Thursday, December 08, 2011

मीडिया पर खुफिया नियंत्रण भाग २


 
भगवा आतंकवाद से परदा उठते ही प्रज्ञा सिंह ठाकुर और कर्नल पुरोहित एण्ड कम्पनी की गिरफ्तारी के साथ-साथ उनके द्वारा कराए गए बम धमाकों का आरोप मुसलमान युवकों पर मढ़ने की साजिश का पर्दा भी फाश हो गया। आतंकवाद के नाम पर अब चलने वाली एक तरफा बहस को एक और रुख मिल गया। खुफिया एजेंसियों की भूमिका पर भी सवाल उठने लगे। विशेष रूप से समझौता एक्सप्रेस धमाके को लेकर इन्टेलीजेंस ब्यूरो (आई0बी0) पर प्रत्यक्ष रूप से टिप्पणियाँ होने लगीं। 26/11 के मुम्बई पर पाकिस्तान प्रायोजित आतंकी हमले के दौरान भगवा आतंकवाद का खुलासा करने वाले तत्कालीन मुम्बई ए0टी0एस0 चीफ हेमन्त करकरे संदिग्ध परिस्थितियों में शहीद हो गए। उसके बाद देश में होने वाली सभी आतंकी घटनाओं के पश्चात खुफिया एवं अन्य बेनामी सूत्रों के हवाले से सघन मीडिया अभियान की शुरुआत हो गई। खास बात यह कि साध्वी और उसके साथियों की गिरफ्तारी के बाद मुम्बई ए0टी0एस0 की कहानी से ज्यादा रुचि मीडिया ने उन समाचारों में दिखाई जिनमें उन गिरफ्तारियों का विरोध किया गया था। आतंकवाद को लेकर संघ परिवार के तेवर बदल गए। हेमंत करकरे को धमकियाँ मिलने लगीं। परन्तु इस विषय पर एक दो खबरों के अपवाद को छोड़ दें तो कोई मीडिया अभियान नहीं चला। पुलिस रिमाण्ड के दौरान साध्वी पर बल प्रयोग को लेकर अडवाणी जी नाराज हो गए तो प्रधानमंत्री के विशेष सलाहकार उन्हें मनाने उनके निवास तक गए। जो शक्तियाँ आतंकवाद के मामले में सरकार के नरम रवैये की कटु आलोचक थीं व्यक्ति और संगठन का नाम बदलते ही पुलिस के तौर तरीके में उन्हें इतनी सख्ती नजर आई कि बिलबिला उठे। भगवा आतंकवाद के खुलासे से उत्पन्न नई परिस्थितियों को बदलने और पुरानी हालत बहाल करने के लिए यह सभी शक्तियाँ एक जुट प्रयास में लग गईं। जिसके नतीजे में अगले धमाके से ही शक्तिशाली मीडिया अभियान की शुरुआत भी हो गई।

13.02.2010 का पुणे जर्मन बेकरी धमाका हो या 07.12.2010 का शीतला घाट, वाराणसी विस्फोट, 13.07.11 का मुम्बई सीरियल ब्लास्ट हो या 13.09.11 की दिल्ली हाईकोर्ट के बाहर की घटना, इन सभी वारदातों के बाद खुफिया सूत्रों के हवाले से मीडिया में लगातार आने वाले समाचारों में भगवा आतंकवाद से जनता का ध्यान हटाकर जेहादी आतंकवाद को पूरी तरह फिर से स्थापित करने के प्रयासों की झलक साफ दिखाई देती है।

पुणे धमाके के तुरन्त बाद इंडियन मुजाहिदीन और उसके पाकिस्तानी कनेक्शन की खबरें अलग-अलग सूत्रों से आना शुरू हो र्गइं। घटना को अंजाम देने वाले माड्यूल्स के तार कभी पुणे और मुम्बई से जुड़े बताए गए तो कभी उत्तर प्रदेश और भटकल से। अभी कडि़याँ जुड़ भी नहीं पा रही थीं कि जल्दबाजी में भटकल के एक युवक को गिरफ्तार कर लिया गया। इससे पहले कि ए0टी0एस0 उसके दोषी होने का प्रथम दृष्टया कोई सुबूत दे पाती उसने अपनी बेगुनाही अदालत में साबित कर दी। शीतला घाट वाराणसी के धमाके के पश्चात खुफिया एजेंसियों ने एक बार फिर शक की सुई इंडियन मुजाहिदीन की तरफ घुमाई। इस बार आई0एम0 का कथित आजमगढ़ माड्यूल निशाने पर रहा। कुछ मुस्लिम युवकों के नाम भी उछाले गए। इस घटना को अंजाम देने वाले सूत्रधारों के बारे में खुफिया एजेंसियों (आई0बी0 तथा रा) के हवाले से कभी यह खबर आई कि वे शारजाह में हैं तो कभी पाकिस्तान में। जाहिर सी बात है कि शीतला घाट पर फटने वाले बम को उतनी दूर से उछाला नहीं जा सकता था। इसके लिए यहाँ पर कुछ लोगों की मौजूदगी आवश्यक थी। ऐसी स्थिति में इन सम्पर्क सूत्रों तक पहुँचे बगैर सूत्रधारों तक पहुँचने की थ्योरी कितनी हास्यास्पद और दुर्भावना पूर्ण है। लगभग एक साल बीत जाने के बाद भी अब तक जाँच में कोई प्रगति नहीं हो पाई है। इससे जाहिर होता है कि जाँच की दिशा ही गलत थी और इसकी जिम्मेदारी खुफिया एवं जाँच एजेंसियों पर ही जाती है। समाचार माध्यमों पर खुफिया एजेंसियों का कितना नियंत्रण है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मुम्बई धमाकों के बाद पिछले विस्फोटों को अंजाम देने वाले संगठनों की जो सूची समाचार पत्रों में प्रकाशित हुई है उसमें पुणे और वाराणसी धमाकों के सामने इंडियन मुजाहिदीन का नाम अंकित है। हालाँकि उनको अभी हल नहीं किया जा सका है।

क्रमश:


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