Friday, July 01, 2011

क्या कोई अपने को हिन्दू कहता है?




देश और विदेशों में कोई हिन्दू नहीं, यह शब्द केवल कागजों तक ही सीमित है।
यदि आप नम्बर एक दर्जे से पूछें कि आप कौन है? तब वे बताते हैं कि मैं ब्राह्मण हूँ। तब आप यह पूछें कि आप कौन से ब्राह्मण हैं? तब वे बताना प्रारम्भ कर देते हैं कि मैं शर्मा हूँ, मिश्रा हूँ, उपाध्याय हूँ, दीक्षित हूँ, भारद्वाज हूँ, कश्यप हूँ, पाण्डेय हूँ, शुक्ला हूँ, दूबे हूँ, द्विवेदी हूँ, तिवारी हूँ, त्रिपाठी हूँ, त्रिवेदी हूँ, चतुर्वेदी हूँ, चौबे हूँ, भट्टाचार्य हूँ, मुखर्जी हूँ, बनर्जी हूँ, चटर्जी हूँ और अपने को विभिन्न प्रकार का ब्राह्मण बताते हैं। लेकिन अपने आपको हिन्दू नहीं बताते हैं, क्योंकि वे हिन्दू हैं ही नहीं। इसलिए वे अपने आपको हिन्दू नहीं बताते हैं और न ही अपने नाम के पीछे हिन्दू लिखते हैं। वे ब्राह्मण हैं, इसलिए अपने आपको विभिन्न प्रकार का ब्राह्मण बताते हैं, न कि हिन्दू।
यदि आप नम्बर दो दर्जे से पूछें कि आप कौन हैं? तो वे बताते हैं कि मैं क्षत्रिय हूँ, तब आप पूछें कि आप कौन से क्षत्रिय हैं? तब वे बताना प्रारम्भ कर देते हैं कि मैं चौहान क्षत्रिय हूँ, राजपूत क्षत्रिय हूँ, भदौरिया क्षत्रिय हूँ, तोमर क्षत्रिय हूँ, राव क्षत्रिय हूँ, राय क्षत्रिय हूँ, सिंह क्षत्रीय हूँ, मैं शाही क्षत्रीय हूँ और अपने को विभिन्न प्रकार का क्षत्रिय बताते हैं, लेकिन अपने आपको हिन्दू नहीं बताते हैं और न ही अपने नाम के पीछे हिन्दू लिखते हैं। वे क्षत्रिय हैं, इसीलिए अपने आपको विभिन्न प्रकार का क्षत्रिय बताते हैं, न कि हिन्दू।
यदि आप नम्बर तीन दर्जे से पूछे कि आप कौन हैं? तो वे बताते हैं कि मैं वैश्य हूँ। तब आप पूछें कि आप कौन से वैश्य हैं? तब वे बताना प्रारम्भ कर देते हैं कि मैं गुप्ता हूँ, अग्रवाल हूँ, माथुर हूँ, महाजन हूँ, अग्रहरि हूँ, मद्धेशिया हूँ, जायसवाल हूँ और अपने को विभिन्न प्रकार का वैश्य बताते हैं, लेकिन अपने आपको हिन्दू नहीं बताते हैं, क्योंकि वे हिन्दू हैं ही नहीं। इसी लिए अपने आपको हिन्दू नहीं बताते हैं और न ही अपने नाम के पीछे हिन्दू लिखते हैं। वे वैश्य हैं, इसीलिए अपने आपको विभिन्न प्रकार का वैश्य बताते हंै, न कि हिन्दू।
यदि आप नम्बर चार दर्जे से पूछें कि आप कौन हैं? तो वे अपनी जातियाँ बताना प्रारम्भ कर देते हैं, मैं जार हूँ, गुर्जर हूँ, कायस्थ हूँ, सुनार हूँ, माली हूँ, यादव हूँ, कहार हूँ, बढ़ई हूँ, नाई हूँ, राठौर (तेली) हूँ, शाक्य हूँ, काछी हूँ, राजपूत लोधी हूँ, बघेल हूँ, जाटव (चमार) हूँ, कोरी हूँ, धोबी हूँ,
धानुक हूँ, खटीक हूँ, कोहरी हूँ, कुर्मी हूँ, वाल्मीकि (भंगी) हूँ और वे अपनी विभिन्न प्रकार की जातियाँ बताते हैं, लेकिन अपने को हिन्दू नहीं बताते हैं, क्यांेकि वे हिन्दू हैं ही नहीं। इसीलिए अपने आपको हिन्दू नहीं बताते हैं और न ही अपने नाम के पीछे हिन्दू लिखते हैं। शूद्र होने के नाते अपनी विभिन्न प्रकार की जातियाँ बताते हैं, न कि हिन्दू।
यदि किसी के मुँह से, धोखे से हिन्दू शब्द निकल गया, तो इससे उसकी सन्तुष्टि नहीं होगी, उसे अपनी जाति बताओ, तब उसकी सन्तुष्टि और तसल्ली होगी।
ब्राह्मणों द्वारा बनाई गई चातुर्य वर्ण व्यवस्थाको मानने वाला कोई भी आदमी अपने नाम के पीछे न हिन्दू लिखता है और न ही कहता है, तो फिर कौन हिन्दू है? फिर किसका नाम हिन्दू हैं?
जब कोई अपने आपको हिन्दू कहता और लिखता नहीं, तो फिर हिन्दू नहीं। हिन्दू नहीं, हिन्दू धर्म नहीं, हिन्दू धर्म नहीं, हिन्दू समाज नहीं। हिन्दू समाज नहीं, विश्वहिन्दू परिषद नहीं, विश्व हिन्दू परिषद नहीं, हिन्दुत्व नहीं, हिन्दुत्व नहीं, हिन्दू संस्कृति नहीं, हिन्दू संस्कृति नहीं, हिन्दू राष्ट्र नहीं, हिन्दू राष्ट्र नहीं, हिन्दूस्थान नहीं, हिन्दूस्थान तो हिन्दुस्तान नहीं।
तो फिर इसका क्या नाम है और इसे क्या कहना चाहिए, ब्राह्मणों की व्यवस्था ही इसका असली नाम है और इसे ब्राह्मणों की व्यवस्था ही कहना चाहिए। ब्राह्मण संस्कृति और वर्तमान में ब्राह्मण राष्ट्र ही कहना चाहिए।
ब्राह्मणों (ब्राह्मण ऋषियों द्वारा बनाई गई) की यह एक ऐसी व्यवस्था है कि इसे न अनादि ही कहा जा सकता है, और न ही इसे बहुत प्राचीन ही कहा जा सकता है, न ही धर्म ही कहा जा सकता है और न इसे दर्शन ही कहा जा सकता है, न इसे संस्कृति ही कहा जा सकता है और न ही इसे मानवता का हितेषी ही कहा जा सकता है, न इसकी प्रशंसा की जा सकती है और न ही यह प्रशंसा करने के योग्य है।
यह तो ब्राह्मणों द्वारा समाज में फैलाई गई साजि़श का हिस्सा है। जिसने भारत की प्राचीन सभ्यता को छिन्न-भिन्न कर दिया है। जिसने भारत की जनता में फूट का बीज बो दिया है। ब्राह्मणों द्वारा अन्ध विश्वास के प्रचार-प्रसार करने के कारण यह देश विदेशियों का हजारों वर्षों तक गुलाम रहा। ब्राह्मणी व्यवस्था के बराबर संसार की किसी भी दूसरी व्यवस्था ने इतनी असमानताओं को जन्म नहीं दिया। इस देश के सवर्ण लेखकों तथा अन्य लोगों की खोपड़ी में इस बात का भूत सवार है कि हिन्दुओं के कारण ही इस देश का नाम हिन्दुस्तान है। ब्राह्मणों द्वारा बनाई गई वर्ण व्यवस्था को मानने वाला कोई भी आदमी अपने आपको न तो हिन्दू कहता है और न ही अपने नाम के पीछे हिन्दू लिखता ही है, तो फिर इस देश का नाम हिन्दुस्तान नहीं है।
भारत का अर्थ हिन्दुस्तान, हमारे देश का प्राचीन नाम नहीं है। यह नाम विदेशियों द्वारा रखा गया है। ईरानियों ने सिन्धु नदी का नाम, बदलकर हिन्दूरख दिया। यूनानियों ने इसका नाम इण्डोसरखा, इससे हमारे देश का नाम इण्डिया पड़ गया। बहुत प्राचीन काल में इस देश का नाम जम्बूदीप था। बौद्ध ग्रन्थों तथा कतिपय मंत्रों जो विवाह आदि के अवसरों पर अब भी पढ़े जाते हैं में इस नाम का उल्लेख मिलता है। केवल इस देश की सीमा का निर्देश करने के लिए जम्बू द्वीप शब्द का प्रयोग होता था। इस देश का नाम जो उस समय की जनता को ज्ञात था, भारतवर्ष अथवा भरत का देश था। भरत दुष्यन्त और शकुन्तला के पुत्र थे। उनके प्रभाव से इस देश का प्रत्येक भाग उद्दीप्त तथा प्रभावित था। इस कारण इस देश का नाम भारत है और इस देश का इतिहास, भारतवर्ष अथवा भारतीय इतिहास के नाम से इतिहास है, न कि हिन्दुस्तान के नाम से इतिहास है। वर्तमान में इस देश का
संविधान, भारतीय संविधान के नाम से संविधान है, न कि हिन्दुस्तान के नाम से संविधान है।
यदि वास्तव में इस देश का नाम हिन्दुस्तान होता, तो फिर हिन्दुस्तान के नाम से इस देश का इतिहास और संविधान होता। वास्तव में इस देश का नाम हिन्दुस्तान है ही नहीं। इसीलिए हिन्दुस्तान के नाम से इस देश का इतिहास और संविधान नहीं लिखा गया है।
विश्व में बौद्ध हैं। यदि आप पूछें कि आप कौन हैं? तो वे आपको उत्तर देंगे कि मैं बौद्ध हूँ, क्योंकि भगवान बुद्ध ने विश्व के मानव समाज को एकता, समता तथा स्वतंत्रता का ही उपदेश दिया है।
भगवान बुद्ध ने 563 ईसा पूर्व में एक ऐसी व्यवस्थाको जन्म दिया कि उसे हर हालत में अनादि और प्राचीन भी कहा जा सकता है, इसे सद्धर्भऔर दर्शनभी कहा जा सकता है। इसे संस्कृतिऔर कलाभी कहा जा सकता है। इसे मानवता का हितैषी एवं शुभ चिन्तक भी कहा जा सकता है। इसकी प्रशंसा भी की जा सकती है और यह प्रशंसा करने के योग्य है।
भगवान बुद्ध द्वारा फैलाई गई विश्व में इन्सानियत है। जिसने विश्व के मानव समाज को एकता के सूत्र में बाँधा है। जिसने विश्व के मानव समाज को सत्य, अहिंसा, शान्ति और समता का पाठ पढ़ाया है।
भगवान बुद्ध की श्रेष्ठ व्यवस्था’, बौद्ध धर्म के बराबर संसार में कोई दूजी व्यवस्था नहीं है। जिसने विश्व में मानव समाज को सभ्यता और महा मानवता का पाठ पढ़ाया हो। वैसे तो भारतीय संविधान के अन्तर्गत, भारत बौद्ध राष्ट्र है, क्योंकि राष्ट्रीय चिन्ह पर अशोक चक्र (धम्मचक्र) है। डाक टिकटों, सिक्कों और नोटों पर अशोक के चार सिंह हैं ये भगवान बुद्ध और सम्राट अशोक की वीरता तथा महानता के सूचक हैं। इसे स्वतंत्र भारत सरकार ने राष्ट्रीय चिह्न के रूप में स्वीकार कर लिया है।
हिन्दूशब्द का सम्बन्ध धर्म से नहीं, इस शब्द का सम्बन्ध सिन्धु नदीसे है।
हिन्दूशब्द मध्ययुगीन है। श्री रामधारी सिंह दिनकर के शब्दों में हिन्दूशब्द हमारे प्राचीन साहित्य में नही मिलता है। भारत में इसका सबसे पहले उल्लेख ईसा की आठवीं सदी में लिखे गए एक तन्त्र ग्रन्थमें मिलता है। जहाँ इस शब्द का प्रयोग धर्मावलम्बी के अर्थ में नहीं किया गया जाकर, एक, ‘गिरोहया जातिके अर्थ में किया गया है।
गांधी जी भी हिन्दूशब्द को विदेशी स्वीकार करते हुए कहते थे- हिन्दू धर्म का यथार्थ नाम, ‘वर्णाश्रमधर्महै।
हिन्दू शब्द मुस्लिम आक्रमणकारियों का दिया हुआ एक विदेशी नाम है। हिन्दूशब्द फारसी के गयासुललुगातनामक शब्दकोश में मिलता है। जिसका अर्थ- काला, काफिर, नास्तिक सिद्धान्त विहीन, असभ्य, वहशी आदि है और इसी घृणित नाम को बुजदिल लोभी ब्राह्मणों ने अपने धर्म का नाम स्वीकार कर लिया है।
हिंसया यो दूषयति अन्यानां मानांसि जात्यहंकार वृन्तिना सततं सो हिन्दू: से बना है, जो जाति अहंकार के कारण हमेशा अपने पड़ोसी या अन्य धर्म के अनुयायी का, अनादर करता है, वह हिन्दू है। डा0 बाबा साहब अम्बेडकर ने सिद्ध किया है कि हिन्दूशब्द देश वाचक नहीं है, वह जाति वाचक है। वह सिन्धुशब्द से नहीं बना है। हिंसा से हिंऔर दूषयति से दूशब्द को मिलाकर हिन्दू बना है।
अपने आपको कोई हिन्दूनहीं कहता है, बल्कि अपनी-अपनी जाति बताते हैं। 

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भिक्षु विमल कीर्ति महास्थविर
मो0:- 07398935672

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