Saturday, December 17, 2011

भारत के मुसलमानों का भविष्य (भाग-3)


गुजरात में नरेन्द्र मोदी सरकार की देखरेख में हुए मुसलमानों के नरसंहार की सच्चाई सामने लाने के लिए या तो तीस्ता सीतलवाड़ को मुंबई से अहमदाबाद आना पड़ता है या फिर वहीं रह रहे मुकुल सिन्हा जैसे गैर-मुसलमान वकील को खड़ा होना पड़ता है। दरअसल ज्यादातर मुस्लिम संगठन यही चाहते भी हैं कि उनकी लड़ाई तथाकथित सेकुलरवादी हिन्दू लडे़ं। लखनऊ में संदीप पाण्डेय, जयपुर में कविता श्रीवास्तव, दिल्ली में प्रशांत भूषण और अरुंधती रॉय, बाराबंकी में रणधीर सिंह सुमन, अयोध्या में जुगल किशोर शास्त्री सरीखे गैर-मुसलमान लोग ही आज इस लड़ाई में ज्यादा सामने दिखते हैं। समझदार मुसलमान दबे स्वर में कहते हैं कि जितना खुल कर हिन्दू इस मुद्दे पर बात कर सकते हैं उतना कोई मुसलमान कभी बोल ही नहीं सकता। कभी सिमी, कभी इंडियन-मुजाहिदीन, कभी लश्कर-ए-तयबा, कभी हिजबुल मुजाहिदीन आदि नामों से पुलिस मुसलमानों को गिरफ्तार करती रहती है, लेकिन फिर भी कोई मुस्लिम तंजीम या नेता खड़े होकर खुले आम यह नहीं पूछता कि आखिर सबूत कहाँ हैं? होना तो यह चाहिए कि जमात-ए-इस्लामी जैसी तंजीमें खुलकर सामने आएँ और इन सवालों को लेकर मुल्क के कोने-कोने में आमसभा बुलाएँ और सरकार और उसके पुलिसिया निजाम पर उँगली उठाएँ। होना तो यह चाहिए कि ये तन्जीमें आतंकवाद के झूठे आरोप में गिरफ्तार हुए हर एक मुसलमान शख्स को प्रिजनर ऑफ काॅन्शेंस का दर्जा देने की राजनैतिक लड़ाई छेड़ें और सार्वजनिक तौर पर उनकी रिहाई के लिए अवाम को खड़ा करें। होना तो यह चाहिए कि इस मुल्क के मुसलमान अपना डर त्याग कर कौम पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ मोर्चे में न केवल शिरकत करें बल्कि उसकी कमान अपने हाथ में लें और सरकारी आतंकवाद का पर्दाफाश करें, सरकारी और पुलिसिया टट्टू बने अखबारों और टी0वी0 चैनलों पर हल्ला बोलें। होना तो यह चाहिए कि पैगम्बर मोहम्मद साहब और महात्मा गांधी की तरह देश भर के मुसलमान तय कर लें कि जलालत की जिन्दगी से इज्जत की मौत बेहतर है, और पुलिस की गोली के सामने अपनी करोड़ों छातियाँ खोल दें। होना तो यह चाहिए कि मुसलमान अपना सर रेत से बाहर निकालें और यह समझें कि जब तक वे अपनी लड़ाई खुद एकजुट होकर नहीं लड़ेंगे, अपने ऊपर हो रहे अत्याचार का खात्मा भी नहीं कर पाएँगे। जब तक वे इस अत्याचार के खिलाफ राजनैतिक मोर्चा नहीं खोलेंगे, जब तक अपनी आबरू, अपनी अस्मत को बचाने के लिए लाखों की तादाद में जेल जाने को तैयार नहीं होंगे, जब तक वे शासन को ललकार कर यह नहीं कहेंगे कि हम डरते नहीं चाहे तुम जो कर लो, चाहे हम में से जितनों की जानें ले लो, तब तक उनके साथ ऐसा ही अत्याचार होता रहेगा।

याद होना चाहिए कि दो करोड़ से भी कम सिख समुदाय के लोगों को जब यह लगा कि उनके साथ नाइंसाफी हो रही है तो उन्होनें हिंदुस्तान के निजाम की नाक में दम कर दिया था। कश्मीर की घाटी के मुसलमान बगैर गोली-बारूद के हँसते हँसते अपनी आजादी के लिए पुलिस के सामने रैली निकालते हैं और गोली खाकर शहीद हो जाते हैं। हुस्नी मुबारक के टैंकों के सामने इजिप्ट के लोगों ने जानें दे दीं लेकिन झुके नहीं। अमरीका और इजराइल के बर्बर आतंक के बावजूद आज भी फिलिस्तीन में गाजा के लोग कहते हैं कि अपनी आजादी को हम हरगिज लुटा सकते नहीं, सर कटा सकते हैं लेकिन सर झुका सकते नहीं।

गांधीजी ने कहा था कि जो आदमी डरने को तैयार न हो उसको कोई डरा नहीं सकता, जो दबने को तैयार न हो उसको कोई दबा नहीं सकता। भारत के मुसलमान उस हाथी की तरह हैं जिसने अपनी मर्जी से एक पिद्दी भर आदमी को अपना मालिक मान लिया है। इस हाथी को अपनी असली शक्ति का एहसास करना ही होगा।

मो. 09910346464
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