Tuesday, June 21, 2011

भूख की पहचान करना कब सीखेगी बिहार सरकार ?




बिहार में पिछले साढे पांच वर्षों में गैर सरकारी दस्तावेजों के अनुसार भूख के कारण करीब 347 लोगों की मौतें हो चुकी हैं। ऐसा कोई जिला नहीं है जहां लोग भूख़् से नहीं मरे हों। राजधानी पटना में भी लोग भूखमरी की जिंदगी जी रहे हैं। राजधानी में इसका प्रमाण आसानी से चमचमाती सड़कों के किनारे जिंदगी जीने वालों के काल्पनिक घरों में झांक कर देखा जा सकता है।
सबसे पहले बात करते हैं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भूख की एक तस्वीर की। एफ़ ए ओ खुद दूनिया के भूखों को खिलाने और खाद्य सुरक्षा प्रदान करने के नाम पर धान का जीनकोष (जीनोम) बनाने, विटामिन से भरपूर पराजीनी गोल्ड राइस या अंतरराष्ट्रीय व्यापार में कृषि को शामिल करने जैसे प्रयासों की हिमायत करने में सबसे आगे रहता है। अब तो एफ़ ए ओ खुलेआम यह कहता फ़िरता है कि खाद्य उत्पादन बढाने और भूख मिटाने में बड़ी खाद्य कंपनियां और बीज कंपनियां ही मदद कर सकती हैं। दक्षिण एशिया में तो अनाज के गोदाम उस समय ही भर गये हैं जब इन देशों में अनाज की उत्पादकता दूनिया में सबसे कम केवल 2 टन प्रति एकड़ पर अटकी हुई है, जो प्रौद्योगिकी इस समय इन देशों में उपलब्ध है, उसी के इस्तेमाल से खाद्यान्न उत्पादन का स्तर 3 गुणी बढाया जा सकता है। फ़िर भला इस विदेशी महंगी और अविश्वसनीय पराजीनी फ़सलों वाली प्रौद्योगिकी की किसको और क्यों जरुरत होगी।
भारत में बहुत से किसान इसलिये आत्महत्या कर रहे हैं कि मेहनत से उपजायी गई इनकी फ़सलों के खरीददार नहीं हैं। पाकिस्तान में मंडियों में पड़े अनाज के ढेरों में किसानों ने आग लगा दी, क्यों कि उन्हें उसके बदले वाजिब दाम नहीं मिल रहे थे। इंडोनेशिया में किसान अपना चावल बेचने के लिये इंतजार करते रहते हैं कि खरीददार आयें। इंतजार की घड़ी कभी समाप्त ही नहीं होती। उधर इंडोनेशिया की सरकार वियतनाम से चावल खरीद रही है। उधर एफ़ ए ओ और अरबों-खरबों डालर वाले कृषि उद्योग संघ 2020 की जरुरतों के मद्देनजर अनाज की पैदावार कई गुणा बढाने की तजबीजों में लगे हुए हैं और इधर किसान कई देशों में खेतीबारी छोड़ने पर मजबूर हो गये हैं। भारत में सरकार खुद ही किसानों से कह रही है कि ज्यादा अनाज पैदा न करें। क्योंकि सरकार अब उसे खरीद नहीं हो सकती।
भूख की एक और तस्वीर यह कि पराजीनी फ़सलों की शुरुआत सन 1994 में टमाटर की फ़्लावर सावर किस्म से की गई थी। तबसे कोई 60 पराजीनी किस्में बन चुकी हैं। इनमें से 20 की अमेरिका में व्यापारिक खेती होने लगी है। इस तरह से पराजीनी खाद्य पदार्थ तीसरी दूनिया में फ़टकने की तैयारियां पूरी हैं। इनको बाजार में लाने के लिये हर तरह के हथकंडे अपनाये जा रहे हैं। अमेरिकी कृषि विभाग ने तो यहां तक दावा किया कि जैव कृषि यानि आर्गेनिक एग्रीकल्चर में पराजीनी फ़सलें मदद करेंगी।  जब यह दावा इन्टरनेट पर जारी किया गया तो कोई 2 लाख लोगों ने इसका विरोध किया। इसके बाद अमेरिकी कृषि विभाग को अपना दावा वापस लेना पड़ा। असलियत यही है कि अमेरिकी कृषि विभाग( यूएसडीए) अरबों डालर वाले बायोटेक उद्योग को बढावा देना चाहता है। बायोटेक उद्योग इस बारे में अनेकों दावे कर चुका है कि जैव प्रौद्योगिक किस तरह तीसरी दूनिया के लिये वरदान साबित होगी। लेकिन अभी तक का अनुभव यही बताता है कि ये सभी दावे थोथे हैं। बायोटेक उद्योग की निगाह केवल मुनाफ़ा बटोरने पर टिकी हैं। इसका एक उदाहरण है कसावा या टेपीओका की फ़सल। अफ़्रीका में 3 करोड़ लोगों का मुख्य भोजन यही कसावा है। यह शकरकंद के जैसे फ़ीका कंद है, जिसे भूनकर या उबालकर खाया जाता है। अगर बायोटेक कंपनियों को तीसरी दूनिया की खाद्य सुरक्षा की इतनी ही चिंता है तो उन्होंने कसावा की किस्में सुधारने और उपज बढाने में जैव प्रौधोगिकी का करिश्मा क्यों नहीं दिखाया ?
जब कसावा को सुअरों को खिलाया गया तो वे इसे खाने लगे और मोटे होने लगे। तब चार अमेरिकी खाद्य और बायोटेक कंपनियों ने कसावा पर अनुसंधान शुरु किया। इसकी वजह यह रही कि उन्हें दिखाई दे रहा था फ़ूड नहीं फ़ीड के रुप में कसावा से कमाई की जा सकती है। इससे साफ़ जाहिर है कि उन्हें इंसानों से ज्यादा सुअर प्यारे हैं।
दुर्भाग्य से भारत में स्थिति तीसरी दूनिया के जैसे ही है। अथवा यह कहना भी गैर वाजिब नहीं कि भारत अमेरिका की नजर में तीसरी दूनिया का सबसे बड़ा हिस्सा है। यहां की ऊर्वरता और खाद्य सुलभता अमेरिका की नजरों में खटक रहा है। विशेषकर गैट समझौता लागू होने के बाद स्थिति में विनाशकारी परिवर्तन आया है। एक तरफ़ भारत सरकार का बफ़र स्टाक अनाजों से अटा पड़ा है तो दूसरी ओर जन वितरण प्रणाली ध्वस्त हो चुकी है। अनाज गोदामों में सड़ रहा है। सर्वोच्च न्यायालय इस मामले में सरकार को अनेकों बार कड़ी फ़टकार भी लगा चुका है। लेकिन भारत सरकार है कि अनाजों को बांटने के बजाय थोथी दलील दे रही है और अमेरिकी कंपनियों के दबाव में भारतीय किसानों को आत्महत्या करने पर मजबूर कर रही है।
बिहार की स्थिति पूरे देश से अलग है। अलग इस मायने में कि बिहार के पास जो सबसे महत्वपूर्ण संसाधन है, वह है यहां की ऊर्वरता। इसमें कोई संदेह नहीं है कि यदि कृषि के साथ न्यायोचित व्यवहार किया जाये तो निश्चित तौर पर बिहार देश को खिलाने की क्षमता रखता है। लेकिन फ़िर क्या वजह है कि बिहार में लोग भूख के साथ जी रहे हैं?
यह तो हुई एक तस्वीर। अब दूसरी तस्वीर की बात करते हैं। बिहार सरकार के मुखिया अब अनाज के बदले कैश देने की बात करते हैं। सरकार का कहना है कि जिस तरह से उसे साइकिल योजना में लाभ मिला है। ठीक वही सफ़लता उसे अनाज के बदले कैश योजना में मिलेगी। जबकि वास्तविकता कुछ और है। साइकिल और अनाज में व्यापक अंतर है। साइकिल के बगैर भी बच्चे पढते थे और बड़ी संख्या में बिहारी छात्र आईएएस बनते थे। लेकिन अनाज के बगैर तो लोग भूख से मर रहे हैं। बाजार पर जमाखोरों और मुनाफ़ाखोरों का कब्जा है। फ़िर केवल उनके लिये अनाज के बदले कैश देना क्या यह साबित नहीं करता है कि बिहार सरकार गरीबों की सरकार नहीं, बल्कि लालची और मुनाफ़ाखोर व्यापारियों की सरकार है? वैसे यह बताते चलें कि भारत 150 जिलों के गरीबों को अब अनाज के नकद राशि मिलेगी। इसकी व्यवस्था 12वीं पंचवर्षीय योजना में की जा रही है। इनमें से 15 जिले बिहार के भी हैं। परिलक्षित जन वितरण प्रणाली यानि टीडीपीएस के जरिये यह सुविधा उपलब्ध कराई जायेगी। हालांकि यहां भी एक राजनीतिक पेंच है। बिहार सरकार एक तरफ़ 12 फ़ीसदी से अधिक आर्थिक विकास दर का दावा करती है तो दूसरी ओर घोर गरीबी का भी रोना रोती है।
बिहार सरकार के खाद्य आपूर्तिं एवं उपभोक्ता संरक्षण मंत्री श्याम रजक का कहना है कि बिहार में डेढ करोड़ परिवार बीपीएल यानि गरीबी रेखा के नीचे है। इनकी शिकायत है कि केंद्र सरकार केवल 65 लाख परिवारों के लिये ही खाद्यान्न का आवंटन करती है। वैसे इनका यह भी दावा है और पिछले 6 महीने से यह बात लगातार कही जा रही है कि राज्य सरकार अपने संसाधनों के बूते 80 लाख बीपीएल परिवारों को अनाज नहीं, बल्कि नकद पैसे उपलब्ध करायेगी। अब जरा इनसे कोई पूछे कि आखिर लोग अनाज किस दर पर और कहां से खरीदेंगे। अनाज के बदले महंगे दर पर अनाज खुले बाजार से लेने पर क्या व्यापारियों की चांदी नहीं हो जायेगी? इसका एक प्रमाण यह भी कि राज्य सरकार साईकिल योजना का राग अलापती है। जबकि वास्तविकता यह है कि 2000 रुपये में अब साइकिल नहीं मिलती। कम से कम 2800 रुपये में एक साइकिल मिलती है। जाहिरतौर पर ये 800 रुपये बच्चों के अभिभावकों को अपनी जेब से खर्च करना पड़ता है। इससे प्रमाणित होता है कि राज्य सरकार की साइकिल योजना असल में साइकिल उद्योग को मुनाफ़ा पहुंचाने के लिये अमल में लाई गई है। वैसे यह भी उल्लेखनीय है कि साइकिल कंपनियों की जड़ें बिहार में नहीं, बल्कि बिहार के बाहर हैं। ऐसे में अरबों रुपये प्रतिवर्ष बिहार के बाहर जा रही हैं। यही स्थिति होगी अनाज के बदले नकद अनुदान योजना के लागू होने पर।
जैसे आज बाजार में आटा 20 रुपये किलो उपलब्ध है और राज्य सरकार अधिकतम 12 रुपये अनुदान देगी। यानि गरीब परिवार को प्रतिकिलो कम से 8 रुपये खर्च करने होंगे। जबकि अभी जो सिस्टम काम कर रहा है उसके हिसाब से इन्हें इससे कम कीमत पर अनाज मिल जाता है। इसके अलावे जब सभी के पास पैसे होंगे तो अर्थशास्त्र की मूल परिभाषा के हिसाब से अनाज की कीमतों में इजाफ़ा होना तय है और साथ ही तय है अनाज का किल्लत होना। आखिर जब डिमांड बढेगा तो किल्लत पैदा की जायेगी और जब किल्लत पैदा होगी तो अनाज का भाव बढेगा। इस परिस्थिति में ये बेचारे गरीब अनाज कहां से ले पायेंगे। हां, संभव है कि जो पैसे इन्हें राज्य सरकार नकद अनुदान के रुप में देगी, वे इसका उपयोग अन्य कार्यों में करेंगे।
सबसे बड़ा सवाल यही कि क्या तीसरी दूनिया के लोग सुअर हैं, जिन्हें जैसा दे दो, जिस कीमत पर दे दो, वे खा लेंगे। फ़िर नहीं खा सके तो कोई बात नहीं, वे मर जायेंगे। आखिर मरना तो सबको एक दिन है ही। फ़िर आज मरे या कल्। लेकिन क्या लोकतंत्र की परिभाषा यही कहती है? भारतीय संविधान में वर्णित जीने का अधिकार इसी को कहते हैं? या फ़िर सुशासन की यही परिभाषा है?

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