Monday, June 27, 2011

शर्मीला के आवाज में आवाज मिलाना ही सच्ची देशभक्ति है.




शायद उन्हें सात बहने इसलिए कहा जाता है कि आम तौर पर इस देश में बेटियों और बहनों को तमाम जुल्मो सितम सहते हुए भी ख़ामोश रहने की जो आदत डाली गयी है वो आदत ये बहनें भी सीख लेंऔर शायद ये आदत उन्होंने सीख भी ली है और हमने ये मान भी लिया है | अगर ऐसा नहीं होता तो लोकपाल के नाम पर अन्ना के अनशन और बाबा रामदेव द्वारा आम आदमी के स्वाभिमान को जगाने की मुहिम में पगलाई भीड़ शर्मीला के हठ पर अपने होंठ सीए नहीं बैठती इन भगिनी प्रदेशों से एक मणिपुर की इरोम आम आदमी और मानवीयता के खिलाफ पिछले ५३ साल से इस्तेमाल किये जा रहे भारतीय सेना विशेषाधिकार अधिनियम को हटाये जाने को लेकर 11 सालों से भूख हड़ताल पर बैठी है क्या उसके इस हठ तप को लेकर हमारा स्वाभिमान नहीं जागता? एक तरफ सत्ता खुलेआम उत्तर पूर्व में मानवाधिकारों को आर्मी के बूटों से रौंदवाने पर आमादा है दूसरी तरफ हम उम्मीद कर रहे हैं कि यही सरकार भ्रष्टाचार का खात्मा करके लोकप्रिय लोकतंत्र की स्थापना करेगी|क्या आप इसे ईमानदारी कहेंगे कि कलावती से लेकर भट्टा परसौल की कृष्णा तक को लेकर टेसुयें बहाने वाले भारत भाग्य विधाता खानदान से ताल्लुक रखने वाले राहुल गांधी ने आज तक शर्मीला के सन्दर्भ में एक बार भी अपनी जुबान नहीं खोली है |संसद में महिला आरक्षण के मामले में क्रिचदार साड़ी में भाषण देने वाली सोनियाशबानासुषमा और अन्य महिला सांसद पिछले ११ वर्षों में शर्मीला को लेकर एक सवाल भी उठाने की जुर्रत नहीं दिखा पायी हैंमीडिया भीड़ और भाषा के आधार पर इतना बटा हुआ है कि उससे उम्मीद करना बेमानी है ख़बरें वहीँ हैं जिनमे या तो भीड़ हो या जो भीड़ बटोरे |

भारतीय सेना विशेषाधिकार अधिनियम जो जम्मू कश्मीर के अलावाअसममणिपुरअरुणांचल प्रदेशमेघालयमिजोरम और त्रिपुरा में लागू है ने पिछले हफ्ते अपना एक और साल पूरा कर लियायह कानून कांग्रेस और ख़ास तौर से नेहरु परिवार की देन है और इसमें और आपातकाल में कोई ख़ास अंतर नहीं हैख़ास तौर से इसका रूप और भी वीभत्स इसलिए है कि इसमें सीधे तौर पर न सिर्फ एक क्षेत्र और राज्य को अशांत घोषित कर उसे सेना को सौंप दिया जाता है बल्कि आम आदमी पर भी शासन करने का अधिकार सेना को दे दिया जाता है और निश्चित तौर पर आदिकाल से ये होता आया है कि जब कभी सेना बर्बर होती है तो उसका पहला शिकार महिलायें और फिर युवा होते हैं ,मणिपुर में भी यही हो रहा है कश्मीर में भी यही हो रहा है |दुखद ये है कि आहत होने के बावजूद यहाँ की महिलायें उफ़फ् तक नहीं कर सकती|गाँधी ,चेव ग्वेरा को अपना आदर्श मानने वाली इरोम जब ये कहती है कि क्या एक सभ्य समाज में इस कानून को स्वीकार किया जाना चाहिए ?तो उसका ये सवाल सिर्फ सरकार से नहीं होता ,देश की उस जनता से भी होता है जो खामोश ,रहने सहने और खुद से बाबस्ता जिंदगी जीने की आदि हो चुकी है |

बहुत ही अजीबो गरीब है कि अरुंधती के मामले में ताल ठोक कर हो हल्ला मचाने वाले तमाम वामपंथी शर्मीला के मामले में वैसी अधीरता नहीं दिखाते |अरुंधती खुद कश्मीर से लेकर छत्तीसगढ़ तक मानवाधिकारों की हत्या को लेकर हो हल्ला मचाती हैं लेकिन उनके एजेंडे से उत्तर-पूर्व गायब रहता है साफ़ प्रतीत होता है कि शर्मीला के मामले को लेकर ये अजीबो गरीब चुप्पी किसी साजिश का हिस्सा है इस साजिश में कुछ हो चाहे न होनेतृत्व के संकट से जुड़ा डर तो साफ़ नजर आता हैअरुंधती और उन जैसे तमाम लोग जानते हैं ये स्वाभिमानी बहने अपना नेतृत्व किसी को नहीं देंगीऔर न ही वो तरीका अपनाएंगी जो अरुंधती जैसे लोग अपनाते हैं उनकी नेता कोई है तो शर्मीला है सिर्फ शर्मीला ,उनके लिए पल -पल मरती हुई |अब तक देश में जितने भी जनांदोलन हुए हैंलोगों ने जीते हुए किये हैंकिसी ने मरते हुए कोई आन्दोलन नहीं कियाइस एक  बातसे शर्मीला का सत्याग्रह गांधी से भी महान हो जाता हैमगर अफ़सोस है कि गोरों को तो गाँधी का सत्याग्रह झुकने पर मजबूर कर देता थालेकिन अपने देश में अपनी ही सरकार शर्मीला के इस सत्याग्रह पर ख़ामोशी से बैठकर तमाशा देखती रहती हैऔर अलगाववाद के संभावित खतरे की दुदंभी बजा करके आफ्प्सा की धार और पैनी करती रहती है |

बाबा रामदेव के स्वास्थ्य की पल-पल खबर मिडिया में प्रसारित हो रही थी. उनके स्वास्थ्य बुलेटिन जारी किए जा रहे थे. सिर्फ नौ दिन के उपवास में उनके अंग-प्रत्यंगों पर होने वाले दुष्प्रभावों की चर्चा की जा रही थी. १० साल के उपवास सेशर्मीला के लीवर-किडनी-ह्रदय पर क्या असर हुआ है… इस से किसी को सरोकार नहीं. इसलिए कि वो एक आम इंसान हैं?? यानि कि किसी आम इंसान को अपनी आवाज़ उठाने का कोई हक़ नहीं??
बहुत मुमकिन है इन दिनों बीमार चल रही शर्मिला की साँसें कभी किसी वक्त थम जाए  कमोजर पड़ती जा रही उसकी हड्डियों को ढंकी त्वचा अब थकने लगी हैंशिराओं से होकर गुजरने वाले रक्त की रफ़्तार अब धीमी पद रही है ये बात दीगर है कि शर्मीला फिर भी मुस्कुरा रही है ईश्वर न करे अगर शर्मीला को कुछ हुआ तो आने वाली पीढ़ी और मानवता शायद ही हम आम हिन्दुस्तानियों को कभी माफ़ कर पाएसत्ता अपना चरित्र नहीं छोड़ सकती ये तय है सिर्फ अख़बारों में पैसे देकर महापुरुषों के नाम पर अपने श्रद्धा सुमन अर्पित कर देने और पुण्य तिथियाँ मनाकर खुद को राष्ट्रवादी साबित करने वाले हम आप गाँधीभगत सिंहचन्द्र शेखर और न जाने कितनो को खो चुके हैं, अगर सत्ता का चरित्र जन -विरोधी है तो उसके खिलाफ संघर्ष कर रहे जननायकों के आवाज में आवाज मिलाना ही सच्ची देशभक्ति है अब इसमें हमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मणिपुर समेत समूचे उत्तर -पूर्व में लोकतंत्र का जो स्वरुप में है वो पूरी तरह से जनजमीन और जंगल विरोधी है.

जनर्लिस्ट यूनियन फॉर सिविल सोसायटी (जेयूसीएस)
09873672153,07503000208,08802268097

1 comment:

  1. हम भीषण संकट के दौर से गुज़र रहें हैं .. इरोम शर्मीला का जीवट संघर्ष ,पोस्को में जनता (बच्चों समेत ) का बहादुराना संघर्ष ,विदर्भ से लेकर बुंदेलखंड में किसानों की आत्महत्याएं ,बस्तर से लेकर झारखण्ड में आदिवासियों द्वारा जन जंगल ज़मीन के लिए चल रही लड़ाईयां मीडिया के लिए कभी मुद्दा नहीं रही ....शासक वर्ग ने बड़ी चालाकी और धूर्तता से इन मुद्दों को निगल लिया है इसलिए ऐसे संकट के दौर में हमे एक जुट होकर और सघन संघर्ष चलाना पड़ेगा ......हालाँकि सभी वामपंथी पार्टियों को आलोचना के डंडे से हांकना सही नहीं है ..और ना ही अन्ना या रामदेव के साथ आई जनता को मुर्ख और दक्षिणपंथी कहकर खारिज करके समस्या से पल्ला झाड़ लेना इसका हल है ..इस भयानक दमन के दौर में ज़नता की शक्ति में विश्वास रखना बेहद ज़रूरी है. भ्रस्टाचार के जड़ में कॉरपोरेट शक्तियों द्वारा किये जा रहे लूट को जनता के सामने पर्दाफाश करना हमारी ज़िम्मेदारी बनती है

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