Thursday, June 16, 2011

सरकार गिराने के ऐवज में राष्ट्रपति बनाने का था ऑफर



कांग्रेस का सनसनीखेज खुलासा- सरकार गिराने के ऐवज में राष्ट्रपति बनाने का था ऑफर
खुफिया एजेंसियों ने यह जानकारी तो सरकार को दी थी कि रामदेव के पीछे संघ परिवार

योग गुरु बाबा रामदेव दिल्ली के रामलीला मैदान में विदेशों में जमा काला धन वापस लाने के लिए नहीं, बल्कि केंद्र सरकार को गिराने आए थे। रामदेव ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ मिलकर जो व्यूहरचना की थी, उसके मुताबिक रामलीला मैदान को भारत के तहरीर चौकमें बदलकर केंद्र सरकार को गिराने की थी। बदले में संघ परिवार की ओर से रामदेव को 2012 में राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाने का प्रस्ताव दिया गया था।  
चार जून को इसकी पुख्ता जानकारी सबसे पहले कपिल सिब्बल को हुई। सिब्बल ने फौरन प्रणब मुखर्जी से बात की। फिर दोनों प्रधानमंत्री के पास गए। प्रधानमंत्री ने चिदंबरम से बात की। सोनिया को बताया। तय हुआ कि शाम को प्रेस कॉन्फ्रेंस करके रामदेव के साथ हुई डीलको सार्वजनिक किया जाए और अनशन न खत्म होने पर मैदान खाली कराने के लिए प्लान दोको अमल में लाया जाए।
सूत्रों ने बताया कि रामदेव और संघ परिवार की सियासी खिचड़ी कई दिनों से पक रही थी। संघ के थिंक टैंक माने जाने वाले एस.गुरुमूर्ति, संघ और सर्वोदयी और अन्य गैर वामपंथी सोच वाले स्वयंसेवी संगठनों के बीच पुल का काम कर रहे पूर्व प्रचारक गोविंदाचार्य इस योजना के सूत्रधार थे। इनके प्रयासों से रामदेव की संघ प्रमुख मोहन भागवत, भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी व अन्य संघ नेताओं के साथ कई बार मुलाकात हुई। हरिद्वार जाकर भी मोहन भागवत और भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी रामदेव से मिले थे।
रामदेव के सत्याग्रह शुरू होने से पहले लखनऊ में भाजपा की कार्यकारिणी की बैठक के दौरान भी गडकरी इस मामले पर भागवत का निर्देश लेने नागपुर गए थे। वित्तीय अनियमितताओं को लेकर कानून के कठघरे में आए पाँच बड़े पूँजीपतियों समेत कुछ अन्य उद्योगपतियों ने भी पूरा सहयोग देने का वादा किया था। इनमें एक उद्योगपति के रामदेव से रिश्ते जगजाहिर हैं।
रणनीति के मुताबिक चार जून से रामदेव का अनशन शुरू होने के बाद पाँच और छः जून तक संघ और बाबा अपनी ताकत झोंक कर दिल्ली में रामलीला मैदान और उसके आसपास दो से तीन लाख लोगों की भीड़ जुटा देते। फिर रामदेव विदेशी बैंकों में जमा काले धन का कथित ब्यौरा देना शुरू करते, जिससे कांग्रेस और केंद्र सरकार का संकट बढ़ता और सोनिया गाँधी पर निशाना साधते हुए मनमोहन सिंह से इस्तीफे की माँग की जाती।
सूत्रों के मुताबिक भाजपा, जद (यू), अकाली दल, ओमप्रकाश चौटाला, चंद्रबाबू नायडू, नवीन पटनायक, असम गण परिषद जैसे विपक्षी दल भी इस माँग का समर्थन करते हुए अपना दबाव बढ़ाते। जनमत के दबाव में वाम मोर्चे के दल भी इससे जुड़ते। फिर संप्रक में द्रमुक और दूसरे नाखुश घटक दलों को छिटकाने की कोशिश होती। लालकृष्ण आडवाणी और राकांपा अध्यक्ष शरद पवार की पिछले दिनों हुई मुलाकात में भी कुछ खिचड़ी पकने की बात सरकारी सूत्र कह रहे हैं। कहा यह जा रहा था कि सरकार गिरने पर राजग और संप्रग के घटक दलों को मिलाकर कोई ऐसी सरकार बनाई जाएगी, जिसे भाजपा व वाम मोर्चे दोनों का समर्थन मिले। हालाँकि खुफिया एजेंसियों ने यह जानकारी तो सरकार को दी थी कि रामदेव के पीछे संघ परिवार है, लेकिन सरकार गिराने की योजना की मुकम्मल जानकारी सबसे पहले कपिल सिब्बल को पं.एनके शर्मा से मिली.

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