Sunday, June 12, 2011

यह बाबा तो आम आदमी भी नहीं है...



बाबा रामदेव के जयकारे लगाने वालों को अब तो यह बात समझ आ जानी चाहिए कि इस बाबा की इच्छाशक्ति तो आम आदमी जितनी भी नहीं है।

मांगें पूरी न होने तक अनशन न तोड़ने की बात कहने वाले बाबा को आखिर ऐसी कौन सी मजबूरी आ गई जो 9 दिन में ही अनशन तोड़ दिया। दूसरी तरफ अगर हम मणिपुर की सामाजिक कार्यकर्ता इरोम शर्मिला को देखें तो वह 10 सालों से भी ज्यादा वक्त से अपनी मांगों को लेकर भूख हड़ताल पर डटी हैं।

सरकार के लोग उन्हें जबरन पकड़ कर नाक के जरिए फीड कराते हैं, लेकिन वह अब भी अपने अनशन पर डटी हैं। सरकार का अत्याचार भी उन्हें टस से मस नहीं कर सका है। जबकि बाबा के पास तो आगे पीछे घूमने वाले एक से बढ़कर एक लोग हैं। तो क्या हुआ बाबा को और उनके मुद्दे को?

पिछले कई महीनों से बाबा रामदेव ने यह संकल्प लिया था कि जब तक काले धन को वापस लाने की वैधानिक प्रक्रिया शुरू नहीं हो जाती, भ्रष्टाचार को रोकने के लिए ठोस कायदे नहीं बन जाते और व्यवस्था परिवर्तन करने के लिए इलेक्टोरल रिफॉर्म सहित दूसरे सुधार लागू नहीं हो जाते तब तक अनशन जारी रहेगा। बाबा बार बार कहते रहे कि मैं मौत से नहीं डरता। तो अब क्या हो गया बाबा को?

इसमें कोई संदेह नहीं है कि बाबा अच्छे योग गुरु हैं, लेकिन सिर्फ उससे ही उनकी सामाजिक प्रतिबद्धता जाहिर नहीं होती है। अगर इरोम की प्रतिबद्धता देखें तो बाबा तो उनके आगे कहीं ठहरते ही नहीं हैं। अब भले ही बाबा अलग-अलग बयान देकर इस मसले को भटकाने की कोशिश करें, लेकिन हकीकत सबके सामने हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि यह सब उत्तराखंड की राजनीति को ध्यान में रखकर किया जा रहा था।

उत्तराखंड सरकार पर भ्रष्टाचार के कई आरोप हैं, बावजूद इसके सरकार अपने दाग धोने की बजाय कहती है कि बाबा उत्तराखंड आकर आंदोलन करें हम उनका साथ देंगे। तो क्या यह हास्यासपद नहीं है। बाबा को सपोर्ट करने के चक्कर में उत्तराखंड सरकार कुछ ज्यादा ही आगे निकल गई।

एक तरफ डॉक्टर कहते रहे कि बाबा का स्वास्थ्य ठीक है और सुधार हो रहा है, वहीं मुख्यमंत्री कहने लगे कि बाबा कोमा में जा सकते हैं। इस सबका तो एक ही मतलब निकलता है कि भले ही बाबा के उठाए मुद्दों में जान हो, लेकिन बाबा की नीयत और ईमानदारी में आंख मूंदकर भरोसा नहीं किया जा सकता है। बाबा पूरी दुनिया के करप्शन पर भले ही बोलते रहे लेकिन जिस राज्य से वह जुड़े हैं, वहां का भ्रष्टाचार उन्हें कभी नजर ही नहीं आया।

उत्तराखंड में कुछ ही महीनों में चुनाव होने हैं और मौजूदा बीजेपी सरकार पर भ्रष्टाचार के कई आरोप हैं। ऐसे में वहां के मुख्यमंत्री भ्रष्टाचार के खिलाफ बाबा का साथ देने की बात कहते हैं और बाबा भी वहां के भ्रष्टाचार पर मूक दर्शक बने रहते हैं, तो शक होना लाजिमी है। सवाल तो यह भी उठ रहे हैं कि कहीं बाबा का अनशन पूरा नाटक ही तो नहीं था। नींबू पानी पीकर और शहद लेकर भला यह कौन सा अनशन हुआ।

बाबा को अगर सच में अपने मुद्दों के आगे और देश हित के आगे अपनी जान की परवाह ही नहीं थी तो वह रामलीला मैदान से भागे ही क्यों? अगर नहीं भागते तो क्या होता...पुलिस गिरफ्तार कर लेती....जेल भेज देती....या अगर बाबा पर यकीन करें तो बाबा का एनकाउंटर कर देती....तो.....बाबा तो मौत से नहीं डरते ....तो फिर बाबा को क्या हुआ जो भाग गए और 9 दिन के अनशन पर जब हालत खराब होने लगी तो जूस पीकर अनशन तोड़ दिया।

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