Thursday, June 16, 2011

मुसलमानों का पक्ष रखने की कोशिश




आज़ाद हिंदुस्तान में मुसलमान ज़ाहिद ख़ान के लेखों का संग्रह है। भारतीय मुसलमानों को केंद्र में रख कर ज़ाहिद ख़ान ने ये आलेख लिखे हैं। मुसलमानों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति पर तो उन्होंने नज़र डाली ही है वर्तमान माहौल में मुसलमानों के सामने जिस तरह के सवाल खड़े किए जाते हैं उन पर भी उन्होंने विस्तार से चर्चा की है। लेकिन ऐसा नहीं है कि उनकी चिंता सिर्फ़ मुसलमानों को लेकर है। उनकी चिंता में हर वह वर्ग और समुदाय शामिल है जो शोषण का शिकार है। उनकी यह चिंता गैरवाजिब भी नहीं। यह सवाल इसलिए भी मौजूं है क्योंकि हर सियासी पार्टी बराबरी का बात करती है। लेकिन जब मुसलमान अपने हक़ की आवाज़ बुलंद करता है तो उसे तुष्टिकरण जैसे सवालों में उलझा दिया जाता है। ज़ाहिद खान की किताब आज़ाद हिंदुस्तान में मुसलमानमें इन सवालों को शिद्दत के साथ उठाया गया है।
ज़ाहिद खान साफ करते हैं कि इस किताब का मकसद मुसलमानों की वतर्मान सामाजिक, आर्थिक स्थितियों का समग्रता के साथ अध्ययन प्रस्तुत करना और उसे लोगों के सामने रखना है। ज़ाहिद का मानना है कि सरकार ने 1980 में अल्पसंख्यकों और अनुसूचित जातियों की आर्थिक स्थितियों का अध्ययन करने के लिए डॉ. गोपाल सिंह कमेटी का गठन किया था और छब्बीस साल बाद सच्चर कमेटी। लेकिन हैरत इस बात को लेकर है दोनों ही कमेटी ने जो नतीजे निकाले उनमें कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है। सरकारी नौकरियों में तो मुसलमानों का हाल, दलितों से भी बदतर है। मुल्क में न केवल विभिन्न क्षेत्रों और तबकों के बीच, बल्कि सांप्रदायिक स्तर पर भी गहरी खाई मौजूद है। इससे सरकार की नीयत को भी समझा जा सकता है। जाहिद ने देश की कट्टरवादी ताक़तों पर भी सवाल खड़ा करते हैं। जाहिर है कि देश का विकास तभी मुमकिन है जब सबको बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराई जाएं। लेकिन दिक्क़त तब होती है जब मुसलमानों को लेकर देश में अचनाक ही लोग तुष्टिकरण का राग अलापने लगते हैं। मुसलमानों को लेकर यह धारणा भी सुनियोजित ढंग से फैलाई गई है कि मुसलमान परिवार नियोजन के ख़िलाफ़ हैं, इसलिए उनकी जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है। एक दिन ऐसा भी आ सकता है जब इनका बहुमत हो जाएगा और वे भारत पर कब्ज़ा कर लेंगे। लेकिन इस तरह की आशंका पूरी तरह से निराधार है। क्योंकि, कुछ मजहबी फतवेबाज़ों के परिवार नियोजन के विरोध के बावजूद आम मुसलमान छोटे परिवार की जरूरत को महसूस करने लगा है। जाहिर है ऐसे में उनकी आबादी बढ़ने की बातों को लेकर जो अफ़वाह फैलाई जाती रही है उस पर भी अंकुश लगेगा। लेखक ने उन आयोगों की रिपोर्टों पर सरकार की चुप्पी पर भी चिंता जताई है। सांप्रदायिक दंगों के बाद कई आयागों ने अपनी रिपोर्ट में कुछ राजनीतिक दलों, पुलिस और प्रशासन की भूमिका पर जिस तरह से सवाल उठाए लेकिन सरकार ने इन रिपोर्टों पर कोई कार्रवाई नहीं कर मुसलमानों के ज़ख़्मों पर नमत छिड़कने का काम ही किया है। ज़ाहिद खान ने इस सच को सामने रखा है और ईमानदारी से रखा है।
ज़ाहिद खान ने कुछ लेखों में अभिव्यक्ति की आज़ादी की बात भी उठाई है। डेनमार्क के एक समाचार पत्र में छपे पैगंबर साहब के कार्टून, बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन के साथ हैदराबाद में हुए दुर्व्यवहार, फिल्म अभिनेता आमिर खान के नमर्दा बचाओ आंदोलन को समर्थन देने पर गुजरात में उनकी फिल्म प्रदर्शन का विरोध सरीखी घटनाओं को केंद्र में रख कर अभिव्यक्ति की आज़ादी और उसके दुरुपयोग के बारे में अपने विचार रखते हैं।
किताब में शामिल लेख भारतीय मुसलमानों की वतर्मान स्थिति और उसके लिए जिम्मेदार सरकारों के चेहरों को बेनकाब करने की कोशिश करते हैं। ज़ाहिद ने भाजपा और संघ परिवार के अन्य संगठनों का चरित्र भी उजागर किया ही है, लेकिन धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देने वाली दूसरी सियासी जमातों के चेहरे पर पड़े झीने परदे को भी हटाया है।

आज़ाद हिंदुस्तान में मुसलमान (लेख संग्रह), लेखक: ज़ाहिद खान, प्रकाशक: कॉनफ्लुएंस इंटरनेशनल, नई दिल्ली, मूल्य: 225 रुपए (हार्डबाउंड), 60 रूपए (पेपरबैक)।

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