Sunday, May 22, 2011

भारतीय राजनीति में कांग्रेस और भाजपा से इतर एक तीसरे वैकल्पिक मोर्चे की जगह बनी हुई है



पश्चिम बंगाल और केरल में वाम मोर्चे की हार के बाद भारत में भी वामपंथी विचारधारा और राजनीति के अंत की भविष्यवाणियां सुर्ख़ियों में हैं. कहा जा रहा है कि सोवियत संघ के साथ वामपंथ के ध्वंस की हवा दो दशक बाद यहां पहुंची है लेकिन अंततः इतिहास के अंत से भारतीय वामपंथ का तयशुदा साक्षात्कार हो ही गया.

यह भी दावा किया जा रहा है कि अगर वामपंथ खासकर माकपा (सी.पी.आई-एम) ने खुद को एक सामाजिक जनवादी पार्टी में नहीं बदला तो उसका कोई राजनीतिक भविष्य नहीं है. चुटकी लेनेवाले अंदाज़ में कहा जा रहा है कि यह तो बहुत पहले ही हो जाना था और यह पता लगाया जाना चाहिए कि वाम मोर्चा पश्चिम बंगाल में ३४ सालों तक चुनाव कैसे जीतता रहा? 


कहने की जरूरत नहीं है कि कुछ लोग इसी दिन और मौके का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे. खासकर पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे के सफाए ने वामपंथ के आलोचकों को ऐसी भविष्यवाणियां और टिप्पणियां करने का मौका दे दिया है. यह मौका देने के लिए खुद वाम मोर्चा खासकर माकपा सबसे अधिक जिम्मेदार है.

लेकिन वामपंथ के वैचारिक और राजनीतिक आलोचक उसके अंत की घोषणा करने में न सिर्फ बहुत जल्दबाजी और अति उत्साह दिखा रहे हैं बल्कि लगता है कि वे खुद इतिहास के सबक को भूल गए हैं. इतिहास ने पिछले एक-डेढ़ दशकों में लातीन अमेरिका से लेकर यूरोप तक में किस तरह से करवट ली है, यह किसी से छुपा नहीं है.


माफ़ कीजियेगा, यह मानना किसी वैचारिक आस्था का प्रश्न नहीं है कि यह वामपंथ का अंत नहीं है और वामपंथ की प्रासंगिकता बनी रहेगी. सच पूछिए तो भारतीय समाज की विविधता और बहुलता के साथ-साथ उसमें मौजूद आर्थिक-सामाजिक विषमता, गैर-बराबरी और शोषण-उत्पीडन के मद्देनजर एक उच्चतर और वैकल्पिक राजनीतिक दर्शन के बतौर भारतीय राजनीति में वामपंथ की भूमिका और प्रासंगिकता हमेशा बनी रहेगी.

असल में, राजनीति में किसी विचारधारा की प्रासंगिकता उसके समर्थकों और सिद्धांतकारों की मनोगत इच्छा से नहीं बल्कि उस समाज की ठोस वस्तुगत राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक यथार्थ और उसके मुताबिक आम लोगों की इच्छाओं, आकांक्षाओं और उम्मीदों को अभिव्यक्त कर पाने से होती है.


इसलिए भारत में वामपंथ के भविष्य पर बात करते हुए असल सवाल यह बनता है कि क्या आज वामपंथ भारतीय समाज और राजनीति में एक उच्चतर वैचारिक विकल्प और आम लोगों की इच्छाओं और आकांक्षाओं को पेश कर पा रहा है? इस सवाल के उत्तर के लिए हमें मौजूदा दौर में भारतीय वामपंथ की तीन विशिष्ट धाराओं की वैचारिक दृष्टि, राजनीतिक एजेंडे और दिशा, रणनीति और कार्यनीति को समझने की कोशिश करनी पड़ेगी.

ये तीन धाराएँ हैं: माकपा के नेतृत्व में संसदीय राजनीति में पूरी तरह से रम चुका वाम मोर्चा, नक्सलवादी विद्रोह से निकली और संसदीय राजनीति को जनसंघर्षों के मातहत रखने की वकालत करनेवाली रैडिकल वामपंथ की एम-एल धारा और संसदीय दायरे से बाहर सशस्त्र क्रांति में विश्वास करनेवाली माओवादी धारा. इनके अलावा भी देश में सैकड़ों स्वतंत्र वाम-लोकतान्त्रिक जनसंगठन और पार्टियां हैं जो स्वयं को वाम राजनीति और पहचान से जोड़कर देखती हैं.        


इसमें कोई दो राय नहीं है कि अगर वाम धारा की इन सभी पार्टियों, मोर्चों और जनसंगठनों की सामूहिक ताकत को जोड़ लिया जाए तो वामपंथ आज भी देश में एक बड़ी और प्रभावशाली राजनीतिक शक्ति है. दूसरे, वामपंथ की कुल शक्ति का अंदाजा सिर्फ उसकी संसदीय उपस्थिति से नहीं बल्कि जनसंघर्षों को खड़ा करने और उसकी अगुवाई से भी लगाया जाना चाहिए.

आज भी देश के बड़े हिस्से में गरीबों, दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों के हक और सम्मान की लड़ाई में वाम संगठन ही सबसे आगे हैं. तीसरे, राष्ट्रीय राजनीति में दक्षिणपंथी झुकाव और नव उदारवादी आर्थिक सुधारों और सांप्रदायिक फासीवाद के उभार के खिलाफ सबसे सुसंगत राजनीतिक आवाज़ वामपंथ की ही है.


यही कारण है कि आज भी भारतीय राजनीति में कांग्रेस और भाजपा के विकल्प में वाम के बिना एक विश्वसनीय तीसरे मोर्चे की कल्पना नहीं की जा सकती है. दोहराने की जरूरत नहीं है कि भारतीय समाज की विविधता और बहुलता और लोगों की लोकप्रिय इच्छाओं और आकांक्षाओं को समेटने में कांग्रेस और भाजपा और उनके नेतृत्व में बने दोनों गठबंधन नाकाम रहे हैं. यही कारण है कि अपनी तमाम कमियों, अंतर्विरोधों और अस्थिरता के बावजूद तीसरे मोर्चे का सवाल प्रासंगिक बना रहता है.


कहने का आशय है कि भारतीय राजनीति में एक वैकल्पिक वाम राजनीति के लिए जगह मौजूद है. लेकिन जगह होना और उसे भरने के लिए जरूरी तैयारी के साथ आगे आना दो अलग-अलग बातें हैं. मुश्किल यह है कि इस दौर में वामपंथ की तीनों विशिष्ट धाराएँ कुछ एक जैसे और कुछ अलग-अलग कारणों से राजनीतिक गतिरुद्धता में फंसी हुई हैं.

लेकिन इनमें राजनीतिक रूप से सबसे बड़ी ताकत होने के बावजूद पश्चिम बंगाल में हार के बाद सरकारी वामपंथ के सामने सचमुच एक अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है. इस चुनावी हार से उबरना और राज्य और राष्ट्रीय राजनीति में अपने को राजनीतिक रूप से प्रासंगिक बनाना वाम मोर्चे खासकर माकपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गई है.


यह चुनौती आसान नहीं है जितनी वाम मोर्चे के समर्थक और खुद माकपा के नेता समझ रहे हैं. यह केवल एक चुनाव हारने तक सीमित मामला नहीं है. यह बुनियादी संकट है. असल में, एक पूंजीवादी लोकतंत्र में किसी भी रैडिकल वाम पार्टी या मोर्चे की असली भूमिका विपक्ष की होती है. यहां तक कि जनसंघर्षों के बल पर स्थानीय और क्षेत्रीय सरकारों में होने के बावजूद उसकी भूमिका में बदलाव नहीं होता.

लेकिन वाम मोर्चे और माकपा ने इस व्यवस्था के विपक्ष के बजाय खुद को सत्ता की पार्टी में बदल दिया है. उनकी सारी राजनीति अपनी तीन राज्य सरकारों को बचाने और उसके लिए अपने मुद्दों और जनसंघर्षों को भी कुर्बान करने तक पहुंच गई.


आश्चर्य नहीं कि माकपा एक ओर नव उदारवादी आर्थिक नीतियों का विरोध कर रही थी लेकिन दूसरी ओर, उन्हीं नीतियों को जबरन पश्चिम बंगाल में लागू कर रही थी. उसने इसके लिए नंदीग्राम और सिंगुर में गरीबों और किसानों का खून बहाने में भी संकोच नहीं किया. यही नहीं, वाम मोर्चे खासकर माकपा ने संयुक्त मोर्चे के नाम पर भारतीय राजनीति में वाम की स्वतंत्र दावेदारी को भी बहुत पहले छोड़ दिया.

यह एक ऐसी भूल थी जिसने वाम के अपने राजनीतिक आधार को खोखला कर दिया. उत्तर और दक्षिण भारत में वाम मोर्चे का आधार छीजता चला गया. इसकी सबसे बड़ी वजह यह थी कि पिछले दो दशकों में साम्प्रदायिकता को रोकने के नाम पर कभी कांग्रेस, कभी मुलायम, कभी लालू और कभी जयललिता का झंडा उठाने में लगे रहे वाम मोर्चे ने अवसरवादी, भ्रष्ट और बेमेल गठजोड़ों को आगे बढ़ाया.


गोया साम्प्रदायिकता के खिलाफ लड़ाई लोगों के बुनियादी हक-हुकूक की लड़ाई से अलग हो. उसकी इसी राजनीतिक दिवालिएपन का नमूना चार साल तक यू.पी.ए-एक सरकार का समर्थन करने के बाद जल्दबाजी में एक अवसरवादी और साख खो चुके नेताओं का चुनावी तीसरा मोर्चा बनाने की कोशिश था जिसे लोगों ने ठुकरा दिया. इन कोशिशों के जरिये माकपा ने रही-सही साख भी गंवा दी.

लेकिन लगता नहीं कि माकपा ने इससे कोई सबक सीखा. हैरानी की बात नहीं है कि तमिलनाडु में माकपा-भाकपा ने भ्रष्टाचार और मनमानी के लिए मशहूर जयललिता के साथ मिलकर चुनाव लड़ा. साफ है कि माकपा ने मान लिया है कि वह अकेले दम पर खड़ी नहीं हो सकती है.


दूसरी ओर, जनसंघर्षों से उसकी बढ़ती दूरी का प्रमाण यह है कि देश भर में नव उदारवादी आर्थिक नीतियों, प्राकृतिक और सार्वजनिक संसाधनों के कारपोरेट लूट, जल-जंगल-जमीन की लूट के खिलाफ चल रहे ९० फीसदी जनांदोलनों में सरकारी वामपंथ कहीं नहीं है.

उल्टे माओवाद को कुचलने के नाम पर जनांदोलनों के खिलाफ चल रहे आपरेशन ग्रीन हंट में वह सरकार के साथ खड़ी है. लालगढ़ में वह इस आपरेशन की अगुवाई करती हुई दिखाई पड़ी. साफ है कि एक वामपंथी पार्टी के रूप में माकपा की भूमिका दिन पर दिन रैडिकल वामपंथ के बढ़ाव को रोकने के लिए शासक वर्गों द्वारा इस्तेमाल किए जानेवाले बफर में सीमित होती जा रही है.


लेकिन उम्मीद करनी चाहिए कि सत्ता से बाहर आने के बाद वह अपने विचलनों का आत्मनिरीक्षण करेगी और संसदीय राजनीति के अवसरवाद में फंसते जाने के बजाय गरीब जनता के जनसंघर्षों से अपने को जोड़ेगी. यही नहीं, उसे वामपंथी आंदोलन की दूसरी रैडिकल धाराओं के साथ-साथ अन्य वाम-लोकतान्त्रिक जनांदोलनों के साथ भी संवाद का रास्ता खोलना होगा. 


लेकिन सबसे बढ़कर वामपंथ की स्वतंत्र दावेदारी को बुलंद करना होगा. मध्यमार्गी बुर्जुआ पार्टियों के पीछे-पीछे बहुत चल चुके. अब अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश कीजिए. कहने की जरूरत नहीं है कि इसके लिए अपना अहंकार छोड़कर पहल माकपा को ही करनी होगी. इसके अलावा कोई और विकल्प नहीं है. 

('राष्ट्रीय सहारा' के हस्तक्षेप में २१ मई'११ को प्रकाशित)

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