Wednesday, October 12, 2011

फॅमिली बैक ग्राउंड बहुत बड़ी चीज है !!!???




नो डाउट - फॅमिली बैक ग्राउंड बहुत बड़ी चीज है .... सुख हो या दुःख, बाहरी झंझावात 
हो, आर्थिक सामाजिक समस्या हो तो यह परिवार एक मुट्ठी सा होता है ...... लेकिन प्रचलित फॅमिली बैक ग्राउंड का अर्थ क्या है ? पैसेवाला घर? ओह्देवाला घर? माँ, बाप, पति-पत्नी - जहाँ रात दिन कलह होते हैं, जिनके लिपे पुते चेहरे और भारी भरकम पर्स के आगे सामाजिक नियम कुछ और हो जाते हैं. जो अपने बच्चों से बेखबर होते हैं, जिनके बच्चे एक घर की तलाश में गुमराह हो जाते हैं ....
पेचीदा सा लगता यह सवाल मेरे अन्दर हथौड़े मारता है -
चलो सतयुग से प्रश्न उठाते हैं - राजा दशरथ की तीन रानियाँ थीं, तो आप कहेंगे - उस समय यही प्रचलन था. यदि यह सही था तो कालांतर में यह कानून क्यूँ बना कि दो शादी अपराध है? या उसी युग में राम ने एक पत्नीव्रत क्यूँ लिया? दशरथ के तीन विवाह, तीनों से हुए पुत्रों का परिणाम था राम का वनवास ... कैकेयी की जिद्द से दशरथ के प्राण गएतो उस परिवार को क्या बड़ी चीज कहेंगे ? उर्मिला के लिए कुछ नहीं सोचा गया - पर चलो यह ख़ास बात है ही नहीं ! (अबला जीवन हाय ......) ............. सीता के त्याग, सहनशीलता का उदाहरण आप सब हम सब आज तक देते आए हैं, एक रात के लिए किसी की बेटी का अपहरण कलंक - तो सीता तो एक वर्ष रहीं ! अब बताइए कि दूरबीन लगाकर कौन पल पल का हिसाब रख रहा था और यदि रख रहा था तो निःसंदेह रावण सम्मान योग्य है. ...... पर राम ने आम जनता की शंका के निवारण के लिए अग्नि परीक्षा ली - अब आप कहेंगे कि वे भगवान् थे, राम ने पहले ही सीता को अग्नि को सुपुर्द कर सुरक्षित कर दिया था - अब प्रश्न है कि हम भगवान् कैसे बन जाएँ, और यदि यह सत्य था तो सबके सामने परीक्षा का प्रयोजन क्यूँ ? सतयुग में तो सब भगवान् ही थे ! फिर एक धोबी, फिर वनवास - और कोई खोज खबर नहीं .... इस फॅमिली में बड़ी चीज क्या रही?
अब चलें द्वापर युग में ----- मथुरा नरेश कंस अपनी नृशंस ज़िन्दगी को बरक़रार रखने के लिए अपनी बहन देवकी और उसके पति वासुदेव को बंदीगृह में डाल देता है, क्योंकि ज्योतिषी ने भविष्यवाणी की कि देवकी का आठवां पुत्र उसके लिए काल होगा ..... कालकोठरी में वह निर्ममता से देवकी के बच्चों की हत्या करता गया = इस पूरे प्रकरण में परिवार जैसी कोई बड़ी चीज तो नहीं थी.
कृष्ण की अदभुत छवि सर्वव्याप्त है - तुलसी दास ने बहुत ठीक लिखा है- जाकी रही भावना जैसी, हरि मूरत देखी तिन तैसी "कृष्ण के रास की अलग अलग परिभाषा है, किसी ने उसे भक्तिभाव से जोड़ा है, किसी ने शरीर से. यदि हम शरीर से जोड़कर देखेंगे तो अनुकरणीय नहीं, न ही कोई परिवार मानेंगे. तो यह व्यापक सत्य गीता से ही समझा जा सकता है, जिसे हम कसौटी पर रखने की ध्रिष्ट्ता नहीं कर सकते !

पर उसी युग में शांतनु पुत्र विचित्रवीर्य की दोनों ही रानियों से उनकी कोई सन्तान नहीं हुई और वे क्षय रोग से पीड़ित हो कर मृत्यु को प्राप्त हो गये। अब कुल नाश होने के भय से माता सत्यवती ने एक दिन भीष्म से कहा, "पुत्र! इस वंश को नष्ट होने से बचाने के लिये मेरी आज्ञा है कि तुम इन दोनों रानियों से पुत्र उत्पन्न करो।" माता की बात सुन कर भीष्म ने कहा, "माता! मैं अपनी प्रतिज्ञा किसी भी स्थिति में भंग नहीं कर सकता।"
यह सुन कर माता सत्यवती को अत्यन्त दुःख हुआ। अचानक उन्हें अपने पुत्र वेदव्यास का स्मरण हो आया। स्मरण करते ही वेदव्यास वहाँ उपस्थित हो गये। सत्यवती उन्हें देख कर बोलीं, "हे पुत्र! तुम्हारे सभी भाई निःसन्तान ही स्वर्गवासी हो गये। अतः मेरे वंश को नाश होने से बचाने के लिये मैं तुम्हें आज्ञा देती हूँ कि तुम उनकी पत्नियों से सन्तान उत्पन्न करो।" वेदव्यास सबसे पहले बड़ी रानी अम्बिका के पास गये। अम्बिका ने उनके तेज से डर कर अपने नेत्र बन्द कर लिये। वेदव्यास लौट कर माता से बोले, "माता अम्बिका का बड़ा तेजस्वी पुत्र होगा किन्तु नेत्र बन्द करने के दोष के कारण वह अंधा होगा।" सत्यवती को यह सुन कर अत्यन्त दुःख हुआ और उन्हों ने वेदव्यास को छोटी रानी अम्बालिका के पास भेजा। अम्बालिका वेदव्यास को देख कर भय से पीली पड़ गई। उसके कक्ष से लौटने पर वेदव्यास ने सत्यवती से कहा, "माता! अम्बालिका के गर्भ से पाण्डु रोग से ग्रसित पुत्र होगा।" इससे माता सत्यवती को और भी दुःख हुआ और उन्होंने बड़ी रानी अम्बालिका को पुनः वेदव्यास के पास जाने का आदेश दिया। इस बार बड़ी रानी ने स्वयं न जा कर अपनी दासी को वेदव्यास के पास भेज दिया। इस बार वेदव्यास ने माता सत्यवती के पास आ कर कहा, "माते! इस दासी के गर्भ से वेद-वेदान्त में पारंगत अत्यन्त नीतिवान पुत्र उत्पन्न होगा।" इतना कह कर वेदव्यास तपस्या करने चले गये।
समय आने पर अम्बा के गर्भ से जन्मांध धृतराष्ट्र, अम्बालिका के गर्भ से पाण्डु रोग से ग्रसित पाण्डु तथा दासी के गर्भ से धर्मात्मा विदुर का जन्म हुआ।

अब इस परिवार को आदर्श की किस श्रेणी में रखेंगे, कहाँ उदाहरण देंगे और परिवार सही मायनों में हुआ किसका ..... न शांतनु से संबंध न विचित्रवीर्य से न भीष्म से - तो बंधु कथा तो यहीं से पलट गई ! और अब सूक्ष्मता से देखा जाए तो दासी पुत्र विदुर की ही चर्चा हो सकती है.... विदुर से रिश्ता जोड़ना अधिक श्रेष्ठ है, बशर्ते ध्रितराष्ट्र और पांडू से रिश्ता जोड़ने के ! पांडू पुत्र कह देने से अर्जुनयुद्धिष्ठिरभीम, नकुल, सहदेव पांडू पुत्र नहीं होते, कर्ण तो सूर्य पुत्र कहे गए (सही नाम मिला). उसके बाद इस कहानी में आती है द्रौपदी ..... जो ५ पुत्रों के बीच खाद्य सामग्री की तरह सौंप दी गई. कुंती ने जानबूझकर खुद की तरह कई पुरुषों के मध्य द्रौपदी को कर दिया .... खैर, ये परिवार के नाम पर क्या बड़ी चीज थे जब अपनी शान के लिए इन्होंने द्रौपदी को दाव पर लगा दिया - कृष्ण न होते तो बेड़ा गर्क ही था !
अब आज ऐसी कुंती माँ के संग कौन रिश्ता जोड़ेगा ..... ह्म्म्म, जोड़ेगा, यदि हस्तिनापुर जैसा राज्य हो, वैभव के आगे सारे ऐब निरस्त होते हैं !!!
..............
अब कलयुग के ऐसे पुरुष पात्रों को उठाती हूँ , जिसमें से आपके आसपास की कई छवियाँ उभरेंगी, और आपका मन उसके साथ आपके मन को तौलेगा - हाँ मन को, क्योंकि मन से भागना संभव नहीं ! और ऐसे सवालिया पात्र परिवार की बात अधिक उठाते हैं -
- दहेज़ के नाम पर पत्नी को बेरहमी से मारनेवाले
- बेटी होने पर पत्नी के साथ बुरा सलूक करनेवाले
- अपने अहम् की तुष्टि में पत्नी को घर से निकालनेवाले
- गाली गलौज करनेवाले
- हत्या करनेवाले
- एक एक रोटी का टुकड़ों में हिसाब करनेवाले
- दूसरे की बहू बेटी को गलत नज़रों से देखनेवाले ................. इत्यादि
अब कुछेक महिला पात्रों को भी उठाती हूँ :
- अपने संदेह में पुरुष का जीना दुश्वार करना
- पुरुष के हर कार्य में हस्तक्षेप , अपनी राय देना
- पुरुष के परिवार के सदस्यों के साथ बदसलूकी से पेश आना
- अपनी बात मनवाने के लिए त्रियाचरित्र दिखाना
- बात बेबात कलह करना .................
ऐसे परिवार की बातें आसमानी होती हैं, ये सिर्फ दूसरों से उम्मीदें पालते हैं, उनकी आलोचना में वक़्त जाया करते हैं और सबसे ज्यादा तरीके की बात यही करते हैं. फॅमिली फॅमिली' सबसे ज्यादा यही करते नज़र आते हैं.
फॅमिली बैक ग्राउंड बहुत बड़ी चीज तभी होती है जब वह पैसे से समर्थ हो, रूतबा हो .... मात्र शिक्षा का कोई औचित्य नहीं (शिक्षा का संबंध संस्कार से जुड़ा होता है और रोटी कपड़ा मकान )...पॅकेज से शुरुआत होती है, फिर कौन खूनी है, कौन अय्याश है ... कोई फर्क नहीं पड़ता,
और आजकल तो लिविंग रिलेशनशिप का ज़माना है - कानूनन ! और भी बहुत कुछ क़ानूनी है तो अब पलड़े का क्या आधार होगा ! किसे बड़ी चीज कहेंगे ....???

1 comment:

  1. haahhhaaa jo apna itihaas nahi jaante vo ram par prishnchinh lagate hai

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