Thursday, June 16, 2011

एक ग़ज़ल उनके लिए जिन्हेँ सच पढ़ना पसंद है!!




क़त्ल करेँ जो मासूमोँ का बैठेँ चाँद सितारोँ पर
किसका हक है हमेँ बता ऐ जन्नत तेरी बहारोँ पर

हमने जान बचायी है कुछ भोले भाले बच्चोँ की
लिक्खा जाए नाम हमारा मस्जिद की मीनारोँ पर

मोदी तोगड़िया आडवाणी ये किस खेत की मूली हैँ
सूली पर लटका दो चाहेँ, लिखूँगा सब गद्दारोँ पर

शौक़ से खेलो ख़ून की होली लेकिन ये भी याद रहे
हमने भी इतिहास लिखा है दिल्ली की दीवारोँ पर

हिन्द के दुश्मन होश मेँ आयेँ भूलेँ मत ये सच्चाई
हिन्दुस्तानी चल सकते हैँ काँटोँ और अंगारोँ पर

ये अंधा कानून अगर इंसाफ हमेँ देना चाहे
ख़ून के धब्बे देख ले आकर बस्ती की दीवारोँ पर

लाशोँ का सौदा करते हैँ ये नापाक हुकूमत से
आग लगा दो शहर के इन सब बिके हुये अख़बारोँ पर

कलम छुपाये बैठे हैँ जो आज हुकूमत के डर से
सदियाँ लानत भेजेँगी ऐसे घटिया फनकारोँ पर

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