Friday, June 24, 2011

बाबा, बवाल और कुछ जरूरी सवाल




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भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के आंदोलन, उस पर सरकार की प्रतिक्रिया और उसके बाद शुरू हुए आरोपों-प्रत्यारोपों के सिलसिले से एक जटिल परिदृश्य उभरा है जिसमें हर पक्ष खुद को सही बता रहा है. इस सबके बीच कुछ अहम सवालों के जवाब तलाशती रेवती लाल की रिपोर्ट
तकरीबन महीना भर पहले की बात होगी. चिलचिलाती धूप में खड़े 20,000 से भी ज्यादा अनुयायियों के समूह को संबोधित करने के बाद बाबा रामदेव महाराष्ट्र के जलगांव से औरंगाबाद जा रहे थे. जैसे-जैसे यह खबर फैली कि रामदेव इस रास्ते से जा रहे हैं, वैसे-वैसे सड़क के किनारे लोगों का जमावड़ा शुरू हो गया. जगह-जगह लोग उनकी गाड़ी रोक लेते और एक झलक पाने के लिए कार की खिड़की के शीशे से आंखें सटा लेते. ऐसे ही एक पड़ाव पर रामदेव की कार रुकी. वे बाहर निकलकर कार की छत पर चढ़ गए. अपनी चिरपरिचित शैली में हाथ हिलाने और हंसने के बाद उन्होंने भीड़ की तरफ देखा और कहा, 'चार जून, पता है न, उस दिन क्या करना है?'
सम्मोहित भीड़ ने एक स्वर में जवाब दिया, 'हां.'
इसके बाद रामदेव फिर से कार में बैठ गए और आगे चल पड़े. बताया जाता है कि उन्होंने अपने सहयोगियों से कहा कि चार जून को जब उनका सत्याग्रह शुरू होगा तो पूरा देश पागल हो जाएगा. शायद ही उन्हें अंदाजा रहा हो कि यह पागलपन किस हद तक जाने वाला है. दरअसल शुरुआती दिनों से ही रामदेव इसे लेकर लेकर स्पष्ट लग रहे थे कि उनके अनशन का उद्देश्य क्या है. यह सिर्फ काले धन और भ्रष्टाचार से जुड़ा हुआ नहीं था. इसका लेना-देना मुख्यतः शक्ति प्रदर्शन से था और बाबा यह काम अपने सबसे बड़े हथियार यानी दो करोड़ समर्पित भक्तों के जरिए करना चाहते थे.
इसके बाद क्या हुआ वह तो सबको मालूम ही है. अब रामदेव के रहस्यमय योग साम्राज्य से संबंधित खबरों की बाढ़ है. राजनीतिक बयानबाजी और दो खेमों में बंटे नेताओं के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी चल रहा है. हर खेमे में यह साबित करने को लेकर रस्साकशी हो रही है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ असली लड़ाई कौन लड़ रहा है. यहीं यह जरूरत पैदा होती है कि अलग-अलग बयानों और परिस्थितियों के इस घालमेल से जो जटिल परिदृश्य उभर रहा है उसमें चीजों को अलग-अलग करके देखा जाए. सियासी और रामदेव के खेमे के दोहरे आचरण को, रामदेव के दो करोड़ अनुयायियों को अपने पाले में करने के लिए बोले जा रहे झूठ को, गुस्से में भरी जनता के पीछे के सच को और अन्ना हजारे से लेकर रामदेव तक मचे बवाल से अब तक क्या हासिल हुआ है, इसको भी. यह इसलिए भी जरूरी है कि कुछ चीजें स्पष्ट रूप से समझी जा सकें.  सबसे पहले झूठ की बात.
अगर रामदेव का आंदोलन सिर्फ भ्रष्टाचार के विरोध में था तो सरकार ने तो पहले ही उनकी मांगें मान ली थीं
जो भी बाबा रामदेव को टेलीविजन पर देखता होगा वह जानता होगा कि अतिशयोक्ति और झूठ उनके लिए नयी बात नहीं. मसलन कुछ समय पहले एक योग सत्र के बाद भीड़ में से एक महिला खड़ी हुई और बताने लगी कि उसके जीवन को बदलने में बाबा रामदेव का कितना बड़ा योगदान रहा. इस महिला ने कहा कि उसे पॉलीसिस्ट ओवरीज (प्रजनन तंत्र से जुड़ी एक बीमारी) थी और इस वजह से वह आठ साल से मां नहीं बन पा रही थी. महिला के मुताबिक इसके बाद उसने योग करना शुरू किया. इतने में रामदेव अपनी जगह से उठे और उन्होंने बताना शुरू किया कि यह बीमारी कितनी खतरनाक है और इसके लिए मेडिकल साइंस में कोई इलाज नहीं है. पर अगर आप इस बारे में किसी भी प्रसूति रोग विशेषज्ञ से पूछें तो आपको पता चल जाएगा कि यह बीमारी आज कितनी आम है और इसका इलाज बिल्कुल संभव है.
बाबा के राजनीतिक संबोधनों और खास तौर पर विदेशी बैंकों में जमा काले धन के बारे में बात करते हुए भी रामदेव आधे-अधूरे सच का सहारा लेते हैं. बाबा रामदेव लोगों को आसानी से काले धन का गणित समझाते हुए कहते हैं कि विदेशी बैंकों और कर पनाहगाहों में भारतीयों के कुल 400 लाख करोड़ रुपये जमा हैं और अगर यह पैसा वापस आ जाता है तो हर जिले को 60,000 करोड़ रुपये या दूसरी तरह से देखें तो हर गांव को 100 करोड़ रुपये मिलेंगे.
हाल ही में एक साक्षात्कार के दौरान तहलका ने रामदेव से पूछा कि अगर व्यवस्था पूरी तरह भ्रष्ट है तो विदेशों में जमा पैसा वापस आने के बाद भी इस बात की क्या गारंटी है कि आम लोगों तक पहुंचने से पहले यह फिर से भ्रष्टाचार की भेंट नहीं चढ़ जाएगा. इस पर बाबा ने जवाब दिया, 'इसका सबसे बड़ा समाधान तो यही है कि हर व्यक्ति सुबह-सुबह योग करे और ध्यान लगाए. अगर कोई हर रोज अपने शरीर और दिमाग पर काम करता है तो उसके विचारों में इतनी शुद्धता आएगी कि वह किसी और को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहेगा. समाज के आध्यात्मिक स्तर को सुधारना बदलाव का अहम जरिया है.'
सवाल साफ था लेकिन जवाब गोल-मोल. काला धन वापस आएगा तो आम जनता तक उसका फायदा  कैसे पहुंचेगा, इस बारे में रामदेव के पास भी कोई स्पष्ट सोच नहीं थी. लेकिन उनके समर्थकों के लिए यह अहम नहीं था. उनके हिसाब से तो उनके गुरु एक जायज मांग कर रहे थे जिसका बिना सवाल समर्थन करना उनका फर्ज था.
चार जून को दिल्ली के रामलीला मैदान में बाबा रामदेव का सत्याग्रह शुरू होने के दो दिन पहले से ही उनके समर्थक जुटने लगे थे और कुछ ने तो एक दिन पहले से अनशन भी शुरू कर दिया था. इन्हीं लोगों में से एक थे गुजरात स्थित मेहसाणा के जगजीवन चोकसी. चोकसी 97 साल के हैं और उनका जन्मदिन चार जून को ही पड़ता है. चोकसी ने तय किया कि इस बार वह अपना जन्मदिन अपने गुरु के साथ अनशन करते हुए मनाएंगे. वे इससे अनजान थे कि उनके गुरु ने पहले ही सरकार के साथ समझौता कर लिया है. इसकी गवाही बाबा के सहयोगी बालकृष्ण के दस्तखत वाली चिट्ठी दे रही है. इस पत्र में रामदेव ने साफ-साफ कहा है कि उनकी सभी मांगों को सरकार ने मान लिया है इसलिए वे दो दिन का तप करेंगे. सरकार से हुए इस समझौते के बारे में बाबा ने रामलीला मैदान में एकत्रित अपने भक्तों को कुछ नहीं बताया.
बाबा ने सोचा कि अगर इंडिया अगेंस्ट करप्शन के अभियान के केंद्र में मैं नहीं हूं तो फिर मुझे खुद का इससे कहीं बड़ा अभियान खड़ा करना चाहिए
इसके बाद जब चार जून की शाम सरकार ने उनके पत्र को मीडिया के सामने रखा तो हमेशा मुस्कुराते रहने वाले रामदेव की भाव-भंगिमाएं बदल गईं. आक्रामक तेवरों के साथ उन्होंने दावा किया कि दस्तखत करने के लिए उन पर दबाव डाला गया और उन्हें ठगा गया. पर सच को छिपाने वाले सिर्फ रामदेव नहीं थे. केंद्र की संप्रग सरकार भी थी जिसने पहले तो अपने चार प्रमुख मंत्रियों को बाबा से मिलने हवाई अड्डे भेजकर उनसे अगले दो दिनों तक वार्ता की और इसके बाद अचानक अपना पैंतरा बदल लिया. चार केंद्रीय मंत्रियों के गिरोह में से सबसे ज्यादा बोलने का काम मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल कर रहे थे. जैसे-जैसे बाबा के साथ बातचीत आगे बढ़ी वैसे-वैसे शुरुआत में रक्षात्मक रवैया अपनाने वाले सिब्बल आक्रामक होते गए और खुद को सही साबित करने में लग गए. उन्होंने दावा किया कि बाबा को राजनीतिक रैली के लिए अनुमति नहीं मिली थी और न ही उन्हें इतनी बड़ी संख्या में लोगों को जुटाने के लिए मंजूरी दी गई थी.
जैसे-जैसे पांच जून को आधी रात को हुई पुलिसिया ज्यादती के बारे में जानकारी आती गई वैसे-वैसे झूठ का सिलसिला आगे बढ़ता गया. हरियाणा में योग का प्रशिक्षण देने वाली राजबाला उस रात पुलिसिया कार्रवाई में बुरी तरह से घायल हुईं और अभी वे राजधानी के लोकनायक जयप्रकाश नारायण अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच झूल रही हैं. उसी रात बुरी तरह घायल हुए सुनील कुमार ने तहलका को बताया कि मैदान के ज्यादातर बाहर निकलने वाले रास्तों को पुलिस ने बंद कर दिया था और हम कहीं भाग नहीं सकते थे. इसके बावजूद कार्रवाई के बाद कपिल सिब्बल ने इसे सही ठहराते हुए कहा कि पुलिसिया दमन के बारे में वे कुछ नहीं जानते. उन्होंने कहा कि गलती रामदेव की है क्योंकि उन्होंने अनुमति योग शिविर के लिए ली थी लेकिन वे इस तक ही सीमित नहीं रहे. उसी दिन कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने यह भी जोड़ दिया कि रामदेव एक ठग और धोखेबाज हैं.
अब इसे मुद्दा बनाकर सरकार पर हमला कर रही भाजपा की बात. ऊपरी तौर पर भले ही भाजपा पुलिसिया कार्रवाई की निंदा करके सरकार को घेरती दिखी हो मगर अंदरखाने से आ रही जानकारियों पर यकीन करें तो पार्टी का मानना है कि बाबा नौसिखिया तरीके से राजनीति कर रहे हैं. सूत्रों के मुताबिक पार्टी इससे चिंतित है कि बाबा एक तरफ तो सरकार के साथ समझौता कर चुके थे और दूसरी तरफ अपने समर्थकों को अनशन करने के लिए कह रहे थे. बताया जाता है कि इससे भी ज्यादा चिंतित करने वाली बात उनके लिए यह रही कि अपने समर्थकों को पुलिस की लाठियों के सामने अकेला छोड़कर बाबा ने महिला वेश में भागने की कोशिश की.
सवाल उठता है कि आखिर रामदेव का आंदोलन क्यों हुआ था. अगर यह सिर्फ भ्रष्टाचार के विरोध के लिए था तो सरकार ने तो आंदोलन शुरू होने से पहले ही मांगें मान ली थीं. ऐसे में इस सवाल का सही जवाब यही लगता है कि यह आंदोलन शक्ति प्रदर्शन के लिए था. किसी भी राजनीतिक दल के लिए देश भर के लाखों लोगों को एक जगह एकत्रित करना आसान नहीं है लेकिन बाबा में यह क्षमता है. इस सवाल का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है. आखिर सरकार रामदेव में इतनी दिलचस्पी क्यों ले रही थी? खास तौर पर तब जब वह खुद भ्रष्टाचार-निरोधी कानून का मसौदा तैयार कर रही थी. इसका जवाब भी यही है कि उसकी नजर रामदेव के समर्थन में खड़ी भीड़ पर थी.
दरअसल यह सिलसिला ही संख्या बल की वजह से शुरू हुआ. इस साल जनवरी में जब अरविंद केजरीवाल और उनके इंडिया अगेंस्ट करप्शन के साथी भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम की शुरुआत कर रहे थे तब उन्हें जनसमर्थन की जरूरत थी. इसलिए वे बाबा रामदेव के पास समर्थन के लिए गए. बात बन गई. जनवरी से शुरू हुए अन्ना हजारे के आंदोलन में शामिल लोगों में से एक बड़ी संख्या बाबा रामदेव के समर्थकों की थी. यहां अन्ना की टीम इस बात को समझ नहीं पाई कि इस संख्याबल के लिए बाबा रामदेव की अलिखित शर्त क्या थी. यह शर्त थी खुद को पूरे आंदोलन के केंद्र में रखने की.
संकट तब पैदा होने लगा जब रामदेव के साथ संघ की विचारधारा के लोग दिखने लगे. अन्ना हजारे के अभियान के दौरान तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रवक्ता राम माधव भी मंच पर पहुंच गए. इंडिया अगेंस्ट करप्शन के सूत्र बताते हैं कि राम माधव को तुरंत मंच छोड़ने के लिए कहा गया क्योंकि इस अभियान के संचालक यह चाहते नहीं थे कि उनके गैरराजनीतिक अभियान पर संघ की कोई छाप पड़े. इन लोगों का यह दावा है कि मतभेद की शुरुआत यहीं से हुई.
हालांकि, राम माधव इस बात से इनकार करते हैं.  रामदेव भी अपने अभियान की शुरुआत की वजह इसे नहीं मानते. पर इस बात पर हर सियासी खेमे में सहमति है कि बाबा ने भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन पर बैठने का फैसला इसी वजह से किया. बाबा ने सोचा कि अगर इंडिया अगेंस्ट करप्शन के अभियान के केंद्र में वे नहीं हैं तो फिर उन्हें खुद का इससे कहीं बड़ा अभियान खड़ा करना चाहिए.
अमीर और ताकतवर लोग वैसा कोई भी सबूत पीछे नहीं छोड़ते जिससे यह पता लगाने में मदद मिले कि किसका पैसा विदेशी बैंकों में जमा है
अब यहां यह सवाल उठ सकता है कि इस रस्साकशी में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई का क्या हुआ. अभी जो हालत है उसके हिसाब से यह कई हिस्सों में बिखरी हुई दिख रही है. सबसे पहले अन्ना की टीम की बात. अभी जन लोकपाल विधेयक को लेकर जो स्थिति है उसमें तो यही लग रहा है कि इसके जरिए 15,000 लोगों की एक एजेंसी बन जाएगी जो देश भर के भ्रष्टाचार के मामलों की जांच करेगी. अन्ना की टीम चाहती है कि लोकपाल प्रधानमंत्री, कैबिनेट मंत्रियों और उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के खिलाफ लगने वाले भ्रष्टाचार के आरोपों की भी जांच करे.
यह पूछे जाने पर कि इस विभाग को चलाएगा कौन, लोकपाल मसौदा समिति के सदस्य अरविंद केजरीवाल कहते हैं कि इस मोर्चे पर विधेयक के मसौदे में अब तक कोई खास प्रगति नहीं हुई है और इस पर काफी काम करने की जरूरत है. वे इस काम के लिए एक अलग स्वतंत्र संस्था बनाने की बात कर रहे हैं जिसमें सेवानिवृत्त न्यायाधीश, भारत के सीएजी और ऐसे ही अन्य वरिष्ठ अधिकारी हों. इससे अन्ना की टीम द्वारा तैयार किए गए मसौदे में एक नया पेंच आ गया है. अगर लोकपाल सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की जांच कर सकता है और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश लोकपाल की जांच कर सकते हैं तो ऐसे में इस बात की क्या गारंटी है कि यह व्यवस्था बदले का औजार नहीं बनेगी? ऐसी व्यवस्था में एक भ्रष्ट लोकपाल खुद पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा लगाए गए आरोपों के बदले में संबंधित न्यायाधीश पर आरोप लगाकर बच सकता है.
दूसरी बात आती है रामदेव की योजना पर. उनका कहना है कि सिर्फ मजबूत लोकपाल विधेयक से भ्रष्टाचार नहीं मिटाया जा सकता लेकिन इसकी अहम भूमिका होगी. रामदेव कहते हैं कि देश में और देश से बाहर जमा काले धन को आर्थिक तंत्र में डाला जाना चाहिए और इसका राष्ट्रीयकरण कर देना चाहिए. वे यह भी कहते हैं कि भ्रष्टाचार में जो भी दोषी पाए जाए उसे मृत्युदंड जैसी कड़ी सजा दी जानी चाहिए.
वहीं सिविल सोसाइटी के दूसरे समूहों जैसे अरुणा राय की किसान मजदूर शक्ति संगठन और नेशनल कैंपेन फॉर पीपुल्स राइट टू इन्फॉरमेशन की राय कुछ अलग है. जन लोकपाल का इनके विरोध का आधार इसका आकार, इसमें न्यायाधीशों को शामिल किया जाना और लोकपाल की निगरानी व्यवस्था है. ये लोग अन्ना की टीम के साथ इस विधेयक पर बातचीत के लिए नहीं बैठ रहे हैं. इससे यह मतलब निकाला जा रहा है कि भ्रष्टाचार-निरोधी विधेयक तैयार करने को लेकर अलग राय रखने वाला एक खेमा यह भी है. इस मामले में सरकार भी एक पक्ष है. सरकार अभी अन्ना की टीम के साथ मिलकर यह कानून तैयार करने की कोशिश कर रही है. सरकार और अन्ना की टीम में मतभेद प्रधानमंत्री और न्यायपालिका को लोकपाल के दायरे में लाने को लेकर है. इसी मसले पर पिछली बैठक में बात टूट गई थी. वहीं भारतीय जनता पार्टी भ्रष्टाचार-निरोधी कानून तैयार करने के मसले पर संयुक्त संसदीय सत्र बुलाने की मांग कर रही है.
दूसरी तरफ माकपा की नेता वृंदा करात जैसे लोग भी हैं जिनके पास कई और सवाल हैं. मसलन कॉरपोरेट अपराध पर क्या रुख अपनाया जाएगा? कॉरपोरेट अपराध के खिलाफ आवाज उठाने वालों की रक्षा कौन करेगा? हाल के समय में आई घोटालों की बाढ़ को देखते हुए कानून बनाने वाले क्या हर्षद मेहता जैसे मामलों को भूल गए हैं? क्या वे आधुनिक भारतीय भ्रष्टाचार के गॉडफादर को भूल गए हैं जिसने शेयर बाजार में खेल करके हजारों लोगों को चूना लगाया था?
सबसे अहम सवाल तो यह है कि क्या पुराने लोगों के सहारे नये कानून को लागू कर देने से कोई परिणाम निकल पाएगा. या फिर गंभीर प्रशासनिक सुधार हमारी समस्या को हल करने के लिए जरूरी हैं? हाल ही में केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड से सेवानिवृत्त हुए दुर्गेश शंकर कहते हैं, 'बाबा रामदेव बीमारी के लिए एलोपैथिक इलाज बता रहे हैं. वे बीमारी के लक्षणों को खत्म करने की बात तो कर रहे हैं लेकिन समस्या की बुनियादी चीजों जैसे खराब प्रशासन और क्रियान्वयन की लचर व्यवस्था को ठीक करने की बात नहीं कर रहे.'
शंकर कहते हैं कि हमारी आर्थिक जिंदगी बेहद जटिल है. कई कंपनियां, ट्रस्ट, सोसाइटी या लोग हैं जो कानूनी तरीके से कारोबार करने के लिए विदेशों में बैंक खाता खुलवाते हैं. स्विस बैंक पिछले 800 साल से अस्तित्व में है और यह उस देश की अर्थव्यवस्था का आधार है. वे आसानी से भारतीय अधिकारियों को वे नाम नहीं बताएंगे. उदाहरण के तौर पर, महाराजा रणजीत सिंह के बेटे दलीप सिंह की संपत्ति स्विस बैंकों में रखी हुई है. शंकर कहते हैं, 'बेशक हम इसे वापस ले सकते हैं लेकिन यह एक आपराधिक मामला नहीं है. इसलिए हमें विभिन्न कानूनों के तहत काम करना होगा.'
शंकर ने कहा, 'सरकारी तंत्र में कानून का पालन करने के लिए बहुत ठंडे दिमाग से और प्रतिबद्धता के साथ काम करना पड़ता है क्योंकि दूसरे देशों की सरकारें और वहां के बैंक आपके भावनात्मक आक्रोश पर कुछ करने वाले नहीं हैं.' शंकर का कहना है कि वे तथ्य मांगेंगे. अमीर और ताकतवर लोग वैसे भी पीछे कोई सबूत नहीं छोड़ते जिसके जरिए यह पता लगाने में मदद मिले कि किसका पैसा विदेशी बैंकों में जमा है. ऐसे सबूत मिलना किसी चमत्कार से कम नहीं होगा. इसके बावजूद भ्रष्टाचार के मसले पर कुछ प्रगति तो हुई है. भ्रष्टाचार के खिलाफ लोगों के बढ़ते आक्रोश की वजह से 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन मामले में द्रमुक के ए राजा और कनिमोझी समेत राष्ट्रमंडल खेल आयोजन में धांधली के मामले में सुरेश कलमाड़ी जेल पहुंच गए हैं. इसी कड़ी में अगला नाम पूर्व दूरसंचार मंत्री दयानिधि मारन का है. इसके बावजूद कोई भी मामला अदालत में तभी टिक पाएगा जब जांच एजेंसियों के पास ठोस सबूत हों जो पैसे के लेन-देन को पूरी तरह से स्थापित कर दें.
यही वजह है कि शंकर जैसे कर मामलों के जानकार और प्रशासनिक सेवाओं से जुड़े और भी कई लोग सिविल सोसाइटी समूह और बाबा रामदेव के सुझावों को पर्याप्त नहीं मान रहे हैं. उनके मुताबिक ज्यादा एजेंसियां और ज्यादा कानून इस समस्या का समाधान नहीं कर सकते. जरूरत साफ-सुथरे प्रशासन और कानून की है. लेकिन सत्याग्रह के लिए तैयार बैठा मध्यवर्ग यह सुनने के लिए तैयार नहीं है. यह वर्ग पहले अन्ना हजारे के साथ अनशन पर बैठा, फिर इसने बाबा रामदेव का साथ दिया और जब अन्ना दोबारा अनशन पर बैठे तो ये लोग फिर उनके साथ बैठेंगे. इस वर्ग ने बड़े खतरनाक ढंग से अपने आसपास की दुनिया को बढ़ते, बिखरते और सिमटते देखा है. भूमंडलीकरण के दौर में पली-बढ़ी नयी पीढ़ी पैसे कमाना चाहती है और इसने पुराने पारिवारिक और सामाजिक बंधनों को टूटते देखा है. यही वर्ग बाबा रामदेव जैसे नये जमाने के गुरुओं के पास जा रहा है. यह वर्ग यह मानने को तैयार नहीं कि लोकतंत्र में चीजें एक निश्चित प्रक्रिया के साथ ही होती हैं और जो बीमारी सदियों पुरानी हो उससे छुटकारा पाने का कोई त्वरित समाधान नहीं हो सकता. शंकर कहते हैं कि इस वर्ग में वे लोग हैं जो एक तरफ तो भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रदर्शन करेंगे और दूसरी तरफ अखबारों के प्रॉपर्टी पेजों पर सबसे बढ़िया सौदे तलाशेंगे, यह जानते हुए भी कि जब वे ये संपत्तियां खरीद रहे होंगे तो इसके लिए वे कुछ रकम ब्लैक में भी चुका रहे होंगे. अगर भ्रष्टाचारियों को फांसी देना ही एकमात्र िवकल्प है, जैसा कि रामदेव कहते हैं तो इस देश में हर प्रॉपर्टी एजेंट और मकान मालिक को फांसी पर चढ़ाना पड़ेगा.
रामदेव के 1,100 करोड़ रुपये के साम्राज्य पर भी सवाल उठ रहे हैं. जो उनके समर्थक नहीं हैं, उनमें से कुछ लोग इस वजह से बाबा को भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई के लिए सही व्यक्ति नहीं मानते. इस तरह से देखा जाए तो भ्रष्टाचार के खिलाफ उदार और वाम विचारधारा के कुछ लोगों द्वारा शुरू किया गया अभियान धार्मिक अनुष्ठान तक पहुंच गया है. अन्ना हजारे और रामदेव के आंदोलन पर संप्रग सरकार की अकड़ और अकुशलता ने भाजपा, संघ और रामदेव को बैठे-बिठाए एक मुद्दा थमा दिया है. 1991 में इसी मध्यवर्ग के आक्रोश ने अयोध्या आंदोलन और मंडल आयोग विरोधी आंदोलन का रूप लिया था.
भारत का उभरता हुआ नया मध्यवर्ग एक ऐसे मोड़ पर है जहां उसके सामने दो रास्ते हैं. इसमें पहला है नए जमाने के इन गुरुओं की शरण जिनके विचारों में संपूर्ण दृष्टि का अभाव है. लेकिन अगर वह चरणबद्ध बदलाव चाहता है तो उसे चटपट समाधान वाली शैली को पीछे छोड़कर लोकतंत्र को एक विस्तृत दृष्टि के साथ समझना होगा. भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाले एक योद्धा जयप्रकाश नारायण ने कभी कहा था, 'अगर आप स्वतंत्रता की बात करते हैं तो कोई भी लोकतंत्र या संस्थाएं राजनीति से अलग नहीं रह सकतीं. राजनीतिक विसंगति का इकलौता इलाज और भी अधिक व साफ-सुथरी राजनीति है, न कि राजनीति को नकारना.'

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