Wednesday, April 13, 2011

ऐसे चलती है भारतीय शिक्षा प्रणाली


एक अप्रैल २०११ से हरियाणा में अध्यापन कार्य ६ घंटे के स्थान पर साढ़े सात घंटे हो गया है. सुना है कि इस सिलसले में राज्य शिक्षा निदेशक, चंडीगढ़  से राज्य की अध्यापकों से संबंधित ११ यूनियन मिली भी थी. खबर है कि केवल एक यूनियन को छोड़कर बाकी दस की दस युनियने इसके विरुद्ध थी. मगर विरुद्ध होने से होता क्या है. इन दस यूनियनों की स्थिति यह है कि ये बिलकुल अपने विपरीत में बदल चुकी है. यानि इनकी कार्य प्रणाली में अधिकारी वर्ग और बुर्जुआ राजनीतिक पार्टियों से अपने निजी तालुक रखकर अपने व्यक्तिगत काम करवाना मुख्य है. ये युनियने अध्यापक वर्ग से अपना सम्मान गवां चुकी है. अहोदेदारों के अलावा इनके पीछे कोई अध्यापक नहीं है.
लेकिन नयी बनी आजाद गेस्ट अध्यापकों की यूनियन की स्थिति कुछ अलग है. एक बार राज्य के मुख्यमंत्री भूपेंड्र सिंह हुड्डा से बातचीत टूटने पर यूनियन के अध्यापकों द्वारा मोबाइल पर अपने साथियों को सूचित करने की देर थी कि राज्य के पद्रह हजार अध्यापकों में से साढ़े तेरह हजार रोहतक इकठ्ठे हो गए थे. तकनीक की मदद से इसकी तुलना मिडल ईस्ट और मिश्र में उठने वाले जन आक्रोश से तो नहीं की जा सकती अलबता इतना तो तय है कि तकनीक केवल शोषकों के लिए ही नहीं है इसका फायदा मेहनतकश वर्ग भी उठा सकता है. मिडल ईस्ट की घटनाओं ने यह भी सिद्ध किया है कि किसी सच्चे क्रांतिकारी अभाव में जनता के स्वयंस्फूर्त आंदोलनों का हश्र अच्छा नहीं होता. लेकिन इन घटनाओं ने सच्चे कम्युनिस्ट संगठनों के निर्माण की जरूरत पैदा कर दी है. प्रकृति का नियम है कि जब जरूरत पैदा हो जाती है तो वह चीज भी पैदा हो जाती है.
सत्र पूरा होने पर बच्चों के साथ अध्यापकों की भी छुटियाँ कर दी जाती है. लेकिन उन्हें कहा जाता है कि वे अपने मोबाईल फोन आन रखे. उन्हें कभी भी काम पर बुलाया जा सकता है. जरा सोचिये उस अध्यापक और उसके बच्चों  की मनोस्थिति के  बारे में जो समुद्र के किनारे या किसी अन्य रमणीय स्थान पर छुट्टियाँ मना रहे होते हैं और मोबाइल पर सन्देश आता है कि उसकी डियूटी फलां कार्य के लिए लगा दी गयी है. वह तुरंत डियूटी रिपोर्ट करे. अब पाठक ही बताएं कि अध्यापकों के कोई जरूरी जनवादी अधिकारी भी है या नहीं. वैसे हमारा उनकी स्थिति पर नजरिया बिलकुल स्पष्ट है. वह गुलाम तो नहीं है लेकिन उजरती मानसिक गुलाम जरूर है. वह अपनी इस गुलामी से छुटकारा पा सकता है. लेकिन रास्ता सिर्फ एक ही है. आज के दौर  का क्रांतिकारी वर्ग मजदूर वर्ग है. उसके लिए बेहतर होगा कि वह अपने ज्ञान का थोडा सा सदुपयोग इस वर्ग की चेतना को मजबूत करने में करे, क्योंकि विद्वानों ने नोट किया है कि केवल मजदूर वर्ग ही अपनी जंजीरें तोड़ने के अलावा अन्य वर्गों की जंजीरें  भी तोड़ने की ताकत रखता है.
सरकारी स्कूलों के अध्यापकों और प्राईवेट स्कूलों के अध्यापकों के जीवन स्तर और स्थिति का जिक्र करना भी जरूरी है. सरकारी स्कूलों के अध्यापकों को वेतन ठीक मिलता है लेकिन उनके पास बच्चे बिलकुल मेहनतकश और गरीब तबके से आते हैं. जबकि प्राईवेट स्कूलों के अध्यापकों को नाम मात्र वेतन मिलता है लेकिन उन स्कूलों में पढनेवाला विद्यार्थी उच्च मध्यम संम्पन वर्ग से आता है. यह एक वस्तुपरक विडंबना ही तो है.
सरकारी स्कूलों के अध्यापकों के पास करने के लिए एक और जरूरी कवायद है. आर. टी. आई. के तहत आने वाली ज्यादातर डाक का निपटारा जिला स्तर पर ही हो सकता है. लेकिन स्कूलों में सभी डाके फोटोकापी करके भेज दी जाती है. डाक का जवाब देना जरूरी होता है क्योंकि डाक के एक तरफ खंड शिक्षा अधिकारी द्वारा अति जरूरी , आज ही लिखा होता है. अगर डाक का संबंध स्कूल से न भी हो तो इसे निल लिखकर भेजना जरूरी होता है. मुख्य अध्यापक द्वारा एक या दो अध्यापकों की डियूटी इसे लिखने के लिए लगा दी जाती है. इस दौरान कक्षाएं खाली रहती हैं और बच्चे भगवान के सहारे.
अधिकारी वर्ग की एक आदत और नोट करने वाली है. वे कभी भी डाक समय पर नहीं पहुंचाते लेकिन संबंधित स्कूल को जरूर लिखेंगे कि इसे तुरंत, आज ही पूरा करके भेजा जाये.
दसवी और बाहरवीं कक्षा की बोर्ड की परीक्षाओं की उत्तर पुस्तिकायों की जाँच का कार्य भी सत्र के समापन पर छुट्टियों में होता है. सरकारी अध्यापकों में से एक वर्ग ऐसा भी है जो स्कूल में कम पर अपने निजी व्यवसाय में ज्यादा दिलचस्पी रखता है. वह खंड और जिला मुख्यालय से संपर्क और चाटूकारता बनाए रखता है. उनकी डियूटीयाँ कभी भी नहीं लगाई जाती. हरियाणा शिक्षा निदेशालय से एक सवाल. क्या छुट्टियाँ सभी अध्यापकों के लिए होती है? क्या ऐसा नहीं होता की कुछ अध्यापक तो छुट्टियों में ऐश कर रहे होते हैं जबकि कुछ सरकारी डियूटी बजा रहे होते हैं ? होना तो ऐसा चाहिए कि अधिकार और कर्तव्य सभी के लिए एक जैसे हों.
रूस में बोलेश्विक पार्टी के निर्माण से कुछ वर्ष पहले क्रांति पर विचार करने के लिए किसी शहर में आठ क्रांतिकारी इक्कट्ठे हुए थे. उनमें से एक लेनिन भी थे. किसी साथी द्वारा सुझाव आया था कि उन्हें मजदूरों की बस्तियों में मजदूरों के बच्चों को पढ़ाना चाहिए. उस वक्त लेनिन ठहाका मारकर हँसे थे और उन्होंने कहा था कि अगर क्रांति का कार्य अध्यापकों पर छोड़ दिया जाये तो रूस में आनेवाले पांच सौ सालों तक क्रांति नहीं हो सकती.
लेकिन आज स्थिति वैसी नहीं है. दुनिया के पिछड़े से पिछड़े देश में भी सार्वजानिक शिक्षा प्रणाली है. आज लेनिन की उस उक्ति का वह अर्थ नहीं है जो १२५ वर्ष पहले था. इक्कीसवीं सदी में संम्पन होने वाली नयी समाजवादी क्रांतियों में अध्यापक वर्ग की भूमिका भी अहम् होगी.

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