Thursday, June 30, 2011

Daughters of the brothel

Filmmaker Gautam Singh explains how he came to make Daughters of the brothel

India's handwritten magazines have long fascinated me. But while researching the subject for a blog, I came across one in particular that stood out. Jugnu is a 32-page monthly magazine that has been written and published by the sex workers of the Chaturbhuj-sthan brothel in Bihar, near the border with Nepal, for the past 10 years.

Home to about 10,000 women and children, the whole area - named after the Chaturbhuj-sthan temple, which is located inside - is essentially one large brothel. Historians believe it was first established during the Moghul era. Prostitution has become a family tradition there - passed down from generation to generation.

Intrigued, I contacted the magazine and as more details emerged about this extraordinary publication and the women behind it, I realised that this story was much bigger than a blog.

The magazine had been set up by a group of sex workers led by one girl - Naseema. Born into Chaturbhuj-sthan, Naseema was abandoned by her mother and raised by a woman she calls her 'grandmother'. Although not actually related to her, this woman used the money she earned as a prostitute to raise Naseema and send her to school. Naseema became the first girl in the brothel's 300-or-so-year history to receive an education.
But their work has brought them many enemies; the most feared being Rani Begum. As chief of the brothel, Begum's finances have suffered a blow as a result of Naseema's activities. Her thugs have publicly harassed and beaten Naseema and the other women who work with her. Naseema has also had to fight pimps, as well as some police officers and clerics who were unhappy about her work. When she returned to Chaturbhuj-sthan it was not to sell her body. With the help of local banks, Naseema established small industries inside the brothel - making candles, matchsticks, bindis and incense - offering many prostitutes an alternative form of employment. And she set about persuading the sex workers to send their children to school. Now almost every child in Chaturbhuj-sthan is in full-time education.

More than 50 former prostitutes now work with Naseema, who taught them how to read and write. As well as running the magazine - which is sold across India and also sent to subscribers elsewhere - Naseema and the other women work to prevent others being trafficked, mainly from neighbouring Nepal and Bangladesh, into prostitution. In the last year alone, they have been able to send at least 20 new girls safely back home.

With a clearly identifiable hero, a suitably sinister villain and plenty of action guaranteed as they face off against one another, I felt I had come across a story worthy of a novel. I was hopeful that we could produce a perfect film, but shooting inside a brothel was never going to be easy. I deliberately chose a very small crew of just three people so that we might remain as invisible as possible. We used a Canon 7d camera. Its small size and light weight meant that we were able to move quickly from one place to the next - something that was to prove useful when Begum's thugs were sent to threaten us.

Before starting the shoot, I met Begum, hoping that this would reduce the likelihood of any problems arising at a later point. About 65 years old, she lives in a huge mansion inside Chaturbhuj-sthan. Polite and courteous, she sought to portray herself as somebody running a kind of welfare institute for destitute girls and referred to her brothel as a 'social heritage'. A former dancer herself, she stressed that every girl in the brothel is taught classical music and dance.

Begum grew less friendly when I started questioning her about Naseema and her work, but nevertheless promised not to trouble us as long as we filmed indoors. One day, however, while eating lunch, some men came to tell me that Rani Begum wanted us to leave. We eventually had to call the local police to enable us to complete our shoot.

For me, the most emotional scene in the film is when we meet Roma. A 19-year-old Bangladeshi girl, Roma thought she was coming to India to marry a friend of her brother-in-law. She was rescued from the brothel by Naseema and taken to live in a government shelter. But her family still refuses to allow her to return home for fear that she will give them a bad name. We were able to watch the heartfelt telephone conversation between Roma and her family as she pleaded with them to take her back.

And then there is the story of Boha Tola - a red light area in the neighbouring Sitamarhi district that was burnt down when local government officials conspired with villagers to eradicate it. Unofficial sources say that at least 100 women, men and children went missing as a result of the fire. As they were never officially registered by the government, no effort was made to find out what had happened to them.

Naseema and some of the other women recorded the incident on their mobile phones and gave me the footage to use exclusively in the film. They told horrifying tales of gang-rape, children being thrown onto fires and police brutality. Some of the women from Chaturbhuj-sthan went on hunger strike to show their solidarity with the people of Boha Tola, but the hunger strikers and their supporters were all put in prison.

Now 32 years old, Naseema is an amazing character who is proud to call herself "a daughter of the brothel".

Wednesday, June 29, 2011

सेकुलर बनेंगे सांप्रदायिक शिवराज

सेकुलर बनेंगे सांप्रदायिक शिवराज
रामनामी ओढ़कर राजनीति के मैदान में उतरी भारतीय जनता पार्टी अपनी साम्प्रदायिक छवि से आजिज आ चुकी है इसलिए वह अब अपनी छवि बदलने में लगी हुई है लेकिन उसे दमदार सेकुलर चेहरा नहीं मिल पा रहा है। भाजपा में लालकृष्ण आडवाणी, नितिन गडकरी, मुरली मनोहर जोशी, अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, राजनाथ सिंह, नरेन्द्र मोदी आदि जितने कद्दावर नेता है इन सबकी साम्प्रदायिक छवि है। ऐसे में पार्टी मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की सेकूलर छवि बनाने के लिए प्राणपण से जुट गई है। शिवराज के बहाने मुस्लिम वोटो को पटाने की कोशिश शुरू हो रही है।
असम, तमिलनाडु, केरल, पंदुचेरी और पश्चिम बंगाल में हुए विधानसभा चुनावों में भारी खर्चा और कड़ी मेहनत के बाद भी नतीजा उलटा निकलने से भाजपा को अहसास हो गया है कि अगर आगामी लोकसभा चुनाव तक उसने अपनी छवि नहीं बदली तो लोकसभा चुनाव तो दूर वह भाजपा शासित राज्यों में भी सत्ता से बंचित हो सकती है। वर्तमान समय में गुजरात (मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी),उत्तराखण्ड (मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक),मध्यप्रदेश (मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान), छत्तीसगढ़ (मुख्यमंत्री रमन सिंह),झारखण्ड (मुख्यमंत्री अर्जुन मुण्डा),कर्नाटक (मुख्यमंत्री येद्दियुरप्पा),हिमांचल प्रदेश (मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल)और बिहार (उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ) में भाजपा या उसकी समर्थित सरकारे है। पार्टी  इन राज्यों में सत्ता बरकरार रखने के साथ-साथ अन्य कई राज्यों सहित केन्द्र में भी सत्ताशीन होने का ख्वाब बुन रही है, इसलिए नितिन गडकरी, अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, राजनाथ सिंह, सभी इन दिनों इस थीसिम में काम कर रहे है कि वोट जोड़ो, अल्पसंख्यक जोड़ो,दलित जोड़ो, किसान जोड़ो, फारवर्ड जोड़ो, उदार बनों और अपने को स्वीकार्य बनाते हुए जोड़तोड़ से सरकार बनाओं।  साध्य आसान नहीं है,इसलिए साधनों को आहिस्ता आहिस्ता प्रयोग में लाया जा रहा है।
जानकारों की माने तो यह सब दो साल बाद की राजनीतिक परिस्थितियों को ध्यान में रख किया जा रहा है। राष्ट्रीय फलक पर गौर करें तो भाजपा के पास ऐसे चेहरों की कमी दिखाई पड़ती है जो भीड़ खींचने का माद्दा रखते हो और जिनकी छवि भी अच्छी हो। ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर की नीति पर चलने वाले शिवराज इस पैमाने पर फिट बैठते हैं। उन्हें चुनौती गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी और हाल ही में पार्टी की सदस्य बनी उमा भारती से मिल सकती है। लेकिन दोनों  हिंदूवादी चेहरे हैं जिनसे गठबंधन के इस दौर में कई सहयोगियों को दिक्कत हो सकती है,इसलिए शिवराज जैसे मध्यमार्गी नेता पार्टी के लिए फायदेमंद रह सकते हैं। इसे ध्यान में रख कर ही उन्हें अल्पसंख्यकों के निकट ले जाया जा रहा है। 
भगवाधारी के सर हरी पगड़ी,
ये राजनीती भी कैसे कैसे गुल खिलाती है.
इसकी शुरूआत भोपाल में 12 जून को भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा द्वारा शिवराज के सम्मान के साथ हुई। मौके की नजाकत देखते हुए शिवराज ने भी आव देखा न ताव और घोषणा कर दी की- मैं मुसलमानों की सुरक्षा करूंगा और उन्हें कोई दिक्कत नहीं होने दूंगा। जिस तरह से इंसान की दो आखें व दो बाजू होते हैं उसी तरह हिंदू और मुसलमान मेरे लिए हैं। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की इस घोषणा पर टिप्पणी करते हुए मध्य प्रदेश कांग्रेस सदभावना प्रकोष्ट के प्रदेश अध्यक्ष मुश्ताक मलिक कहते हैं कि पूरा प्रदेश जानता है कि शिवराज के कार्यकाल में आरएसएस, विश्व हिन्दु परिषद, बजरंग दल द्वारा विभिन्न अवसरों पर प्रदेश को झुलसाने की कोशिश की गई। मध्यप्रदेश में जब से भाजपा सरकार आई है तब से प्रदेश के करीब 250 स्थानों पर साम्प्रदायिक दंगे हुए हैं और अल्पसंख्यक समुदाय के बेकसूर लोगों पर भाजपा सहित और उनके सहयोगी संगठन आरएसएस और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने सुनियोजित एवं षडय़ंत्रपूर्वक अत्याचार कर काफी नुकसान पहुंचाया है।  ऐसे में शिवराज की साम्प्रदायिक छवि को भाजपा सेकूलर बनाने की कोशिश कर दाग धोने की कोशिश कर रही है। उधर शिवराज की सेकूलर छवि के सम्मान पर बरसते हुए कांग्रेस के विधायक आरिफ अकील ने सम्मान को मुसलमानों के साथ छलावा बताते हुए कहा की शिवराज का सम्मान मुसलमानों का अपमान है।
अकील कहते हैं कि मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार अपने खर्चे पर मुख्यमंत्री का सम्मान करवाकर अल्पसंख्यकों के घावों पर मरहम लगाने की कोशिश कर रही है। जबकि प्रदेश का बच्चा-बच्चा तक जानता है कि प्रदेश की भाजपा सरकार के संरक्षण में 1 जनवरी 2004 से लेकर अब तक करीब 250 बार मुस्लिम समुदाय को परेशान करने के लिए साम्प्रदायिक माहौल बिगाडऩे की कोशिश की गई। वह सरकार से सवाल करते हुए पूछते हैं कि आज मुस्लिम समुदाय की हितैशी बनने की कोशिश कर रही सरकार ने आज तक मुसलमानों के लिए क्या किया। प्रधानमंत्री कार्यालय के पत्र क्रमांक 850/3/सी/3/05- पोल दिनांक 9 मार्च 2005 को अधिसूचना जारी कर भारत के मुस्लिम समुदाय की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति पर रिपोर्ट तैयार करने के लिए न्यायमूर्ति राजिन्दर सच्चर की अध्यक्षता में 7 सदस्यीय समिति का गठन किया है।  इस समिति की रिपोर्ट को मध्यप्रदेश में लागू नहीं करने के संबंध में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने विधानसभा से लेकर जनसभाओं तक में बोला है कि प्रदेश में सच्चर कमेटी की सिफारिशें लागू नहीं की जाएंगी। इससे दो समुदायों दरार पैदा होगी लेकिन इसके पीछे षडय़ंत्र यह है कि कहीं मुसलमानों का उत्थान न हो जाए, वे  सामाजिक, आर्थिक एवं शैक्षणिक दृष्टि से परिपक्व न हो जाए। इससे अंदाजा लगाया जा  सकता है कि  भाजपा सरकार मुस्लिम समुदाय की कितनी हितैषी है। वह सिर्फ मुसलमानों को वोट बैंक के रूप मे इस्तेमाल करना चाहती है।
वे कहते हैं कि अल्पसंख्यक कल्याण हेतु 8 सूत्रीय कार्यक्रम तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के कार्यकाल में अधिसूचना राजपत्र में दिनांक 7 अगस्त 2003 को जारी करने के उपरांत भी भाजपा सरकार ने उसे लागू नहीं किया  है।  प्रदेश की राजधानी भोपाल में हज हाउस निर्माण हेतु तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सरकार ने हज हाउस की भूमि की रजिस्ट्री कराकर बुनियाद रखी और भाजपा ने उसमें अड़ंगा लगाकर निर्माण कार्य रोक दिया। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने घोषणा की थी कि आगामी 100 दिनों में हज हाउस का निर्माण करा दिया जायेगा लेकिन वह घोषणा का क्रियान्वयन आज दिनांक तक नहीं हो सका।
अकील कहते हैं कि  अल्पसंख्यकों के बिना मध्यप्रदेश को स्वर्णिम मध्यप्रदेश बनाने का सपना प्रदेश की भाजपा सरकार देख रही है।  इस हेतु मई 2010 में विधानसभा का विशेष सत्र आयोजित किया गया जिसमें 70 बिन्दुओं के संकल्प पारित किए गए। इन बिन्दुओं में एक भी बिन्दु अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए नहीं है का जवाब विधानसभा प्रश्न 103 (1596) दिनांक 23 जुलाई 2010 को दिया है। प्रदेश भाजपा सरकार/शासन के इस जवाब से आप स्वयं अंदाजा लगा सकते हैं कि प्रदेश भाजपा सरकार मुसलमानों की कितनी हितैषी है। अकील का कहना है कि भाजपा की भेद-भाव नीति के चलते मासूम बच्चों के दिलों में दरार पैदा करने के उद्देश्य से स्कूलों में प्रतिदिन वंदेमातरम का गान व सूर्य नमस्कार योग करने के निर्देश भाजपा सरकार ने जारी किये है। इस कारण मुस्लिम धर्म की भावना को तो ठेस पहुंची ही है और साथ में निर्देशों का छात्रों द्वारा पालन करने व कुछ शिक्षकों को पालन कराने में असुविधा हो रही है। ऐसे में भाजपा सरकार का नया फार्मूला है कि ऐसे छात्रों को स्कूलों से बाहर किया जाए और शिक्षकों को तत्काल निलंबित किया जाए। भय से मुस्लिम छात्र व शिक्षक शासन के निर्देशों के पालन में वंदेमातरम और सूर्य नमस्कार कर धर्मविरोधी कृत्य करने को मबजूर हैं। कांग्रेस की सोच के इतर एक बात जाहिर है भाजपा अपने में ही फंसी है। न लोगों में जज्बा पैदा करने वाले मुद्दे है और न जज्बा पैदा कर सकने वाले चेहरे है। जो है वे हाशिए में है। ऐसे में शिवराज की लाटरी लग जाए तो कोई बड़ी बात नहीं होगी।

पूरा मुजफ्फरपुर बीमार, सुशासन बाबू हुए बेकार

पूरा मुजफ्फरपुर बीमार, सुशासन बाबू हुए बेकार
सुशासन का दंभ भरने वाली नीतीश कुमार की सरकार बिजली के मुद्दे पर पहले ही असफल हो चुकी है और अब स्वास्थ के मामले में भी नाकारा साबित हो रही है। सुशासन बाबू के दावों की पोल खोली है मुजफ्फरपुर में फैली अज्ञात बीमारी ने जिसने विगत एक पखवाड़े में बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में 59 बच्चों की जान ले चुका है। पहले इस बीमारी को जापानी इंसेफ्लाइटिस माना जा रहा था, लेकिन अब तक जितने परीक्षण हुए हैं उसमें बीमारी का पता नहीं चल पाया है। साफ है, इतनी मासूम जानों के जाने के बाद अभी तक सुशासन बाबू की सरकार बीमारी का पता लगाने में भी बेकार साबित हो रही है।
बीमारी से जुड़े अब तक 62 सैंपल पुणे स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी को भेजे गए हैं। इनमें 22 सैंपलों की जाँच की जा चुकी है। जांच के बाद विशेषज्ञों ने जापानी इंसेफ्लाइटिस की पुष्टि अभी तक नहीं की है। जाँच किये गये नमूनों से यह भी पता चला है कि बच्चे नीपा वायरस और चंदीपुरा वायरस से भी पीड़ित नहीं हैं। शेष 40 सैंपलों के जाँच का काम अभी भी जारी है। कई तरह के सैंपल पुणे भेजे गए हैं, मसलन-सीएसएफ (रीढ़ की हड्डी की जाँच), ब्लड सैंपल इत्यादि। प्रभावित क्षेत्र के जद में रहने वाले पशु, चमगादड व मच्छड़ों के ब्लड सैंपल की भी जाँच की जा रही है।  स्वास्थ विभाग के प्रधान सचिव श्री सी के मिश्रा ने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी के विशेषज्ञों से मदद माँगी है। वहाँ के विशेषज्ञ अपनी तरफ से हर तरह की मदद भी मुहैया करवा रहे हैं। फिर भी अभी तक इस मामले की तह तक नहीं पहुँचा जा सका है।
हो सकता है कि ब्रेन टिश्यू के सैंपल की जाँच करने से इस बीमारी का पता चल जाए, पर इसके लिए सरकार को बीमारी को महामारी घोषित करना पड़ेगा। भारत में महामारी एक्ट सन्् 1897 में भयावह व विकराल प्लेग को काबू में करने के लिए बनाया गया था। इस एक्ट के तहत सरकार को यह अधिकार दिया गया है कि वह रोग के रोक-थाम के लिए रोगी के किसी भी अंग का सैंपल लेकर उसका जाँच करवा सकती है। इस एक्ट में यह भी प्रावधान है कि बीमारी के संक्रमण को रोकने के लिए पीड़ित रोगी को अलग रखा जाए तथा उस स्थान पर विशेष साफ-सफाई का भी ध्यान रखा जाए।
उल्लेखनीय है कि जिले के कलेक्टर श्री संतोष कुमार मल्ल ने राज्य के मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार के पास इस आशय का प्रस्ताव भेजा है। श्री मल्ल मानते हैं कि इस अज्ञात बीमारी को महामारी घोषित करने से बीमारी के रहस्य को समझने में आसानी होगी। फिलहाल डॉक्टर अशोक कुमार, डॉक्टर कृष्ण कुमार, डॉक्टर ब्रज मोहन, डॉक्टर अरुण शाह और डॉक्टर राजीव कुमार जोकि शिशु विशेषज्ञ हैं एक टीम के रुप में पूरे जिले में अज्ञात बीमारी से लड़ने की कोशिश कर रहे हैं। जिलाधिकारी संतोष कुमार मल्ल के अगुआई में 26 जून से 63 पीड़ित गाँवों में जबर्दस्त सफाई अभियान चलाया जा रहा है। इस तारतम्य में प्राथमिक स्वास्थ केन्द्रों में पदस्थापित बी ग्रेड की नर्सों व इलाके के सीडीपीओ को विशेष तौर पर पूरे घटनाक्रम पर निगाह रखने की हिदायत दी गई है। उल्लेखनीय है कि इन कवायदों की श्रंखला की अगली कड़ी के रुप में बुजुर्गों के स्वास्थ की जाँच भी करवाई जा रही है।
भले ही अभी तक अज्ञात बीमारी का पता नहीं चल सका है। लेकिन इस बात के कयास लगाये जा सकते हैं कि इस बीमारी का तार कहीं न कहीं गंदगी से जरुर जुड़ा हुआ है, क्योंकि अब तक सबसे अधिक मरीज मुसहरी से आये हैं। (मुसहरी उस स्थान को कहा जाता है, जहाँ मुसहर जाति के लोग निवास करते हैं) इस जाति के सदस्यों का रहन-सहन बहुत ही गंदा रहता है। इनका मुख्य आहार चुहा व सुअर का माँस है। ये मूल रुप से मजदूरी व देषी षराब बेच करके अपना पेट पालते हैं।
यहाँ पर यह सवाल उठता है कि हर बार जिला प्रषासन पानी के सिर के ऊपर से गुजरने के बाद ही क्यों हरकत में आता है ? अगर प्रशासन अपने काम को सुनियोजित तरीके से करेगा तो इस तरह की महामारी से हमें शायद ही कभी रुबरु होना पड़े।
मुजफ्फरपुर को छोड़ दीजिए, राज्य की राजधानी पटना में भी सफाई की स्थिति दयनीय है। बेली रोड में ही दो मुसहरी स्थित हैं। पटना से दानापुर जाने के क्रम में एक आशियाना मोड़ से 10 कदम आगे दायीं ओर है और दूसरा जगदेवपथ से पहले बायीं तरफ। दोनों जगह गंदगी का साम्राज्य है। बेली रोड पर ही अवस्थित खाजपुरा मोहल्ला में सत्तार मियाँ के कोल्डस्टोर के पीछे एवं बांसवाड़ी के पास कचड़ों का अंबार इस कदर से लगा हुआ है कि वहाँ कभी भी महामारी फैल सकती है। इनका जिक्र तो बानगी भर है। पटना नगर निगम टैक्स की वसूली करने में तो आगे है, किन्तु सफाई के मामले में पूरी तरह से फिसड्डी।
आज बिहार के किसी भी जिले के प्राथमिक स्वास्थ केन्द्रों पर, प्रखंड में या अनुमंडल स्तर पर पदस्थापित नर्स या डॉक्टर क्या ईमानदारी पूर्वक अपना काम कर रहे हैं ? काम तो दूर की बात है जनाब उनके पास जॉब नॉलेज तक नहीं है। कुछ स्वास्थकर्मियों को तो सूई तक लगाना नहीं आता है। वे दवाई का नाम न तो पढ़ सकते हैं और न ही लिख सकते हैं। इस तरह की नेगेटिव तस्वीर को पॉजिटिव में तब्दील करना नीतीश सरकार के लिए चुनौती के समान है। मुजफ्फरपुर में फैले अज्ञात बीमारी के फ्रंट पर फिलवक्त राज्य सरकार गंभीर नहीं लग रही है। सरकार के द्वारा इस अज्ञात बीमारी को महामारी घोषित करने से संभवत इस अज्ञात बीमारी के ईलाज में डॉक्टरों को मदद मिल सकती है। सुशासन बाबू को वाजिद अली शाह और नीरो बनने से बचना चाहिए, तभी जनता का विश्वास उन पर बना रहेगा।

Tuesday, June 28, 2011

रसोई गैस-डीजल-केरोसीन और पेट्रोल की मंहगाई

मंहगाई का असली कारण रसोई गैस का 
कार में उपयोग

सरकार जब-जब भी रसोई-गैस, डीजल, केरोसीन और पेट्रोल की कीमतें बढाती है, सरकार की ओर से हर बार रटे-रटाये दो तर्क प्रस्तुत करके देश के लोगों को चुप करवाने का प्रयास किया जाता है| पहला तो यह कि कि अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के भाव बढ गये हैं, जो सरकार के नियन्त्रण में नहीं है| दूसरा तर्क यह दिया जाता है कि रसोई-गैस, डीजल, केरोसीन और पेट्रोल की आपूर्ति करने वाली कम्पनियों को भारी घाटा हो रहा है| इसलिये रसोई-गैस, डीजल, केरोसीन और पेट्रोल की कीमतें बढाना सरकार की मजबूरी है| राष्ट्रीय मीडिया की ओर से हर बार सरकार को बताया जाता है कि यदि सरकार अपने करों को कम कर दे तो रसोई-गैस, डीजल, केरोसीन और पेट्रोल की कीमतें बढने के बजाय घट भी सकती हैं और आंकड़ों के जरिये यह सिद्ध करने का भी प्रयास किया जाता है कि रसोई-गैस, डीजल, केरोसीन और पेट्रोल की आपूर्ति करने वाली कम्पनियों को कुल मिलाकर घाटे के बजाय मुनाफा ही हो रहा है, फिर कीमतें बढाने की कहॉं पर जरूरत है|

मीडिया और जागरूक लोगों की ओर से उठाये जाने वाले इन तर्कसंगत सवालों पर सरकार तनिक भी ध्यान नहीं देती है और थोड़े-थोड़े से अन्तराल पर रसोई-गैस, डीजल, केरोसीन और पेट्रोल की कीमतें लगातार और बेखौप बढाती ही जा रही है| जिससे आम गरीब लोगों की कमर टूट चुकी है| लेकिन इन लोगों में सरकार के इस अत्याचार का संगठित होकर प्रतिकार करने की क्षमता नहीं है| मध्यम एवं उच्च वर्ग जो हर प्रकार से प्रतिकार करने में सक्षम है, वह एक-दो दिन चिल्लाचोट करके चुप हो जाता है|

राजनैतिक दल भी औपचारिक विरोध करके चुप हो जाते हैं| क्योंकि राजनेता तो सभी दलों के एक जैसे हैं| उन्हें सत्ता से बाहर होने पर ही जनता की तकलीफें नरज आती हैं| मोरारजी देसाई के छोटे से कार्यकाल को छोड़ दिया जाये तो यह बात पूरी तरह से सच है कि सत्ता में आने पर किसी भी राजनैतिक दल के नेताओं को आम लोगों की गम्भीर समस्याएँ भी नजर ही नहीं आती हैं| इसीलिये अन्य अनेक जीवन रक्षक जरूरी वस्तुओं की कीमतों में परोक्ष वृद्धि के साथ-साथ रसोई-गैस, डीजल, केरोसीन और पेट्रोल की कीमतें प्रत्यक्ष रूप से बढने का सिलसिला लगातार चलता रहता है|

मैं समझता हूँ कि अब आम-अभावग्रस्त लोगों को इस दिशा में कुछ समाधानकारी मुद्दों को लेकर सड़क पर आने की जरूरत है, क्योंकि राजनैतिक लोगों से इस समस्या के बारे में आम लोगों के साथ खड़े होने की आशा करना अपने आपको धोखा देने के समान है| बल्कि जनता को अपने आन्दोलन से राजनैतिक लोगों को अलग भी रखना चाहिये| केवल दो बातें ऐसी हैं, जिन्हें देश के आम-अभावग्रस्त लोगों को देश की अंधी-बहरी सरकार को समझाने की जरूरत है:-
1. रसोई गैस एवं केरोसीन की कुल खपत का करीब 40 प्रतिशत व्यावसायिक उपयोग हो रहा है, जिसके लिये मूलत: इनकी कालाबाजारी जिम्मेदार है| जिसमें सरकार के अफसर भी शामिल हैं, क्योंकि उनको हर माह रसोई गैस एवं केरोसीन की कालाबाजारी करने वालों और इनका व्यावसायिक उपयोग करने वालों की ओर से कमीशन मिलता है| जिसकी रोकथाम के लिये सरकार कोई प्रयास नहीं करके रसोई गैस एवं केरोसीन की कीमतें बढकार जनता पर अत्याचार करती है| जबकि कालाबाजारी करने वालों, व्यावसायिक उपयोग करने वालों और सम्बन्धित सरकारी अमले को कठोर सजा मिलनी चाहिये|

2. रसोई-गैस, डीजल, केरोसीन और पेट्रोल की आपूर्ति करने वाली कम्पनियों के कर्मचारियों और अफसरों को जिस प्रकार की सुविधा और वेतन दिया जा रहा है, वह उनकी कार्यक्षमता से कई गुना अधिक है| जिसका भार अन्नत: देश की जनता पर ही पड़ता है| जब सरकार रसोई-गैस, डीजल, केरोसीन और पेट्रोल की कीमतें बढाने के मामले में इन कम्पनियों की ओर से हस्तक्षेप कर सकती है तो इन कम्पनियों के खर्चों को नियन्त्रित करने के लिये हस्तक्षेप क्यों नहीं करती है? जब भी इस बारे में सरकार से नियन्त्रण की बात की जाती है तो सरकार इसे कम्पनियों का आन्तरिक मामला कहकर पल्ला झाड़ लेती है, जबकि कम्पनियों द्वारा अर्जित धन की बर्बादी के कारण होने वाले घाटे की पूर्ति के लिये सरकार रसोई-गैस, डीजल, केरोसीन और पेट्रोल की कीमतें बढाने के लिये इन कम्पनियों की ओर से जनता पर भार बढाने में कभी भी संकोच नहीं करती है|

अदालतें भ्रष्टाचार से मुक्त हों

न्यायपालिका के पास विशाल शक्तियां है क्योंकि वह जो कहती है अंतिम बात होती है, अचूक एवं अमोध। इतनी शक्तिशली है न्यायपालिका कि जब कार्यपालिका का कोई अधिकारी कानून का उल्लंघन करता है तो जज उसके आदेश को निरस्त कर सकते हैं और हुक्मनामे की अपनी ताकत से दिशा-निर्देश दे सकते हैं। जब संसद कोई कानून पास करती है और कानून का अतिक्रमण कर देती है या मौलिक अधिकारों की सीमाओं से बाहर निकल कर आदेश जारी करती है तो अदालत उस आदेश और कार्रवाई को खारिज कर सकती है। पर जब उच्च न्यायालय कानून के बेरोकटोक उल्लंघन के अपराधी हों तो उनकी इस चूक, उनकी इस गलती के लिए न कोई तरीका है न संहिता। हर संविधान का एक सामाजिक दर्शन होता है, खासकर भारत के संविधान का एक सामाजिक दर्शन है। हम एक समाजवादी लोकतांत्रिक गणतंत्र हैं। यदि संविधान के इन आदेशों का उल्लंघन होता है और जजों से जिस तरह के बरताव की उम्मीद की जाती है वे उस बरताव को धता बता देते हैं तो किसी को अधिकार नहीं कि उन्हें सही रास्ते पर लाये और उनके दुराचार को ठीक करे।

जज लोग तत्वतः दूसरे सरकारी अधिकारियों से कुछ अलग नहीं हैं। न्यायिक ड्यूटियों पर आकर भी सौभाग्य से वे इंसान बने रहते हैं। अन्य इंसानों की तरह उन पर भी समय-समय पर गर्व और मनोविकारों का, तुच्छता एवं चोट खायी भावनाओं का, गलत समझ या फालतू जोश का असर पड़ता है।” - ह्यूगो ब्लैक

अपनी पुस्तक में डेविड पैमिक जजों के बारे में लिखते हैंः

अमरीका के सर्वोच्च न्यायालय के जस्टिस जैक्सन ने 1952 में टिप्पणी की कि जो लोग कुर्सी पर पहुंच जाते हैं कभी-कभी घमंड, गुस्सेपन, तंग नजरी, हेकड़ी और हैरान करने वाली कमजोरियों जैसी उन कमजोरियों का परिचय देते हैं जो इंसानियत को विरासत में मिली हुई है। यह हैरानी की बात होगी, असल में चिंताजनक बात होगी यदि जो प्रख्यात दिमाग लोग इंग्लैंड की न्यायापालिका में हैं यदि वे अपने अवकाश, जो उन्हें विरले ही मिलता है, के दिनों में गैरन्यायिक तरीके से काम करें। हाल में लॉर्ड चांसलर हेल्शाम ने स्वीकार किया। उन्होंने कहा कि जो लोग जज की कुर्सी पर बैठते हैं कभी वे उस चीज का शिकार हो जाते हैं जिसे जजी का रोग कहते हैं अर्थात एक ऐसी हालत जिसके लक्षण हैं तड़क-भड़क , चिड़चिड़ापन, बातूनीपन, ऐसी बातें कहने की प्रवृत्ति जो मामले में फैसला करने में जरूरी नहीं होती और शोर्टकट का रूझान।

दुख की बात है कि कानून के अंदर महाभियोग-जो इस बीमारी के बढ़ने से रोकने के लिए एक राजनैतिक इलाज है- के अलावा इसका अन्य कोई इलाज नहीं। इन चिंताजनक बातों से भी बदतर बात है वो जो लार्ड एक्शन ने ही है- सत्ता भ्रष्ट बनाती है और चरम भ्रष्ट बनाती है।लोकतंत्र में लोगों को न्यायपालिका की आलोचना करने का अधिकार है जिससे पारदर्शी, स्वतंत्र, अच्छे व्यवहार वाली, पक्षपात से दूर और हर किस्म की कमजोरियों से मुक्त होने की अपेक्षा की जाती है। कितना भी महत्वपूर्ण मामला क्यांे न हो हर विवाद मंे जज जो फैसला करते हैं वह उस संबंध में अंतिम फैसला होता है। अतः जजों का चयन जांच-पड़ताल के बाद और उनकी वर्ग राजनीति और वर्ग पूर्वाग्रहों के समीक्षात्मक मूल्यांकन के बाद हद दर्जे की सावधानी के साथ किया जाना चाहिये। (देखिये, पोलिटिक्स ऑफ जुडिशयरी, लेखक प्रो. ग्रिफिथ)।

जज लोगंों आप कहां निष्पक्ष हैं?” वे सभी कर्मचारियों की तरह उसी गोल चक्कर में चलते रहते हैं और नियोक्ता लोग जिन विचारों में शिक्षित हुए हैं और पले-बढ़े हैं जज लोग भी उन्हीं शिक्षित और पले-बढ़े हैं। किसी मजदूर या टेªड यूनियन कार्यकर्ता को इंसाफ कैसे मिल सकता है? जब विवाद का एक पक्ष आपके वर्ग का होता है और दूसरा आपके वर्ग का नहीं होता तो कभी-कभी यह सुनिश्चित करना बड़ा मुश्किल हो जाता है कि आपने इन दो पक्षों के बीच स्वयं को पूरी तरह निष्पक्ष स्थिति में रखा है।

लॉर्ड जस्टिस स्क्रटून

न्याय और न्यायतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है भ्रष्टाचार, साम्प्रदायिकता और भाई-भतीजावाद। हाल के दिनों में न्यायापालिका में भ्रष्टाचार बहुत अधिक बढ़ा है यहां तक कि सर्वोच्च स्तर पर भी। गुनाहगार जजों पर संसद में महाभियोग का तरीका पूरी तरह नाकाफी और बेकार साबित हुआ है, इसका ज्वलंत उदाहरण है रामास्वामी का मामला। प्रशांत भूषण ने मुख्य न्यायाधीशों के खिलाफ भ्रष्टाचार का जो आरोप लगाया है, और जिसका समर्थन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस वर्मा ने किया है, क्या उसमें रत्तीभर भी अतिशयोक्ति है? जजों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप दिन दूना रात चौगुना बढ़ते ही जा रहे हैं। महाभियोग इनका कतई कोई समाधान नहीं है। अदालतों में बकाया पड़े-मुकदमों का अम्बार बढ़ता जा रहा है, पार्किन्सन्स कानून (संख्या बढ़ा दो) और पीटर प्रिंसिपल (अयोग्यता में वृद्धि) कोई इलाज नहीं, इसका इलाज है नियुक्ति आयोग (अपॉइटमेंट कमीशन) और एक ऐसा कार्य निष्पादन आयोग (परफोर्मेन्स) कमीशन जिनके पास काफी अधिक शक्तियां हों। नियुक्ति आयोग के पास यह शक्ति हो कि वह कार्य पालिका द्वारा नियुक्ति के लिए सुझाये गये नामों को खारिज कर सके और नियुक्ति से पहले उनके नाम सार्वजनिक कर सके। परफोर्मेन्स कमीशन के पास जजों के दुराचार के खिलाफ जांच करने की और दोषी पाये जाने पर उन्हें बर्खास्त करने की शक्तियां हों। ये चीजें संविधान में संशोधन कर न्यायिक आचरण संहिता का हिस्सा होना चाहिये। प्रस्तावित उम्मीदवार के बारे में कुछ कहने का अधिकार हर नागरिक को होना चाहिए। क्यों?

एक रोमन कहावत हैः जिस चीज का हम सब पर असर पड़ता है उसका फैसला सबके द्वारा होना चाहिये। हमारी न्यायापालिका अभी भी एक प्रतिष्ठित संस्था है। उनके नियतकालिक पाठ्यक्रम होने चाहिये ताकि वे अपने विषय में पूरी तरह पारंगत रहें।

Meritorious Manipuri Muslim students felicitated by an online forum

The Manipuri Muslims Online Forum (MMOF), an online group of Manipur Muslim diaspora spread across the globe, felicitated meritorious Manipuri Muslim students who got ranks in the High School and Higher Secondary examinations 2011 and Pre-Medical Test (PMT) or MBBS/BDS Entrance Examination 2011 conducted by Manipur government.
The felicitation function for Muslim rankers in the High School Leaving Certificate (HSLC) and Higher Secondary Examinations (HSE) besides PMT or MBBS/BDS Entrance Examination was held on 19th June 2011 here at the compound of the Muslim Girls’ Hostel, at Hafiz Hatta, which was only a few months back inaugurated by UPA Chairperson, Mrs. Sonia Gandhi.

Dr. Baharuddin giving the key-note address
The function was graced by A. Halim Chowdhury, IAS (Retd.), Chairperson of Manipur State Minorities Commission as Chief Guest, and Mrs. Laaljan Begum, former member, Manipur State Commission for Women as Guest of Honour. A.R. Khan, IAS, Principal Secretary (Labour and Employment), Government of Manipur, presided over the program.
The function was attended by Muslims leaders, government officials, social workers, college and school teachers, students and ulema.
M. Baharuddin Shah, executive member of the Manipuri Muslims Online Forum and a College Lecturer, gave the key-note address. He presented a brief introduction of MMOF. The online forum was formed recently (through Facebook) and, as of now, it has more than 400 members – mostly young Manipuri Muslims students, research scholars, young defence personnel, civil servants, doctors, engineers, college teachers, among others – from across the globe, including 8 administrators. He offered gratitude to Abdul Gaffar, a Manipur native presently in Delhi, for taking the initiative of opening the forum.

Felicitation of a girl who cleared the PMT, 2011
Baharuddin said the purpose of the online forum is for Manipuri Muslims to know each other and share information that concerns the Manipuri Muslims, and also discuss socio-economic and political issues that concern the community. He also said that the forum also gives admission and career guidance to students and job-seekers respectively, and the forum is trying to enlarge its activities by organizing literary programmes which will include debate, quiz and essay competitions.
A. Halim Chowdhury said that the Muslims in the state should realize the importance of modern education and the Muslim parents should also encourage their girls for higher education.
Mrs. Laaljan Begum, among the first generation of Manipuri Muslim women who took to modern education in the early 1970s, narrated the challenges that she and her friends faced in getting higher education. Former Principal of G.P. Women’s College, Laaljan Begum said that she feels very happy and proud to see many Manipuri Muslim girl students clearing high school, higher secondary, medical and engineering exams over the recent years. They have made not only their parents proud but also the community, she added.

Felicitation of a boy who cleared the PMT, 2011
A.R. Khan, in his speech, said that he is happy to see many meritorious Muslim students from the state clearing tough exams over the years, but sad to see that still now only a few and well-off Manipuri Muslims are serious about giving their children quality education and are able to afford the costly fees for tuition and coaching, which are today very essential for clearing the tough and highly competitive matric and higher secondary exams or the medical and engineering exams. The majority of the poor Muslims are still not much concerned about educating their sons and daughters and it becomes the responsibility of the learned Muslims to make them aware of the importance of modern education, he added.
Mohd. Mustafa, who teaches at an educational institution managed by the Aligarh Muslim University (AMU) and was invited by the forum as special guest, said that he has been giving admission guidance to those Muslim students from Manipur who came to AMU or colleges of Delhi for admission. Mustafa, who also hails from Manipur, shared the information about the admission procedures and other opportunities offered by AMU to students.
The function concluded at the felicitation of the Muslim rank holders in the HSLC (3) and HS (2) Examinations, 2011 and the PMT (13), 2011.
There were in all 13 Muslim candidates (7 girls and 6 boys) who cleared the PMT, 2011 conducted by the Medical Department, Government of Manipur. It is the highest number so far. For many years Muslim students failed to clear this test. It is in the recent years only that Muslim students managed to clear the test mainly due to their hard labour, encouragement from parents and reservation of seats (4%) for the community. In the recent recruitment drive of 401 Medical Officers by the Manipur Public Service Commission 12 Muslim candidates were selected.
The following students were felicitated at the function:
High School Leaving Certificate Examination, 2011 
Conducted by Board of Secondary Education, Manipur (BOSEM)
1. Samina Heibokmayum (21st rank), daughter of Md. Sayed Ahmed of Lilong, student of Islamic Baby English High School, Lilong
2. Khullakpam Sunil Khan (23rd rank), son of Md. A. Hassan of Oinam Sawombung, student of Little Master English Higher Secondary School, Oinam
3. Iqbal Hussain (24th rank), son of Md. Abdul Majid of Lilong Haoreibi Makha Leikei, student of Little Master English Higher Secondary School, Oinam
Higher Secondary Examination, 2011 
Conducted by Council of Higher Secondary Education, Manipur (COHSEM)
1. Md. Raeesh Khan (16th rank), son of Md. Najir Khan of Keibung
2. S. Noor Rahman (16th rank), son of S. Kasim of Thoubal Wangkhem
Pre Medical Test, 2011
1. Noorjahan (21st rank), daughter of Haji Md. Jalaluddin of Lilong Turel Achouba Ubakthong
2. Nashima Begum (26th rank), daughter of late Md. Abdul Rahman of Lilong Uku Maning
3. Sabera Banu (29th rank), daughter of Md. A. Rashid of Porompat
4. Halima Khilzi (30th rank), daughter of Md. Meihuddin of Hatta Minuthong
5. Md. Ayub Ali (36th rank), son of Md. Alimuddin of Lilong Haoreibi Mayai Leikei
6. Oinam Azmir (40th rank), son of Yusuf Ali of Oinam Sawombung
7. Buyamayum Bidyarani (43rd rank), daughter of B. Itocha Shah of Hiyanthang Palak
8. Ishaq Ali (64th rank), son of Rashid Ali of Moijing Lamkhai
9. Anjila Shahni (93rd rank), daughter of Md. Jahiruddin of Lilong Heinoumakhong
10. Md. Iquebal Ahmed (97th rank), son of Md. Abdul Salam of Oinam Sawombung
11. Syed Rubina (100th rank), daughter of Syed Haider Ali of Paona Bazaar Masjid Road
12. Chesam Rafiuddin Shah (106th rank), son of Tayeb Ali of Irong Chesaba Makha Leikei
13. Md. Mirza Abbas (117th rank), son of late Bashira Begum of Lilong Ushoipokpi
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