Monday, May 23, 2011

भारत में लोकतन्त्र अलपसंख्यकों के लिए अभिशाप



जिस देश में विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों के लोग रहते हों और जहां धर्मों और जातियों के आधार पर वर्गीकरण करके समाज को बांटा गया हो वहां लोकतन्त्र भीड़तन्त्र बन जाता है और बहुसंख्यक समाज निरंकुश होकर अल्पसंख्यकों के हितों की अनदेखी करके उनके अधिकारों का हनन करने लगता है और इस प्रकार से लोकतन्त्र अल्पसंख्यकों के लिए अभिशाप बन जाता है। किसी शायर के द्वारा कहे गए यह शब्द अल्पसंख्यकों और बहुसंख्यकों के बीच सम्बन्धों का इज़हार करने के लिए पर्याप्त हैं -
हम आह भी करते हैं तो हो जाते हें बदनाम।
वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता।।

हिन्दोस्तान में दुनिया के सबसे बड़े कहलाए जाने वाले लोकतन्त्र की भयावह तस्वीरदिखाने के लिए निम्नलिखित उदाहरण प्रस्तुत हैं -

1 - 1965
में भारत पाकिस्तान युद्ध के समय पाकिस्तान रेडियो से समाचार सुनने पर रोक लगा दी गई थी जिसके नतीजे में पुलिस अपनी आदत के अनुसार किसी भी मुसलमान को केवल यह आक्षेप लगाकर प्रताड़ित करने से नहीं चूकती थी कि वह रेडियो पाकिस्तान से समाचार सुन रहा था चाहे वह दिल्ली से गाने ही सुन रहा हो जबकि हिन्दुओं को अक्सर रेडियो पाकिस्तान से सुने हुए समाचारों पर चर्चा करते हुए देखा जा सकता था।

2 -
सन् 1984 में तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्रीमति इन्दिरा गांधी का क़त्ल हुआ और चूंकि क़ातिल सिख (जोकि एक अल्पसंख्यक समुदाय है) थे इसलिए उसकी प्रतिक्रिया का बहाना बनाकर हज़ारों बेक़सूर सिखों का क़त्ले आम कराया गया। ध्यान रहे क़त्ले आम में औरतों, बच्चों और बूढ़ों को भी नहीं बख़्शा जाता। जबकि राष्ट्रपिता गांधी जी के क़त्ल की प्रतिक्रिया इस प्रकार की न हुई क्योंकि उस घटना में अपराधी बहुसंख्यक समाज से सन्बन्धित था।

श्रीमति इन्दिरा गांधी के क़त्ल से सम्बन्धित पूरे घटनाक्रम में अफ़सोसनाक पहलू यह है कि उनके क़त्ल के आरोपियों के ख़िलाफ़ अपराध सिद्ध होने पर अदालत द्वारा सज़ा भी सुना दी गई और सज़ा दे भी दी गई जबकि उसी दौरान किये गए सिखों के क़त्ले आम के ज़िम्मेदार अपराधियों को अभी तक चैथाई सदी गुज़रने पर भी सज़ा नहीं मिली है। क्या यह इसलिए है कि यह अपराधी बहुसंख्यक समाज से सम्बन्धित हैं जबकि इनके द्वारा पीड़ित अल्पसंख्यक थे।

3 -
उड़ीसा के एक गांव में रात को अपनी गाड़ी में सो रहे फ़ादर ग्राह्म स्टेन्स नामक एक पादरी को उनके दो मासूम बच्चों के साथ ज़िन्दा जला दिये जाने की दिल दहला देने वाली घटना को सभी जानते हैं। इस घटना को अंजाम देने वाला दारा सिंह नाम का एक व्यक्ति ईसाई समाज के ख़िलाफ़ कार्यरत एक संस्था का संचालक था। भा.ज.पा. और बजरंग दल के नेताओं ने दारा सिंह को क्लीन चिट देकर ईसाईयों के प्रति नफ़रत और अपराधियों से लगाव की भावना को ज़ाहिर कर दिया। उच्च न्यायालय द्वारा दारा सिंह को सुनाई गई फांसी की सज़ा के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में की गई अपील में फैसला सुनाते हुए माननीय न्यायधीश ने अपने विवेकाधिकार का प्रयोग करते हुए फांसी की सज़ा को आजीवन कारावास में बदल दिया क्योंकि न्यायधीश महोदय ने इस अपराध को दुर्लभ से दुर्लभतम श्रेणी का नहीं पाया। इस घटना में भी पिता के साथ ज़िन्दा जला दिये गए दो मासूम बच्चे अल्प संख्यक समाज से सम्बन्धित थे। यदि ज़िन्दा जलाए जाने वाले अल्प संख्यक समाज से न होकर बहुसंख्यक समाज से सम्बन्धित होते और जलाने वाले अपराधी बहुसंख्यक समाज से न होकर अल्पसंख्यक समाज से सम्बन्धित होते तो क्या तब भी यह अपराध दुर्लभ से दुर्लभतम श्रेणी से बाहर ही होता?

4 -
किसी शायर के द्वारा कही गई दो पंक्तियां देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समाज की स्थिति का आईना हैं -

Kabeer Chaudhary
एक दो ज़ख्म नहीं सारा बदन है छलनी।
दर्द बेचारा परेशां है किस कल उठे।।

बहुसंख्यक समाज, चाहे वह प्रशासन से सम्बन्धित हो अथवा राजनीति से या किसी भी क्षेत्र से हो, के द्वारा बाबरी मस्जिद को मन्दिर में पविर्तित करने की घिनौनी साज़िश पर अमल करके हमेशा के लिए मानसिक यातना का जो ज़ख्म मुसलमानों को दिया गया गया है वह तब तक रिसता रहेगा जब तक मस्जिद उसी स्थान पर दोबारा नहीं बना दी जाती चाहे सदियां क्यों न गुज़र जाएं। यह बात मज़लूमों की मानसिकता के अनुरूप है।

गुजरात में महीनों तक होने वाले मुसलमानों के क़त्लेआम और उसके ज़िम्मेदार व्यक्ति को नायक के रूप में महिमामण्डित किया जाना लोकतन्त्र की ही तो देन है। इसीलिए भारत में लोकतन्त्र अल्पसंख्यकों के लिए अभिशाप है।

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