Friday, September 30, 2011

कार्टूनिस्‍ट को जेल भिजवा कर और ज्‍यादा नंगे हुए मोदी!



सांप्रदायिक शख्‍सीयत के रूप में कुख्‍यात गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के इस वक्‍तव्‍य को अभी दस दिन भी नहीं हुए थे कि इसके ठीक उलट उनकी इस कथित खुली सोच और उनके मजबूत लोकतंत्र की डींग का असली चेहरा हमारे सामने है। ये नरेंद्र मोदी की आलोचना का ही असर है कि प्रभात किरण, इंदौर से प्रकाशित सांध्य दैनिक का मुस्सविर नाम से कार्टून बनानेवाला पत्रकार हरीश यादव गहरे सदमे में है। वो बुरी तरह डिप्रेशन का शिकार है और उसे घंटों हो गये, नींद नहीं आ रही है। अलग-अलग जगहों और लोगों की तरफ से धमकियां मिल रही हैं और बुरी तरह घबराया हुआ है। इस बात की आशंका है कि उसके साथ कभी भी कुछ भी हो सकता है।

नरेंद्र मोदी की निगाह में उसका गुनाह है कि जिन मुसलमानों के बीच उन्होंने भरोसा पैदा करने की कोशिश की और अपने प्रति ये विश्वास जतलाने का प्रयास किया कि वो उनके विकास के लिए बराबर रूप से चिंतिंत रहते हैं, मुस्सिवर ने उन्हीं मुसलमानों की भावनाओं को चोट पहुंचाने का काम किया है। उसने ऐसे कार्टून बनाये, जिससे इस्लाम पर यकीन रखनेवाले लोगों की भावनाएं बुरी तरह आहत हुई हैं। ऊपरी तौर पर मुख्यधारा मीडिया को ये बात प्रभावित कर सकती है कि नरेंद्र मोदी को मुसलमानों और उनकी भावनाओं की कितनी गहरी चिंता है और अगर वो किसी कार्टूनिस्ट को भावनाएं भड़काने या आहत करने के अपराध में सजा देते हैं, तो इसमें गलत क्या है? लेकिन क्या नरेंद्र मोदी सचमुच इतने संवेदनशील और उनके प्रति सजग हैं, जिनके मुख्यमंत्रित्‍व काल में सरेआम कत्ल किये गये और इस सद्भावना मिशन में ताल ठोंक कर दावा किया कि अगर नरेंद्र मोदी गलत है, उसने कुछ करवाया तो फिर उसके खिलाफ इस देश में एक भी एफआईआर क्यों नहीं दर्ज कराया गया? मुख्यधारा मीडिया ने छिटपुट तरीके से ही सही, इस पूरे मामले में जो कुछ भी प्रकाशित किया (न्यूज चैनल लगभग चुप ही हैं), उसके आधार पर अंदाजा लग जाता है कि नरेंद्र मोदी के लिए आलोचना का मतलब क्या है और भावनाओं को आहत करने का अर्थ क्या है?


हमने इस पूरे मामले में प्रभात किरण अखबार जिसने कि 20 सितंबर को मुस्सविर का कार्यून प्रकाशित किया, उसके संपादक प्रकाश पुरोहित से टेलीफोन के जरिये बातचीत की। प्रकाश पुरोहित ने इस संबंध में जो तर्क दिया, वो मुख्यधारा मीडिया में या तो टुकड़ों-टुकड़ों में आया है या फिर कई ऐसी बातें हैं, जिसका कि जिक्र ही नहीं है। कार्टून के संबंध में उन्होंने स्पष्ट किया कि ये किसी भी तरह से मुसलमानों की भावनाओं को ठेस पहुंचानेवाला नहीं है बल्कि इसे पाठकों ने बहुत सराहा है और इस बात की कोई शिकायत नहीं आयी। हमने ऐसा करके दरअसल एक सामान्य मुसलमान की उस भावना को लोगों के सामने रखने की कोशिश की, जिसे कि स्वयं नरेंद्र मोदी ने दरकिनार कर दिया। दरअसल हुआ ये था कि सद्भभावना अनशन के दौरान देश के अलग-अलग हिस्से से आये लोग अपने यहां के प्रतीक चिन्ह के तौर पर वस्तुएं मोदी को भेंट कर रहे थे। मोदी उन चीजों को स्वीकार कर रहे थे और ये चीजें मामूली होती हुई भी उस इलाके की संस्कृति का प्रतिनिधित्व करती है। इसी दौरान एक सामान्य मुसलमान जो कि पिछले दो दिनों से इंतजार कर रहा था कि वो भी नरेंद्र मोदी को कुछ दे और उसने नरेंद्र मोदी को टोपी दे दी और पहनने का आग्रह किया। ये बहुत ही संवेदनशील और भावुक क्षण था और अगर वो उसे पहनते, तो संभव था कि मुसलमानों के बीच बहुत ही अलग किस्म का सकारात्मक संदेश जाता लेकिन नरेंद्र मोदी ने ऐसा करने से इनकार कर दिया और उससे मुसलमान की भावना को चोट पहुंची।

प्रकाश पुरोहित जो बात बता रहे थे, उसे एनडीटीवी ने भी दिखाया। ये बिल्कुल सीधा सवाल है कि अगर आप मुसलमानों को बराबर का सम्मान देते हैं, तो दूसरे पंथों और क्षेत्रों के लोगों की दी हुई प्रतीकात्मक चीजों को जिस तरह से आपने ग्रहण किया, उसी तरह एक सामान्य मुसलमान की दी हुई टोपी क्यों नहीं? प्रकाश पुरोहित ने आगे जोड़ा कि इस घटना से हमें नरेंद्र मोदी को लेकर दिक्कत हुई और लगा कि इसे किसी न किसी रूप में लोगों के सामने लाया जाना चाहिए। लिहाजा मुस्सिवर ने कार्टून बनाया, जिसे कि हमने अपने अखबार के पहले पन्ने पर 20 सितंबर को छापा।

जिस चांद-सितारे को कार्टून में दिखाया गया है, उसकी व्याख्या इस्लाम धर्म के जानकार बेहतर कर सकते हैं? क्या इस धर्म में चांद-सितारे की उसी अर्थ में व्याख्या है, जिस अर्थ में मुस्सविर पर धार्मिक भावनाएं भड़काये जाने के लिए सजा दी गयी? ये सिर्फ और सिर्फ उस एक सामान्य मुसलमान की भावनाओं की अभिव्यक्ति है, जो कि नरेंद्र मोदी को टोपी भेंट में देना चाहता था।

कार्टून छपने के बाद मुस्सविर को घर जाकर पुलिस ने उठा लिया और रातभर थाने में रखा। उसे तरह-तरह से परेशान किया जाने लगा। हमें यह तक नहीं बताया गया कि वे ऐसा क्यों कर रहे हैं और जब उस पर धाराएं लगायी जा रही थीं तो हमसे कुछ पूछा तक नहीं गया। मल्हारगंज थाने में उसके खिलाफ आईपीसी के सेक्शन – 295 ए के तहत मुकदमा दर्ज किया गया। ये वो धारा है, जिसे कि समाज के किसी तबके की धार्मिक भावना को भड़काने के संदर्भ में लगाया जाता है। उसके साथ बहुत ही बुरा सलूक किया गया। अभी भाजपा समर्थक लोग मुस्सिवर को अलग-अलग तरीके से परेशान कर रहे हैं जबकि वह इस घटना से इतनी बुरी तरह आहत और घबराया है कि कुछ वक्त के लिए सोना चाहता है।

मेरे ये पूछे जाने पर कि क्या आपने इस पूरे पक्ष को प्रभात किरण अखबार में विस्तार से प्रकाशित किया, और मुस्सिवर के साथ संपर्क में हैं, इस संबंध में उनका जवाब था – हम अपने अखबार की उपलब्धि और परेशानी को नहीं प्रकाशित करते हैं। लेकिन हां आज का जो अखबार आ रहा है, उसमें हमने दूसरे तमाम अखबारों और पत्रिकाओं ने इस संबंध में क्या छापा है, उसे शामिल कर रहे हैं। प्रभात किरण में ही मेरा एक कॉलम है जो कि शनिवार को आता है – बस यूं ही, उसमें मैं इस घटना की विस्तार से चर्चा करने जा रहा हूं। मुस्सविर कहां है, पता ही नहीं चल रहा लेकिन हां फोन पर बात हो रही है और बताया कि लोग उसे बुरी तरह परेशान कर रहे हैं, वो चाहता है कि कुछ समय के लिए सुकून मिल जाए।

मुस्सविर के साथ इतना कुछ हो गया लेकिन उसके बाद भी प्रभात किरण ने सख्ती से इस खबर को प्रकाशित नहीं किया। ये दरअसल उसी मेनस्ट्रीम मीडिया का चरित्र है, जहां कोई पत्रकार रिस्क लेकर खबरें लाता है, प्रकाशित करता है लेकिन जैसे ही उस पर मुसीबत आती है, वो पत्रकार होने के बजाय एक व्यक्ति हो जाता है। पत्रकारों पर जो भी राजनीतिक हमले होते हैं और आये दिन सांप्रदायिक ताकतों का निशाना बनते हैं, उसकी एक बड़ी वजह यही है कि जिस मीडिया के लिए वो काम करते हैं, वही मीडिया उनका साथ छोड़ देता है और उपद्रवियों और उनकी आवाज कुचलनेवाली ताकतों का मनोबल बढ़ जाता है। लेकिन अभी हाल ही में तुर्की में Bahadir Baruter ने जो कार्टून बनाया और उनके खिलाफ धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाने के अपराध में कार्रवाई की गयी, उस कार्टून को कई प्रमुख मीडिया संस्थानों ने प्रकाशित किया। लेकिन यही काम अगर यहां किया जाए, जिस कार्टून को लेकर किसी को सजा होती है और उस पर बात करने की नीयत से उसे दोबारा से प्रकाशित किया जाता है, तो उस पर भी कार्रवाई होगी। डेनमार्क में छपे कार्टून को आलोक तोमर (जो कि अब हमारे बीच नहीं रहे) ने जब प्रकाशित किया तो उन्हें जेल जाना पड़ा। क्या ये दोहरे स्तर की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन नहीं है? क्या मीडिया में ये और कार्टून सार्वजनिक नहीं की जानी चाहिए कि जिस कार्टून को लेकर सजा दी गयी है, वो आखिर लोगों तक पहुंचे भी तो। उस पर रोक लगाने से लोकतंत्र की कौन सी जड़ें मजबूत होगी?

प्रकाश पुरोहित ने एक जो दूसरी बात कही, उस पर ध्यान देना जरूरी है। मुस्सिवर पर जो कानूनी कार्रवाई की गयी, वो दरअसल शिवराज सिंह चौहान के आदेश पर की गयी, जिस समय वो चीन के दौरे पर थे। नरेंद्र मोदी ने यहां तक कहा कि आप इंदौर में मामला दर्ज करवाएं नहीं तो फिर अहमदाबाद में करवाया जाएगा। शिवराज सिंह की सरकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर निकलनेवाली दर्जनों पत्रिकाओं को विज्ञापन देती आयी है और शायद उनकी ऐसा करने की इच्छा नहीं रही हो लेकिन मोदी के कहने पर ऐसा किया और रातोंरात कार्रवाई की गयी। ये दरअसल एक ही पार्टी के होने की वजह से भी किया गया। पुरोहित का मानना है कि जिस कार्टून को लेकर इतना विवाद हुआ, अगर दिल्ली या किसी बड़े शहर से प्रकाशित होता तो कुछ नहीं होता। छोटे शहरों से निकलनेवाले अखबारों की बातों पर मैनिपुलेशन का काम ज्यादा होता है। सच बात तो ये है कि सद्भावना मिशन में जो भी मुसलमान मौजूद थे, वो या तो भाजपाई ताकतों के डर से थे या फिर मोदी समर्थकों के कहने पर बुलाये गये थे। स्वाभाविक तौर पर जो मुसलमान आये भी हों, तो इस घटना से रही-सही शंका भी अपने आप दूर हो जाती है।

पहले फेसबुक पर बिहार सरकार से असहमति जताने पर मुसाफिर बैठा और अरुण नारायण का निलंबन और अब इंदौर में कार्टून बनाने पर मुस्सविर के साथ लगातार जबरदस्ती और परेशान किये जाने की घटना किस लोकतंत्र को मजबूत करेगी, ये हमसे बेहतर नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी करेंगे या फिर मुख्यधारा का मीडिया जो लगातार इन दोनों की बहुत ही सेकुलर, लोकतांत्रिक और उदार छवि बनाने में जुटा है। इंदौर में मुस्सिवर के साथ जो कुछ भी हुआ, वो दरअसल सद्भावना अनशन के दौरान नरेंद्र मोदी के आगे मुख्यधारा मीडिया के दंडवत हो जाने की परिणति है।

सद्भावना अनशन के दौरान सांप्रदायिक नेता की बनी छवि को रातोंरात मेकओवर करने के लिए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो कुछ भी कहा, उसके आगे मुख्यधारा के अधिकांश मीडियाकर्मी और चैनल लोटते नजर आये। ब्रेकिंग और एक्सक्लूसिव की आपाधापी के बीच नरेंद्र मोदी ऐसे महत्वपूर्ण हुए कि मीडियाकर्मी से अगर वो बात कर लेते तो वो अपने ऊपर एक तरह का नरेंद्र मोदी का एहसान मानते। ये सब कुछ टीवी स्क्रीन पर बहुत ही साफ दिखाई दे रहा था। आजतक के बाकी लोगों से ज्यादा समझदार समझे जानेवाले अजय कुमार जैसे कई मीडियाकर्मी इस एहसान के तले इतने अधिक दब गये कि इंटरव्यू लेते हुए जो बातें नरेंद्र मोदी के लिए कही वो पेड न्यूज से कहीं ज्यादा घिनौनी दिखनेवाली थी। चैनलों ने नरेंद्र मोदी की कही बातों को साकारात्मक तौर पर जमकर दिखाया और एक-एक वक्तव्य को लेकर घंटों फ्लैश चलाये गये। मुख्यधारा के मीडिया को इस तीन दिन के मिशन में ही आगामी सरकार की रुपरेखा दिखने लगी और तभी नरेंद्र मोदी को इस बात का एहसास करा दिया कि आपके प्रधानमंत्री होने की स्थिति में हम आपके साथ होंगे, आपके पक्ष में होंगे और आपके आगे न केवल घुटने टेक देंगे बल्कि आपकी छवि मेकओवर करने में कहीं से कोई कोर-कसर नहीं छोडेंगे। इन तीन दिनों में मुख्यधारा का मीडिया जिसने कि गुजरात दंगे के बाद से लगातार मोदी की सांप्रदायिक छवि सामने लाने में लगा रहा, पूरी तरह पलटता नजर आया। नेटवर्क 18 और एनडीटीवी और दूसरे चैनलों की कुछ खबरों को छोड़ दें तो साफ झलक रहा था कि मीडिया पूरी तरह नरेंद्र मोदी के प्रभाव में आ चुका है और आनेवाले समय में राष्ट्रीय स्तर पर अगर उनकी स्थिति मजबूत होती है तो उनकी मर्जी के बिना एक पत्ता तक नहीं हिलेगा।

हद तो तब हो गयी जब नरेंद्र मोदी का वक्तव्य आया कि वो अपनी और सरकार की आलोचना का सम्मान करते हैं, उससे सीखते हैं क्योंकि इससे लोकतंत्र की जड़ें मजबूत होती है। नरेंद्र मोदी के इस वक्तव्य को चैनलों ने कुछ इस तरह से दिखाया कि जैसे उन्हें पता ही नहीं है कि नरेंद्र मोदी का क्या इतिहास रहा है या फिर कथनी और करनी के बीच किस हद तक फासला रहा है और भविष्य में इस लेबल को चिपका कर क्या करने जा रहे हैं? चैनलों ने इस पर अपनी तरफ से खड़े तेवर नहीं अपनाए और सवाल-जवाब नहीं किया। इन तीन दिनों की फुटेज पर गौर करें तो आपको सहज ही अंदाजा लग जाएगा कि जिस नीयत से नरेंद्र मोदी ने ये मिशन शुरू किया, मुख्यधारा मीडिया ने उसका साथ दिया।

एक मामूली सी स्टोरी होती है तो चैनल उससे जुड़ी पुरानी फुटेज को शामिल करता है, उसे लगातार दिखाता है। लेकिन सद्भावना मिशन की खबरों के दौरान मोदी ने सांप्रदायिक ताकतों को मजबूत करने की नीयत से जो बयान दिये, गुजरात दंगे में जो स्थितियां बनी, उन सबों को शामिल नहीं किया। क्या ये सब कुछ अकारण ही किया गया। जिस चैनल को इस बात की आदत पड़ी हुई है कि एश्वर्या या अमर सिंह पर स्टोरी चलानी हो तो वो सिनेमा से लेकर सीडी तक की पुरानी फुटेज का इस्तेमाल करती है, नरेंद्र मोदी के इस सद्भभावना अनशन के दौरान क्यों नहीं किया? क्या ऐसा नहीं है कि मुख्यधारा मीडिया के कार्पोरेट खेल के भीतर जो थोड़े व्यक्तिगत तौर पर ईमानदार पत्रकार बच गये हैं, वो संस्थान खुद उन पत्रकारों को हालात, राजनीतिक आकाओं के हाथों मरने-खत्म होने के लिए खुला छोड़ देते हैं और उनकी मौत और परेशानी को अपनी ब्रांडिंग के लिए इस्तेमाल करते हैं। उनके खिलाफ हुई कार्रवाई को मार्केटिंग वालों की गिद्ध नजरों की मदद से रिवन्यू में तब्दील करती है? मुझे नहीं पता कि प्रभात किरण के संपादक प्रकाश पुरोहित मुस्सविर के साथ होनेवाली इस ज्यादती में कितनी दूर तक साथ देंगे, वो मुख्यधारा मीडिया से कितना अलग चरित्र निभाएंगे लेकिन इतना तो जरूर है कि प्रशासन और सरकार के कुचलने के पहले मीडिया संस्थान ही ऐसे पत्रकारों को तबाह हो जाने के लिए जमीन तैयार कर देते हैं, जहां व्यक्तिगत स्तर पर ईमानदार होने का मतलब सिर्फ प्रताड़ना और अफसोस है।

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