Wednesday, October 19, 2011

दहेज समाज और राष्ट्र की आधी से अधिक बुराइयों का जड़ है.



धर्म, समाज और परंपरा के आवरण में दहेज जैसी अभिशाप को किसी भी तरह के क़ुरबानी देकर रोकना होगा| बिना रोके किसी भी परिवार को हम खुशहाल नहीं कर पाएँगे| दहेज और किसी भी तरह के कर्मकाण्ड जीवन, परिवार और राष्ट्र के सभी बड़ी बुराइयों में से एक है| दहेज और कर्मकांड को रोकने के लिए आप इस मुहिम से जुड़ें, ताकि समाज और राष्ट्र की आधी से अधिक बुराइयों और बीमारियों को खत्म किया जा सके|

एक लाईलाज बीमारी, जन्म से मरण तक, संस्कृति से अपसंस्कृति तक, मानवीय सभ्यता की शुरुआत से लेकर आज के दिन तक यदि समाज और राष्ट्र को दीमक की तरह सम्पूर्ण रूप से खोखला करने का किसी ने काम किया है, तो वह है कर्मकांड, आडंबर, जाति और दहेज| दहेज और कर्मकाण्ड, हमारे परिवार और निजी जीवन की स्वतंत्रता को समाप्त कर देता है| आज सरकार, स्वयंसेवी संस्था और समाज चिल्ला रहा है कि भ्रूण हत्या को रोको| लड़के और लड़कियों के बीच की असामनता को खत्म करो| दकियानुसी विचारों से बेटियों को आपने सामाजिक, लोक-लाज रूपी अवर्ण दिखाकर, जो एक बंधन में बांध कर, उनके मन में जो हीनता वर्षों से भर दी गयी है, उसे खत्म करोगी| बेटियों पर अबलाओं पर आज जो अत्यधिक जुल्म बढ़ें हैं, उसके खिलाफ सभ्य समाज के लोग अनवरत संधर्ष कर रहे हैं| परन्तु उसके जो मुख्य कारण हैं, दहेज, उसके लिए आज तक, ना तो सभी समाज के लोग, ना साधू-संत, ना नेता और ना ही किसी नौजवान ने किसी भी तरह का महबूत प्रयास किया|

सभी समाज आर कुछ नौजवानों के द्वारा कुछ प्रयास छोटी-बड़ी हुई भी थी जिसका मुख्य उद्देश्य अपनी जिम्मेवारी से मुक्त होना था| दहेज, आज समाज का स्टेटस सिम्बल बन चुका है| शादी अब लड़के और लड़कियों के दिलों के मिलन के कारण नहीं हो रहा है, बस रीत है, परम्परा है, समाज इसी गति से बढ़ेगी, इस परंपरा के बगैर परिवार नहीं फल-फूल सकता इसलिए शादी करनी है| अब तो शादी के आड़ में हम अपने अहंकार और दिखावे के स्वाभिमान को तृप्त कर रहे हैं, और जिसके आड़ में हम अपने कई बुराइयों को ढक पाते हैं|

आप देखते होंगे कि आह इसी देश में “खाप” के जैसे हजारों गाँव हैं जहाँ प्यार करने वालों को मौत मिलती है| और यही विचार करीब-करीब सभी बड़े-छोटे जातियों के खून में समाया है कि बेटियों ने हमारी नाक कटवा दी| इस तमाम बुराइयों के खिलाफ समाज या नौजवान खड़े क्यों नहीं हुये? जो कई तरह के बुराइयों को जन्म देता हो, जो एक परिवार के लिए भ्रष्टाचार की जननी हो| बेटा और बेटी, दोनों में हम लेन-देन करते हैं| यह लेन-देन सिर्फ दिखावा है, स्टेट्स सिम्बल है और दकियानुसी बातें जैसे – यह हम अपने बच्चों की खुशी के लिए दे रहे हैं, ऐसा कहकर जमीन घर गिरवी और पूरी जिंदगी की कमाई को ताक पर रखकर भीखारी बन जाना, यह कैसे उचित है और कहाँ की परंपरा है? क्या यह अंतहीन लोभ नहीं है? इसी अंतहीन लोभ ए कारण हजारों-लाखों बेटियों को बलि पर चढ़ा दिया जाता है| हजारों-लाखों बेटियों को भ्रूण हत्या के द्वारा खत्म कर दिया जाता है|

दहेज आज इस परिवार, समाज और राष्ट्र के लिए बहुत बड़ा सवाल है| इसे खत्म करना ही होगा| आइये मिलकर किसी भी तरह की संकीर्णता – जाति, धर्म या मजहब, से ऊपर उठाकर, एक नए समाज, राष्ट्र और खुशहाल परिवार के लिए एक नयी क्रांति की शुरुआत करें! और आने वाले भविष्य में सुनहरे अवसर के लिए स्वस्थ और किसी भी तरह के बुराइयों से मुक्त समाज के निर्माण के लिए, प्रत्येक हाथ में मशाल लेकर हम आगे बढ़ें! जो लोग हृदय से इस मशाल को लेकर आगे बढ़ना चाहते हैं, वो इस मुहिम में हमारा साथ दें!

1 comment:

  1. sohrab bhai aap ka ye lekh bahut hi achha laga .,ab samay aa gaya hai hum sab ke liye ke hum logon ko kuchh kadam uthane padenge taaki is dahej ki samasya se nipat sakein...mujhe lagta hai ise agar mitana hai to kuchh padhe likhe or thoda famous logon ko bina dahej ke shaadiyan karni padengi.....or hamei ek udahran dena hoga...mujhe to apne aap se start karna hoga..oron ko bhi utsahit karna padega....ye ladai hai jo hamei jitni hai har kimat par ...nahin to hum mit jayenge...namon nishan nahin rahega.....

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