Thursday, April 14, 2011

हमारी संस्कृति एवं सभ्यता पर पश्चिमी देशों का योजनाबद्ध हमला


हमारी संस्कृति एवं सभ्यता पर पश्चिमी देशों का योजनाबद्ध हमला
भारत की संस्कृति संसार में सबसे पुरानी संस्कृतियों में से एक है I हजारों वर्ष पहले से पाणि-ग्रहण संस्कार स्त्री एवं पुरुष में ही नैसर्गिक मान्य रहा है । कुछ अंतराल पश्चात एक पुरुष और कई पत्नियाँ रखने का चलन चला ।  एक राजा कई रानियाँ रखने लग गये ।  या यों कहे की शायद कई पत्नियाँ रखना एक उच्च  मानक या स्तर समझे जाने लगा । यहाँ तक कई पत्नियों रखने के उदाहरण हमें देवताओं में भी मिलते हैं । समय चक्र अपनी गति से आगे बढ़ता रहा जिसके अंतर्गत अनगिनत बदलाव जन्म लेते रहे ।  ऐसी भी मिसाल मिलती हैं की एक स्त्री के साथ कई कई पुरुष इस पावन संबंध में बंधते रहे । 

पुरुषोत्तम श्री रामचन्द्र जी ने इस बहु विवाह की रीति में एक नई मिसाल कायम की ।  उन्होंने प्रतिज्ञा की कि वो एक ही स्त्री से विवाह करेंगे एवं केवल उसी से  नैसर्गिक सम्बन्ध भी, और किसी से भी नहीं ।   ये उस काल की एक बहुत बड़ी और अद्भुत चुनौती थी और आदर्श भी ।  उस समय से भारत में अधिकतर एक ही स्त्री से विवाह होता है चला आ रहा है एवं उसी एक से नैसर्गिक सम्बन्ध भी । हालांकि और धर्मों में अभी भी कई स्त्रियों से विवाह होने का चलन है ।   परन्तु हिन्दू धर्म में अधिकतर एक स्त्री की ही पद्धति चली आ रही है । तब एड्स जैसी भयानक न कभी बीमारियाँ होती थी और न ही संभावनाएं ।

हमारी उच्च संस्कृति , आध्यात्मिक ज्ञान, पारंपरिक संस्कार , रिश्तों की मान्यताओं, धार्मिक विचार , प्रेम व् एक दूसरे के मान सम्मान से ओत प्रोत जीवन हर्ष उल्लास एवं आनंदित अवस्थाओं से गुजरता रहा । भारत के वेदों, उपनिषदों से उत्पन्न ज्ञान की गंगा की महिमा संपूर्ण जगत में विख्यात रही है । उच्च ज्ञान-संस्कृति में अग्रिम होने के कारण,  चारों दिशाओं से असंख्य संख्याओं में ज्ञान एवं शांति की खोज में जिज्ञासू भारत भ्रमण करते रहे एवं उनमें से कई तो यहाँ की संस्कृति, व्यवहारिक छवि से इतना प्रभावित हो जाते थे की वो फिर यहाँ से वापस ही नहीं जा पाते थे ।

कुछ अंतराल के पश्चात कुछ देश अनुचित उद्देश्यों से अपनी बुरी दृष्टि भारत के अदभुत ज्ञान एवं उच्च कोटि की व्यवहारिक संपदा पर डालने लगे ।  यहाँ से वेदों  और पुराणों का पलायन करने में सफल हो गये ।  वो इस ज्ञान के भंडारों को ले तो गये परन्तु उनसे कोई विशेष लाभ न उठा सके ।  तदोपरांत यहाँ की संस्कृति और व्यवहारिक संपदा को भ्रष्ट करने की नियत के अंतर्गत वो तमाम देश अब नाना प्रकार के दावों पेच द्विमुखी मुखौटे के आवरण से चला रहे हैं और उनकी ये कूट नीतियाँ, कूट-योजनायें, एवं रणनीतियां सनह सनह सफल भी होती नजर आ रही हैं।

पाश्चात्य सभ्यता की आंधी ने हमारी भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति में उथल  पुथल मचा रखी है ।  उसकी पूरी कोशिश इसे जड़ से उखाड़ फेंकने की है।  आधुकनिकता एवं वेषभूषा की शैली व् उनके आचरण के आवरण में हमारी संस्कृति एवं सभ्यता ध्वस्त होती चली जा रही है । वो देश यह सब एक पूर्व निर्धारित षड्यंत्र के अंतर्गत योजनाबद्ध कार्य किये जा रहे हैं । उसकी  चमचमाहट  और जगमगाहट से नई पीढी की ही नहीं हम सब में से अधिकांशों की आँखें चुधियाँ सी गई हैं और उस चमचमाहट के पीछे अंधाधुंध अंधों की तरह हम सब भागे चले  जा रहे हैं और उसका अनुसरण भी हंसी- खुशी कर रहें हैं । हमारी मानसिक शक्ति इतनी विवेक शून्य हो गयी है की सोचने और समझने की शक्ति ही लुप्त हो गयी।  इसके फलस्वरूप हमें आज न अपने माँ-बाप का डर है और न ही आदर-सम्मान , इतना ही नहीं अब शर्म लिहाज ही नहीं रह गयी है । हमलोगों के विवेक पर इतना मोटा पर्दा पड़ा रहता है की हमें न आस-पास का और न समाज से इन सब अभद्रताओं का डर,  न शंका अपितु कुतर्क पर अमादा रहते हैं ।  सारे रिश्तों की गरिमा तो रखी ही नहीं, बल्कि हर रिश्तों की अस्थि पंजर भी दफन कर चुके हैं और बचे खुचों पर भी अमादा हैं । 

इस षड्यंत्र का एक और नया वो भी बहुत ही भयानक रूप नजर आ रहा है ।  यदि इसका तिरस्कार न किया गया या इससे अपनी समाज को, स्वयं को बाल बच्चों को सावधान न किया गया, बचाया न गया तो इसके अत्यधिक घातक परिणाम शीघ्र ही सामने आने लग जाएँगे । ये भयानक रोग है "एक ही लिंग में विवाह" - "गे और लिसबिन" का जोड़ा ।   भारत में कुछ राज्यों में इसे न्याय संगत भी करार घोषित कर दिया है । शायद उनकी भी दूरदृष्टि इस षड्यंत्र से दूषित हो गयी हो, जिन्होंने ऐसे अप्राकृतिक, अन्यायपूर्ण एवं दूषित संस्कृति को भारत जैसे देश में न्याय का चोला पहना दिया है ।

यह प्रणाली अत्यंत अनैसर्गिक तथा अप्राकृतिक है और भारतीय संस्कृति, समाज एवं हमारी वर्षों क़ी धरोहर सभ्यता के लिए घोर अभिशाप व् घातक ।   हमको, आपको एवं सबको इस षड्यंत्र को भारत से निकाल फेकना है और इससे उत्पन्न होने वाले समाज में असंतुलन, अराजकता व् पूर्वजों से मिली धरोहर को दूषित होने से बचाना होगा ।  हम अपने अंदर दृढ़ संकल्प करें कि हम इस दुराचार से बचेंगे, और न ये दुराचार होने देंगे " हम सुधरेगे जग सुधरेगा, न हम ऐसा करेंगे न जग को करने देगें " । हम अपनी संतानों को अव्यवहारिक कार्य करने नहीं देंगे, नई पीढी नई स्फूर्ति से परिपूर्ण है, बस मार्ग से भटक गई है और भटक रही है । आइये हम सब मिलकर ये संकल्प लें कि हमारी लुप्त होती हुई सभ्यता, और संस्कृति को हम किसी भी रूप में दूषित नहीं होने देंगे । सर्व प्रथम हम स्वयम को सुधारेगें, आदर्शपूर्ण आदर्शों को अपनाए,  तभी तो फिर जग को सुधारने में सहायक हो सकेगें । पीढी को पतन से उबारेगे और स्वयम उदाहरण बन कर आदर्शों का प्रतिमान स्थापित करेंगे । जय  हिंद ।।

सूर्य मोहन  दुबे
भारतीय वायु सेना में लगभग 4 दशकों तक सेवा करने और स्क्वाड्रेन लीडर के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद से अमेरिका के फ्लोरिडा शहर में रह रहे श्री सूर्य मोहन दुबे ने मानवीय, आध्यात्मिक और सामाजिक विषयों पर खूब लिखा है। आप 'फेस एन फॅक्ट्स' के वरिष्ठ स्तंभकार है।
http://www.facenfacts.com/

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