Wednesday, November 02, 2011

देश के नक्कारखाने में पूर्वोत्तर की चीखें


सुदूर पूर्वोत्तर राज्यों की आवाज दिल्ली आते-आते  कितनी कमजोर हो जाती हैं, इसका ताजा उदाहरण बना हुआ है मणिपुर। आमतौर पर पूर्वोत्तर के राज्यों की ओर दिल्ली यानी केंद्र सरकार और मीडिया के एक बड़े वर्ग का ध्यान तभी जाता है जब वहां कोई बड़ी प्राकृतिक आपदा आती है या फिर कोई पड़ोसी देश उन सीमावर्ती राज्यों के साथ कोई छेड़खानी करता है। राष्ट्रीय या अखिल भारतीय कहे जाने वाले राजनीतिक दलों या फिर राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता की जोड़तोड़ में शामिल दलों को भी केंद्र में सरकार बनाते या गिराते वक्त ही याद आता है कि पूर्वोत्तर के राज्य भी भारत का ही हिस्सा है, क्योंकि उन्हें वहां से निर्वाचित क्षेत्रीय दलों के सांसदों का समर्थन चाहिए होता है। इसके अलावा उन राज्यों में दैनिक जनजीवन में क्या कुछ होता है और वहां लोगों को किन आर्थिक-सामाजिक और राजनीतिक दुश्वारियों का सामना करना पड़ता है, इससे किसी का कोई सरोकार नहीं होता। यह तथ्य एक बार नहीं, कई बार साबित हुआ है और इस समय मणिपुर के हालात से एक बार फिर साफ-साफ साबित हो रहा है।


बीते कई वर्षों से जारी उग्रवाद और अलगाववाद की लपटों में  बुरी तरह झुलस रहा पूर्वोत्तर का छोटा सा लेकिन खूबसूरत मणिपुर राज्य इस समय अपने सबसे मुश्किल भरे दौर से गुजर रहा है। इस बार उसके सामने संकट उग्रवाद का नहीं बल्कि विभिन्न स्थानीय समुदायों के बीच अपनी पहचान और वर्चस्व को लेकर बढ़ते तनाव का है। एक अलग जिले के गठन के सवाल पर राज्य के कूकी और नगा समुदाय एक दूसरे के खिलाफ खड़े हैं। कूकी समुदाय का संगठन 'द सदर हिल्स डिस्ट्रिक्ट डिमांड कमेटी' नगा बहुल सेनापति जिले को विभाजित कर सदर हिल्स जिले के गठन की मांग कर रहा है। सदर हिल्स इलाका कुकी बहुल सब-डिविजन है। कूकी समुदाय की इस मांग का नगा समुदाय का संगठन 'द युनाइटेड नगा काउंसिल' विरोध कर रहा है। मणिपुर घाटी को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने वाले दो रास्ते हैं जिनमें से एक रास्ता कूकी बहुल इलाके से गुजरता है जबकि दूसरा नगा बहुल इलाके से। दोनों संगठनों ने अपनी-अपनी मांग को लेकर इन रास्तों पर पिछले तीन महीने से भी ज्यादा समय से आर्थिक नाकेबंदी लागू कर रखी है, जिसके चलते मणिपुर घाटी के बाशिंदों खासकर मैतेई समुदाय के लोगों का जीना दुश्वार हो गया है। इस प्रकार राज्य के तीनों प्रमुख समुदाय एक दूसरे के खिलाफ खड़े हो गए हैं।

आर्थिक नाकेबंदी की वजह से राज्य के इस इलाके में रसोई गैस, पेट्रोल, डीजल, दवाइयां जैसी जरूरी वस्तुओं का अभाव हो गया है और कालाबाजारियों और जमाखोरों की बन आई है। वे मनमाने दामों पर चीजें बेच रहे हैं जिसके चलते रसोई गैस का सिलेंडर 1800 स्र्पए में तथा पेट्रोल 100 स्र्पए और डीजल 80 स्र्पए प्रति लीटर में भी मुश्किल से उपलब्ध हो रहा है। आलू और प्याज 50 से 60 स्र्पए किलो तक मिला रहा है। हालात विस्फोटक हो गए हैं और भयावह खूनखराबे को न्योता दे रहे हैं। इस मौके का फायदा उठाने के लिए राज्य में पहले से सक्रिय उग्रवादी संगठन भी तैयार बैठे हैं। अफसोस की बात यह है कि राज्य सरकार किसी समाधान पर नहीं पहुंच पा रही है और केंद्र सरकार भी मूकदर्शक बनी हुई है। सिर्फ केंद्र सरकार ही नहीं, एक राजनीतिक दल के तौर पर कांग्रेस की चुप्पी भी कम अफसोसनाक नहीं है। कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी उत्तर प्रदेश में किसानों पर लाठीचार्ज होता है तो वहां पदयात्रा करने पहुंच जाते हैं। बिहार में जमीन अधिग्रहण का विरोध कर रहे लोगों पर पुलिस फायरिंग होती है तो वे वहां का भी दौरा कर आते हैं, लेकिन उन्हें मणिपुर बिल्कुल याद नहीं आता।

देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी और जल्द से जल्द जैसे भी हो, सत्ता में आने को बेताब भारतीय जनता पार्टी के एजेंडा में भी मणिपुर या पूर्वोत्तर के राज्यों के लिए कोई खास जगह नहीं है। हां कभी-कभी उसे असम की याद जरूर आ जाती है। वहां वह बांग्लादेशी शरणार्थियों और वहां के कथित घुसपैठियों का मुद्दा उठा कर राज्य की राजनीति में साम्प्रदायिक धु्रवीकरण की कोशिश करती रहती है। लेकिन मणिपुर या अस्र्णाचल प्रदेश, मिजोरम, नगालैंड में उसके लिए इस तरह की राजनीति की कोई गुंजाइश नहीं रहती है, इसलिए इन राज्यों की ओर सामान्यतया उसका ध्यान नहीं जाता है। हां, इन राज्यों में ईसाई मिशरियों की गतिविधियों और यदा-कदा होने वाली धर्मातंरण की घटनाओं को लेकर वह अपनी हिन्दुत्व जनित परेशानी का इजहार जरूर कर देती है। जहां तक वामपंथी दलों और विभिन्न दलों में बंटे समाजवादियों की बात है तो वामपंथी तो अभी तक पश्चिम बंगाल और केरल में मिली हार के सदमे से ही उबर नहीं पाए हैं और समाजवादियों के लिए तो अब मानो उत्तर प्रदेश और बिहार ही पूरा देश है। डॉ. लोहिया, मधु लिमए और सुरेंद्र मोहन के बाद मणिपुर जैसे सवालों पर सोचने और बोलने वाला कोई नेता या चिंतक अब समाजवादियों में है ही नहीं।

सवाल सिर्फ मणिपुर में इन दिनों चल रही आर्थिक नाकेबंदी का ही नहीं है, पूर्वोत्तर के राज्यों से जुड़ा इस तरह का जब भी कोई मामला आता है तो क्या सरकार, क्या राजनीतिक दल और क्या मीडिया कोई भी उसे कभी गंभीरता से नहीं लेता। मणिपुर की ही इरोम शर्मिला चानू हैं जिनके अनशन को आगामी चार नवंबर ग्यारह वर्ष पूरे हो रहे हैं। उनकी मांग है कि मणिपुर में लागू सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून हटाया जाए क्योंकि इस कानून की आड़ में वहां तैनात सशस्त्र बलों के जवान निर्दोष लोगों के साथ गुलामों जैसा बर्ताव करते हैं और उनके द्वारा महिलाओं का अपहरण और बलात्कार किया जाना आम बात है। पूर्वोत्तर के सभी राज्यों में यह कानून लागू है। इरोम शर्मिला के आरोपों की जांच करने की जहमत भी कभी सरकार ने नहीं उठाई। मणिपुर हो या जम्मू-कश्मीर जब भी वहां तैनात सशस्त्र बलों पर फर्जी मुठभेड़ में किसी को मार दिए जाने, लूटपाट करने या महिलाओं से बलात्कार करने के आरोप लगते हैं और उनकी जांच कराने की मांग उठती है तो सरकार का एक ही घिसापिटा जवाब होता है कि ऐसा करने से सशस्त्र बलों का मनोबल गिरेगा। जनता के मनोबल का क्या होगा, इस बारे में सरकार कभी नहीं सोचती। अपने इसी रवैये के चलते दिल्ली में भ्रष्टाचार और जन लोकपाल के सवाल पर अनशन करने वाले अण्णा हजारे और बाबा रामदेव के आगे सिर के बल खड़ी हो जाने वाली सरकार और उनके अनशन का चौबीसों घंटे लाइव प्रसारण करने वाले टीवी चैनलों ने कभी शर्मिला की सुध लेने की जहमत नहीं उठाई। अण्णा हजारे और बाबा रामदेव की पालकी के कहार बनने को आतुर रहने वाले राजनीतिक दलों के नेताओं ने भी कभी शर्मिला से मिलना मुनासिब नहीं समझा। सिर्फ इसलिए कि मणिपुर छोटा सा राज्य है और वहां से लोकसभा के सिर्फ दो सदस्य चुने जाते हैं।

दरअसल, असम के अलावा पूर्वोत्तर के बाकी सभी राज्यों की आबादी जनजाति बहुल है। वहां के लोगों की कद-काठी और चेहरे-मोहरे, उनकी संस्कृति, उनकी सामाजिक परंपराए, रीति-रिवाज और उनकी भाषाएं शेष भारत के लोगों से काफी अलग है। इसीलिए न तो शेष भारत खासकर उत्तर भारत के लोग उन्हें अपनी ही तरह भारत का नागरिक मानते हैं और न ही वे लोग शेष भारत के लोगों के साथ अपना जुड़ाव कायम कर पाते हैं। इस दूरी को पाटने और समूचे पूर्वोत्तर के लोगों को मुख्यधारा में लाने के लिए सरकार की ओर से भी राजनीतिक व सामाजिक संगठनों की ओर से भी कभी कोई संजीदा पहल नहीं की गई। कहने की आवश्यकता नहीं कि पूर्वोत्तर को हम सिर्फ भारतीय भू भाग का हिस्सा भर मानते हैं। भावनात्मक तौर पर यह अलगाव ही भौगोलिक अलगाव को बढ़ावा देता है। इस अलगाव के चलते ही कभी चीन अस्र्णाचल पर अपना दावा कर देता है तो कभी नगालैंड और मिजोरम के लोग देश से अलग होने की बात करते हैं। पूर्वोत्तर के सभी राज्यों में बने अलगाववादी संगठन और वहां चलने वाली उग्रवादी गतिविधियों के लिए सबसे ज्यादा अगर कोई जिम्मेदार है तो वह है केंद्र सरकार और राजनीतिक दलों का उपेक्षित रवैया तथा शेष भारत के लोगों की तंगदिली और स्वार्थीपन।

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