Sunday, April 10, 2011

बिखरा रहा मुसलमान तो बहुमत नहीं किसी के हाथ


उत्तर प्रदेश 2012 के विधानसभा चुनाव की धुंधली तस्वीर अभी से दिखने लगी है। प्रदेश में 21 फीसदी की हैसियत रखने वाला मुसलमान अभी तक ये तय नहीं कर पाया है कि उसे किस के साथ जाना है। लेकिन इतना तय नज़र आ रहा है  कि वो इस बार भाजपा के साथ-साथ बीएसपी से भी दूर रहने वाला है। पिछले कुछ चुनावों की तरह इस बार भी जातीय समीकरण सभी मुद्दों पर हावी पड़ने वाला है। अखाड़े में पुराने पहलवानों के साथ इस बार एक नया पहलवान भी होगा। यानि मुसलमानों की पीस पार्टी। इसके मुखिया डाक्टर अय्यूब बिना कोई कुश्ती मारे अभी से अपने आपको मुलायम सिंह समझने लगे हैं। जबकि असलियत यह है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश को छोड़कर उनका सब जगह डिब्बा गोल है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुसलमान डाक्टर अय्यूब को अपना क़ायद मानने को तैयार नहीं है। लिहाज़ा यहां मुसलमानों के वोटों का बंटवारा होना तय है। जबकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुसलमानों की आबादी 30 फीसदी है। लेकिन यहां मुस्लिम लीडर-शिप न होने की वजह से मुस्लिम वोटों का बिखरना स्वभाविक ही है। मुलायम सिंह से मुसलमान दूर होते जा रहे हैं। चूंकि मुलायम की सियासत से अब धीरे-धीरे पर्दा उठता जा रहा है। 20 साल तक मुलायम सिंह ने मुसलमानों का बे-वकूफ बनाया है। प्रदेश में मात्र नो फीसदी यादव हैं। और 21 फीसदी वाले मुसलमान वोटों के दम पर 20 साल तक सत्ता में बने रहे। 20 सालों में मुलायम सिंह की उपलब्धि ये रही कि उन्होंने किसी भी मुस्लिम नेता को उभरने नहीं दिया। जो थे उनको भी फट्टे लगा दिया। जैसे क़जी रशीद मसूद। ऐसा बर्फ में लगाया कि आज कोई नाम लेवा नहीं हैं। बहुत से सारे नेता उभरे और फना कर दिए गए। अपनी दुकान सजाने के लिए आज़म खान को वो अब पार्टी में ले तो आए है। लेकिन उनको खुद अपनी हैसियत पता है। शायद मुसलमानों से पूछने की ज़रूरत नहीं है। यहां मुसलमान नेताओं ने कभी इस दल तो कभी उस दल में जाकर अपने किरदार को भी खोया। ऐसा कोई नेता नज़र नहीं आता जिसने  तन के कपड़ों की तरह दल न बदले हों।  उत्तर प्रदेश में अगर दांव पर है तो मायावती सरकार, बचेगी या जाएगी, दांव पर है राज्य में अपने अस्तित्व के लिए लड़ रही समाजवादी पार्टी का भविष्य और दांव पर है भाजपा और कांग्रेस की राज्य में दीर्घकालिक भविष्य तलाशने की योजना.
उत्तर प्रदेश के चुनाव में ये सवाल अहम हैं:
• राष्ट्रीय लोक दल और पीस पार्टी का गठबंधन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ज़मीन पर कितना कारगर साबित होगा?
• कल्याण सिंह भाजपा को कितना नुक़सान पहुंचाऐंगे?
• मायावती से ग़ैर दलितों नाराज़गी का किस हद कर असर होगा?
उत्तर प्रदेश की बात आती है तो हम जातीय समीकरण खोजने लगते हैं, एक हद तक ऐसा करना सही भी है. उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुख्यत: जातियों के ख़ेमे हैं, लेकिन जातियों के ये ख़ेमे कैसे काम करते हैं इसके  बारे में तमाम तरह के मिथक प्रचलित हैं.हर कोई जानता है कि दलित, मुसलमानों और ब्राह्मण का वोट मिलाकर मायावती जीती हैं, लेकिन इस बार ये जातीय समीकरण नहीं है।  राज्य में सत्ता की दावेदार तीनों बड़ी पार्टियों बसपा, सपा और भाजपा का अपना-अपना जातीय आधार है. भाजपा का मुख्य आधार राज्य की 20 प्रतिशत अगड़ी आबादी है. देश में कम ही ऐसे इलाक़े हैं जहां अगडों के दम पर  सीट जीती जा सकती है।  अगड़ो में इस बार कांग्रेस भी सेंध लगा चुकी है।  भाजपा इसकी भरपाई शायद ही कर पाए। पश्चिम उत्तर प्रदेश में प्रभावी राष्ट्रीय लोकदल ने पीस पार्टी से समझौता किया है,जाट समाज के वोट पर लगभग एकाधिकार है.राज्य की कुल जनसंख्या के हिसाब से जाटों की आबादी बहुत ही कम है लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कुछ सीटों पर वो बहुत  बेहतर हालत में है। कुछ सीटों पर उसको पीस पार्टी से फायदा तो हो सकता है लेकिन बहुत ज्यादा की उम्मीद करना शेख-चिल्ली के सपने समान होगा।  90 के दशक में उत्तर प्रदेश में भाजपा की विशाल विजय का कारण था, अति-पिछड़ा समाज के वोटों में भाजपा की गहरी पैठ. लेकिन, अब  ये पैठ कम पड़ गई है. उत्तर प्रदेश के 19 प्रतिशत दलित समाज के वोट पर मायावती का लगभग एकाधिकार सा है. दलितों की आबादी का आधा उनकी अपनी जाति जाटव समाज से है. मायावती को न सिर्फ अपनी जाति से तीन चौथाई से ज्यादा वोट मिलते हैं बल्कि अन्य दलित जातियों में भी उन्हें 60-65 प्रतिशत  वोट मिल जाते हैं।  उधर सपा का मुख्य आधार मुस्लिम और यादव समाज था.उत्तर प्रदेश में मुस्लिम 21 प्रतिशत और यादव नौ प्रतिशत. मुस्लिम समुदाय में सपा का वोट अब घटकर आधे से भी कम रह गया है लेकिन यादव समाज के तीन चौथाई वोट उसे अब भी मिलते हैं. जनाधार बढ़ाने के लिए पहले
मुलायम सिंह यादव ने राजपूत समाज को अपने साथ जोड़ने की कोशिश की थी। लेकिन अब अमर सिंह भी उनकी कब्र खोदने में जुटे हैं। पीस पार्टी को अमर सिंह की ही पुश्त-पनाही है।  कल्याण सिंह अब डफली खुद बजा रहे हैं। लोध जाति को जोड़ने की वो भरपूर कोशिश में जुटे हैं. हर दल के पास अपना-अपना जातीय जनाधार है इसलिए असली चुनावी लड़ाई अपने जातीय जनाधार से बाहर के कुछ वोट बटोरने को लेकर होगी. इसलिए, उत्तर प्रदेश को जातीय समीकरण से अलग भी समझना होगा. जातियां या जातियों के ख़ेमे वोटर के शुरूआती पसंद और नापसंद का आधार रहे हैं. लेकिन दो चुनाव के बीच वोटर अपना मन बदलते हैं तो वो जाति के आधार पर नहीं बदलते, उसका आधार रहा है सरकार का कामकाज. इसलिए, उत्तर प्रदेश के चुनाव में जातिगत आधार-वोट होने के  बावजूद मुद्दे और नेताओं की छवि निर्णायक हो जाती है.  अफ़सोस की बात है कि पिछले 20 साल में उत्तर प्रदेश में ज़्यादातर सरकारों का कामकाज,  आर्थिक स्थिति और क़ानून व्यवस्था इतनी ख़राब रही है मानो उत्तर प्रदेश और बिहार में होड़ लगी हो,  सबसे निचले पायदान पर खड़े होने की. नतीजतन, वोटर ने बार-बार सत्तारुढ़ दल को अस्वीकार किया है  और सत्तारुढ़ दल के ख़िलाफ़ वोटरों का ग़ुस्सा उत्तर प्रदेश चुनाव में बहुत बड़ा कारक रहा है. मायावती जब सत्ता में आईं तो उसमें कहीं न कहीं मुलायम सिंह यादव या उनकी सरकार के ख़िलाफ़ ग़ुस्सा या  उनके विकल्प की तलाश थी. ठीक उसी तरह मौजूदा सरकार के खिलाफ भी लोगों का गुस्सा फूट सकता है। 
कांग्रेस-
एक समय कांग्रेस सवर्ण और दलित को जोड़ने वाली कड़ी थी पर पिछले 20 साल में उसका कोई विशेष जनाधार नहीं बचा है कांग्रेस किसी के साथ गठबंधन होता तो कुछ समीकरण बदल सकते थे। लेकिन इसके आसार नहीं दिखते। यदि कांग्रेस उत्तर प्रदेश में बिहार की तरह  अकेले मैदान में उतरी तो मुमकिन है कि हाल वैसा ही हो। अलबत्ता पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उसके वोटों की संख्या ज़रूर बढ़ सकती है। चूंकि मुसलमानों  का रुझान कांग्रेस की तरफ नज़र आता है।  आज की स्थिति में कुछ कहना यूं तो जल्दबाज़ी होगी। लेकिन जो धुंधली तस्वीर नज़र आ रही है उससे तो यही लगता है कि कोई दल अपने बूते पर सरकार बनाने की हालत में नहीं है।
(अनवर चौहान की खास रिपोर्ट) 

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