Monday, June 13, 2011

कोई बताएगा कि बिहार में मीडिया को ये हो क्‍या गया है?




अगर आप बिहार से बाहर रहते हैं और ऐसी खबरों को लेकर सचेत नहीं हैं, तो इस बात की पूरी आशंका है कि अररिया के फारबिसगंज में हुए पुलिसिया हत्याकांड के बारे में नहीं जानते। अगर आप पटना में हैं, तो भी यह शायद आपके लिए बड़ी खबर नहीं होगी। राज्य को हिला दे, ऐसी बड़ी खबर तो आप इसे नहीं ही मानते होंगे। मीडिया ने बताया ही नहीं कि यह बड़ी खबर है, इसलिए आपको नहीं पता कि फारबिसगंज हत्यकांड बड़ी खबर है। मीडिया का एजेंडा तय करने की ताकत की वजह से ऐसा होता है। ऐसा नहीं है कि मीडिया विचार करने की आपकी शक्ति को छीन लेता है। लेकिन आप किन चीजों के बारे में विचार करेंगे, यह अक्सर मीडिया ही तय करता है। फारबिसगंज अगर आपके लिए मुद्दा नहीं है तो इसकी वजह यही है कि मीडिया ने फॉरबिसगंज को मुद्दा नहीं बनने दिया।
दैनिक हिंदुस्तान, पटना संस्करण, पहला पेज, 5-11 जून, 2011
[ फारबिसगंज, अररिया हत्याकांड के संदर्भ में ]
दैनिक जागरण, पटना संस्करण, पहला पेज, 5-11 जून, 2011
क्या जिस दौरान बिहार में फारबिसगंज फायरिंग हुई थी, उस दौरान बिहार में ऐसा कुछ इतना बड़ा चल रहा था कि फारबिसगंज को पहले पन्ने पर रखना संभव नहीं था। यह जानने के लिए यह देखना होगा कि उस दौरान ये बड़े अखबार तीसरी खबर के रूप में क्या चला रहे थे। आलोच्य सप्ताह में दैनिक हिंदुस्तान पटना ने पहले पन्ने पर तीसरी खबर के रुप में ये खबरें चलायीं।
बचना है तो पेड़ लगाएं
धरहरा संदेश बढ़ाने फिर पहुंचे नीतीश
समंदर से निकला शुगर का रामबाण इलाज
आंधी पानी से भारी तबाही, 24 की मौत
एक जुलाई से मिलेगा टीटीई का फॉर्म
ग्रामीण सड़कों के लिए बनेगा निगम: नीतीश
वहीं दैनिक जागरण की तीसरी बड़ी खबर की लिस्ट भी बेहद रोचक है :
चाहिए शीतल छाव, चलिए गांव गिरांव
पेड़ लगाएं बेटी बचाएं
डॉन का उठ गया आईएसआई से भरोसा
ताजपुर से दरभंगा तक बनेगी चार लेन सड़क
राज्यों ने रोया धन न होने का रोना
स्पष्ट है कि मामला पहले पन्ने पर स्थान होने या न होने का या इस दौरान किसी बड़ी खबर के छाए रहने का नहीं है। इसी हफ्ते में अखबारों ने बेहद औसत और हल्की खबरें पहले पन्ने पर छापीं। अगर अखबार फारबिसगंज फायरिंग को नहीं छाप रहे थे तो इसका सीधा सा मतलब है कि यह उनका सचेत फैसला था। जैसे अगर हिंदुस्तान अखबार ने जागरण के पहले पन्ने पर छपी दोनों खबरों को नहीं लिया, तो इसका यही मतलब है कि जहां जागरण खबरों को अंडरप्ले कर रहा था, वहीं हिंदुस्तान फारबिसगंज की खबरों को ब्लैक आउट कर रहा था।
बिहार के तीसरे प्रमुख अखबार प्रभात खबर का कवरेज भी देखें तो उसमें फारबिसगंज अमूमन गायब है। इस अखबार में पहले पेज की खबरों में पौधे लगाएं, सूबे को हरा बनाएं: नीतीशऔर बालों से बना पेस्टिसाइड जैसी खबरों के लिए तो जगह है लेकिन पुलिस फायरिंग पर वहां 6 जून से 12 जून के बीच पहले पन्ने पर कोई खबर नहीं है। अगर बिहार के तीनों प्रमुख अखबार किसी खबर को प्राथमिकता न देने पर तुल गए हों, तो ऐसी खबर का मुद्दा बन पाना आसान नहीं है।
प्रभात खबर, पटना संस्करण, पहला पेज, 5-11 जून, 2011
[ अररिया हत्याकांड के संदर्भ में ]
 

बिहार में मीडिया मैनेजमेंट और मोनोपॉली
बिहार में हिंदुस्तान टाइम्स ग्रुप और दैनिक जागरण की प्रिंट मीडिया में मोनोपॉली है। इंडियन रिडरशिप सर्वे 2010 की चौथी तिमाही (IRS Q4) के आंकड़े इस बात को पुष्ट करते हैं। एवरेज इश्यू रिडरशिप यानी हर दिन के अखबार की औसत पाठक संख्या के बारे में नीचे दिये आंकड़ों को देखें। आंकड़े लाख में हैं:

- ये आंकड़े आपको बताते हैं कि बिहार में सबसे ज्यादा बिकने वाले दस अखबारों की कुल एवरेज इश्यू रीडरशिप (एआईआर) 81.01 लाख है।
- इसमें से 46.25 लाख यानी 57% पाठक सिर्फ एक अखबार दैनिक हिंदुस्तान के पास हैं।
- हिंदुस्तान टाइम्स की पाठक संख्या को दैनिक हिंदुस्तान के साथ जोड़ लें तो एचटी मीडिया समूह के पास बिहार के टॉप 10 अखबारों की 58.37% पाठक संख्या है।
- अब अगर एचटी मीडिया और दैनिक जागरण समूह के अखबारों (दैनिक हिंदुस्तान, दैनिक जागरण, हिंदुस्तान टाइम्स और आईनेक्स्ट) की पाठक संख्या को जोड़ दें तो यह संख्या 72.73 लाख हो जाती है।
- ये दो मीडिया समूह बिहार के टॉप 10 अखबारों के पाठकों का 89.67% कंट्रोल करते हैँ।
- यानी इन दो अखबारों को मैनेज करके कोई बिहार के टॉप 10 प्रिंट मीडिया के लगभग 90% को मैनेज कर सकता है।
- इन दोनों की पाठक संख्या में अगर प्रभात खबर की पाठक संख्या को जोड़ दें तो बिहार का लगभग पूरा मीडिया कवर हो जाता है।
मीडिया के नीतीश प्रेम का अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र
नीतीश कुमार के मीडिया प्रबंधन में बढ़ते विज्ञापन खर्च का योगदान है। सूचना के अधिकार से मिली जानकारी से यह बता चला है कि नीतीश सरकार ने साल दर साल अखबारों को दिये जाने वाले विज्ञापन के खर्च में बढ़ोतरी की है। बिहार में निजी उद्यम की हालत ठीक नहीं होने के कारण कुल विज्ञापनों में सरकारी विज्ञापनों का हिस्सा काफी बड़ा होता है।
आरटीआई कार्यकर्ता अफरोज आलम साहिल के आवेदन से नीतीश कुमार के मीडिया प्रबंधन के अर्थशास्त्र के बारे में काफी महत्वपूर्ण जानकारियां मिलीं। साहिल नयी दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया में मास कम्युनिकेश के विद्यार्थी हैं। उन्होंने अपना आवेदन बिहार के सूचना और जनसंपर्क विभाग को भेजा था।
बिहार सरकार का विज्ञापनों पर खर्च

2009-10 फरवरी तक के आंकड़े इस आरटीआई रिप्लाई में दिये गये हैं। 28 फरवरी 2010 तक बिहार सरकार विज्ञापन पर 19.66 करोड़ रुपये खर्च कर चुकी थी।
बिहार में नीतीश सरकार के चार साल पूरा होने पर 24 नवंबर 2009 को एक ही दिन 1.15 करोड़ रुपये के विज्ञापन 24 अखबारों को दिये गये। इन विज्ञापनों के शीर्षक थे बदलता बिहार और नीतीश सरकार के चार साल। इन विज्ञापनों का बड़ा हिस्सा लगभग 72.5 लाख रुपये दैनिक हिंदुस्तान, दैनिक जागरण, प्रभात खबर और आज को दिये गये। सबसे ज्यादा 37 लाख रु के विज्ञापन दैनिक हिंदुस्तान को मिले। इस विज्ञापन के फौरन बाद 31 दिसंबर, 2009 को दैनिक हिंदुस्तान ने एक एसएमएस पोल के नतीजे छापे, जिसके मुताबिक राष्ट्रीय हीरो के तौर पर नीतीश कुमार देश में सबसे आगे रहे। उन्हें 40.64 फीसदी लोगों ने पसंद किया।
लेकिन नीतीश कुमार के प्रति बिहार के मीडिया के प्यार के सिर्फ आर्थिक तरीके से नहीं समझा जा सकता। नीतीश कुमार को बिहार में जाति का भी समर्थन हासिल है और यह जाति उनकी अपनी जाति नहीं है। बिहार के मीडिया का जातिवादी स्वरूप अब जगजाहिर है। 2009 में प्रमोद रंजन,  फिरोज मंसूरी, अशोक यादव, अरविंद, प्रणय, संतोष यादव व गजेंद्र प्रसाद के संपादन में आयी पुस्तिका मीडिया में हिस्सेदारी में यह बात आंकड़ों के साथ सामने आई थी बिहार के किसी भी अखबार में शीर्ष पांच पदों पर कोई दलित या पिछड़ा नहीं हैं। इन पदों पर ब्राह्मण, राजपूत, भूमिहार और कायस्थ ही हैं। अन्य यानी बीच के और नीचे के पदों में करीब 75 फीसदी स्थानों पर भी सवर्ण हिंदुओं का आधिपत्य है, जिसमें महिलाएं भी शामिल हैं। पुस्तक के अनुसार बिहार में कार्यरत पत्रकारों में 31 फीसदी ब्राह्मण, 11 फीसदी भूमिहार, 17 फीसदी राजपूत और 16 फीसदी कायस्थ शामिल हैं। पिछड़ी और दलित पत्रकारों की संख्या मात्र 11 फीसदी है। इस धंधे में करीब 16 फीसदी मुसलमान भी कार्यरत हैं, जिसमें अशराफ मुसलमानों की संख्या 12 फीसदी है। पसमांदा मुसलमान सिर्फ 4 फीसदी हैं।
बिहार के मीडिया का यह जातिवादी स्वरूप भी नीतीश कुमार के पक्ष में काम करता है। बिहार में 2005 के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार पहली बार जीतकर मुख्यमंत्री बने और 2010 में उनकी सत्ता में वापसी हुई। नीतीश कुमार ने अपना जो राजनीतिक समीकरण बनाया है, उसकी बुनियाद सवर्णों का समर्थन है। इस सामाजिक आधार पर खड़े नीतीश कुमार पर बिहार का सवर्ण मीडिया क्यों न अपना प्यार लुटाये?
dilip mandal
(दिलीप मंडल। सीनियर टीवी जर्नलिस्‍ट। सक्रिय फेसबुक एक्टिविस्‍ट। कई टीवी चैनलों में जिम्‍मेदार पदों पर रहे। इन दिनों अध्‍यापन कार्य से जुड़े हैं। उनसे dilipcmandal@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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