Tuesday, July 05, 2011

क्या बिहार में मुसलमान होना गुनाह है ??????




आज के बदलते दौर में यह सवाल संभवतः कई सवालों को जन्म देता है। मसलन क्या भारत वाकई में धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र नहीं है? अथवा क्या भारत के मुसलमानों को जीने का अधिकार नहीं है? अथवा क्या भारत के मुसलमानों को अभी भी कुर्बानियां देनी होगी, यह साबित कारने के लिये कि वे भी इसी माटी के सपूत हैं? जाहिर तौर इस सवाल का कोई मतलब नहीं होता अगर भारत में गुजरात नहीं होता या फ़िर गुजरात में नरेंद्र मोदी जैसा शासक नहीं होता। लेकिन दुर्भाग्य कहिये कि अब ये सवाल हमारे बिहार में भी उठने लगे हैं। यह सवाल उठा है उस व्यक्ति के शासनकाल में जो स्वयं को बिहार का सबसे काबिल मुख्यमंत्री बताते फ़िरते हैं और फ़िर बिहार की गरीब जनता के पैसे को विज्ञापन के रुप में बांटकर पालिटिशियन आफ़ द इयर का अवार्ड लेना इनका शौक बन चुका है।

जी हां, हम बात कर रहे हैं, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की। इनकी बात हम बाद में करेंगे। सबसे पहले हम बात करेंगे उपर तस्वीर में दिख रहे चेहरों की। इन सभी लोगों का गुनाह यह है कि ये सभी बिहार के अररिया जिले के फ़ारबिसगंज के निवासी हैं। इनमें से एक अब इस दूनिया में नहीं है। लेकिन 3 जून तक वह बिहार का वासी था। उसके साथ कुछ और लोगों ने इस दूनिया को अलविदा कहा। यह उनके जाने का समय नहीं था। मरने वाले सभी की उम्र 35 वर्ष से कम ही रही होगी। इनमें से एक की उम्र तो केवल 7 महीने की थी। उसका नाम नौशाद था। उसकी मां उसे अपने गोद में छिपाये सुरक्षित स्थान की ओर भाग रही थी। पुलिस ने सामने से उस पर गोली चलाया और गोली नौशाद को लगी। 7 महीने का नौशाद खुशनसीब था कि उसकी मौत मां की गोद में हो गई। नौशाद की मां अपने लाल को मरा देख दहाड़े मारकर रोने लगी। पुलिस को फ़िर भी रहम नहीं आई। उसने नौशाद की मां पर भी गोली चलाई। गोली उसके जांघ में लगी और वह गिर पड़ी। एक तरफ़ नौशाद की लाश पड़ी थी, तो दूसरी ओर उसकी मां गोली लगने की वजह से बेसुध पड़ी थी।

कुछ दूरी पर एक और लाश पड़ी थी। वह लाश थी मुस्तफ़ा की। मुस्तफ़ा 18 वर्ष का नौजवान था। वह फ़ारबिसगंज में ही कर्बला के पास पान की दूकान चलाया करता था। उसके पिता फ़ुलकान अंसारी ने बताया कि उनका बेटा बाजार से सामान लेकर लौट रहा था। इसी बीच वह पुलिस की गोली का शिकार हो गया। 18 साल के नौजवान मुस्तफ़ा को पुलिस ने 4 गोलियां मारी थी। लेकिन वह मरा नहीं था। उसके शरीर में जान बाकी थी। एक पुलिस वाला उसके शरीर पर कूद रहा था और उसे अपने बूट से मारे जा रहा था। मुस्तफ़ा मरा तो नहीं, लेकिन उसके शरीर में प्रतिरोध की शक्ति नहीं थी। वह पुलिस वाला उस बेजान पर अपनी मर्दानगी दिखा रहा था। बाद में पुलिस ने उसे मरा हुआ जानकर पोस्टमार्टम के लिये भेज दिया। पोस्टमार्टम के दौरान डाक्टरों ने उसे जीवित पाया। डाक्टरों ने उसे तत्काल ही इलाज के लिये भेज दिया और उसे तत्काल ही आक्सीजन लगाया गया। लेकिन तबतक बहुत देर हो चुकी थी और इस बार वह हमेशा-हमेशा के लिये मर चुका था।

एक महिला भी सुशासक नीतीश कुमार के राज में पुलिस की गोली का शिकार हुई। वह भी फ़ारबिसगंज के भजनपुर गांव की ही रहने वाली थी। उसका पति उसी निर्माणाधीन फ़ैक्ट्री में काम करता था, जिस फ़ैक्ट्री के संचालकों के दबाव पर बिहार पुलिस ने लोगों पर कहर बरपाया। वह गर्भवती थी। उसके पेट में 6 माह का बच्चा था। वह बाजार में एक मैटरनिटी सेंटर से अपना चेक अप कराकर घर लौट रही थी। लेकिन वह घर नहीं पहुंच सकी। इसकी वजह रही कि वह घर पहुंचने से पहले ही परलोक सिधार चुकी थी। उस गर्भवती महिला और उसके अजन्मे बच्चे को भी नीतीश कुमार की पुलिस ने गोली से मार दिया। जरा सोचिये कि आखिर उस महिला ने बिहार के मुखिया अथवा सत्ता में बैठे लोगों अथवा उस कंपनी के मालिकों का कौन सा हक छीनने का प्रयास किया कि पुलिस ने उसे एक नहीं 6 गोलियां मारी।
जाहिर तौर पर इन सवालों का जवाब बिहार सरकार के पास नहीं है। बिहार सरकार की गद्दी पर जो महानुभाव बैठे हैं, उनका एक ही एजेंडा है। गरीबों को मारो, उद्यमियों को खुश रखो। विकास के इसी फ़ार्मूले को नीतीश कुमार न्याय के साथ विकास कहते हैं।
खैर, उस घटना, घटना के कारणों और घटना को अंजाम देने वाले लोगों के बारे में बता दें कि आखिर क्यों और किसने भजनपुर गांव के लोगों के घर में लाशों का ढेर लगा दिया। बदलता बिहार का एक बदलता हुआ जिला है अररिया जिला। इस जिले को सरकार ने दो हिस्सों में बांट रखा है। एक हिस्सा खास अररिया के नाम से जाना जाता है तो दूसरे हिस्से को लोग फ़ारबिसगंज के नाम से जानते हैं। वह वही फ़ारबिसगंज है, जहां कभी मैला आंचल के जनक फ़णीश्वरनाथ रेणु का जन्म हुआ था। इसी फ़ारबिसगंज में एक गांव है भजनपुर गांव और इसके बगल में एक और गांव है रामपुर। नाम से लगता है कि ये दोनों गांव हिन्दूओं के गांव होंगे। लेकिन भारतीय धर्मनिरपेक्षता का अधूरा प्रमाण कि इन दोनों गांवों के अधिकांश वाशिंदे मुसलमान हैं।

वर्ष 1984-85 में बिहार सरकार ने इन गांवों की सीमा में करीब 150 एकड़ जमीन अधिग्रहण किया। जमीन अधिग्रहण का मकसद इस जमीन पर उद्योग लगाना था। लेकिन जमीन अधिग्रहण के बावजूद इस जमीन पर कोई फ़ैक्ट्री नहीं लग सकी। अभी एक साल पहले ही बिहार सरकार ने देहरादून की एक कंपनी औरो सुन्दरम इन्टरनेशनल प्राइवेट कंपनी को यह जमीन एक स्टार्च फ़ैक्ट्री लगाने के लिये दी। इसी जमीन के बीचों-बीच एक सड़क थी जो भजनपुर गांव के लिये लाइफ़लाइन थी। इस गांव के लोग इस रास्ते का उपयोग अपने पूर्वजों के जमाने से करते आये हैं। कंपनी वाले स्थानीय प्रशासन पर जमीन खाली कराने का दबाव दे रहे थे। लेकिन जब पुलिस और अन्य स्थानीय पदाधिकारी अपनी इस कोशिश में नाकाम हुए तब, 29 मई को सूबे के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी स्वयं फ़ारबिसगंज पहूंचे और उन्होंने स्थानीय प्रशासन को किसी भी कीमत पर जमीन पर कब्जा करने का निर्देश जारी किया।
दरअसल यह जमीन जिसके नाम पर बिहार सरकार ने आवंटित किया है, वह भाजपा विधानपार्षद अशोक अग्रवाल का बेटा है। यह वही अशोक अग्रवाल हैं जिनपर हत्या करने का एक मामला हाईकोर्ट में चल रहा है और इनके उपर स्मगलिंग करने का आरोप भी लग चुका है। जब स्थानीय प्रशासन आम नागरिकों को समझाने में असफ़ल रही तो उसने 2 जून को ही ग्रामीणों के साथ लिखिज समझौता किया। लिखित समझौते के हिसाब से कंपनी को पहले गांव में आने-जाने के लिये रास्ता बनवाने का वायदा किया गया। लेकिन 3 जून को दोपहर में पुलिस वालों की मौजूदगी में कंपनी वालों ने भजनपुर गांव के लोगों के लाइफ़लाइन पर दीवार खड़ी कर दी। फ़िर क्या था, यह खबर इलाके में जंगल की आग की तरह फ़ैल गई। लोग जूटने लगे। गांव वाले दीवार हटाने की मांग कर रहे थे। लेकिन जब प्रशासन की ओर से बातचीत के लिये कोई पहल नहीं की गई तब ग्रामीणों का आक्रोश बढने लगा। इस बीच ग्रामीणों ने कंपनी प्रबंधकों द्वारा बनाये गये नवनिर्मित दीवार को ढाह दिया। इस घटना से आपा खोते हुए स्थानीय आरक्षी अधीक्षक ने फ़ायरिंग करने का आदेश दे दिया। फ़िर जो कुछ हुआ, उस पर अफ़सोस ही जताया जा सकता है।
खैर, अब इस घटना को बीते कई सप्ताह हो चुका है और अभी तक मृतकों के परिजनों और घायलों को मुआवजा नहीं दी गई है। इस पर तुर्रा यह कि राज्य का सुशासक यह दलील दे रहा है कि सभी को मुआवजा न्यायिक जांच के बाद दी जायेगी। यानि पहले पूरे घटना की जांच की जायेगी और फ़िर मुआवजे की राशि तय की जायेगी।
वैसे इस संबंध में मेरी निजी राय है कि बिहार सरकार को इस घटना के लिये जिम्मेवार लोगों को कोई मुआवजा नहीं देना चाहिये। सबसे पहले तो मुआवजा उस कंपनी के प्रबंधकों को मिलनी चाहिये, जिसे इतना नुकसान हुआ। गरीब ग्रामीणों का क्या है, उन्हें मुआवजा देने से क्या लाभ? वैसे भी गलती उनकी है कि उन्होंने सच के लिये अपनी कुर्बानी दी और आज की तारीख में ऐसे लोगों को शहीद कहा जाता है। शहीदों की शहादत की कोई कीमत नहीं होती है। शहीदों की शहादत कभी बेकार नहीं जाती। संभव है कि लाशों के ढेर पर बिहार में खड़ा होने वाले उद्योगों से बिहार की गरीबी दूर हो। हालांकि एक सवाल यह भी क्या वाकई इस राज्य में मुसलमान होना कोई पाप है। जरा सोचिये कि अगर भजनपुर और रामपुर गांव के लोग मुसलमान के बजाय हिन्दू होते तो क्या भाजपाई उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी अपने दल के क्रिमिनल विधान पार्षद अशोक अग्रवाल के पक्ष में बिहार की भलमानस पुलिस को ग्रामीणों पर फ़ायरिंग करवाते। इसका सीधा जवाब है- नहीं। इसका एक प्रमाण यह कि जब उत्तरप्रदेश के नोयडा के एक गांव में जमीन अधिग्रहण को लेकर हिंसा हुई तो भाजपा के सभी बड़े नेताओं सहित सुशील मोदी ने भी उत्तप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती की आलोचना की थी। बहरहाल, हम तो आप सभी से इसी सवाल का जवाब जानना चाहते हैं-


Friday, July 01, 2011

बालकृष्ण योगी का झूठ और नेपाल से उजागर होता सच



बालकृष्ण मामले में अबतक का सबसे बड़ा खुलासा
बाबा रामदेव के दाहिने हाथ और पातंजलि योगपीठ के मुख्य कर्ताधर्ता बालकृष्ण योगी की नागरिकता को लेकर 5 मई से शुरू  हुआ तमाशा  अभी थमा नहीं है। कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने बालकृष्ण को नेपाल का गुण्डा और नेपाल के कई मामलों में अपराधी बताया है। वहीं बालकृष्ण को लेकर उत्तराखण्ड खुफिया पुलिस की स्थानीय ईकाई की ओर से जारी रिपोर्ट में उन्हें नेपाली नागरिक के तौर पर चिन्हित किया गया है और उनके पासपोर्ट को संदेहास्पद। पासपोर्ट के अनुसार बालकृष्ण पुत्र रामकृष्ण , गांव-टिटोरा, थाना-कथौली का पता ही उनके पासपोर्ट के संदेहास्पद होने का आधार है। इसी खुफिया रिपोर्ट के आधार पर कुछ भारतीय चैनल और अखबार दावा कर रहे हैं कि उनके पास बालकृष्ण की असलियत है। 
 बालकृष्ण के छोटे भाई और मौसी का लड़का, पहले गेट   फिर घर में                       सभी फोटो - अजय प्रकाश

मीडिया के पास बालकृष्ण की क्या असलियत हैवह उजागर होता उससे पहले ही बालकृष्ण ने प्रेस कांफ्रेंस आयोजित कर रोने-धोने के माहौल के साथ जो इमोशनल अत्याचार किया हैजाहिर है उसके पीछे सिर्फ भय है। भय बालकृष्ण को नेपाली गुण्डा होने का नहीं हैकई मामलों में अपराधी होने का भी नहीं हैबल्कि उनका भय नेपाल के स्यान्जा  जिले के वालिंग कस्बे के उस स्कूल से हैजहां उन्होंने चौथी कक्षा तक पढ़ाई की थी। इसी वजह से यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या भारत का नागरिक बनने के लिए जो तकनीकी खानापूर्ति करनी होती हैउसे बालकृष्ण ने पूरा किया है या नहीं। अगर ऐसा नहीं किया गया है तो बालकृष्ण की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

बालकृष्ण ने मीडिया के सामने आकर कहा कि उनकी पैदाइश  और पढ़ाई भारत में ही हुई है और वे भारत के नागरिक हैं। यह बालकृष्ण का आधा सच है, क्योंकि बालकृष्ण के भारत में पैदा होने की बात तो उनको जानने वाले कहते हैं, मगर पढ़ाई का प्रमाण तो उस रजिस्टर में दर्ज है जो नेपाल के स्यांजा जिले के वालिंग कस्बे के एक प्राथमिक स्कूल में पड़ता है। बालकृष्ण जिस कस्बे के रहने वाले हैं, वहां के लोगों का कहना है कि उनके मां-बाप जब भारतीय तीर्थस्थलों के दर्शन  करने गये थेउसी समय बालकृष्ण का जन्म भारत में हुआ था।

इस मामले से जुड़ी पहली तथ्यजनक खबर सिर्फ जनज्वार के पास है, लेकिन जनपक्षधरता की अपनी परंपरा को जारी रखते हुए हमें यह वाजिब नहीं लगा कि कालेधन और भ्रष्टाचार के खिलाफ बन रहे एक राष्ट्रव्यापी माहौल के बीच सस्ती लोकप्रियता और सनसनी फैलाने के लिए संघर्ष  में लगे लोगों की खुर्दबीन की जाये। क्योंकि अगर यही खोजी रिपोर्टिंग है तो पहली खोजी खबर अपने उन माफिया मालिकों के खिलाफ लिखनी होगी, जिनके दिये पैसों से हम मीडिया में मुनाफे का बाजार खड़ा करते हैं।

वैसे में सवाल अब यह उठता है कि जनज्वार ने बालकृष्ण  मामले में अपनी खोजी रिपोर्ट को अब जारी करने की जरूरत क्यों समझी। तो जवाब है, ‘सिर्फ इसलिए कि बालकृष्ण को लेकर जो धुंध और धंधा फैलाने की कोशिश हो रही है, उसके सच को सामने लाया जाये, जिससे बालकृष्ण सच का सामना करने को मजबूर हों न कि गुण्डा और अपराधी होने के फर्जी आरोपों की सांसत झेलने में उलझें। 


बालकृष्ण के चाचा के लड़के और स्कूल  
भारत की सोनौली सीमा से नेपाल के बुटवल के रास्ते काठमांडू की ओर बढ़ने पर पोखरा जिले से पहले स्यांजा पड़ता है। बालकृष्ण योगी का घर स्यांजा जिले के भरूआ गांव में है और वह स्कूल गांव के ऊपर,जिसके रजिस्टर में बालकृष्ण के चौथी तक पढ़ने का साक्ष्य दर्ज है। 
इस सिलसिले में हमारी पहली मुलाकात बालकृष्ण   के चाचा के लड़कों से होती है जो अपने नामों के पीछे सुवेदी लगाते हैं। वालिंग कस्बे में दुकान चला रहे बालकृष्ण  के चाचा के लड़कों से पता चलता है कि भरूआ गांव ब्राह्मणों का है और वहां सुवेदी ब्राह्मणों की तादाद ज्यादा है। उनमें से एक जो फोटो में सबसे किनारे है, वह बालकृष्ण   के साथ ही पढ़ा होता हैलेकिन जब मैं उससे दुबारा उसका नाम पूछता हूं तो उसको मुझ पर संदेह होता है और वह हंसते हुए नाम बताने से इंकार कर देता है।

मैं हाथ में डायरी नहीं निकालता, क्योंकि अपना परिचय उनको मैंने बालकृष्ण के दोस्त के रूप में दिया होता है और रिकॉर्डर तो बिल्कुल भी नहीं। मुझे ऐसा इसलिए करना पड़ता है कि जिनके जरिये यहां मैं पहुंचा हुआ होता हूं उन्होंने हिदायत दे रखी थी कि ऐसी कोई गलती मत करना जिससे तुम गांव न जा सकोजहां वह स्कूल है। तस्वीर में दिख रहे दो लोग जिनकी उम्र ज्यादा हैवह बताते हैं कि जब बालकृष्ण चौथी कक्षा के बाद भारत चले गये थे तो भी वह बाबा रामदेव के साथ आया करते और जंगलों में जड़ी-बूटियां ढूंढ़ा करते थे। उनसे ही पता चला कि पिछले दस-बारह वर्षों से बालकृष्ण यहां नहीं दिखे, हां उनकी कमाई से वालिंग में बनवाई गयी आलीशान कोठी जरूर दिखती है, जो इसी साल तैयार हुई है.

बालकृष्ण के चाचा के उन दुकानदार लड़कों से मैं कहता हूं कि उस कोठी तक हमें ले चलो, शायद आप लोगों की वजह से हमसे उनके परिवार के लोग बात कर लेंगे, लेकिन वह नहीं जाते हैं। पते के तौर पर वे बस इतना कहते हैं कि जो कोठी दूर से दिखे और कस्बे में सबसे सुंदर हो उसी में घुस जाना।

कोठी का गेट खटखटाने पर हमारी आवभगत के लिए दो बच्चे आते हैं। उन दोनों से मैं हाथ मिलाता हूं और गेट के अंदर दाखिल होता हूं। उनमें से एक फर्राटेदार हिंदी बोलता है और बताता है कि वह बालकृष्ण का सबसे छोटा भाई नारायण सुवेदी है। फिर साथ के लड़के के बारे में पता चला है कि वह मौसी का लड़का है। अब हम उनके डायनिंग रूम में होते हैं जहां बड़े स्क्रीन की टीवी लगी होती है। हमें लड्डू खाने को दिया जाता है। उस समय मैं बच्चों को अपना परिचय बालकृष्ण के दोस्त के रूप में देता हूं और बताता हूं कि मैं तुम्हारे गांव चलना चाहता हूं। गांव जाने की बात सुन नारायण खुश होता है और आत्मीयता से कहता है गांव यहां से चार किलोमीटर दूर है और पैदल ही पहाड़ियों पर चलना होता है, इसलिए इस समय चलना खतरनाक होगा, कल सुबह यहां से निकल लेंगे।
बालकृष्ण का स्कूल और भरुआ में उनका घर

तभी अधेड़ उम्र की एक महिला दिखती है। उसको नमस्कार करने के बाद नारायण बताता है कि वह उसकी मौसी है और मां गांव में है। वह महिला थोड़ी देर तक मुझे देखती है और फिर करीब घंटे भर बाद किसी पवन सुवेदी को लेकर आती है, जो खुद को बालकृष्ण की मौसी का बेटा बताता है। वह मुझसे कुछ रुष्ट  दिखता है वह इशारे से बच्चों को अपने पास बुलाता है, जिसके बाद बच्चे वहां नहीं दिखते। थोड़ी देर बाद पवन सुवेदी एक नयी कहानी बताता है कि बालकृष्ण के माता-पिता तीर्थ करने काठमांडू गये हैं और पंद्रह दिनों बाद आयेंगे। मैं फिर भी गांव जाने की बात कहता हूं तो वह शुरू में तो इंकार करता है, फिर कहता है ठीक है सुबह देखेंगे।’ लेकिन वह साफ कह देता है कि इस घर में आप रात नहीं गुजार सकते।

तब तक करीब रात के आठ बज चुके होते हैं और मैं कहीं दूसरी जगह जा पाने में खुद को असमर्थ बताता हूं तो वह मुझे कस्बे के एक होटल में ले जाता हैजहां मैं दो सौ नेपाली रुपये में एक कमरे के बीच तीन लोगों के साथ सोता हूं। होटल कैसा था इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि मैंने सुबह उसके शौचालय  में जाने के मुकाबले खेत में जाना पसंद किया था।

अब मेरी अगली चिंता एक ऐसे आदमी की तलाश  की होती है जो मुझे भरूआ गांव ले जायेक्योंकि सुबह बालकृष्ण की आलीशान कोठी में बड़ा ताला जड़ा होता है। बहरहाल, मुझे एक कुरियर मिल जाता है जो मुझे गाँव तक ले जाता है। कुरियर कहता है पहले गांव चलते हैं और लौटते हुए स्कूल। मेरे दिमाग में आता है कि अगर गांव में बात बिगड़ गयी तो स्कूल से मिलने वाली जानकारी से हम लोग चूक जायेंगे।

हम पहले स्कूल के मास्टर से मिलते हैं जो हमें बताता है कि वह नया आया है। वह आगे बताता है कि बालकृष्ण ने बचपन में यहीं पढ़ाई की है। उसके बाद हम मास्टर की मदद से रजिस्टर खोजने में लग जाते हैं। कई वर्षों का रजिस्टर खंगालने के बाद हमें पता चलता है कि बालकृष्ण नाम का कोई छात्र ही नहीं है। हम बालकृष्ण के पिता जयबल्लभ सुवेदी के नाम से खोजते हैं तो एक नाम डंभर प्रसाद  सुवेदी का मिलता है, जिसमें पिता के तौर पर जयबल्लभ सुवेदी नाम दर्ज होता है। बालकृष्ण का असल नाम डंभरदास सुवेदी है, यह इसलिए भी पक्का हो जाता है क्योंकि बालकृष्ण के चाचा के लड़कों ने भी बालकृष्ण का यही नाम बताया होता है। दूसरा प्रमाण यह भी रहा कि बालकृष्ण का चौथी कक्षा के बाद नाम रजिस्टर से कट जाता हैजो अगली कक्षाओं के उपस्थिति रजिस्टरों में नहीं दिखता है। जबकि जयबल्लभ सुवेदी के दूसरे बेटों का नाम रजिस्टर में है.   

जब यह साफ हो जाता है कि बालकृष्ण सुवेदी उर्फ डंभर प्रसाद  सुवेदी ही जयबल्लभ सुवेदी के चार लड़कों में से एक हैं और उनका गांव घाटी में स्थित भरूआ हैतो हम उनके मां-बाप से मिलने भरूआ की ओर चल देते हैं। करीब दो घंटे पैदल चलने के बाद हम बालकृष्ण के घर पहुँचते हैं और हमारी मुलाकात उनकी मां से होती है। अभी हम उनकी मां से कुछ पूछते उससे पहले ही आलीशान कोठी में मिले नारायण सुवेदी और उसकी मौसी का लड़का एक साथ नेपाली में चिल्ला पड़ते हैं और वह औरत घर में घुसकर खुद को अंदर से बंद कर लेती है, लेकिन इस बीच कैमरे ने अपना काम कर लिया होता है और हम बालकृष्ण की मां का फोटो खींच लेते हैं। 

 
 रजिस्टर में ६३ नम्बर पर डंभर प्रसाद सुवेदी है , 

और गाँव में उनकी माँ
 
घर में छुपी मां से बाहर आने को कहा तो कुरियर ने बताया कि वह गाली दे रही है और कैमरा छिनवाने की बात कह रही है। कुरियर ने आगे कहा कि बालकृष्ण की मां अपने छोटे बेटे नारायण सुवेदी को पिता और भाइयों को बुला लाने की बात कह रही है। दूसरे ही पल हमने देखा कि खेतों में काम कर रहे कुछ लोगों की ओर नारायण बड़ी तेजी से घाटी में उतरता जा रहा है और कुछ चिल्लाता जा रहा है। 
हमने कुरियर से पूछा अब क्या करें?उसने कहा कि वह गाँव  में कई लोगों को जानता है और उसकी अच्छी साख हैइसलिए कोई मारपीट तो नहीं कर सकतालेकिन कैमरा छीन लेंगे। मैंने पूछा ऐसा क्योंकुरियर का कहना था कि यहां गांव की परंपरा के हिसाब से कोई औरत का फोटो नहीं खींच सकता। 

फिर हमने कुरियर के बताये अनुसार निर्णय लिया कि यहां से भागना चाहिए। लेकिन हम घाटी से पहाड़ी पर उस रास्ते से नहीं जा सकते थे, जो सामान्य रास्ता था या जिस रास्ते से आये थे। पकड़ से बचने के लिए हमें जंगल के रास्ते वालिंग कस्बे का रास्ता तय करना पड़ा। हमने दिन के 11 बजे चलना शुरू किया था और दुबारा वालिंग कस्बे में पोखरा के लिए गाड़ी पकड़ने के लिए 4 बजे पहुंच पाये थे।

भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान के पीछे कहीं साम्प्रदायिकता की राजनीति तो नहीं




बहुत दिन बाद कुछ चुनिन्दा पत्रकारों से मुखातिब हुए मनमोहन सिंह ने अपनी बात बतायी. उनके मीडिया सलाहकार के पांच मित्र पत्रकारों के कान में उन्होंने कुछ बताया लेकिन जब देखा कि वहां से निकलकर वे संपादक लोग प्रेस कानफरेंस करने लगे हैं और प्रधान मंत्री की बात पर अपनी व्याख्या कर रहे हैं तो हडबडी में करीब नौ घंटे बाद प्रधानमंत्री कार्यालय की वेबसाईट पर सरकारी पक्ष भी रख दिया गया.उनके दफतर वालों की मेहनत से जारी की गयी ट्रान्सक्रिप्ट पर नज़र डालें तो साफ़ लगता है कि दिल्ली के सत्ता के गलियारों में तैर रही बहुत सारी कहानियों को खारिज करने के लिए प्रधानमंत्री ने इन पंज प्यारों को तलब किया था.उन्होंने एक बार फिर ऐलान किया कि वे कठपुतली प्रधानमंत्री नहीं हैं . राहुल गाँधी को प्रधानमंत्री बनाने के अभियान को भी उन्होंने अपने तरीके से हैंडिल करने की कोशिश की . कांग्रेस के एक वर्ग की तरफ से चल रहे उस अभियान को भी उन्होंने दफन करने की कोशिश की जिसके तहत दिल्ली में यह कानाफूसी चल रही है कि सारे भ्रष्टाचार की जड़ में प्रधानमंत्री ही हैं . देश में ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि अपने आप को बचाने के लिए ही वे प्रधानमंत्री पद को लोकपाल के घेरे में नहीं आने देना चाहते . लेकिन डॉ मनमोहन सिंह ने बहुत ही बारीकी से यह बात स्पष्ट कर दी कि दरअसल कांग्रेस का वह वर्ग प्रधानमंत्री को लोकपाल से बाहर रखने के चक्कर में है जो भावी प्रधानमंत्री की टोली में है. जहां तक उनका सवाल है , वे तो प्रधानमंत्री को लोकपाल की जांच में लाना चाहते हैं . राहुल गाँधी को प्रधानमंत्री बनवाने की कोशिश में लगे नेताओं को उनके इस बयान का असर कम करने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ेगी. संपादकों से प्रधानमंत्री के संवाद की यह वे बातें हैं जो आम तौर पर सबकी समझ में आयीं और टेलिविज़न में काम करने वाले कुछ अफसर पत्रकारों ने इसे टी वी के ज़रिये पूरी दुनिया को बताया और सर्वज्ञ की मुद्रा में बहसों को संचालित किया . दिल्ली शहर में बुधवार को कई ऐसे पत्रकारों के दर्शन हुए जो कई वर्षों से प्रधानमंत्री और उनके मीडिया सलाहकार के ख़ास सहयोगी माने जाते थे लेकिन संवाद में नहीं बुलाये गए. उनके चहरे लटके हुए थे. जो लोग नहीं बुलाये गए थे उन्होंने अपने अपने चैनलों पर बाकायदा प्रचारित करवाया कि प्रधानमंत्री अपनी कोशिश में फेल हो गए हैं .इन बातों का कोई मतलब नहीं है , दिल्ली में यह हमेशा से ही होता रहा है .ज़्यादातर प्रधानमंत्री इन्हीं मुद्दों में घिरकर अपने आपको समाप्त करते रहे हैं .केवल जवाहरलाल नेहरू ऐसे व्यक्ति थे जिनको हल्की बातों में कभी नहीं घेरा जा सका.प्रधानमंत्री ने आर एस एस और बीजेपी की अगुवाई में शुरू किये गए उस अभियान को पकड़ने की कोशिश की जिसके बल पर हर बार आर एस एस ने देश की जनता को अपनी राजनीति का हिस्सा बनाने में सफलता पायी है . उन्होंने संसद, सी ए जी और मीडिया से अपील की उनकी सरकार को सबसे भ्रष्ट सरकार साबित करने की आर एस एस की कोशिश का हिस्सा न बनें और पूरी दुनिया के माहौल को नज़र में रख कर फैसले करें.उन्होंने कहा कि निहित स्वार्थ के लोग उनकी सरकार को लुंजपुंज सरकार साबित करने की फ़िराक़ में हैं और मीडिया उनको हवा दे रहा है. उन्होंने मीडिया से अपील की कृपया सच्चाई की परख के बाद ही अपनी ताक़त का इस्तेमाल सरकार के खिलाफ करें. 
भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाने की आर एस एस और बीजेपी की कोशिश को पकड़कर प्रधानमंत्री ने निश्चित रूप से दक्षिणपंथी राजनीति को अर्दब में लेने की कोशिश की है .यह बात स्पष्ट कर देने की ज़रुरत है कि १९६७ से लेकर अबतक लगभग सभी सरकारें भ्रष्ट रही हैं . उन पर विस्तार से चर्चा करने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि सब को मालूम है कि टाप पर फैले भ्रष्टाचार का शिकार हर हाल में गरीब आदमी ही होता है और उसे मालूम है कि सरकार भ्रष्ट है . लेकिन भारत के समकालीन इतिहास में तीन बार केंद्रीय सरकार को भ्रष्ट साबित करके आर एस एस ने अपने आपको मज़बूत किया है. यह अलग बात है कि २००४ के चुनावों में कांग्रेस ने भी बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार को महाभ्रष्ट साबित करके एन डी ए की सरकार को पैदल किया था . लेकिन केंद्र की कांग्रेस सरकार को भ्रष्ट साबित करने की कोशिश के बाद हमेशा ही आर एस एस के हाथ सत्ता लगती रही है . इस विषय पर थोड़े विस्तार से चर्चा कर लेने से तस्वीर साफ़ होने में मदद मिलेगी. १९७४ में जब जयप्रकाश नारायण का आन्दोलन शुरू हुआ तो उसमें बहुत कम संख्या में लोग शामिल थे लेकिन जब के एन गोविन्दाचार्य ने पटना में उनसे मुलाकात की और आर एस एस को उनके पीछे लगा दिया तो बात बदल गयी. राजनीति की सीमित समझ रखने वाली इंदिरा गाँधी ने थोक में गलतियाँ कीं और १९७७ में अर एस एस के सहयोग से केंद्र में जनता पार्टी की सरकार बन गयी. महात्मा गाँधी की हत्या के आरोपों की काली छाया में जी रहे संगठन को जीवनदायिनी ऊर्जा मिल गयी.आर एस एस की ओर से बीजेपी में सक्रिय ,उस वक़्त के सबसे बड़े नेता, नानाजी देशमुख ने खुद तो मंत्री पद नहीं स्वीकार किया लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी को कैबिनेट में अहम विभाग दिलवा दिया . जनता पार्टी की सरकार में आर एस एस के कई बड़े कार्यकर्ता बहुत ही ताक़तवर पदों पर पंहुच गए. बाद में समाजवादी चिन्तक और जनता पार्टी के नेता मधु लिमये ने इन लोगों को काबू में करने की कोशिश की लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी . आर एस एस वालों ने जनता पार्टी को तोड़ दिया और बीजेपी की स्थापना कर दी. लेकिन आर एस एस के नियंत्रण में एक बड़ी राजनीतिक पार्टी आ चुकी थी. आज के बीजेपी के सभी बड़े नेता उसी दौर में राजनीति में आये थे और आज उनके सामने ज़्यादातर पार्टियों के नेता बौने नज़र आते हैं .राजनाथ सिंह , सुषमा स्वराज, नरेंद्र मोदी, सुशील कुमार मोदी सब उसी दौर के युवक नेता हैं .दिलचस्प बात यह है कि केवल राजनीतिक लाभ के लिए भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चलाया गया था क्योंकि सत्ता में आने के बाद जनता पार्टी की सरकार अपनी पूर्ववर्ती कांग्रेस से भी ज्यादा भ्रष्ट साबित हुई .
दूसरी बार भ्रष्टाचार के खिलाफ जब आर एस एस ने अभियान चलाया तो मस्कट के रूप में राजीव गाँधी के वित्तमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह को आगे किया गया . राजीव गाँधी की टीम में राजनीतिक रूप से निरक्षर लोगों का भारी जमावड़ा था . उन लोगों ने भी भ्रष्टाचार के मुद्दे को ठीक से नहीं संभाला और वी पी सिंह की कठपुतली सरकार बना दी गयी. उस सरकार का कंट्रोल पूरी तरह से आर एस एस के हाथ में था और बाबरी मस्जिद के मुद्दे को हवा देने के लिए जितना योगदान वी पी सिंह ने किया उतना किसी ने नहीं किया . वी पी सिंह के अन्तःपुर में सक्रिय सभी बड़े नेता बाद में बीजेपी के नेता बन गए. अरुण नेहरू, आरिफ मुहम्मद खान और सतपाल मलिक का नाम प्रमुखता से वी पी सिंह के सलाहकारों में था . बाद में सभी बीजेपी में शामिल हो गए.बाबरी मस्जिद के मुद्दे को पूरी तरह से गरमाने के बाद भ्रष्टाचार और बोफर्स को भूल कर आर एस एस ने केंद्र में सत्ता स्थापित करने की रण नीति पर काम करना शुरू कर दिया था..
भ्रष्टाचार के मुद्दे पर देश को लामबंद करके सत्ता हासिल करने के नुस्खे को आर एस एस ने बार बार आजमाया है.यह भी पक्की बात है कि उसके बाद सत्ता भी मिलती है . लेकिन इस बार लगता है कि मनमोहन सिंह उनकी इस योजना की हवा निकालने का मन बना चुके हैं . आर एस एस ने पहले तो अन्ना हजारे को आगे करने की कोशिश की लेकिन सोनिया गाँधी ने उनको अपना बना लिया .बीजेपी के नेता बहुत निराश हो गए .अन्ना हजारे का इस्तेमाल मनमोहन सिंह के खिलाफ तो हो रहा है लेकिन वे बीजेपी के राजसूय यज्ञ का हिस्सा बनने को तैयार नहीं हैं . इस खेल के फेल होने पर बीजेपी अध्यक्ष ,नितिन गडकरी ने योग के टीचर रामदेव को आगे किया लेकिन भ्रष्टाचार की हर विधा में गले तक डूबे रामदेव अब उनकी जान की मुसीबत बने हुए हैं . इन सारे नहलों पर बुधवार को चुनिन्दा और वफादार संपादकों को बुलाकर प्रधान मंत्री ने भारी दहला मारा और साफ़ संकेत दे दिया कि भ्रष्टाचार विरोधी अभियान की मंशा को वे उजागर कर देंगें . ज़ाहिर है इस संकेत में यह भी निहित है कि वे पब्लिक डोमेन यह सूचना भी डाल देने वाले हैं कि भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर आर एस एस अपनी साम्प्रदायिक राजनीति को चमकाने के फ़िराक़ में है . जानकार समझ गए हैं कि प्रधानमंत्री ने भ्रष्टाचार को निहित स्वार्थों का एजेंडा साबित करने की कोशिश करके अपनी पार्टी के उन लोगों को भी धमकाने की कोशिश की है जो उनको राहुल गाँधी का नाम लेकर डराते रहते हैं . जहां तक बीजेपी का सवाल है उनको तो सौ फीसदी घेरे में लेने की योजना साफ़ नज़र आ रही है . जो भी हो अगले कुछ महीने साम्प्रदायिक राजनीति के विमर्श में इस्तेमाल होने वाले हैं . अगर प्रधानमंत्री ने देश की सेकुलर जमातों को अपना ,मकसद समझाने में सफलता हासिल कर ली तो एक बार बीजेपी फिर बैकफुट पर आ जायेगी.
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