Sunday, December 04, 2011

क्यों न हो मीडिया भी लोकपाल के दायरे में?


 
टीम अन्ना के सदस्य अरविंद केजरीवाल ने मीडिया को लोकपाल से बाहर रखने की वकालत की है। वहीं वे स्वीकारते भी हैं कि तमाम सामाजिक संस्थाओं और मीडिया में भ्रष्टाचार है। नई दिल्ली में पत्रकारों को संबोधित करते उन्होंने मीडिया का पक्ष लिया। साथ ही प्रेस काउंसिल को भी सवालों के घेरे में लाने का प्रयास किया और कहा कि यह सक्षम संस्था है। फिर भी अगर काम नहीं चल रहा है तो उसके लिए अलग से कानून बनाया जा सकता है।
एक ओर वे स्वीकारते हैं कि हर ओर भ्रष्टाचार कायम है और इसके घेरे में मीडिया भी शामिल है ऐसे में उनकी यह सोच पल्ले नहीं पड़ती कि लोकपाल के घेरे से मीडिया को बाहर क्यों रखा जाये? मीडिया के अंदर व्याप्त भ्रष्टाचार की कलई खुल चुकी है। ऐसे में आज जरूरी है कि इस पर विमर्श हो? सवाल यह नहीं कि लोकपाल से बाहर हो? मीडिया के अंदर भ्रष्टाचार स्वीकार है तो फिर ऐसे में श्री केजरीवाल जी का बयान बेमानी लगती है? प्रयास होने चाहिये कि इसे साफ सुथरा और पारदर्शी बनाया जाये। जो भरोसा टूटा है उसे वापस कायम किया जाये?
मीडिया के चरित्र को लेकर अभी बवाल मचा हुआ है। बयानों को लेकर कोहराम है। उंगलियां दोनों ओर उठ रही हैं। यह तब हुआ जब उच्चतम न्यायालय के भूतपूर्व न्यायाधीश और फिलहाल प्रेस परिषद के अध्यक्ष मार्कडेय काटजू ने भारतीय मीडिया की कुछ खामियों को सामने लाया है। मार्कडेय मानते है कि हमारा मीडिया फासिस्ट है इसपर नजर रखना जरूरी है। उनकी राय में, ‘भारतीय मीडिया का एक बड़ा हिस्सा खासतौर से इलेक्ट्रानिक मीडिया जनता के हितों को पूरा नहीं करता, वास्तव में इनमें से कुछ यकीनन जनविरोधी है। भारतीय मीडिया में दोष हैं। जिन्हें मैं रेखांकित करना चाहता हूँ। मीडिया अक्सर लोगों का ध्यान वास्तविक मुद्दों की ओर से अ-वास्तविक मुद्दों की ओर भटकाता है। मीडिया अक्सर लोगों को विभाजित करता है।'
श्री काटजू के स्टेटमेंट पर विशेष कर इलेक्ट्रानिक मीडिया में बौखलाहट देखी गयी। देखा जाय तो श्री काटजू ने उन्हीं चीजों की तरफ इशारा किया है, जो मीडिया को भ्रष्टाचार में लवरेज करने से परहेज नहीं करता, बल्कि सुनिश्चित करता है। एक दौर था जब पत्रकारिता की बागडोर वैसे पत्रकारों के हाथ में थी जो इसे मिशन के तौर पर अपनाये हुए थे, वे आज इतिहास के पन्नों में कैद हैं। वहीं आज के दौर में पत्रकारिता की बागडोर उन लोगों के हाथ में पहुंच रहा है जिन्हें पत्रकारिता से कोई लेना-देना नहीं बस उनका ‘मुनाफा’ होना चाहिये। ऐसे में उनसे स्वस्थ पत्रकारिता की उम्मीद की आ सकती है? वरिष्ठ पत्रकार अमलेंदु उपाध्याय कहते है,‘‘क्या यह सही नहीं है कि अब मीडिया के क्षेत्र में बिल्डर, चिट फण्ड कंपनियां और तस्कर उतर रहे हैं। ज्यादा समय कहां बीता है जब मध्य प्रदेश के ग्वालियर में तीस से ज्यादा चिट फण्ड कंपनियों को प्रशासन ने सील किया और मजे की बात यह है कि इनमें से अधिकांश चिट फण्डिए अखबार भी निकाल रहे थे और उनके न्यूज चैनल भी हैं! तो क्या अब पत्रकारिता का पाठ गणेश शंकर विद्यार्थी, बाबूराव पराड़कर, राहुल बारपुते, राजेन्द्र माथुर और प्रभाष जोशी से न पढ़कर इन चिटफण्डियों और तस्करों से पढ़ना पड़ेगा?''
मीडिया में भ्रष्टाचार कोई नई बात नहीं। हंगामा तब बरपा जब मीडिया के बड़े ‘जनाब’ भ्रष्टाचार में फंसे पाये गये। और यह हुआ नीरा राडिया प्रकरण से। इसने भारतीय मीडिया के उस परत को खोला जो दिखता नहीं था। मीडिया के चश्में के ऊपर जमा हुआ ‘भ्रष्टाचार’ नजर जरूर आ रहा था। छोटे या बड़े स्तर पर मीडिया में भ्रष्टाचार इंगित करता है कि पत्रकारिता खतरे में हैं? हालांकि इसे पूरी तरह से स्वीकार नहीं किया जा सकता। क्योंकि, पत्रकारों की बड़ी जमात आज भी पूरी ईमानदारी से अपना काम कर रही है। लेकिन, जो दाग मीडिया के उपर लग चुका है या फिर जो कथित मीडिया में भ्रष्टाचार व्याप्त है वह भविष्य के लिए खतरनाक है।
यह सच है कि नीरा राडिया प्रकरण ने भारतीय मीडिया की चूलें हिला दी। मीडिया के शिखर पर बैठे सफेदपोशों को नंगा कर दिया। जनप्रहरी सवालों के घेरे में आ गये। मुद्दे अपनी जगह पर है। लेकिन, जो दाग मीडिया पर लग चुका है, वो जग जाहिर है। राडिया कांड ने पत्रकारों को मजाक का पात्र बना दिया है। मीडिया विशेषज्ञ, वर्तिका नंदा कहती है,‘‘ राडिया कांड के बाद पत्रकारों से पूछा जाता है क्यों भाई मीडिया से आये हो या राडिया से और वह एक छोटा सा मजाक मीडिया के ताजा हाल पर बेहतरीन टिप्पणी बन जाता है। पत्रकारिता को पूरी तरह से उत्पादन बनाते ही जनतंत्र में पत्रकारिता का मूल मकसद कहीं पानी में घुल सा जाता है और धीरे-धीरे जनता का विश्‍वास खो जाता है’’।
भ्रष्टाचार को लेकर हालांकि अक्सर सवाल उठते रहे हैं, लेकिन छोटे स्तर पर। छोटे-बडे़ शहरों, जिलों एवं कस्बों में मीडिया की चाकरी बिना किसी अच्छे मासिक तनख्वाह पर काम करने वाले पत्रकारों पर हमेशा से पैसे लेकर खबर छापने या फिर खबर के नाम पर दलाली के आरोप लगते रहते हैं। खुले आम कहा जाता है कि पत्रकारों को खिलाओ-पिलाओ-कुछ थमाओ और खबर छपवा लो। जैसे पत्रकार, पत्रकार न हो कोई दलाल हो? मीडिया की गोष्ठियों में, मीडिया के दिग्गज गला फाड़ कर, मीडिया में दलाली करने वाले या खबर के नाम पर पैसा उगाही करने वाले पत्रकारों पर हल्ला बोलते रहते हैं। स्वाभाविक है, हो हल्ला तो होगा ही? नीरा राडिया, विकीलिक्स, पेड न्यूज, सीडी काण्ड, स्टिंग के नाम पर ब्लैकमेल सहित कई ऐसे ढेरों मामले पड़े हैं, जिसने मीडिया को बेहद ही अविश्‍वासी नजरिये से देखने पर मजबूर कर दिया। प्रख्यात पत्रकार प्रभाष जोशी ने जब मीडिया के अंदर पैसे लेकर खबर छापने यानी पेड न्यूज की खिलाफत करनी शुरू की थी तो मीडिया दो खेमे में बंट गयी। आरोप-प्रत्यारोप की गूँज सुनाई पड़ने लगी थी। आज एक बार फिर मीडिया सवालों के घेरे में आया है। आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल पड़ा है।
देश भर में घूम घूम कर प्रभाष जोशी ने पत्रकारिता के नाम पर दलाली करने और खबर बेचने वालों के खिलाफ झंडा उठाया था तो पत्रकारों का एक तबका पेड न्यूज के खिलाफ गोलबंद हुआ तो दूसरी ओर मीडिया हाउसों के मालिकों के हां-में-हां मिलाते पत्रकार, विरोधियों पर हल्ला बोलने से नहीं चूके। खैर, यह उनकी मजबूरी रही होगी? तेजी से मीडिया के बदलते हालातों के बीच पत्रकारिता के एथिक्स और मापदण्डों पर बात करना बेमानी-सी प्रतीत होने लगी है। लोकतंत्र पर नजर रखने वाला मीडिया, धीरे-धीरे भ्रष्टाचार के जबड़े में पहुंच गया है। हालांकि, इसे पूरी तरह से स्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि, मीडिया की आड़ में दलाली करने एवं खबरों को बेचने जैसे भ्रष्ट तरीके के खिलाफ मीडिया ने सवाल उठाये।
प्रभाष जोशी ने जिस खतरे से अगाह किया था, वह साफ दिखने लगा है। मीडिया में भ्रष्टचार, पत्रकारिता की सेहत के लिए अच्छी नहीं है। इससे सिद्धांत का, खतरे में पड़ जाना तय है। इस खतरे पर अपनी चिंता व्यक्त करते हुए चर्चित पत्रकार मार्क टुली ने वर्ष 2007 में एक बातचीत में  कहा था, ‘‘अगर पत्रकारिता को बचाना है तो पत्रकारिता के पुराने सिद्धांत के अनुसार काम करना पड़ेगा। प्लांटेड स्टोरी नहीं छापनी होगी। किसी भी समस्या के उत्पन्न होने पर एकता बनाकर साथ-साथ लड़ना होगा। अगर आज के पत्रकार अपनी जिम्मेदारी को सही रूप में समझ लें तो निश्चित रूप से पत्रकारिता की गुणवत्‍ता बढ़ेगी इसके साथ ही मैं एक चीज और विशेष रूप से कहना चाहूंगा कि इलेक्ट्रानिक मीडिया को अपने में ही सुधार लाने की आवश्यकता है अगर वे इसी प्रकार की खबरें प्रसारित करते रहे तो भविष्य में खबर की विश्वसनीयता बनाये रखना मुश्किल हो जायेगा।''
यकीनी तौर पर मौजूदा भ्रष्टाचार सबसे बड़ी चुनौती के तौर पर है। ऐसे में गणतंत्र के प्रहरी मीडिया का भ्रष्टाचार के आगोश में आ जाने पर विषय चिंतनीय प्रतीत होता है। सवाल भ्रष्ट होते पत्र और पत्रकारों का है। जो छोटे स्तर से लेकर बड़े स्तर तक है। वजह जो भी हो, इसके फैलाव पर अकुंश की जरूरत है। छोटे स्तर पर पत्रकारों के भ्रष्ट होने के पीछे सबसे बड़ा मुद्दा आर्थिक शोषण प्रतीत होता है। छोटे और बड़े मीडिया हाउसों में 15 सौ रुपये के मासिक पर पत्रकारों से 10 से 12 घंटे काम लिया जाता है। उपर से प्रबंधन की मर्जी, जब जी चाहे नौकरी पर रखे, या निकाल दें। भुगतान दिहाड़ी मजदूरों की तरह है। वेतन के मामले में कलम के सिपाहियों का हाल, सरकारी आदेशपालों से भी बुरा है। ऐसे में यह चिंतनीय विषय है कि एक जिले, कस्बा या ब्लाक का पत्रकार, अपनी जिंदगी, पानी और हवा पी कर तो नहीं गुजारेगा? वहीं पर कई छोटे-मंझोले मीडिया हाउसों में कार्यरत पत्रकारों को तो कभी निश्चित तारीख पर तनख्वाह तक नहीं मिलती है। सेंटीमीटर या कालम के हिसाब से भुगतान पर काम करने वाले पत्रकारों से क्या उम्मीद की जा सकती है? उपर से मीडिया हाउस का विज्ञापन लाने और अखबार की बिक्री को बढ़ाने का दबाव। विरोध करने पर निकाल दिया जाता है। आज पत्रकारों से मिशन नहीं दलाली या फिर अखबार चैनल के लिए पैसा उगाही कराये जाने पर दबाव डाला जाता है।
पत्रकार कुमार सौवीर के साथ ऐसा ही कुछ हुआ, उन्होंने अपनी आपबीती, भडास4मीडियाडाटकाम पर डाली और पेड न्यूज के लिए चैनल ने जिस तरह दबाव बनाया उसका खुलासा किया, जो मीडिया के लिए शर्मनाक है।  पत्रकारों को भ्रष्ट बनाने में मीडिया हाउस जिम्मेवार हैं। एक स्ट्रिंगर को प्रति समाचार 10 रु. देते हैं, चाहे खबर एक कालम की हो या चार कालमों की। सुपर स्ट्रिंगर को प्रति माह दो से तीन हजार पर रखा जाता है। छोटे मंझोले समाचार पत्र तो, कस्बा और छोटे जगहों पर कार्यरत पत्रकारों को एक पैसा भुगतान तक नहीं करते। हां उनके समाचार जरूर छप जाते हैं। ऐसे में उन पत्रकारों का आर्थिक शोषण और साथ ही साथ उन्हें विज्ञापन लाने को कहा जाता है, जिस पर कमीशन दिया जाता है। जबकि अखबार के मुख्य कार्यालयों में कार्यरत स्ट्रिंगर और सुपर स्ट्रिंगर को तीन हजार से 14 हजार रुपये प्रतिमाह दिये जाते हैं। संपादक/प्रबंधक तनख्वाह तय करते हैं। अमूमन हर अखबार, कस्बा या छोटे शहरों में किसी को भी अपना प्रतिनिधि रख लेते हैं, उसे खबर के लिए कोई भुगतान नहीं किया जाता है। बल्कि वह जो विज्ञापन लाता है, उस पर उसे कमीशन दिया जाता है। अखबार के संपादक/प्रबंधक जानते हैं कि वह बेगार पत्रकार अखबार के नाम पर अपनी दुकान चलायेगा। जो उसकी मजबूरी बन जाती है। आखिर दिन भर अखबार के लिये बेगार करेगा तो खायेगा क्या? हालात यह है कि पैसा मिले या न मिले किसी मीडिया हाउस से जुड़ने के लिए पत्रकारों की लम्बी कतार है। बिना पैसे और विज्ञापन के कमीशन पर काम करने वाले पत्रकार मौजूद हैं? इसके पीछे के कारण को मीडिया में सब जानते है, लेकिन इस परिपाटी को खत्म करने के लिए, किसी भी स्तर पर प्रयास नहीं दिखता।
खबरों का चयन सम्पादकों के हाथों होते हुए आज विज्ञापन प्रबंधन के हाथों में चला गया है। अखबार हो या चैनल अपने को चलाने के लिए, बाजार में बने रहने के लिए, खबरों को बेचने का काम बड़े सफाई से करते आ रहे हैं। तभी तो, चर्चित पत्रकार प्रभात जोशी ने खबरों को बेचे जाने और मीडिया में बढ़ती दलाली को लेकर देश भर में व्याख्यान देकर आलेख लिखकर पत्रकारिता व्यवसायी को बचाने की पुरजोर कोशिश की थी। इसी कड़ी में प्रभाष जोशी ने पटना में एक व्याख्यान के दौरान कहा था-‘‘पत्रकारिता के अंदर आज जो कुछ हो रहा है वह मेरे लिए खतरे की घंटी है। पत्रकारिता किसी मुनाफे या खुशी के लिए नहीं बल्कि पत्रकारिता लोकतंत्र में साधारण नागरिक के लिए एक वह हथियार है जिसके जरिए वह अपने तीन स्तम्भों न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालक की निगरानी करता है। अगर पत्रकारिता नष्ट होगी तो हमारे समाज से हमारे लोकतंत्र में निगरानी रखने का तंत्र समाप्त हो जायेगा। आज पत्रकारिता पर कोड़े बरसाता हूं या धिक्‍कारता हूं तो वह मेरी पीठ पर ही पड़ता है।''
मीडिया में भ्रष्टाचार से इसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठ खड़ा हुआ है। शर्मसार मीडिया को इस झटके से उबरने में समय लगेगा। मीडिया के उपर दाग लग चुका है। सवाल है कैसे छूटेगा यह...? इन सब में सिद्धांत की पत्रकारिता को चोट लगी है। खतरनाक है इसके दूरगामी प्रभाव। प्रोफेसर बृज किशोर कुठियाला की माने तो, ‘‘भ्रष्टाचार की छोटी-मोटी घटना तो अब सामाचार ही नहीं बनती कार्यपालिक, न्यायपालिका और खबरपालिका सभी में भ्रष्ट व्यवहार की दुर्गंध जनमानस तक पहुंच रही है। यह तो वह कहानियां है जो खुल गयी, परंतु उनके खुलने से मन में एक और डर उत्पन्न होता है कि जो खुला नहीं वह कितना विराट और भयंकर होगा। अंग्रेजी शब्दावली का प्रयोग करें तो जितना खुला वह तो टिप आफ द आईस वर्ग है।''
पत्रकारिता को भ्रष्टाचार के खतरे से बाहर लाना होगा। इसके नकारात्मक भूमिका पर सवाल उठे रहे हैं। बहस/चर्चा/विमर्श जारी है। जरूरत है पत्रकारिता के जनकों ने जो सपना देखा है उसे यों मरने नहीं दिया जाये। लांमबद/गोलबंद होने का समय आ चुका है। ऐसे में सवाल उठता है क्यों न हो मीडिया भी लोकपाल के दायरे में?

1 comment:

  1. सामयिक प्रस्तुति,आभार.

    ReplyDelete

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...