Friday, September 30, 2011

गुजरात में… जो अपराधी नहीं होंगे, मारे जाएंगे



गुजरात में एक दलित नेता और उनकी पत्नी को पकड़ लिया गया है। पुलिस की कहानी में बताया गया है कि वे दोनों नक्सलवादी हैं और उनसे राज्य के अमन चैन को खतरा है। शंकर नाम के यह व्यक्ति मूलतः आंध्र प्रदेश के रहने वाले हैं लेकिन अब वर्षों से गुजरात को ही अपना घर बना लिया है। गुजरात में सांप्रदायिकता के खिलाफ जो चंद आवाजें बच गयी हैं, वे भी उसी में शामिल हैं। विरोधियों को परेशान करने की सरकारी नीति के खिलाफ वे विरोध कर रहे हैं और लोगों को एकजुट करने की कोशिश कर रहे हैं। उनकी पत्नी, हंसाबेन भी इला भट्ट के संगठन सेवा में काम करती हैं। वे गुजराती मूल की हैं लेकिन उनको गिरफ्तार करते वक्त पुलिस ने जो कहानी दी है, उसके अनुसार वे अपने पति के साथ आंध्रप्रदेश से नक्सलवाद की ट्रेनिंग लेकर आयी हैं। जाहिर है पुलिस ने सिविल सोसाइटी के इन कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार करने के पहले होम वर्क नहीं किया था।

इसके पहले डांग्स जिले के एक मानवाधिकार कार्यकर्ता अविनाश कुलकर्णी को भी गिरफ्तार कर लिया गया था। किसी को कुछ पता नहीं कि ऐसा क्यों हुआ लेकिन वे अभी तक जेल में ही हैं। गुजरात में सक्रिय सभी मानवाधिकार संगठनों के कार्यकर्ताओं को चुप कराने की गुजरात पुलिस की नीति पर काम शुरू हो चुका है और आने वाले वक्त में किसी को भी नक्सलवादी बता कर धर लिया जाएगा और उसके बाद वही हाल होगा जो पिछले 10 साल से गुजराती मुसलमानों का हो रहा है। नक्सलवादी बता कर किसी को पकड़ लेना बहुत आसान होता है क्योंकि किसी भी पढ़े लिखे आदमी के घर में मार्क्सवाद की एकाध किताब तो मिल ही जाएगी। और मोदी के पुलिस वालों के लिए इतना ही काफी है। वैसे भी मुसलमानों को पूरी तरह से चुप करा देने के बाद, राज्य में मोदी का विरोध करने वाले कुछ मानवाधिकार संगठन ही बचे हैं। अगर उनको भी दमन का शिकार बना कर निष्क्रिय कर दिया गया तो उनकी बिरादराना राजनीतिक पार्टी, राष्ट्रवादी सोशलिस्ट पार्टी और उसके नेता, एडोल्फ हिटलर की तरह गुजरात के मुख्यमंत्री का भी अपने राज्य में एकछत्र निरंकुश राज कायम हो जाएगा।

अहमदाबाद में जारी एक बयान में मानवाधिकार संस्था, दर्शन के निदेशक हीरेन गांधी ने कहा है कि ‘गुजरात सरकार और उसकी पुलिस विरोध की हर आवाज को कुचल देने के उद्देश्य से मानवाधिकार संगठनों, दलितों के हितों की रक्षा के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं और सिविल सोसाइटी के अन्य कार्यकर्ताओं को नक्सलवादी बताकर पकड़ रही है’ लेकिन विरोध के स्वर भी अभी दबने वाले नहीं हैं। शहर के एक मोहल्ले गोमतीपुर में पुलिस का सबसे ज्यादा आतंक है। वहां के लोगों ने तय किया है कि अपने घरों के सामने बोर्ड लगा देंगे, जिसमें लिखा होगा कि उस घर में रहने वाले लोग नक्सलवादी हैं और पुलिस के सामने ऐसे हालात पैदा की जाएंगे कि वे लोगों को गिरफ्तार करें। जाहिर है इस तरीके से जेलों में ज्यादा से ज्यादा लोग बंद होंगे और मोदी की दमनकारी नीतियों को राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बनाया जाएगा। वैसे भी अगर सभ्य समाज के लोग बर्बरता के खिलाफ लामबंद नहीं हुए तो बहुत देर हो चुकी होगी और कम से कम गुजरात में तो हिटलरी जनतंत्र का स्वाद जनता को चखना ही पड़ जाएगा।

वैसे गुजरात में अब मुसलमानों में कोई अशांति नहीं है। सब अमन चैन से हैं। गुजरात के कई मुसलमानों से सूरत और वड़ोदरा में बात करने का मौका लगा। सब ने बताया कि अब बिलकुल शांति है। कहीं किसी तरह के दंगे की कोई आशंका नहीं है। उन लोगों का कहना था कि शांति के माहौल में कारोबार भी ठीक तरह से होता है और आर्थिक सुरक्षा के बाद ही बाकी सुरक्षा आती है। बड़ा अच्छा लगा कि चलो 10 साल बाद गुजरात में ऐसी शांति आयी है। लेकिन कुछ देर बाद पता चला कि जो कुछ मैं सुन रहा था, वह सच्चाई नहीं थी। वही लोग जो ग्रुप में अच्छी अच्छी बातें कर रहे थे, जब अलग से मिले तो बताया कि हालात बहुत खराब हैं। गुजरात में मुसलमान का जिंदा रहना उतना ही मुश्किल है, जितना कि पाकिस्तान में हिंदू का। गुजरात के शहरों के ज्यादातर मोहल्लों में पुलिस ने कुछ मुसलमानों को मुखबिर बना रखा है। पता नहीं चलता कि कौन मुखबिर है और कौन नहीं है। अगर पुलिस या सरकार के खिलाफ कहीं कुछ कह दिया गया तो अगले ही दिन पुलिस का अत्याचार शुरू हो जाता है। मोदी के इस आतंक को देख कर समझ में आया कि अपने राजनीतिक पूर्वजों की लाइन को कितनी खूबी से वे लागू कर रहे हैं। लेकिन यह सफलता उन्हें एक दिन में नहीं मिली। इसके लिए वे पिछले दस वर्षों से काम कर रहे हैं।

गोधरा में हुए ट्रेन हादसे के बहाने मुसलमानों को हलाल करना इसी रणनीति का हिस्सा था। उसके बाद मुसलमानों को फर्जी एनकाउंटर में मारा गया। इशरत जहां और शोहराबुद्दीन की हत्या इस योजना का उदाहरण है। उसके बाद मुस्लिम बस्तियों में उन लड़कों को पकड़ लिया जाता था, जिनके ऊपर कभी कोई मामूली आपराधिक मामला दर्ज किया गया हो। पाकेटमारी, दफा 151, चोरी आदि अपराधों के रिकार्ड वाले लोगों को पुलिस वाले पकड़ कर ले जाते थे। उन्हें गिरफ्तार नहीं दिखाते थे। किसी प्राइवेट फार्म हाउस में ले जा कर प्रताड़ित करते थे और अपंग बनाकर उनके मोहल्लों में छोड़ देते थे। पड़ोसियों में दहशत फैल जाती थी और मुसलमानों को चुप रहने के लिए बहाना मिल जाता था। लोग कहते थे कि हमारा बच्चा तो कभी किसी केस में पकड़ा नहीं गया इसलिए उसे कोई खतरा नहीं था। जाहिर है इन लोगों ने अपने पड़ोसियों की मदद नहीं की। इसके बाद पुलिस ने अपने खेल का नया चरण शुरू किया। इस चरण में मुस्लिम मोहल्लों से उन लड़कों को पकड़ा जाता था, जिनके खिलाफ कभी कोई मामला न दर्ज किया गया हो। उनको भी उसी तरह से प्रताड़ित करके छोड़ दिया जाता था।

इस अभियान की सफलता के बाद राज्य के मुसलमानों में पूरी तरह से दहशत पैदा की जा सकी। और अब गुजरात का कोई मुसलमान मोदी या उनकी सरकार के खिलाफ नहीं बोलता। डर के मारे सभी नरेंद्र मोदी की जय जयकार कर रहे हैं। अब राज्य में विरोध का स्वर कहीं नहीं है। कांग्रेस नाम की पार्टी के लोग पहले से ही निष्क्रिय हैं। वैसे उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती क्योंकि विपक्ष का अभिनय करने के लिए उनकी जरूरत है। यह मानवाधिकार संगठन वाले आज के मोदी के लिए एक मामूली चुनौती हैं और अब उनको भी नक्सलवादी बताकर दुरुस्त कर दिया जाएगा। फिर मोदी को किसी से कोई खतरा नहीं रह जाएगा। हमारी राजनीति और लोकशाही के लिए यह बहुत ही खतरनाक संकेत हैं क्योंकि मोदी की मौजूदा पार्टी बीजेपी ने अपने बाकी मुख्यमंत्रियों को भी सलाह दी है कि नरेंद्र मोदी की तरह ही राज काज चलाना उनके हित में होगा।

1 comment:

  1. bhai bjp ke bare me kuch ulta sidha mt likha ker ab bas is per hi bharosa h

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