Saturday, October 22, 2011

बिहार के विकास की दर जब तेज है तब यह हालत है




हिन्दुस्तान अख़बार के आज के एक्सट्रा कवर के पहले पन्ने पर एक विज्ञापन में एक फिल्म अभिनेत्री एक खाद्य पदार्थ का विज्ञापन करते नाचती हुई कह रही है कि आंगन टेढा है पर मेरा है। जिसने भी यह विज्ञापन बनाया है अपनी कंपनी के लिये वह दाद के काबिल है। खैर उसे इस काबिलियते के पैसे भी मिले होंगे।
अखबार के खबरों वाले पहले पन्ने पर टाप लीड खबर सीवान की है जहां पुलिस की बोलेरो ने तीन लोगों की रौंद कर जान ले ली। पुलिस एक बच्चा चोरी की आरोपित महिला को छुडाने गयी थी।

अमानवीयता की हदें यहां साफ हैं। बच्चा चोरी से अमानवीय क्या हो सकता है। एक चोरी गये बच्चे के साथ् क्या-क्या हो सकता है इसकी कल्पना ने हजारों लोगों को आक्रोषित कर दिया, यह सहज है। बच्चे को किसी धनी निःसंतान दंपति को बेचा जा सकता है या उसके पैर-हाथ तोडकर भीख मंगवाई जा सकती है या ऐसी वेबसाइटें भी हैं आज जो बच्चों का मांस परोसने वाले होटलों की तस्वीरें उपलब्ध कराती हैं।

पर सवाल है कि अगर उस महिला ने बच्चा चुराया तो क्या वह बडी अपराधिन है, क्या उसने खुद पालने के लिए बच्चा चुराया होगा। तब तो उसे मनोचिकित्सक की जरूरत है। और अगर पैसे के लिए , तो यह तो राज्य या समाज की जिम्मेवारी होती है कि वह न्यूनतम खाने की व्यवस्था करे हर आदमी के। पर खाना कहां पर्याप्त है...। तमाम मीडिया जिस तरह का बाजार सामने पसारे रहता है वह गरीब आदमी को कुछ भी नारकीय करने को उत्प्रेरित कर सकता है खासकर जब उसकी शिक्षा दीक्षा की कोई व्यवस्था ना हो।

बिहार के विकास की दर जब तेज है सबसे तब यह हालत है। हजारों लोग एक अकेली महिला की जान लेने पर तुल जाते हैं, वे सब इस विकसित राज्य के निवासी हैं। वे पुलिसवाले भी विकसित हैं जो एक महिला को बचाने में तीन जंगली व्यवहार पर उतारू लोगों को बोलेरो से रौंद डालती है।

अब यह नीतीश , या मनमोहन या ओबामा की गलती मात्र नहीं है अकेले की। वे हमारे चुने हुए जनप्रतिनिधि हैं। हम भी उसमें बराबर के भागीदार हैं। हम जिन्हें चुनते हैं उन्हें विकसित नहीं कर पाते या हम अविकसित लोग किसी विकसित को कैसे चुन सकते हैं। सवाल जमीनी विकास का ही है उसके बिना उपाय कहां है।

जो आर्थिक गैरबराबरी है उसे पाटना विकास होगा। जब तक यह नहीं होगा एक आजाद स्त्री अपने टेढे आंगन को सीना ठोंककर कहती रहेगी कि वह मेरा है। इसके दूसरे छोर पर एक दलित स्त्री रोटी के टुकडों के लिए या समाज में किसी तरह की दिखावे की बराबरी पाने के लिए बच्चा चुराने की कोशिश करती दिखेगी।

गैरबराबरी के आंकडे के लिए भी हमें दूर नहीं जाना होगा। आज के ही अखबार में प्रताप सोमवंशी ने इस पर एक जरूरी टिप्पणी लिखी है। हिसार चुनाव के तीन मुख्य प्रतिद्वंद्वियों में तीनों की पिछले दो सालों में अप्रत्याषित तेजी से संपत्ती बढी है। हिसार से जीतने वाले कुलदीप विष्नोई की संपत्ति दो सालों में 17 करोड से 48 करोड हो गयी है। चैटाला ने 29 से 40 करोड की बढत ली है। और जयप्रकाष ने 65 लाख से तीन करोड की बढत ली है। अन्ना कांग्रेस की हार का सेहरा अपने सिर लेने को बेताब हैं पर यह कितना सतही है यह इस आंकडे से जाहिर है।

पहली बात कि जो चुनाव जीता है उसके ज्ञात संपत्ति सर्वाधिक है। फिर जिस कांग्रेसी के हारने का श्रेय अन्ना टीम लेना चाहती है उसकी संपत्ति सबसे तेजी से बढी है। अब इसमें अन्ना इफेक्ट तो टन्ना कर रह जा रहा है, अब कुमार विश्वास अन्ना की सभा में लाख दोहत्था हिलाते रहें, सच का मुख्य पहलू तो यही है।

आज के ही हिंदुस्तान के पहले पेज 18 पर एक और खबर है कि अगले पांच साल में दुनिया और पचास फीसद अमीर हो जाएगी। यह कौन सी दुनिया है अमीर होती, वह कौन सा बिहार है विकसित होता।

उस खबर में आर्थिक वस्तुस्थिति का दूसरा पहलू भी दर्ज है, कि जहां भारत में 43 फीसद वयस्कों की संपत्ति 50 हजार मात्र है वही 0.4 फीसद की संपत्ति 50 लाख से ज्यादा है।

खबरनवीस ने दूसरे पैरा में लिखा है - भारत में प्रति व्यक्ति संपत्ति वैसे तो बढकर 2 लाख 70 हजार रूपये हो गयी है लेकिन संपत्ति का वितरण अभी भी बेतरतीब है।

तो यहां खबरनवीस की खबर में जहां वैसे तो का प्रयोग हुआ है, मुख्य खबर वहीं है, पर बाजार का दबाव व्यवस्था का दबाव ऐसा है कि हेडिंग भारतीयों के दौलत बढने की लगती है। इसी तर्ज पर वैसे तो बिहार का विकास होता जा रहा है पर भीड भूख और अव्यवस्था के दबाव में दंगायी हो रही है और पुलिस वहषी और स्त्री हत्यारन। यह सब कुछ वैसे तो टाइप विकास के चलते हो रहा है जिसके लिए हम सब जिम्मेवार है जो इस विकास को सपने की तरह देखने के आदी हो चुके हैं। जो २६ और ३२ रुपया की विकास दर को अपना मुद्दा नहीं बना पते हैं।

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