की टेर ले रही थी,‘जब सोये थे हम घरों में वो खेल रहे थे होली।’ बगल में एक नौजवान लड़का उसकी आवाज के साथ गिटार बजा रहा था। अन्ना के दाहिने तरफ वह 169  लोग सोये थे जो उनके समर्थन में अनशन कर रहे थे। और ठीक सामने तमाम कैमरे लगे थे जो हरपल देश को ताजातरीन करने में मशगूल थे।

तभी मित्र की निगाह एक पोस्टर पर पड़ी। पोस्टर में लिखा था, ‘गर्भ में शिशु को शिक्षा दीजिए,अभिमन्यु बनाइये।’ अभी हम लोग लिखे का मर्म समझ पाते की उससे पहले ही माईक से आवाज आयी,‘मैं कोई कवि नहीं हूं और न ही भाषण  देने आया हूं। बस समाज को बदलने की बात कहने आया हूं।’शुरू में तो नौजवान की कविता पर ध्यान नहीं गया,मगर ‘गौ मारने वालों को चुन-चुकर मारा जायेगा’ की पंक्तियां सुनकर लगा कि अन्ना हजारे का लोकपाल कहीं सांप्रदायिक तो नहीं है। यही बातें नौजवान ने इसाईयों के लिए भी कहीं।

इस कवि की साम्प्रदायिकता सुने...


कविता कह रहे नौजवान ने जैसे ही माइक छोड़ा, उसके बाद कविता की तारीफ करने वालों की भारी भीड़ ने हमें और हतप्रभ किया। बहरहाल, अपनी बारी के इंतजार में हम भी खड़े रहे और नौजवान से बाचतीत की। अन्ना हजारे के गांधीवादी मंच से साम्प्रदायिकता  की जुबान गाने वाला युवा बलराम आर्य हरियाणा के फरीदाबाद जिले के पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज में कला अंतिम वर्ष का छात्र था। उसने अपना परिचय बताया कि वह योगगुरू स्वामी रामदेव के संरक्षण में चल रहे 'भारत स्वाभिमान मंच'से जुड़ा है और कला-संस्कृति ईकाई फरीदाबाद का जिला अध्यक्ष है।

जाहिर है उसके इस परिचय के बाद साफ था कि वह यूं ही चला आया लौंडा नहीं था, बल्कि बाकायदा स्वामी रामदेव की विचारधारा का एक महत्वपूर्ण वाहक था। ऐसे में सवाल उठता है कि भ्रष्टाचार विरोध की सशक्त आवाज कहने वाले बाबा रामदेव आखिर किस तरह के भ्रष्टाचार से मुक्ति चाहते हैं। सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि अन्ना हजारे की टीम में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाले जो मुख्य पुरोधा हैं उनमें प्रशांत भूषण, अरविंद केजरिवाल, स्वामी अग्निवेश, किरण बेदी के अलावा स्वामी रामदेव भी हैं। इतना ही नहीं, एक तरह से भ्रष्टाचार के खिलाफ मुखर होने का साहस देने वाले रामदेव ही हैं,  जो मंचों से भ्रष्टाचार के खिलाफ लगातार बोलते रहे हैं।

लेकिन सवाल यह है कि क्या हम ऐसे किसी सांप्रदायिक सोच के बदलाव का समर्थन कर सकते हैं? खासकर तब जबकि रामदेव 'स्वाभिमान मंच' के बैनर तले अगले लोकसभा में चुनाव लड़ने जा रहे हों। हालांकि इन सवालों पर लोग कह सकते हैं कि जब भ्रष्टाचार के खिलाफ एक माहौल बन रहा है तो इस तरह की बातें निरर्थक और निराश करने वाली हैं।

हमलोग लौटने लगे तो एक और समाजसेवी से हमारी मुलाकात हुई। हमने उनसे इस बाबत सवाल सवाल किया तो उनका जवाब था,‘सांप्रदायिक गीत ही क्यों? जिस पोस्टर के आगे अन्ना बैठते हैं, उसके पीछे जो फोटो लगी है वह क्या हिंदुवादियों का प्रतीक और राष्ट्रीय स्वयंसेवक की पहचान नहीं है।’साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि जन लोकपाल विधेयक की जरूरत सिर्फ हिंदुओं की ही है क्या, जो अबतक इस आंदोलन में कहीं मुसलमान नहीं नजर आ रहे हैं। इन सबके बावजूद वहां से लौटने वालों की यही राय है कि 'चलो कोई तो कुछ कर रहा है।'

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