Saturday, December 17, 2011

एक अहिंसक वीरांगना- ईरोम शर्मीला


 
एक अहिंसक वीरांगना- ईरोम शर्मीला
आजकल मणिपुर जनता और देश भी इरोम शर्मिला के 11 साल से चल रहे आमारण अनशन से जूझ रही है। वह एक कृत्रिम जीवन व्यतीत करने के लिए बाध्य है। अस्पताल उसका मजबूरी का घर बना हुआ। संभवतः विश्व की वह सबसे लंबा अनशन है जो किसी व्यक्ति वह भी एक महिला ने, अपने लोगों के ऊपर हुए अत्याचार के विरोध में किया है। यह दिसंबर 11 का है और इरोमा ने यह अनशन नवंबर 2000 में मणिपुर के मलोम नगर में सेना  द्वारा आर्मड फोर्सेस स्पेशल पावर्स एक्ट के चलते दस लोगों को गोलियों की भेंट चढ़ा दिया था। आज शर्मीला के अनशन ने मणिपुर को संसार के नक्शे पर ला दिया। उस समय इरोम शर्मीला 28 वर्ष की रही होगी। अब वह 40 साल के लगभग है। उसे लोग अब आयरन लेडी के नाम से पुकारते हैं। अस्पताल में वह अपने संबधियों और मित्रों की जगह सिपाहियों से घिरी रहती है। हर पंद्रह रोज़ में एंबुलेंस में एरोमा को हाज़री देने कचहरी जाना पड़ता है। अगर उससे कोई पूछता है कि क्या तुम अपना अनशन तो़ड़ने के लिए राज़ी वह बिना हिचके इनकार कर देती है, नहीं। उसकी नाक में ट्यूब लगा है जिसके ज़रिए उसे खाना पंहुंचाया जाता है, कृत्रिम खाना। इसी वजह से अब उसका वज़न, बताया जाता है, 37 किलो रह गया। 11 साल में शायद सब खाद्य-पदार्थों का स्वाद भी भूल गई होगी। यह कोई कम बड़ी तपस्या नहीं कि युवा अवस्था में जब सब से अधिक खाने पीने के प्रति बच्चे समर्पित होते हैं एरोमा शर्मीला ने अपने लोगों के लिए उसे भी त्याग दिया। कितने दिन तक वह इस अनशन को इसी तरह जिएगी इसकी किसे चिंता है? और क्यों हो? यह सबसे बड़ा तप है युवावस्था में सारे आकर्षण छोड़कर शरीर को काष्टवत बना लेना और अपने मूल्यवान युवा जीवन के 11 वर्ष अनशन करते हुए, नाक के ज़रिए कृत्रिम भोजन लेकर जीवित रहने के लिए बाध्य होना। यह देश जो अपने को करूणा का स्रोत कहते नहीं अघाता फिर एक महिला पर यह अन्याय कैसे बर्दाश्त करता है?

ईरोमा शर्मीला जैसा कि पहले भी कहा गया अब 39 वर्ष की हो चुकी है। अविवाहित तो है ही पर उसने अपनी सब मानवीय भावनाओं और शारीरिक मूल वासनाओं का परित्याग किया हुआ है। ऐसा नहीं कि उसके मन में कोमल भावनाएं नहीं हैं। उसने एक ब्रिटिश पत्रकार से अपनी इन भावनाओं को प्रकट किया है। गोआ मूल के ब्रिटिशर डेस्मेंड कोटिनो से उसका पूरे एक वर्ष तक पत्र व्यवहार रहा है। पिछले मार्च में वह केवल एक बार उससे मिली भी है। वह भी सामान्य मनुष्य का सा जीवन जीना चाहती है। लेकिन जिस AFSPA कानून को वापिस लिए जाने के लिए वह 11 साल से हर तरह का कारावास जीवन जी रही है, जो उसकी पहली शर्त है, उसकी वापसी की निकट भविष्य में कोई आशा नज़र नहीं आती। भारत सरकार एक पूंजीपति की एयरलाइन्स बचाने के लिए तो सक्रिय हो सकती है, पर 11 साल से कारावास में अपने प्रदेश के नागरिकों की सुरक्षा  के लिए मार्शल लॉ जैसै AFSPA को वापिस लिए जाने की प्रतीक्षा में अनशन करने वाली वीरांगना से बात करने के लिए तैयार नहीं। AFSPA को वापिस लेने की मांग केवल मणिपुर में ही नहीं जेके में भी उठ रही है। वहां के मुख्यमंत्री ने इस सवाल को उठाया है।

यह बहुत बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण है कि मणिपुरी की सिविल सोसायटी के लोग उसकी इस प्रेम भावना को वितृष्णा से देखते हैं। उनका ख्याल है कि प्रेम उनके बीच साजिशन रोपा गया है। इस घटना से शायद मणिपुरवासियों के अहं को चोट पहुंची है। क्या शर्मीला को अपनी निजी जीवन के बारे में कल्पनाएं सजोने और आकांक्षाऐं रखने का कोई अधिकार  नहीं है? खासतौर से जब वह यह कह चुकी है कि वह तब तक विवाह नहीं करेगी जब तक यह काला कानून वापिस नहीं होगा। यह इंताह है कि कि जिस अखबार मे शर्मीला के इंटरव्यू छपते हैं उनका मणिपुर में बहिष्कार किया जाता है। आखिर कब तक सिविल सोसायटी उसके साथ ऐसा कठोर व्यवहार करती रहेगी। वह क्या यह नहीं समझती कि उनके इस आंदोलन को सबसे अधिक प्रतिष्ठा इस अनशन ने दिलाई है। जे के भी इस कानून को वापिस लेने के लिए आवाज़ उठा रहा है लेकिन वहां अभी तक कोई शर्मीला नहीं पैदा हुई। वहां के मुख्यमंत्री इस सवाल को उठा रहे हैं। अभी कुछ दिन पूर्व कश्मीर से ‘शर्मीला बचाओ’ यात्रा एक कश्मीरी सज्जन फैज़ल भाई के नेतृत्व में चलकर कई राज्यों से होकर मणिपुर गई है। उसमें मधयप्रदेश, पंजाब,गुजरात आदि प्रदेशों के प्रतिनिधि सम्मिलित हैं। काशमीर के कुछ ऐसे युवा कार्यकर्ता भी शामिल थे जिन्हें इस कानून के अंतर्गत उठाकर दो दो तीन साल गिरफ्त में रखा गया था। स्वाभाविक है शर्मीला के अनशन की सहानुभूति लहर कश्मीर तक पहुंची है। वह यात्रा कानपुर भी आई थी, उसकी बैठक हरिहर शास्त्री भवन में हुई थी। उसकी इध्यक्षता का अवसर मुझे दिया गया था। गुजरात भी एक खामोश दमन का शिकार बताया जाता है। यह अच्छा संकेत नहीं है।

अभी AFSPA को हटाने की सुरसुराहट भी नहीं है। ऐसा लगता है शर्मीला को अपने प्रण के अनुपालन में अपना अनशन  पता नहीं कब तक जारी रखना पड़े। अगर ऐसा हुआ तो उसके जीवन के साथ उसका प्रेम भी बलि चढ़ जाएगा। गृहमंत्री का कहना है कि सरकार भी इस मामले पर एकमत नहीं है। सेना को अगर इस मसले पर निर्णय लेना है तो कोई भी अपने दमनात्मक अधिकारों को जल्दी छोड़ने के लिए तैयार नहीं होता। हत्या या दंड सत्ता का सबसे बड़ा हथियार होता है। खासतौर से उस जब कानूनन भी अधिकार प्राप्त हो।

11 साल के दौरान, जैसा कि पहले कहा गया, वह बहुत कमज़ोर हो गई है। स्नायु तंत्र भी प्रभावित हुआ है। उससे कुछ मित्रों ने कहा कि तुम सोनिया जी को सख्त शब्दों में पत्र लिखो। तो वह रोने लगी ‘मैं कुछ भी सख्त लिखकर किसी का दिल नहीं दुखाना चाहती। मै जैसे जी रही हूं जी लूंगी।‘ वह मन से पूरी तरह गांधीवादी है। मनसा वाचा कर्मणा वह अहिंसा में विश्वास करती है। ऐसी स्त्री को ऐसी हालत में कैंद में रखना और उसके सपनों में को शनैः शनैः तोड़ना कितना मानव विरोधी है और कहां तक जायज़ है। सरकार लोहे की जंज़ीर ही नहीं होती उसका एक पक्ष संवेदनशीलता से भी जुड़ा होना चाहिए। जो सरकारें दमन के सहारे चलती हैं उनका अशहर स्टालिन, मुसोलीनी और गद्दाफी जैसे तानाशाहों की तरह होता है। इस तरह के कानून अनन्तकाल तक नहीं बने रह सकते। जब बदलाव आता है तो बड़ी बड़ी चट्टानें ढह जाती है। अनशन की परंपरा और अहिंसा की पुकार के चलते ही अंततः इस तरह के कानून रद्दी की टोकरी में फेंक दिए जाते हैं। कानून संवेदना विहीन ज़रूर होते हैं पर उन्हें इन्सानों की बेहतरी के लिए इस्तेमाल किया जाए तो समाज को जोड़ने के काम आते हैं। सहनशीलता और मौन अंततः इंसानों के पक्षधर बनकर सामने आते हैं। मुझे बार बार बर्मा की सू की की याद आती है। वह बिना उफ़् किए गांधी की तरह हर दमन को अपने हिस्से की रोटी समझ कर हज़म करती रही है। लेकिन मणिपुर वासी यह भारतीय वीरांगना भी किसी भी हाल उनसे कम नहीं। 11 वर्ष तक भूखा रहकर जेल की यातना सहना और अपने व्यक्तिगत सुखों को बिसार कर अपनी सांसों को  समाज के नाम मौरूसी कर देना, उसे और भी ऊपर भी ऊपर उठा देता है। हम जिस दुनिया में रह रहे हैं उस दुनिया में इस तरह के बलिदानों का कोई मूल्य नहीं। शायद इसी मूल्यहीनता के कारण ही मणिपुर की सिविल सोसायटी और देश के समर्थन के बावजूद शर्मीला आज इतने बड़ा बलिदान के बाद अकेली है। शर्मीला बचाओ यात्रा और दस दिसंबर को दिल्ली के राजघाट पर देश भर की हज़ारों महिलाओं का उपवास, हो सकता है इस राजनीतिक जड़ता को तोड़ने में कामयाब हो सके। आमीन!

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