Saturday, October 22, 2011

एक साल में देश भर में 6 लाख आत्महत्याएं



जीवन में बहुत उतार-चढ़ाव आते हैं। आशा-निराशा के साथ जीवन की राहों पर चलना होता है। ऐसे में आशा-निराशा का अनुपात ही तय करता है कि कोई व्यक्ति कितना सुखी या दुखी होता है। कई बार काफी धनी-मानी लोग भी तनाव में जीते हैं और अक्सर बेहद गरीब मेहतनकश मजदूरों को कड़ी धूप में भी सड़क पर मजे में सोते देखा जा सकता है। बेशक आशा-निराशा के अलावा संतोष और लोभ भी यह तय करते हैं कि कोई कितने सुख-दुख से रहता है। मगर आशा-निराशा के भाव सफलता-असफलता पाने के लिए सबसे प्रेरक तत्व होते हैं। आशा का भाव अधिक हो, तो प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच से सहजता से निकला जा सकता है। निराशा का भाव अधिक हो, तो सामान्य समय भी विषम और सहज जीवन भी असुविधाजनक लगने लगता है। निराश व्यक्ति अक्सर असामान्य, असहज और गलत फैसले करता है। उसे सही रास्ता या तो सूझता ही नहीं, और अगर सूझता भी है तो वह उस रास्ते पर चलने का साहस नहीं कर पाता। उसकी निराशा बढ़ती चली जाती है... वह अवसाद में चला जाता है। गहन अवसाद में जाने पर तो वह कुछ अनहोनी तक कर सकता है... आत्महत्या तक!

अक्सर कर्ज से दबे किसानों की आत्महत्या की खबरें आती हैं। पिछले 10 साल में देश भर में एक लाख से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं। शहरों का आंकड़ा इससे भी ज्यादा है यह और बात है कि किसानों की आत्महत्या सरकार की बेरुखी को उबारने के कारण सुर्खियों में रहती है। दूसरी ओर, शहरियों की आत्महत्याएं एक-एक खबर के रूप में तो सामने आती हैं, मगर समग्र रूप से उनमें ऊपरी तौर पर कोई ट्रेंड नजर नहीं आता। किसानों की आत्महत्याओं में साफ-साफ वजह नजर आती है- गरीबी, भुखमरी, कर्ज वगैरह। यानी उनके आर्थिक हालात ही उन्हें ऐसा भयावह कदम उठाने को मजबूर करते हैं। वहीं, शहरों-महानगरों में होने वाली आत्महत्याओं के पीछे पहली नजर में ऐसा कोई ट्रेंड नजर नहीं आता। पारिवारिक कलह, विवाहेतर संबंध, बेरोजगारी, नौकरी से निकाला जाना, कारोबार में नुकसान हो जाना या असाध्य रोग जैसी वजहों से शहरों में आत्महत्याओं की खबरें आती हैं। तो जाहिर है कि फिर इनकी संख्या भी शहरों-महानगरों की आबादी के अनुपात में ही होनी चाहिए। हाल के वर्षों के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। शहरों-महानगरों में आबादी और आत्महत्याओं का अनुपात उलझाव पैदा करने वाला है।

नैशनल क्राइम रेकॉर्ड्स ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, देश में सबसे ज्यादा आत्महत्याएं बेंगलुरु में होती हैं। प्रति एक लाख आबादी पर सबसे ज्यादा आत्महत्याएं भी बेंगलुरु में होती हैं। इस मामले में वह जबलपुर, राजकोट और कोयंबटूर जैसे छोटे शहरों के बराबर है। बेंगलुरु में 2009 में 2167 आत्महत्याएं हुई। उससे काफी ज्यादा आबादी वाले महानगरों मुंबई (1051) और दिल्ली (1215) की तुलना में यह दोगुना है। आबादी के अनुपात के आधार पर तुलना की जाये, तो कहा जा सकता है कि बेंगलुरु में मुंबई और दिल्ली की तुलना में करीब 150 प्रतिशत ज्यादा आत्महत्याएं होती हैं। और यह ट्रेंड पिछले एक-दो साल का नहीं है। सिलिकॉन सिटी बेंगलुरु कई सालों से भारत की आत्महत्या राजधानी बना हुआ है। हालांकि शिक्षा, रोजगार, आवास और जीवन-स्तर के आधार पर बेंगलुरु को देश के बेहतरीन शहरों में गिना जाता है। यहां के मध्यमवर्गीय लोग स्वभाव से शांतिप्रिय और संतोषी हैं। उच्चवर्गीय भी आदर्शवादी हैं और विभिन्न व्यवसायों से कमाये धन को समान के जरूरतमंद लोगों पर खर्च करके कॉपोर्रेट जिम्मेदारी निभाते हैं। तो क्या निम्नवर्ग के लोग ज्यादा परेशान हैं और आत्महत्याएं कर रहे हैं?

चौंकाने वाली बात यही है कि शिक्षित, मध्यवर्गीय और अपने सपनों को पूरा करने के नजदीक पहुंच चुके युवाओं की तादाद अपनी जिंदगी खत्म करने वालों में सबसे ज्यादा है। पिछले एक-डेढ़ दशक में आईटी का बड़ा केन्द्र बनने के कारण बेंगलुरु इस क्षेत्र के युवा प्रफेशनलों की पहली पसंद बना हुआ है। देश के कोने-कोने से आईटी में माहिर नौजवान यहां आकर अच्छे वेतन पर अच्छी नौकरियां पा रहे हैं। पढ़ने के लिए भी यहां काफी युवा आते हैं। अपने आसपास वे रोजगार का बेहतरीन माहौल देखते हैं। जीवन में कुछ पाने के उनके सपने बढ़ते चले जाते हैं। वे 50 हजार रुपये महीने की नौकरी को तो कुछ समझते ही नहीं। मिलियन रुपीज (10 लाख रुपये सालाना) से कम का पैकेज वे अपमानजनक मानते हैं। जब 23-24 साल की उम्र में पहला वेतन इस रेंज में मिलता है, तो खर्च भी वैसे ही किया जाता है। फिर लाइफस्टाइल इस तरह ढलती चली जाती है कि क्रेडिट पर खर्च होने लगता है। कई-कई एटीएम कार्ड इस्तेमाल करके बेतहाशा खर्च किया जाता है।

ऐसे में, करियर या जीवन में जरा सी गड़बड़ होते ही जो ठोकर लगती है, उससे संभलना मुश्किल हो जाता है। आर्थिक मंदी के कारण नौकरी चली जाए, क्रेडिट पर लेकर खर्च किया पैसा वापस करना मुहाल हो जाए या ऐसे हालात में दोस्तों के मुंह मोड़ने से जिंदगी में अकेलापन आ जाए, तो फिर युवा इन हालात में संघर्ष करने की मानसिक स्थिति में नहीं होते। वे 12 घंटे के ऑफिस आवर्स के बाद मल्टीफ्लेक्स, मॉल, पब और बार के जीवन के आदी हो चुके होते हैं और जिंदगी के इस मुकाम पर लगभग एकाकी होते हैं। कोई नहीं होता उन्हें संभालने वाला। सभी महानगरों की यही स्थिति है। अब तो मध्यम आकार के शहरों में भी ऐसा होने लगा है। ये युवा निराशा के भंवर में फंसकर जब कोई रास्ता नहीं देख पाते, तो मौत को गले लगा लेते हैं।

पिछले 1 साल में देश भर में एक लाख किसानों ने आत्महत्या की। मगर इसी दौरान शहरों महानगरों में पांच लाख से ज्यादा युवाओं ने आत्महत्या की। किसान गरीबी की वजह से मौत के आगोश में गए, पर शहरी युवाओं ने मनोवांछित वैभव-विलास न मिलने के कारण मृत्यु का वरण किया। क्या आपका ध्यान इस ओर गया है?

1 comment:

  1. aap ne sawaal theek uthaayaa hai , lekin jawaab theek naheen hai. adhikansh aatmhtyaa jeenee kee naamumkin hotee jatee sthitiyon ke chalte ho rahee hain..

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