Monday, February 28, 2011

भ्रष्टाचार : बाबा, नेता या फिर कोई और, हम्माम के अंदर सब नगें हैं


“” आज कल भारत में चारों ओर   भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ बुलंद की जा रही  है, नेता, बाबा  सभी भ्रष्टाचार की  आलोचना में जुटे हैं, पर एक ख़ास बात ये है क़ि, हर कोई  दूसरे की आलोचना या उंगली उठाने में लगा है, किसी को भी अपने घर में नाम मात्र की  भी  खराबी या कमी, या यूँ कहें क़ि भ्रष्टाचार ना तो नज़र आ रहा है, ना ही भ्रष्टाचार की  गंध  का आभास हो रहा है.”"

आश्चर्य की  बात तो  ये है क़ि  नेताओं को तो आम तौर पर ये मान कर चला जाता है क़ि  उनका काम बिना भ्रष्टाचार के  चलता ही नहीं  है, और इस जमात  से ईमानदारी कीं  उम्मीद करना आज के वक़्त में बेमानी हो चुका है. सब जानते हैं क़ि आज चुनाव में कितना पैसा खर्च  होता है और कितना कागजों  पर दिखाया  जाता है, आखिर कहाँ  से आता है ये पैसा, कौन देता है और किस लिए देता है ?

चूँकि फिलहाल यह टिप्पणी,  दिल्ली में हुई बाबा रामदेव की सभा के बारे में की कर रहा हू, इस लिए ज्यादा विस्तार से बात करना विस्यानातर  हो जायेगा, मैं भारत के सभी  लोगों का ध्यान इस देश के बाबाओं और संतों ( सब नहीं  बल्कि उन तथाकथित  लोगों की  ओर ), दिला  रहा हू जो आज सेक्स, क़त्ल और विभिन्न गंभीर आरोपों   में या तो जेल के अंदर  हैं या फिर जमानत पर हैं, कुछ तो जेल के अंदर  ही, मर गयें हैं.

जब तक ये तथाकथित बाबा पकडे  नहीं  गए, इन सभी को भगवान् की  तरह पूजा जाता रहा, और जब पकडे गए  तो वही भक्त जो उनकी पूजा करते नही अघाते थे, उन पर थूकने लगे .

यही हाल उन नेतोँ का भी हुआ, जो जेलों में बंद  किये  गए  और ज़मानत में है., मगर नेताओं  और बाबाओं के एक बड़ा फर्क  यह है  की, किसी बाबा  के खिलाफ  आवाज़ उठाना या उसके बुरे कर्मों  का पर्दाफास  करना भगवान् ( तथाकथित ) का अपमान या हिन्दू धर्म का निरादर  घोषित  कर, पर्दाफास  करने वालों  कर  जीना दूभर  कर दिया जाता है. इस देश में कितने ही मामले  ऐसे हैं  जहाँ, मठों, मंदिरों में अधिकार करने के लिए एक ने दूसरे की  हत्या करवा दी.

बाबा   लोगों  या  धर्म  के नाम पर कुछ ( किसी  तरह का व्यापार )   करने वालों वालों  से ये उम्मीद की जाती है क़ि वो आम लोगों का भला करने के लिए काम करेंगे, ना क़ि धर्म के नाम पर भरी भरकम फीस वसूल करेंगे, जैसा की  आज कल किया जा रहा है. अच्छा है क़ि भ्रष्टाचार को मिटाया जाए, क्यूंकि भ्रष्टाचार देश को खोखला  करता जा रहा है, पर इसके लिए बहुत ज़रुरी  है क़ि ये काम सभी लोग पहले अपने अपने घरों  से शुरू करें, अब चाहें वो नेता हो या बाबा.

“”" मीठा मीठा गप्प  और कड़वा कड़वा थू, करने से किसी देश में क्रांति नहीं होती, सिर्फ अराजकता होती है. शायद इन तथा  कथित  बाबाओं का उद्देश्य  भी है. “ताकि  आम जनता का  ध्यान इधर उधर उलझा कर अपना हित साधन जारी  रख सकें.”"”

” क्या किसी बाबा  ने देश की जनता को ये बताने की  तनिक भी कोशिश की  है क़ि आज   अकूत पैसे के मालिक कैसे बन गए क़ि विदेशों में एक नहीं दर्जनों  आश्रम बनवाने  के लिए  जमीनें खरीदने  के लिए अकूत धन  कंहा से आ गया.. ये पैसा किस देश का हैं और इस  पैसे का असली मालिक   कौन है ?

** देश हित में सब  से पहल काम तो ये होना चाहिए  क़ि सारे भारत में ट्रस्टों के नाम  पर  धरम, जनसेवा, जनकल्याण का सब्जबाग  दिखा कर देश की भोली भली जनता को अंधेरे में रख कर, हजारो अरबों का गोलमाल करने वाले उन सभी लोगो  पर सरकार / कानून   को कहर बन कर टूट पड़ना  होगा चाहे, वो कोई बाबा हो, नेता हो या फिर पूंजीपति, तभी देश का कुछ भाल होने की उम्मीद  क़ि जा सकती है, वरना  हम्माम के अंदर  सभी नगें  हैं. ***

बाबाजी जनता को सबूत का इन्तिज़ार है


योग से भोग और फिर भोग से राजनीति तक


जी हाँ दोस्तों जिन साधू संत मोलवियों और योग गुरुओं का देश में नेतिक शिक्षा देना देश को स्वास्थ शिक्षा देने का काम था आज वोह आज मोह मायाजाल में फंस कर राजनीति में आ गये हैं चाहे साधू हों चाहे संत हो या  मौलाना हों चाहे योग गुरु हों सभी लोग देश को उकसाकर कोई मुद्दा भुना कर राजनीती करने में लगे हैं और हर बार जो भी पार्टी विपक्ष में होती हे वही इस विपरीत कालीन व्यवस्था को बढ़ावा देते हैं ।

अभी हाला ही में देश में भ्रस्टाचार और काले धन के मुद्दे पर योग गुरु बाबा रामदेव ने एक रेली करी बाबा रामदेव का मुद्दा भ्रस्टाचार के खिलाफ बोलना काले धन को उजागर कर दोषियों को दंडित कर इस धन को वापस देश में लाना पुरे देश को अच्छा लगा हे मैं भी इसका समर्थक हूँ और खुदा करे बाबा रामदेव इस देश के भ्रष्ट बेईमान लोगों को सज़ा दिलवाएं लेकिन अगर इसपे राजनीति हो इस नाम पर ब्लेकमेलिंग हो तो ऐसे मुद्दों को जनता में भ्रम फैला कर माहोल बिगड़ने वालों को सरे आम फांसी की सजा का प्रावधान होना चाहिए सारा देश जानता हे बोफोर्स, फेयरफेक्स का तमाशा क्या हुआ था लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात आज भाजपा के रामदेव को सपोर्ट है तो भाजपा रामदेवजी को राज्यसभा में क्यूँ नहीं लेजाती क्यूँ राज्यसभा में एक इमानदार योगगुरु को लेजाकर भ्रष्ट और बेईमान लोगों के खिलाफ बोलने का अवसर नहीं दिया जाता ।

अभी बाबा रामदेव ने रेली की सारा देश जानता हे किसी भी नेता का नाम लेकर उसे भ्रष्ट नहीं कहा गया लोग सोचते थे भर्ष्टाचार के बढ़े बढ़े सबूत उजागर होंगे देश के कई नेता नंगे होंगे लेकिन क्या हुआ कोन भ्रष्ट है  काला धन किसके पास है सबूत कहाँ है बाबा रामदेव कहते हैं वक्त आने पर बताऊंगा वोह कहते प्रधानमन्त्री ईमानदार हैं  दोहरी बात एक भर्ष्टाचार फेलाने वाला कोई भी व्यक्ति या भर्ष्टाचार होता हुआ देख कर चुप रहने वाला कोई भी व्यक्ति अगर इमानदार कहा जाये तो कहने वाले की मानसिकता क्या है समझ लेना चाहिए एक व्यक्ति कहे देश के नेता भ्रष्ट हें देश में कला धन है  और मेरे पास सबूत हैं और वो सबूत जनता को नहीं बताये जाएँ जनता से छुपाये जाएँ तो फिर इसे ब्लेकमेलिंग नहीं तो क्या कहेंगे सारे नेता भ्रष्ट हैं प्रधानमन्त्री मनमोहन इमानदार हैं  और भ्रष्ट कौन है उसका नाम किसी को नहीं बताया जा रहा है नाम नहीं लिया जा रहा है तो फिर क्या यह मुहीम भ्रष्टाचार के खिलाफ है नहीं न तो दोस्तों भ्रष्टाचार की किसी भी लड़ाई में आप हो चाहे मैं हूँ सब मिलकर लड़ने को तय्यार बेठे हैं  लेकिन सबूत जो आपके पास है छुपा कर मत रखो जनता को बताओ और अगर सबूत आप अपने पास रखते हो मांगने पर भी नहीं बताते नाम किसी का लेते नहीं हो तो फिर सारा देश जानता है के ब्लेकमेलिंग की कला क्या है और यह देश इस देश का आसमान ना जाने कहा गयी ब्लेक्मेल्रों को कैसे कैसे जनता कुछ क्षण कुछ पल के लियें बेवकूफ बन सकती है लेकिन सबूत नहीं मिले तो फिर सडकों पर तुम्हारे खिलाफ भी आ सकती है  इसलियें देश के भ्रष्ट लोगों के खिलाफ बाबा सबूत पेश करों और इस लड़ाई में हमें भी शामिल करो ।
दोस्तों यह अपना देश है यहाँ की जनता जनार्दन अपना सबकुछ त्याग कर जिसे सर पर बैठा कर घुमती  है  उसकी पोल खुलने पर उसको सरे राह पीट पीट कर लहुलुहान भी करती है इसलियें जय भारत जय जनता । 
-अख्तर कहाँ अकेला कोटा राजस्थान

नरक और मोक्ष के द्वंद्व में फंसे बाबा रामदेव


        बाबा रामदेव ने कल रामलीला मैदान में शानदार मीटिंग की। उस मीटिंग में अनेक स्वनामधन्य लोग जैसे संघ के गंभीर विचारक गोविन्दाचार्य,भाजपा नेता बलबीर पुंज, नामी वकील रामजेठमलानी,सुब्रह्मण्यम स्वामी,स्वामी अग्निवेश,किरण बेदी आदि मौजूद थे। बाबा रामदेव ने यह मीटिंग किसी योगाभ्यास के लिए नहीं बुलायी थी। यह विशुद्ध राजनीतिक मीटिंग थी। इस मीटिंग में बाबा रामदेव के अलावा अनेक लोगों ने अपने विचार रखे। यह मीटिंग कई मायनों में महत्वपूर्ण है। यह बाबा रामदेव की राजनीतिक आकांक्षाओं को साकार करने वाली मीटिंग थी।
     एक नागरिक के नाते बाबा में राजनीतिक आकांक्षाएं पैदा हुई हैं यह संतसमाज और योगियों के लिए अशुभ संकेत है। बाबा का समाज में सम्मान है और सब लोग उन्हें श्रद्धा की नजर से देखते हैं।उनके बताए योगमार्ग पर लाखों लोग आज भी चल रहे हैं। योग की ब्रॉण्डिंग करने में बाबा की बाजार रणनीति सफल रही है। मुश्किल यह है कि जिस भाव और श्रद्धा से बाबा को योग में ग्रहण किया गया है राजनीति में उसी श्रद्धा से ग्रहण नहीं किया जाएगा।
     बाबा रामदेव को यह भ्रम है कि वे जितने आसानी से योग के लिए लिए लोगों को आकर्षित करने में सफल रहे हैं उसी गति से राजनीतिक एजेण्डे पर भी सक्रिय कर लेंगे । बाबा राजनीतिक तौर पर जिन लोगों से बंधे हैं और जिन लोगों को लेकर वे राजनीतिक मंचों से भाषण दे रहे हैं उनमें अनेक किस्म के स्वयंसेवी संस्थाओं के कार्यकर्ता और नेता हैं। किरणबेदी से लेकर स्वामी अग्निवेश आदि इन सबकी सीमित राजनीतिक अपील है और ये लोग दलीय राजनीति में विश्वास नहीं करते। वरना अपना दल बनाते।
     भारत में लोकतंत्र दलीय राजनीति से बंधा है और दलीय राजनीति कोई करिश्माई चीज नहीं है। राजनीति रैली की भीड़ इकट्ठा करने की कला नहीं है,भाषणकला नहीं है। दलीय राजनीति की समूची प्रक्रिया बेहद जटिल और अंतर्विरोधी है। मसलन योग सिखाते हुए बाबा रामदेव को धन मिलता है। जो सीखना चाहता है उसे पैसा देना होता है। राजनीति में बाबा को रैली करनी है ,अपने राजनीतिक विचार व्यक्त करने हैं,प्रचार करना है तो उन्हें अपनी गाँठ से धन खर्च करना होगा अथवा किसी सेठ-साहूकार-तस्कर-माफिया-भ्रष्ट पूंजीपति से मांगना होगा और कहना होगा कि मेरी मदद करो। आम जनता से पैसा जुगाडना और राजनीति करना यह आज के जमाने की कीमती राजनीति में संभव नहीं है।
     बाबा जानते हैं राजनीति का मतलब राजनीति है, फिर और कोई गोरखधंधा नहीं चल सकता। राजनीति टाइमखाऊ और पैसाखाऊ है। योग में बाबा को जो आनंद मिलता होगा उसका सहस्रांश आनंद उन्हें राजनीति में नहीं मिलेगा। अभी से ही बाबा ने राजनीति के चक्कर में शंकर की बारात एकत्रित करनी आरंभ कर दी है । मसलन दिल्ली में कल जो रैली बाबा ने की उसमें मंच पर बैठे जितने भी नेता और सामाजिक कार्यकर्ता थे उनकी आम जनता में कितनी राजनीतिक साख है यह बाबा अच्छी तरह जानते हैं। इनमें कोई भी जनता के समर्थन से चुनकर विधानसभा-लोकसभा तक नहीं जा सकता। रामजेठमलानी- सुब्रह्मण्यम स्वामी की एक-एक आदमी की पार्टी है नाममात्र की। बाकी दो भाजपानेता मंच पर थे जिनका कोई जनाधार नहीं है। किरनबेदी और स्वामी अग्निवेश कहीं पर नगरपालिका का चुनाव भी नहीं जीत सकते। यही हाल अन्य लोगों का है। बाबा रामदेव आज अपनी सारी चमक,प्रतिष्ठा और भव्यता के बाबजूद यदि अपने मंच पर इस तरह के जनाधारविहीन नेताओं के साथ दिख रहे हैं तो भविष्य तय है कि कैसा होगा। कहने का यह अर्थ नहीं है कि रामजेठमलानी, अग्निवेश,सुब्रह्मण्यम स्वामी आदि जो लोग मंच पर बैठे थे उनकी कोई प्रप्तिष्ठा नहीं है। निश्चित रूप से ये लोग अपने सीमित दायरे में यशस्वी लोग हैं। लेकिन राजनीति में ये जनाधाररहित नेता हैं। राजनीति में मात्र साख से काम नहीं चलता वहां जनाधार होना चाहिए।
    बाबा रामदेव की एक और मुश्किल है वे राजनीति करना चाहते हैं साथ ही योग-भोग और राजनीति का संगम बनाना चाहते हैं। राजनीति संयासियों-योगियों का काम नहीं है । यह एक खास किस्म का सत्ताभोगी कला,शास्त्र,और सिस्टम है।बाबा को भोग से घृणा है फिर वे राजनीति में क्यों जाना चाहते हैं ?  राजनीति लंगोटधारियों का खेल नहीं है। राजनीति उन लोगों का काम भी नहीं जो घर फूंक तमाशा देखते हों। राजनीति एक उद्योग है।एक सिस्टम है। जिस तरह योग एक सिस्टम है।
    बाबा योग के सिस्टम से राजनीति के सिस्टम में आना चाहते हैं तो इन्हें अपना मेकअप बदलना होगा। वे योगी के मेकअप और योग के सिस्टम से राजनीति के सिस्टम में नहीं आ सकते। उन्हें सिस्टम बदलना होगा। राजनीतिक सिस्टम की मांग है कि अब योगाश्रम खोलने की बजाय राजनीतिक दल के ऑफिस खोलें। अपने कार्यकर्ताओं को शरीरविद्या और योगविद्या की बजाय दैनंदिन राजनीतिक फजीहतों में उलझाएं। योगचर्चा की बजाय राजनीतिक चर्चाएं करें। स्वास्थ्य की बजाय अन्य राजनीतिक सवालों पर प्रवचन दें। इससे बाबा के अब तक के कामों का अवमूल्यन होगा। बाबा नहीं जानते राजनीति में हर चीज का अवमूल्यन होता है। व्यक्तित्व,मान-प्रतिष्ठा,पैसा,संगठन आदि सबका अवमूल्यन होता है।
   यह सच है राजनीति और सत्ता की चमक बड़ी जबर्दस्त होती है लेकिन राजनीति में एक दोष है अवमूल्यन का। इस अवमूल्यन के वायरस का सभी शिकार होते हैं वे चाहे जिस दल के हों,जितने भी ताकतवर हों। राजनीति में निर्माण और अवमूल्यन स्वाभाविक प्रक्रिया है। बाबा रामदेव की राजनीति के प्रति बढ़ती ललक इस बात का संकेत है कि वे अब अवसान की ओर जाना चाहते हैं। वैसे योग का उनका कारोबार अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच चुका है। वे योग से जितना निचोड़ सकते थे उसका अधिकतम निचोड चुके हैं। जितने योगी बना सकते थे उतने बना चुके हैं।
    आज बाबा रामदेव का योग ब्राण्ड सबसे पापुलर ब्राँण्ड है और इसकी चमक योग तक ही अपील करती है। योग की आंतरिक समस्याएं कई हैं,मसलन् योग में राजनीति का घालमेल करने से फासिज्म पैदा होता है। बाबा रामदेव जानते हैं या जानबूझकर अनजान बन रहे हैं,योग वस्तुतः धर्म है और धर्म और राजनीति का घालमेल अंततः फासिज्म के जिन्न को जन्म दे सकता है। भारत 1980 के बाद पैदा हुए राममंदिर के नाम से पैदा हुए खतरनाक राजनीतिक खेल को देख चुका है।
   बाबा रामदेव को लगता है कि वे भ्रष्टाचार से परेशान हैं तो वे योग को कुछ सालों के लिए विराम दें और खुलकर राजनीति करें। राजनेता बनें,कुर्ता-पाजामा पहनें,पेंट-शर्ट पहनें, अपना ड्रेसकोड बदलें। जिस तरह योगियों का अपना ड्रेसकोड है,संतों का है,पुजारियों का है,उसी तरह राजनीतिज्ञों का भी है। बाबा अपना ड्रेसकोड बदलें। संत जब तक संत के ड्रेसकोड में है वह धार्मिक व्यक्ति है और यदि वह धर्म और राजनीति में घालमेल करना चाहता है तो यह स्वीकार्य नहीं है । राममंदिर आंदोलन की विफलता सामने है। भाजपा ने संतों का इस्तेमाल किया आडवाणी जी संत नहीं बन गए। वे रामभक्त राजनीतिज्ञ बने रहे,रामभक्त संत नहीं बने।
   संतों की पूंजी पर भाजपा के अटलबिहारी बाजपेयी प्रधानमंत्री के पद पर पहुँचे थे लेकिन भाजपा ने अपने सांसदों में बमुश्किल 10 प्रतिशत सीटें भी संतों को नहीं दी थीं। बाद में जो संत भाजपा से चुने गए उनका इतिहास सुखद नहीं रहा है। संतों की ताकत से चलने वाले आंदोलन,जिसका पीछे से संचालन आरएसएस कर रहा था, का हश्र सामने है।
     एनडीए की सरकार बनने पर राममंदिर एजेण्डा नहीं था। यह संतों के साथ भाजपा का विश्वासघात था। भाजपानेता जानते थे राममंदिर एजेण्डा रहेगा तो केन्द्र सरकार नहीं बना सकते, अटलजी प्रधानमंत्री नहीं बन सकते और फिर क्या था रामभक्तों ने आनन-फानन में राममंदिर को तीन चुल्लू पानी भी नहीं दिया और सरकार में जा बैठे। संतसमाज का इतना बडा निरादर पहले कभी किसी दल ने नहीं किया।
    कायदे से भाजपा को अड़ जाना चाहिए था कि राममंदिर को हम अपने प्रधान लक्ष्य से नहीं हटाएंगे,लेकिन सत्ता सबसे कुत्ती चीज है उसे पाने के लिए राजनेता किसी भी नरक में जाने को तैयार रहते हैं और एनडीए का तथाकथित मोर्चा तब ही बना जब राममंदिर के सवाल को भाजपा ने छोड़ दिया। संतों के राजनीतिक पराभव और भाजपा के राजनीतिक उत्थान के बीच यही अंतर्क्रिया है। संतों ने शंख बजाए भाजपा ने सत्ता पायी।
    संदेह हो रहा है कि कहीं बाबा रामदेव नए रूप में संतसमाज को फिर से राजनीतिक गोलबंदी करके एकजुट करके भाजपा को सत्ता पर बिठाने की रणनीतियों पर तो नहीं चल रहे ?
     बाबा रामदेव को जितनी भ्रष्टाचार से नफरत है उन्हें विभिन्न दलों और खासकर भाजपा के बारे में अपने विचार और रिश्ते को साफ करना चाहिए। मसलन बाबा ने कांग्रेस को भ्रष्टाचार के लिए जिम्मेदार ठहराया है और वे बार-बार उसके खिलाफ बोल रहे हैं। लेकिन पश्चिम बंगाल में कुछ महिने पहले बाबा आए थे,कोलकाता में उन्होंने खुलेआम कहा वे ममता बनर्जी के लिए वोट मांगेगे। बाबा जानते हैं कि उनके बयान का अर्थ है कि कांग्रेस के लिए ही वोट मांगेगे। किनके खिलाफ वोट मानेंगे ? बाबा वाममोर्चे के खिलाफ वोट मांगेंगे। वे जानते हैं वाममोर्चा कालेधन के खिलाफ संघर्ष तब से कर रहा है जब बाबा का योगी के रूप में जन्म नहीं हुआ था। यदि बाबा अपने विचारों पर अडिग हैं और उन्हें भ्रष्टनेताओं से चिड़ है तो वे बताएं कि वामशासन में 35 सालों में किस मंत्री या मुख्यमंत्री के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप आए ? इनदिनों वाममोर्चा अपनी अकुशलता और नाकामी की वजह से जनता में अलगाव झेल रहा है।
     एक अन्य सवाल इठता है कि बाबा गेरूआ वस्त्र पहनकर,संत के बाने के साथ ही राजनीति क्यों करना चाहते हैं ?क्या इससे वोट ज्यादा मिलेंगे ? जी नहीं,रामराज्य परिषद नामक राजनीतिक दल का पतन भारत देख चुका है। किसी ने भी उस पार्टी को गंभीरता से नहीं लिया जबकि उसके पास करपात्री महाराज जैसा शानदार संत और विद्वान था।
   संत का मार्ग राजनीति की ओर नहीं मोक्ष की ओर जाता है। बाबा रामदेव एक नयी मिसाल कायम करना चाहते हैं कि संतमार्ग को राजनीति की ओर ले जाना चाहते हैं। संत यदि राजनीति में जाते हैं यो यह संत के लिए अवैधमार्ग है। संत का वैध मार्ग राजनीति नहीं है। राजनीति में जो संत हैं वे संतई कम और गैर-संतई के धंधे ज्यादा कर रहे हैं। राजनीतिविज्ञान की भाषा में संत का राजनीति में आने का अर्थ धर्म का राजनीति में आना है और इससे राजनीति नहीं साम्प्रदायिकता यानी फासिज्म पैदा होता है।
    धर्म का राजनीति में रूपान्तरण धर्म के रूप में नहीं होता। धर्म के आधार पर विकसित राजनीति कारपोरेट घरानों की दासी होती है। भाजपा के नेतृत्व में बनी सरकारों के कामकाज इस तथ्य की पुष्टि करते हैं। भाजपा ने संतों और धर्म को मोहरे की तरह इस्तेमाल किया है और राजनीति में नव्य आर्थिक उदारीकरण की नीतियों और मुक्तबाजार के सिद्धांतों को खुलेआम लागू किया है। बाबा रामदेव राजनीति करना चाहते हैं तो भाजपा, संघ परिवार की नीतियों, मुक्तबाजार और नव्य़ आर्थिक उदारीकरण के बारे में अपने एजेण्डे का लिखित में खुलासा करें। साथ ही संत और योग को विराम दें और राजनीति करें। जब तक वे यह पैकेज लागू नहीं करते वे अपना शोषण कराने के लिए अभिशप्त हैं वैसे ही जैसे राममंदिर आंदोलन के नाम पर संघ परिवार और भाजपा ने संतों का शोषण किया था।   

गैर-मुसलमानों के साथ संबंधों के लिए इस्लाम के अनुसार दिशा-निर्देश


हमें विस्तार से पता होना चाहिए कि इस्लाम के अनुसार मुसलमानों को गैर-मुसलमानों के साथ कैसे संबंध रखने चाहिए और कैसे उनके साथ इस्लामी शरी'अह के अनुसार जीवन व्यतीत करना चाहिए?

सब तारीफें अल्लाह के ही लिए हैं.
पहली बात तो यह कि इस्लाम दया और न्याय का धर्म है. इस्लाम के लिए इस्लाम के अलावा अगर कोई और शब्द इसकी पूरी व्याख्या कर सकता है तो वह हैन्याय".

मुसलमानों को आदेश है कि ग़ैर-मुसलमानों को ज्ञान, सुंदर उपदेश तथा बेहतर ढंग से वार्तालाप से बुलाओ.  ईश्वर कुरआन में कहता है (अर्थ की व्याख्या):

[29: 46] और किताबवालों से बस उत्तम रीति से वाद-विवाद करो - रहे वे लोग जो उनमे ज़ालिम हैं, उनकी बात दूसरी है. और कहो: "हम ईमान लाए उस चीज़ पर जो हमारी और अवतरित हुई और तुम्हारी और भी अवतरित हुई. और हमारा पूज्य और तुम्हारा पूज्य अकेला ही है और हम उसी के आज्ञाकारी हैं."

[9:6] और यदि मुशरिकों (जो ईश्वर के साथ किसी और को भी ईश्वर अथवा शक्ति मानते हैं) में से कोई तुमसे शरण मांगे, तो तुम उसे शरण दे दो, यहाँ तक कि वह अल्लाह की वाणी सुन ले. फिर उसे उसके सुरक्षित स्थान पर पंहुचा दो; क्यों वे ऐसे लोग हैं, जिन्हें ज्ञान नहीं है.

इस्लाम यह अनुमति नहीं देता है कि एक मुसलमान किसी भी परिस्थिति में किसी गैर-मुस्लिम (जो इस्लाम के प्रति शत्रुतापूर्ण व्यवहार नहीं करता) के साथ बुरा व्यवहार करे. इसलिए मुसलमानों को किसी ग़ैर-मुस्लिम के खिलाफ आक्रमण की, या डराने की, या आतंकित करने, या उसकी संपत्ति गबन करने की, या उसे उसके सामान के अधिकार से वंचित करने की, या उसके ऊपर अविश्वास करने की, या उसे उसकी मजदूरी देने से इनकार करने की, या उनके माल की कीमत अपने पास रोकने की जबकि उनका माल खरीदा जाए. या अगर साझेदारी में व्यापार है तो उसके मुनाफे को रोकने की अनुमति नहीं है.

इस्लाम के अनुसार यह मुसलमानों पर अनिवार्य है गैर मुस्लिम पार्टी के साथ किया करार या संधियों का सम्मान करें. एक मुसलमान अगर किसी देश में जाने की अनुमति चाहने के लिए नियमों का पालन करने पर सहमत है (जैसा कि वीसा इत्यादि के समय) और उसने पालन करने का वादा कर लिया है, तब उसके लिए यह अनुमति नहीं है कि उक्त देश में शरारत करे, किसी को धोखा दे, चोरी करे, किसी को जान से मार दे अथवा किसी भी तरह की विनाशकारी कार्रवाई करे. इस तरह के किसी भी कृत्य की अनुमति इस्लाम में बिलकुल नहीं है.

जहाँ तक प्यार और नफरत की बात है, मुसलमानों का स्वाभाव ग़ैर-मुसलमानों के लिए उनके कार्यो के अनुरूप अलग-अलग होता है. अगर वह ईश्वर की आराधना करते हैं और उसके साथ किसी और को ईश्वर अथवा शक्ति नहीं मानते तो इस्लाम उनके साथ प्रेम के साथ रहने का हुक्म देता है. और अगर वह किसी और को ईश्वर का साझी मानते हैं, या ईश्वर पर विश्वास नहीं करते, या धर्म के प्रति शत्रुतापूर्ण हैं और ईश्वर की सच्चाई से नफरत करते है, तो ऐसा करने के कारणवश उनके लिए दिल में नफरत का भाव आना व्यवहारिक है.

[अल-शूरा 42:15, अर्थ की व्याख्या]:
"और मुझे तुम्हारे साथ न्याय का हुक्म है. हमारे और आपके प्रभु एक ही है. हमारे साथ हमारे कर्म हैं और आपके साथ आपके कर्म."

इस्लाम यह अनुमति अवश्य देता  है कि अगर ग़ैर-मुस्लिम मुसलमानों के खिलाफ युद्ध का एलान करें, उनको उनके घर से बेदखल कर दें अथवा इस तरह का कार्य करने वालो की मदद करें, तो ऐसी हालत में मुसलमानों को अनुमति है ऐसा करने वालो के साथ युद्ध करे और उनकी संपत्ति जब्त करें.

[60:8] अल्लाह तुम्हे इससे नहीं रोकता है कि तुम उन लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करो और उनके साथ न्याय करो, जिन्होंने तुमसे धर्म के मामले में युद्ध नहीं किया और ना तुम्हे तुम्हारे अपने घर से निकाला. निस्संदेह अल्लाह न्याय करने वालों को पसंद करता है.

[60:9] अल्लाह तो तुम्हे केवल उन लोगो से मित्रता करने से रोकता है जिन्होंने धर्म के मामले में तुमसे युद्ध किया और तुम्हे तुम्हारे अपने घरों से निकला और तुम्हारे निकाले जाने के सम्बन्ध में सहायता की. जो लोग उनसे मित्रता करें वही ज़ालिम हैं.

क्या इस्लाम काफिरों का क़त्ल करने का हुक्म देता है?

कुछ लोग इस्लाम के बारे में भ्रान्तिया फ़ैलाने के लिए कहते हैं, कि इस्लाम में गैर-मुसलमानों को क़त्ल करने का हुक्म है. इस बारें में ईश्वर के अंतिम संदेष्ठा, महापुरुष मौहम्मद (स.) की कुछ बातें लिख रहा हूँ, इन्हें पढ़ कर फैसला आप स्वयं कर सकते हैं:

"जो ईश्वर और आखिरी दिन (क़यामत के दिन) पर विश्वास रखता है, उसे हर हाल में अपने मेहमानों का सम्मान करना चाहिए, अपने पड़ोसियों को परेशानी नहीं पहुंचानी चाहिए और हमेशा अच्छी बातें बोलनी चाहिए अथवा चुप रहना चाहिए." (Bukhari, Muslim)


"जिसने मुस्लिम राष्ट्र में किसी ग़ैर-मुस्लिम नागरिक के दिल को ठेस पहुंचाई, उसने मुझे ठेस पहुंचाई."(Bukhari)

"जिसने एक मुस्लिम राज्य के गैर-मुस्लिम नागरिक के दिल को ठेस पहुंचाई, मैं उसका विरोधी हूँ और मैं न्याय के दिन उसका विरोधी होउंगा." (Bukhari)

"न्याय के दिन से डरो; मैं स्वयं उसके खिलाफ शिकायतकर्ता रहूँगा जो एक मुस्लिम राज्य के गैर-मुस्लिम नागरिक के साथ गलत करेगा या उसपर उसकी जिम्मेदारी उठाने की ताकत से अधिक जिम्मेदारी डालेगा अथवा उसकी किसी भी चीज़ से उसे वंचित करेगा." (Al-Mawardi)

"अगर कोई किसी गैर-मुस्लिम की हत्या करता है, जो कि मुसलमानों का सहयोगी था, तो उसे स्वर्ग तो क्या स्वर्ग की खुशबू को सूंघना तक नसीब नहीं होगा." (Bukhari).

एवं पवित्र कुरआन में ईश्वर कहता है कि:

इसी कारण हमने इसराईल की सन्तान के लिए लिख दिया था, कि जिसने किसी व्यक्ति को किसी के ख़ून का बदला लेने या धरती में फ़साद फैलाने के के जुर्म के अतिरिक्त किसी और कारण से मार डाला तो मानो उसने सारे ही इंसानों की हत्या कर डाली। और जिसने उसे जीवन प्रदान किया, उसने मानो सारे इंसानों को जीवन प्रदान किया। उनके पास हमारे रसूल (संदेशवाहक) स्पष्‍ट प्रमाण ला चुके हैं, फिर भी उनमें बहुत-से लोग धरती में ज़्यादतियाँ करनेवाले ही हैं [5:32]

शाहनवाज़ सिद्दीकी

क्या वाकई कल के मैच के भी हीरो सचिन ही हैं?


क्या वाकई कल के मैच के भी हीरो सचिन ही हैं?

सचिन एक महान खिलाड़ी हैंइसमें कोई शक नहीं. उन्होंने १२० रन का शानदार शतक लगाये बंगलौर मेंयह भी काबिले तारीफ़ है. मगर क्या स्ट्रास के १५८ रन उनपर भारी नहीं पड़े?

अगर आखिर में ज़हीर खान के ओवर में स्ट्रास का और उनके साथी का विकेट नहीं उड़ता तो कौन माई का लाल इस मैच को हारने से बचा सकता था.
मगर आज सुबह अखबारों में पहले पेज पर सचिन की तस्वीर देखकर उनके प्रायोजकों के मीडिया मेनेजमेंट की तारीफ करनी होगी, जो भारतीय क्रिकेट टीम की हर जीत का सेहरा सचिन के सर बंधवाने में सफल हो जाते है,
क्या आज इस जगह ज़हीर खान की तस्वीर नहीं होने चाहिए थी? मीडिया ईमानदारी से सोचे!

हम मूरख तुम ज्ञानी ....

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दुनिया का चलन है....हम जो है बस वही सही है, हम चतुर, सत्यवादी , निर्मल हृदय, ईमानदार, कार्यकुशल , परोपकारी, ज्ञानी, ....जो हैं वो बस हम है ...." तुम मूरख हम ज्ञानी " 

कभी न कभी हम सब के मन में यह खयाल जरुर आता है ..
हालाँकि ऐसे लोंग भी होते हैं जो सिर्फ अपने को मूर्ख मानते हैं, उन्हें हर व्यक्ति अपने से ज्यादाबुद्धिमान लगता है, मगर इनकी गिनती सिर्फ अन्गुलियों पर की जा सकती है ..जो दुर्लभप्राणियों की इस जमात में खुद को शामिल कर इठलाते हैं ... ." हम मूरख तुम ज्ञानी " 

खांचों में जीते हैं हम लोंग, हमारे मापदंड, मर्यादायें इन खांचों के साथ बदलती रहती है ....अपनी भूमिका बदलते ही सोच भी अपनी सुविधानुसार परिवर्तित हो जाती है..क्यों नहीं हम येमान सकते कि दुनिया में हर रंग जरुरी है, हर शख्स ,हर वस्तु की अपनी खूबियाँ हैं, अपनीखामियां भी हैं....स्वाद सिर्फ मीठा या तीखा ही नहीं देता ...नमकीन, खट्टा और कसैलामिलकर ही भोजन का स्वाद बढ़ाते हैं ..
देखिये तो जो हम है और जो हम नहीं हैं उसके लिए हम क्या-क्या सोचते हैं ....


मैं विवाहित हूँ .....इसलिए सभी अविवाहित उत्श्रंखलचरित्रहीन है ...!
मैं अविवाहित हूँ ...विवाहितों का भी कोई जीवन है जैसे काराग्रह के बंदी हों.
मैंने प्रेम विवाह किया है ....अरेंज मैरिज वही करते हैं जिन्हें कोई लड़का /लड़की घास नहीं डालतीये तो मां-बाप ने शादी करवा दी वरना कुंवारे ही रह जाते.
मेरा अरेंज मैरेज है .... प्रेम विवाह छिछोरापन है.
मैं धार्मिक हूँ .....इसलिए सभी नास्तिक पापी हैंघृणा करने योग्य हैं.
मैं नास्तिक हूँ ....धार्मिक मान्यताओं का पालन करने वाले पाखंडी हैं.
मैं .... धर्म को मानती हूँ ....इसलिए दूसरे धर्मों में कोई सार नहीं हैउनमे कुछ भी अच्छानहीं है.
मैं .... प्रान्त से हूँ ....सभ्य लोंग बस यहीं बसते हैं .
मैं .... भाषी हूँ ...बस मेरी बोली सबसे मीठी, बाकी सक बकवास.
मैं नेता हूँ ....पूरी जनता मेरी प्रजा है .
मैं अमीर हूँ ....गरीबों को जीने का कोई अधिकार नहीं है.
मैं गरीब हूँ ....अमीर सिर्फ नफरत किये जाने योग्य हैं.
मैं सत्यवादी हूँ ....दुनिया कितनी झूठी है .
मैं शिक्षित हूँ ......इसलिए सभी अशिक्षित जंगली हैंगंवार हैं ..
मैं साहित्यकार हूँ ... .दूसरों को लिखने का शउर ही नहीं हैक्या -क्या लिख देते हैं.
मैं ब्लॉगर हूँ ...साहित्यकारलेखक क्या चीज हैपैसों के भरोसे पैसों के लिए लिखते हैं ...मेरी जो मर्जी आये लिखता हूँ.
मैं कवि हूँ ....कवितायेँ लिखना कितना दुष्कर हैकहानी लिखने में क्या हैजो देखाआसपास लिख दोकोई तुकबहर का ख्याल नहीं रखना पड़ता.
मैं कहानीकार हूँ ....कवितायेँ तो यूँ ही लिख दी जाती हैंकोई भी पंक्ति कैसे भी जोड़ दोबस तुक मिलाने की जरुरत हैआधुनिक कविता में तो तुक की भी जरुरत नहीं .
मैं वैज्ञानिक हूँ ....ज्योतिष पाखंड हैसिर्फ बेवकूफ बनाने का जरिया है.
मैं ज्योतिषी हूँ ....वैज्ञानिकों का भाग्य तो हम ही बता सकते हैं ...
मैं बॉस हूँ ....मातहतों को अपने बॉस के साथ विनम्रता से पेश आना चाहिएऑफिस के कार्य के अलावा थोड़े बहुत घर के काम भी कर दिए तो क्या हर्ज़ है..
मैं मुलाजिम हूँ ...बॉस को कर्मचारियों से प्यार से पेश आना चाहिएहम तनख्वाह ऑफिस के काम की लेते हैंइनके घर का कम क्यों करें...
मैं पुरुष हूँ .....स्त्रियों की अकल उनके घुटने में होती है !
मैं स्त्री हूँ ......पुरुषों के घुटने कहाँ झुकते हैंकौन नहीं जानता !
मैं कामकाजी महिला हूँ ...घर बैठे सिर्फ डेली सोप देखनापास पड़ोस में सास बहू की चुगलियाँ और काम क्या होता है इन गृहिणियों को .
मैं गृहिणी हूँ ....सुबह सवेर सज-संवर कर निकल जानाघर और बच्चों को आया के भरोसे छोड़कर...काम तो बहाना है.
मैं सास हूँ ....आजकल की बहुएं नाआते ही पूरे घर पर कब्जा कर लेती हैंबहू को ससुराल का हर कार्य आदर पूर्वक करना चाहिए..
मैं माँ हूँ ...बेचारी मेरे बेटी से ससुराल वाले कितना काम करवाते हैं , बहू का हक तो उसे मिलना ही चाहिए .
मैं बहू हूँ ....ये सासू माँ , समझती क्या है अपने आप कोजब देखो हुकम चलाती है.
मैं बेटी हूँ ....माँ ने अपनी बहुओं को कितना सर चढ़ा रखा है.
मैं ननद हूँ ...भाभियाँ भाई को अपने वश में रखती हैंभाई को अपनी बहनों को तीज त्यौहार पर महंगे गिफ्ट देने चाहिए.
मैं भाभी हूँ ....ननद बिजलियाँ होती हैंआग लगाने के सिवा कुछ नहीं जानती , तीज त्योहारों पर अपने भाई से महंगे तोहफों की मांग करती रहती हैं.
मैं पिता हूँ ....आजकल बच्चे कितने अनुशासनहीन है , हम तो अपने पिता से कितना डरते थेउन्हें कभी हमें पढने के लिए कहना ही नहीं पड़ता था..
हम बच्चे हैं .....हमारे पिता को कभी उनके माता पिता ने पढने के लिए नहीं टोकामगर ये हमेशा हमारे सर पर सवार रहते हैं..
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