Thursday, June 23, 2011

भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी क्यों?




इस बात से कोई भी इनकार नहीं कर सकता कि इन दिनों भारत में हर क्षेत्र में, भ्रष्टाचार चरम पर है| भ्रष्टाचार के ये हालात एक दिन या कुछ वर्षों में पैदा नहीं हुए हैं| इन विकट हालातों के लिये हजारों वर्षों की कुसंस्कृति और सत्ताधारियों को गुरुमन्त्र देने के नाम पर सिखायी जाने वाली भेदभावमूलक धर्मनीति तथा राजनीति ही असल कारण है| जिसके कारण कालान्तर में गलत एवं पथभ्रष्ट लोगों को सम्मान देने नीति का पनपना और ऐसे लोगों के विरुद्ध आवाज नहीं उठाने की हमारी वैचारिकता भी जिम्मेदार है|

आजादी के बाद पहली बार हमें अपना संविधान तो मिला, लेकिन संविधान का संचालन उसी पुरानी और सड़ीगली व्यवस्था के पोषक लोगों के ही हाथ में रहा| हमने अच्छे-अच्छे नियम-कानून और व्यवस्थाएँ बनाने पर तो जोर दिया, लेकिन इनको लागू करने वाले सच्चे, समर्पित और निष्ठावान लोगों के निर्माण को बिलकुल भुला दिया|

दुष्परिणाम यह हुआ कि सरकार, प्रशासन और व्यवस्था का संचालन करने वाले लोगों के दिलोदिमांग में वे सब बातें यथावत स्थापित रही, जो समाज को जाति, वर्ण, धर्म और अन्य अनेक हिस्सों में हजारों सालों से बांटती रही| इन्हीं कटुताओं को लेकर रुग्ण मानसिकता के पूर्वाग्रही लोगों द्वारा अपने चहेतों को शासक और प्रशासक बनाया जाने लगा| जो स्वनिर्मित नीति अपने मातहतों तथा देश के लोगों पर थोपते रहे|

एक ओर तो प्रशासन पर इस प्रकार के लोगों का कब्जा होता चला गया और दूसरी ओर राजनीतिक लोगों में आजादी के आन्दोलन के समय के समय के जज्बात् और भावनाएँ समाप्त होती गयी| जिन लोगों ने अंग्रेजों की मुखबिरी की वे, उनके साथी और उनके अनुयाई संसद और सत्ता तक पहुँच स्थापित करने में सक्षम हो गये| जिनका भारत, भारतीयता और मूल भारतीय लोगों के उत्थान से कोई वास्ता नहीं रहा, ऐसे लोगों ने प्रशासन में सुधार लाने के बजाय खुद को ही भ्रष्टाचार में आकण्ठ डूबे अफसरों के साथ मिला लिया और विनिवेश के नाम पर देश को बेचना शुरू कर दिया|

सत्ताधारी पार्टी के मुखिया को कैमरे में कैद करके रिश्‍वत लेते टीवी स्क्रीन पर पूरे देश ने देखा, लेकिन सत्ताधारी लोगों ने उसके खिलाफ कार्यवाही करने के बजाय, उसका बचाव किया| राष्ट्रवाद, संस्कृति और धर्म की बात करने वालों ने तो अपना राजधर्म नहीं निभाया, लेकिन सत्ता परिवर्तन के बाद यूपीए प्रथम और द्वितीय सरकार ने भी उस मामले को नये सिरे से देखना तक जरूरी नहीं समझा|

ऐसे सत्ताधारी लोगों के कुकर्मों के कारण भारत में भ्रष्टाचार रूपी नाग लगातार फन फैलाता जा रहा है और कोई कुछ भी करने की स्थिति में नहीं दिख रहा है| सत्ताधारी राजनैतिक गठबन्धन से लेकर, सत्ता से बाहर बैठे, हर छोटे-बड़े राजनैतिक दल में भ्रष्टाचारियों, अत्याचारियों और राष्ट्रद्रोहियों का बोलबाला लगातार बढता ही जा रहा है| ऐसे में नौकरशाही का ताकतवर होना स्वभाविक है| भ्रष्ट नौकरशाही लगातार मनमानी करने लगी है और वह अपने कुकर्मों में सत्ताधारियों को इस प्रकार से शामिल करने में माहिर हो गयी है कि जनप्रतिनिधि चाहकर भी कुछ नहीं कर सकें|

ऐसे समय में देश में अन्ना हजारे जी ने गॉंधीवाद के नाम पर भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन करके सत्ता को झुकाने का साहस किया, लेकिन स्वयं हजारे जी की मण्डली में शामिल लोगों के दामन पर इतने दाग नजर आ रहे हैं कि अन्ना हजारे को अपने जीवनभर के प्रयासों को बचाना मुश्किल होता दिख रहा है|

ऐसे हालात में भी देश में सूचना का अधिकार कानून लागू किया जाना और सत्ताधारी गठबन्धन द्वारा भ्रष्टाचार के मामले में आरोपी पाये जाने पर अपनी ही सरकार के मन्त्रियों तथा बड़े-बड़े नेताओं तथा नौकरशाहों के विरुद्ध कठोर रुख अपनाना आम लोगों को राहत प्रदान करता है|


अन्यथा प्रपिपक्ष तो भ्रष्टाचार और धर्म-विशेष के लोगों का कत्लेआम करवाने के आरोपी अपने मुख्यमन्त्रियों को उनके पदों से त्यागपत्र तक नहीं दिला सका और फिर भी भ्रष्टाचार के खिलाफ गला फाड़-फाड़ कर चिल्लाने का नाटक करता रहता है!



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