Monday, October 24, 2011

येदियुरप्पा उर्फ भाजपा की कलंक कथा



प्रधानमंत्री  बनने की अपनी चिर-परिचित हसरत के साथ भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कांग्रेस और उसके नेतृत्व  वाली केंद्र की यूपीए सरकार  की घेराबंदी करने के लिए एक बार फिर देशव्यापी रथयात्रा पर निकले भारतीय जनता पार्टी के महारथी लालकृष्ण आडवाणी और उनके सहयोगियों को अंदाजा भी नहीं रहा होगा कि उनकी नैतिकता का रथ इतनी जल्दी अपने ही घर में फैले भ्रष्टाचार के दलदल में फंस जाएगा। मध्य प्रदेश के सतना शहर में आडवाणी की रथयात्रा के सिलसिले में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में राज्य सरकार के एक मंत्री समेत भाजपा नेताओं द्वारा पत्रकारों को पैसे बांटने का मामला अभी ठंडा भी नहीं पड़ा था कि भ्रष्टाचार के आरोपों में कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा को जेल जाना पड़ गया। उनके जेल जाने से आडवाणी और पार्टी के दूसरे बड़े नेता ही नहीं, समूचा संघ परिवार सकते में हैं। कहां तो वे कांग्रेस को घेरने निकले थे और कहां अब उनकी ही पार्टी के एक क्षत्रप की कारगुजारी ने उन्हें आईना देखने पर मजबूर कर दिया है।
कोई साढ़े तीन साल पहले जब कर्नाटक  में भाजपा सत्ता में  आई थी तो यह किसी भी अन्य राज्य  की तुलना में उसके लिए ज्यादा महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। दक्षिण भारत में अपनी सरकार बनाने की उसकी हसरत परवान चढ़ी थी। लेकिन सत्ता में आने के बाद जो कुछ हुआ वह सत्ता के दुस्र्पयोग और भ्रष्टाचार की हैरतअंगेज दास्तान है। अवैध खनन के बारे में ढाई महीने पहले राज्य के तत्कालीन लोकायुक्त संतोष हेगड़े की रिपोर्ट आने के बाद येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा था और अब भूमि घोटाले में उनकी लिप्तता के आरोप ने उन्हें जेल के सींखचों के पीछे पहुंचा दिया है। दक्षिण भारत में अपने बूते भाजपा को पहली बार सत्ता का आस्वादन कराने वाले कद्दावर नायक से खलनायक बने येदियुरप्पा कर्नाटक के पहले और देश के ऐसे पांचवें पूर्व मुख्यमंत्री हो गए जिन्हें भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते बेआबरू होकर सींखचों के पीछे जाना पड़ा। इसके पहले महाराष्ट्र के अब्दुल रहमान अंतुले, तमिलनाडु की जयललिता, बिहार के लालू प्रसाद यादव और झारखंड के मधु कोड़ा इसी तरह के आरोपों के चलते जेल की हवा खा चुके हैं।
कांग्रेस  और पूर्व  प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा के जनता दल (सेक्यूलर) के कुशासन से त्रस्त कर्नाटक  की जनता से सुशासन देने का वादा कर सत्ता में आए येदियुरप्पा  बहुत जल्द अपने भ्रष्टाचरण की गाथा लिखने में मशगूल हो गए थे। उन्होंने बेखौफ होकर अपने परिजनों, रिश्तेदारों और मित्रों को बेशकीमती सरकारी जमीन कौड़ियों के भाव दे दी, विधानसभा में बहुमत बनाए रखने के लिए निर्दलीय और विपक्षी विधायकों की खरीद-फरोख्त की और पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के दुलारे बेल्लारी के बदनाम रेड्डी भाइयों को राज्य की बेशकीमती खदानों का मालिक बना दिया। इस सबकी तार्किक परिणति हुई मुख्यमंत्री पद से उनकी स्र्खसती में। वैसे यह तथ्य बहुत पहले ही जगजाहिर हो चुका था कि मुख्यमंत्री पद का दुस्र्पयोग करते हुए येदियुरप्पा ने अपने परिजनों और चहेतों को उपकृत किया है। अगर तभी भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व उनसे पिंड छुड़ा लेता तो आज पार्टी की ऐसी भद नहीं पिटती। लेकिन जब तक बन पड़ा पार्टी उनका बचाव करती रही। पार्टी की ओर से कभी कर्नाटक के प्रभारी रहे वरिष्ठ नेता शांता कुमार के एक बयान से भी इसकी तसदीक होती है। तत्कालीन लोकायुक्त की रिपोर्ट आने के बाद मची सियासी उथल-पुथल के दौरान शांता कुमार ने कहा था कि उन्होंने इस बारे में पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को पहले ही आगाह कर दिया था। लेकिन पार्टी सब कुछ जानते हुए भी मूकदर्शक बनी रही, जब तक कि येदियुरप्पा पार्टी के गले की फांस नहीं बन गए।
येदियुरप्पा ने मुख्यमंत्री रहते हुए जो कुछ धतकरम किए उसमें उन्होंने तो किसी तरह का शर्म-संकोच नहीं ही किया, लेकिन उनके सारे किए-धरे को नजरअंदाज करने में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने भी कम निर्लज्जता नहीं दिखाई। जमीन आवंटन से संबंधित मामले में जब येदियुरप्पा पर आरोप लगे थे तब भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने तो यह कहते हुए निहायत बेशर्मी के साथ उनका बचाव किया था कि येदियुरप्पा ने जो किया है, वह अनैतिक तो है पर गैरकानूनी नहीं। जाहिर है कि भाजपा येदियुरप्पा को छेड़ने में हिचकिचा रही थी। उसे डर था कि ऐसा करने से येदियुरप्पा के वफादार विधायक बगावत पर उतर आएंगे। भाजपा अक्सर दूसरे दलों पर वोट बैंक की राजनीति करने का आरोप लगाती रहती है मगर कर्नाटक के प्रभावशाली लिंगायत समुदाय का समर्थन खो देने के डर से वह येदियुरप्पा के साथ नरमी बरतती रही। पार्टी नेतृत्व को लग रहा था कि येदियुरप्पा के वफादार विधायकों की बगावत से दक्षिण भारत में बड़ी मुश्किल से बनी पार्टी की पहली सरकार बेमौत मारी जाएगी और लिंगायत समुदाय के पार्टी से दूर हो जाने  पर भविष्य में दोबारा वहां सत्ता में लौटना मुश्किल हो जाएगा।
पाकिस्तान में मोहम्मद अली जिन्ना की तारीफ में एक वस्तुपरक बयान देने पर आडवाणी को भाजपा का अध्यक्ष पद छोड़ देने पर मजबूर कर देने वाले संघ नेतृत्व ने भी येदियुरप्पा के भ्रष्ट कारनामों को पूरी तरह नजरअंदाज किया। संघ अपने को चरित्र निर्माण की पाठशाला कहता रहता है लेकिन उसके निष्ठावान स्वयंसेवक येदियुरप्पा पर लगे आरोप और उनकी गिरफ्तारी बताती है कि संघ अपने स्वयंसेवकों का किस तरह का चरित्र निर्माण करता है। लोकायुक्त की अदालत ने येदियुरप्पा की गिरफ्तारी का आदेश ऐसे वक्त जारी किया, जब भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भाजपा केंद्र सरकार और कांग्रेस को घेरने में जी-जान से जुटी हुई है। लालकृष्ण आडवाणी तो जनचेतना रथ पर सवार होकर कांग्रेस और केंद्र सरकार पर हमले बोल ही रहे हैं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी अण्णा हजारे के आंदोलन का श्रेय लूटने में पीछे नहीं है।
येदियुरप्पा की गिरफ्तारी ने सुराज और सुशासन का मंत्रोच्चार करने वाले रथयात्री आडवाणी के लिए बेहद असहज स्थिति पैदा कर दी है। यह अकारण नहीं हैं कि प्रतिदिन अपनी यात्रा प्रारंभ करने से पूर्व संवाददाताओं से बतियाने वाले आडवाणी को येदियुरप्पा की गिरफ्तारी के अगले दिन भोपाल पहुंचने पर अपना गला खराब होने आड़ लेते हुए प्रेस कांफ्रेंस रद्द करनी पड़ी। लेकिन अगले दिन नागपुर में उन्हें हिम्मत जुटा कर कहना पड़ा कि येदियुरप्पा को पार्टी ने पहले ही सचेत किया था, लेकिन वे नहीं चेते और उनकी कारगुजारियों के लिए पार्टी को शर्मिंदगी का सामना करना पड़ रहा है। यह विडंबना ही है कि आडवाणी की इस साफगोई से पार्टी के दूसरे नेता अपने को असहज महसूस कर रहे हैं। वे अभी भी येदियुरप्पा के प्रति अपना मोह नहीं छोड़ पा रहे हैं। पार्टी महासचिव और प्रवक्ता जेपी नड्डा ने साफ कहा है उनकी गिरफ्तारी महज एक कानूनी मसला है, इसलिए कानून अपना काम करेगा लेकिन पार्टी पूरी तरह येदियुरप्पा के साथ है। इतना ही नहीं, कर्नाटक के मुख्यमंत्री सदानंद गौड़ा सहित राज्य सरकार के तमाम मंत्री येदियुरप्पा के साथ खड़े नजर आ रहे हैं। वैसे इसमें अचरज की कोई बात नहीं है। भ्रष्टाचार के खिलाफ बने देशव्यापी माहौल में कांग्रेस के खिलाफ सियासी बढ़त हासिल करने के लिए येदियुरप्पा भले ही हटा दिए गए लेकिन सदानंद गौड़ा को उनकी मर्जी से ही उनका उत्तराधिकारी बनाना गया। जो पार्टी भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों में फंसे अपने एक नेता की पसंद-नापसंद का इतना ध्यान रखती हो, वह किस नैतिक धरातल पर खड़ी होकर भ्रष्टाचार से लड़ने का दावा कर सकती है?
देश अभी भूला नहीं है कि अवैध खनन में भागीदारी और सरकारी जमीन की हेराफेरी के सिलसिले में येदियुरप्पा को लोकायुक्त की रिपोर्ट में साफ तौर पर दोषी करार दे दिए जाने के बाद पार्टी नेतृत्व ने जब मजबूर होकर येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद से हटने का फरमान जारी किया था तो येदियुरप्पा ने किस तरह लिंगायत समुदाय में अपनी पैठ को अपने राजनीतिक सुरक्षा कवच की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश करते हुए पार्टी नेतृत्व को बागी तेवर दिखाए थे और फिर मजबूरन इस्तीफा देने के बाद अपने 'विश्वस्त' को मुख्यमंत्री बनवाकर सत्ता में अपनी वापसी का रास्ता खुला रखना चाहा था। लेकिन अदालत के आदेश पर हुई उनकी गिरफ्तारी ने उनके इस मंसूबे पर पानी फेर दिया है। मुख्यमंत्री पद से जेल तक येदियुरप्पा का यह सफरनामा भाजपा के लिए निश्चित तौर पर एक बड़ा झटका तो है ही, एक सबक भी है। सबक यह कि भ्रष्टाचार के मसले पर दूसरों पर पत्थर उछालने के पहले अपने घर को दुस्र्स्त करना होगा। येदियुरप्पा प्रकरण ने मुख्यमंत्रियों के विवेकाधिकारों के औचित्य पर भी सवाल खड़े किए हैं लेकिन भाजपा ने अभी तक इस बारे में ऐसा कोई नीतिगत फैसला नहीं किया है और न ही करने का इरादा जताया है जो मुख्यमंत्रियों के विवेकाधीन कोटे के दुस्र्पयोग पर अंकुश लगने का भरोसा पैदा कर सके। कहने की जरूरत नहीं कि भाजपा नेतृत्व कर्नाटक के तजुर्बे से कोई सबक सीखने की समझदारी दिखाने को तैयार नहीं है।

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